Thursday, November 12, 2009

व्यंग्य- आओ पब्लिक को सभ्य बनाने में जुट जाएँ - प्रमोद ताम्बट

सुना हैं कि मजदूर-किसानों के साम्यवादी मुल्क चीन ने अपने आप को असभ्य दिखने से बचाने के लिए अपने नागरिकों के पाजामा पहनकर बाहर निकलने पर भृकुटियाँ वक्र कर लीं हैं। वे नहीं चाहते कि वहाँ होने वाले वर्ल्ड एक्सपों 2010 के दौरान चीनी जन सार्वजनिक जगहों पर पाजामा पहनकर असभ्यता का प्रदर्शन करें। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्लासी दिखाने के लिए शंघाई प्रशासन ने चीनियों की छोटी सी नाक में नकेल डालना शुरू कर दी है। नेक इरादा है। सर्वहारा के मुल्क में जब पूँजीवादियों का जमावड़ा हो तो एहतियात तो बरतना ही चाहिये। हमें भी समय-समय पर अपने देश में होने वाले भूमंडलीय आयोजनों के मद्देनज़र तुरंत चीनियों के इस कदम का अनुसरण कर लेना चाहिए क्योंकि हमारे यहाँ भी काफी कुछ दलिद्दर यहाँ-वहाँ बिखरा हुआ है जिसे विदेशी मेहमानों से छुपाना बेहद जरूरी है। ।
हमारे महानगरों में गाँव-खेड़ों से लाखों की तादात में पहुँचने वाले गंवार और जाहिल लोग पाजामा, धोती-कुर्ता और लुँगी को घुटनों से भी ऊपर तक चढ़ाए हुए यहाँ-वहाँ स्वछंद घूमते, हमारी आधुनिक सभ्यता को मुँह चिढ़ाते नज़र आ जाते हैं। कई तो ऐसे भी मिल जाऐंगे जो कच्छा या घुटन्ना पहने ऐन एयर कंडीशन्ड शापिंग मॉल के सामने खड़े, विशाल अर्ध-गगनचुंबी मॉल और उसमें आने-जाने वाले सभ्यजनों को मूर्खों की भांति ताकते खडे़ होंगे और कुछ इन कच्छेधारियों की आधा-एक प्रतिशत सभ्यता को भी मुँह चिढ़ाते हुए, ठीक जैसे माँ के पेट से आए थे वैसे ही, सम्पूर्ण सभ्यता से मुक्त, शत-प्रतिशत वस्त्र विहीन दाँत निपोरते खड़े पाए जाएँगे।
भारत में अगले साल जोर-शोर से होने वाले कामनवेल्थ खेलों के समय दुनियाभर की विस्फारित नज़र हम पर होगी। अतुल्य भारत से अनजान कुछ उल्लू के पट्ठों की नज़र में तो यह परम्परागत प्रश्न टका होगा कि आखिर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का इतना बड़ा आयोजन हम करेंगे कैसे जबकि हमारे पास लोगों को निवृत कराने तक के लिए रेल पटरियों और खुले मैदानों के अलावा कुछ है ही नहीं। ऊपर से हम यूँ धोती-कुरते, लुंगी-पाजामों और कच्छों में यहाँ-वहाँ घूमते नज़र आ गए तो हमारी आधुनिक कार्पोरेटिव छवि को कितना धक्का लगेगा ! देश की कितनी बदनामी होगी ! विकसित देशों के लोग कहेंगे भारत में सभ्यता नाम की चीज़ अब भी नहीं है, जाहिल गंवार लोग अभी भी धोती-कुर्ता, कच्छा-पाजामा पहनकर सड़क पर चले आते हैं जबकि हम तो कबके नंगे घूमने लग पड़े हैं। इसलिए हमें अभी से व्यवस्था चाक-चौबंद कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोग अपनी-अपनी झुग्गियों, टपरों, कच्चे मकानों से बाहर ना निकलें। गाँवों, कस्बों छोटे-मोटे शहरों की झोपड़-पट्टियों में मौजूद मटमैले, चीकट लोग अपने-अपने दड़बों में ही बंद रहे। वे बाहर निकलेंगे तो सीधे शहरों की तरफ भागेंगे और आधुनिक सभ्यता का सत्यानाश करेंगे।
महिलाएँ भी देखिए बाबा आदम के ज़माने के घाघरे पहनकर जा पहुँचतीं है दिल्ली, मुंबई। हमारी प्रगति की रफ्तार के हिसाब से तो सलवार सूट और साड़ियाँ भी अब परिदृष्य से बाहर हो गईं हैं, और छोटे-छोटे लधु-मध्यम आकार के कपडे़ सभ्यता की निशानी बन गए हैं। ऐसे में औरतों का यूँ कुछ भी पहनकर टेक्नालॉजी पार्कों, सायबर-सिटियों और आधुनिक कॉल सेंटरों के सामने जाकर चाट-पकौड़ी खाते खड़े रहना कहाँ की सभ्यता है। इस गांवरूपने पर भी हमें डंडे फटकारने की ज़रूरत है, हाँ सड़क किनारे हॉट डॉग पिज्जाहट पर छोटी छोटी चिंदियाँ पहने नवयौवनाओं का नज़ारा मिले तो मज़ा आए, आधुनिकता एकदम से सिद्ध हो जाए।
ग्लोबलाइजेशन का तकाज़ा है कि जो आप वास्तव में हैं वह आप बिल्कुल ना दिखें। दुनिया के सभ्य लोगों के सामने हमारी ऐसी तस्वीर पेश हो कि लोग बेवकूफ गुरबक बनकर हमारे पास दौडे़ चले आएँ। आप भले ही ऊपर से बेहतरीन थ्री पीस सूट, महँगी टाई और जूते चढ़ाए हुए हों पर अन्दर कसी हुई लंगोट किसी को दिखना नहीं चाहिए। हमारे लोग भले ही मंदिरों, रेल्वे स्टेशनों, बस स्टेंडों, बाज़ारों और लाल बत्तियों पर भीख माँगते नज़र आएँ पर उन्हें अच्छे साफ-सुथरे कलफ लगे, इस्तरी किये कपड़ों में होना चाहिए। देश के तमाम मेट्रो शहरों में रेल्वे लाइन के इर्द-गिर्द मौजूद नर्क को तो हम कुछ नहीं कर पाएँगे परंतु उसमें बसे लोगों के कच्छे-पाजामें छीनकर हम उन्हें सभ्य तो बना ही सकते हैं। क्या देर-दार है भाई, हम जैसे अपने देश को आधुनिक बनाने की तैयारी में जोरशोर से लगे हुए हैं चीन की तरह हमारी पब्लिक को भी सभ्य बनाने में जुट जाएँ तो क्या हर्ज है।

8 comments:

  1. भाई साहब, बढ़िया लिखा है आपने… सिर्फ़ एक अर्ज है कि फ़ोण्ट थोड़े बड़े कर दीजिये और सफ़ेद रंग में कर दीजिये…

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  2. Good one. What about people who keep chewing Paan and spit where ever they like as also those who keep throwing nose dirt from running vehicle on others (Naak Chindna). Inhe kahan Chupana hoga?

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  3. ताम्बट जी, ब्लॉग पर शुरुवात जोरदार है.
    बहुत बहुत स्वागत आपका.
    - सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'( यादों का इन्द्रजाल...)

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  4. Good One !!! Keep it up.
    You are cordially invited to:
    lifemazedar.blogspot.com
    Regards
    Chandar Meher

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  5. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य
    टिप्पणियां भी करें

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  6. अतुल्य भारत की अच्छी तस्वीर पेश की है आपने ...देश में हो रही ढेरों नौंटंकी में एक और सही ....सटीक वर्णन !

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