Wednesday, September 29, 2010

काम के ना काज के दुश्मन अनाज के



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
नईदुनिया दिल्ली में प्रकाशित संपादित अंश
     भूखों का एक डेलीगेशन खाद्य मंत्री से मिलने गया। पहले तो खाद्य मंत्री ने यह सोचकर कि-‘‘भुख्खड़ साले आ गए मुफ्त में गेहूँ माँगने’’, मिलने से साफ इन्कार कर दिया, फिर जब दलालों ने समझाया कि वे गेहूँ माँगने नहीं आएँ हैं, बल्कि अब तक सड़े और भविष्य में सड़ने वाले गेहूँ के बारे में सार्थक चर्चा करने आएँ हैं, तब जाकर खाद्य मंत्री डेलीगेशन से मिलने के लिए राज़ी हुए।
          भूखों का डेलीगेशन जब कान्फ्रेन्स हॉल की कुर्सियों पर चढ़कर बैठ चुका तब खाद्य मंत्री अपने गेहूँ सचिवके साथ  अवतरित हुए और बिन्दास अपनी कुर्सी पर जमते हुए भूखों से मुखातिब होकर बोलने लगे- ‘‘भाइयों और बहनों मुझे बड़ा दुख है कि आप सब लोग भूखे हैं, परन्तु मैं आपको स्टॉक में मौजूद गेहूँ एक दाना भी नहीं दे सकता।’’
          भूखों के नेता ने तपाक से कहा- ‘‘अपना वह गेहूँ का दाना आप अपने पास रखिए, हमें उसकी कोई ज़रूरत नहीं। भगवान की दया से शहर में इतनी भीख मिल जाती है कि हम आप जैसे छत्तीसों को खिला सकते हैं।’’
          गेहूँ सचिव भूखों के नेता की इस बदतमीज़ी पर उखड़ कर बोला- ‘‘बदतमीज़, मंत्री जी से ऐसे बात करते हैं ? सबको जेल भिजवा दूँगा।’’
          मंत्री जी गेहूँ सचिव को शांत करते हुए बोले-‘‘कंट्रोल युवर सेल्फ माय बॉय। मैं देखता हूँ। हाँ भई, अपनी समस्या बताइये, बस ध्यान रखिएगा कि मैं आपको गेहूँ का एक दाना भी मुफ्त में न देने के लिए कटिबद्ध हूँ, चाहे कुछ भी हो जाए। हमारा लक्ष्य देश के पूरे गेहूँ भंडार को सड़ाने का है। जब वह पूरी तौर पर सड़ जाएगा और बदबू और संड़ांध के मारे जीना हराम कर देगा तब हम आगामी योजना पर काम करेंगे।’’
          भूखों का नेता मंत्री जी से बोला-‘‘सर हम उसी गेहूँ के सड़ाने की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय योजना पर आपसे कुछ चर्चा करने के लिए आएँ हैं। वैसे हम जानते हैं कि आप इस मामले में पर्याप्त दूरदृष्टि रखते हैं परन्तु फिर भी चूँकि हम इस देश के जिम्मेदार भूखे नागरिक हैं इसलिए इस दिशा में अपना रचनात्मक योगदान देने के लिए उपस्थित हुए हैं। आप कहें तो हम देना चालू करें ?’’
          मंत्री जी का इशारा मिलते ही भूखों का नेता, नेताओं की तरह शुरू हो गया- ‘‘सर देश में गेहूँ को गोदामों में सुरक्षित रखने की पुरानी परम्परा ठीक नहीं है, इससे कितना गेहूँ फिज़ूल अनसड़ा पड़ा हुआ है। अविलंब सारे गोदामों की छतों को उखड़वा देना चाहिए, ताकि बारिश का पानी गोदामों में भरकर गेहूँ को अच्छी तरह सड़ा सके। गोदाम के दरवाज़ों को ईट-गारे से सील कर देना चाहिये, ताकि पानी बाहर ना निकल सके और बाहर खुले मैदानों में रखे गेहूँ के ऊपर पड़ा टरपोलिन तुरन्त हटाकर गेहूँ को खुले आसमान के नीचे नंगाछोड़ देना चाहिए। गेहूँ देश भर में जहाँ कहीं भी सुरक्षा की नीयत से इधर-उधर लुकाकर रखा गया है, उसे फौरन जलवृष्टि को समर्पित किया जाना चाहिये। घर-घर में लोग गेहूँ सड़ाने के कार्यक्रम में रचनात्मक योगदान दें, इस दृष्टि से सरकार की ओर से जन-जागृति का व्यापक कार्यक्रम हाथ में लेना चाहिए।’’
            डेलीगेशन द्वारा मंत्री जी और गेहूँ सचिव को, दिये जा रहे सुझाव उनकी योजना एवं कार्यक्रम की टक्कर के होने के बावजूद पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था जैसे सारे भूखें उनका मज़ाक उड़ाने के लिए एकत्र हुए हों। गेहूँ सचिव ने फिर गुर्राते हुए कहा-‘‘देखिए, हमारा           कार्यक्रम एक राष्ट्रीय महत्व का कार्यक्रम है, आपको इस तरह उसका मज़ाक उड़ाने का कोई हक नहीं है। आप सबको सरकारी कामकाज में बाधा डालने के जुर्म में अन्दर किया जा सकता है।’’
          भूखों के नेता ने कहा-‘‘श्रीमान कौन कहता है कि हम आपका मज़ाक उड़ाने के लिए यहाँ आएँ हैं। अरे, हमें मज़ाक ही उड़ाना होता तो हम अपने झोपड़े में बैठे-बैठे ही ना उड़ा लेते ? क्या कर लेते तुम ? हमें पागल कुत्तों ने तो काटा है नहीं, जो हम अपनी गाँठ का पैसा खर्च करके यहाँ आएँ, और तुम जैसे मसखरों का मज़ाक उडावें। हम तो यह चाहते हैं कि गेहूँ को सड़ाने की इस सरकारी योजना में किसी तरह की लापरवाही ना हो सके। आप तो जानते ही हैं कि हरामखोरीसरकारी योजनाओं में किस कदर हावी है। इस योजना में भी अगर वही खोरीचली, गेहूँ ठीक से ना सड़ाया गया, कोई कोताही हुई तो फिर योजना खामोखां बदनाम हो जाएगी। वैसे ही आजकल मीड़िया वाले कुत्तों की तरह स्कैमढूढ़ते फिर रहे हैं। कोई कमी बेशी रही, कहीं थोड़ा बहुत गेहूँ सूखा सट्ट पड़ा मिल गया, बिन-सड़े गेहूँ का कहीं स्टिंग ऑपरेशन हो गया तो हफ्ता भर अखबार टी.वी. में सुर्खियाँ चलती रहेगी, ‘‘गेहूँ सड़ाने की योजना में भारी भ्रष्टाचार और घोटाला.......। तुम लोग बर्खास्त और होते फिरोगे।’’
          गेहूँ सचिव और भूखों के नेता में यह गंभीर चर्चा चल ही रही थी कि डेलीगेशन के साथ आए एक तंदरुस्त से भूखे ने खड़े होकर मंत्री जी से पूछा-‘‘हजूर हजूर, हमें तो यहाँ सड़ा गेहूँ बटोरने का लालच देकर लाया गया है, अब लग रहा है कि हमें सरासर ठगा गया है। आपके इरादे नेक नहीं हैं। मेहरबानी करके यह बताया जाए कि आप लोगों की तमाम मेहनत और कर्त्तव्य निष्ठा के साथ गेहूँ को सड़ाने की तमाम कोशिशों के बाद जब वह गेहूँ पूरी तौर पर सड़ जाएगा और बदबू मारने लगेगा, उसमें कीड़े पड़ जाऐंगे, हज़ार-हज़ार कोस दूर तक संड़ांध के मारे लोगों का जीना हराम हो जाएगा........ तब तो हजूर हमें वह सड़ा गेहूँ खाने को मिलेगा कि नही ?’’
          मंत्री जी नाराज़ से होकर आनन-फानन में उठ खड़े हुए और भूखों के नेता से डपटकर बोले-‘‘ऐसे आलतू -फालतू लोगों को लेकर क्यों आते हो ? साले काम के ना काज के दुश्मन अनाज के ?’’ फिर उस डेलीगेट से मुखातिब होकर बोले, माननीय -‘‘मंत्रिमंडल में आपके इस प्रश्न पर विस्तार से चर्चा कर ली जावेगी, ऐसी स्थिति में अगर सड़ा गेहूँ समुद्र में फिकवाने अथवा जलवाने अथवा ज़मीन में गड़वाने से आम जनता में बँटवाना सस्ता पड़ा तो फिर इस विषय पर मंत्रिमंडल द्वारा सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा। तब तक के लिए आज्ञा दीजिए। धन्यवाद। जयहिन्द।’’        

Thursday, September 23, 2010

ओय ओय, फुट ब्रिज गिर गया



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            ओय ओय ओय ओय, फुट ब्रिज गिर गया, फुट ब्रिज गिर गया, बच्चे लोग ताली बजाओं। आज हम विध्नसंतोषियों के लिए बहुत खुशी का दिन है। हम ना कहते थे-भ्रष्टाचार चल रहा है, भ्रष्टाचार चल रहा है! कोई सुन ही नहीं रहा था, हम इतनी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे कि-धाँधली चल रही है, मगर कोई सुनने को ही तैयार नहीं था। अब देख लिया अपनी आँख से भ्रष्टाचार का नमूना- फुट ब्रिज गिर गया। चलो अपना अपना हाथ आगे करो, अब लड्डू बँटने वाले हैं।
            दो-तीन दिन पहले टुरिस्ट बस पर फायरिंग हुई, कुकर बम फूटा हमारे लिए बड़ी खुशी की बात थी। हम चिल्ला रहे थे-सुरक्षा कमज़ोर है, सुरक्षा कमज़ोर है, किसी के कान पर जूँ रेंगने को तैयार न थी, रेंगेगी भी कैसे, लोगों के सिरों में जूँ है कहाँ आजकल जो कानों पर आकर रेंगे! अब तो मानोगे, कि दो-चार ब्लॉस्ट और होंगे, या ठीक कॉमनवैल्थ खेलों के उद्घाटन में ही धम-धम होगी तभी मानोगे, कि हम सही कह रहे थे। हम हमेशा सही कहते हैं, कहते रहते हैं, कहते रहते हैं, तुम लोग सुनते कहाँ हो! अब तो सुनोगे झक मार के। हमारे लिए इससे बड़ा खुशी का मौका दूसरा नहीं। दो-चार धमाके और हों तो मजा आए।
            सालों से पानी नहीं बरसा ढँग से, गटर और जमुना में फर्क करना मुश्किल था। अब कॉमनवैल्थ होने को हैं तो देख लो, पानी बरस- बरस कर हमारा समर्थन कर रहा है। छतें टपक रहीं हैं, खुद भी टपक जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। पानी शहर में घुसा चला आ रहा है, सारी पोलें खोल रहा है, दुनिया देख रही है, कोस रही है कि - जो देश अपना गटर सिस्टम सही नहीं कर सकता उसे कॉमनवैल्थ कराने की जिम्मेदारी किस उल्लू के पट्ठे ने दी है। हम यहीं तो कह रहे हैं इतने दिन से - कि लापरवाहों, अकर्मण्यों, मक्कारों का देश है यह, चोट्टों, भ्रष्टाचारियों का देश है यह, इनसे कुछ होना-हवाना नहीं है, काहे को तो इतनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी गई इन्हेंं। कंडे थोपने भर की औकात है इनकी, वही करते रहते तो ही ठीक था।
            अब देखो, खेल गॉव में कितनी गंदगी मचा के रखी है, जैसे सुअरबाड़ी हो। विदेशी खिलाड़ियों के बिस्तरों पर कुत्ते सो रहे हैं। जिन मजदूरों की औकात दो कौड़ी की नहीं वे भी कमीशन के गद्दों पर लोट लगा रहे हैं। इनका बस चले तो दुनियाभर के ढोर-डंगरों को भी वहाँ लाकर बसा दें।
            हम ना कहते थे, जिम्मेदारी तो किसी एक में नहीं है, आज़ाद देश मिल गया है तो सब साले मकरा गए हैं। देश की इज्ज़त का किसी को रत्ती भर खयाल नहीं है। अब हमी को देख लो, बकर-बकर हमसे चाहे जितनी करवा लो, टाँग खिचाई, टाँग अड़ाई, छिलाई, जग-हँसाई हमसे चाहे जितनी करवा लो, निंदा, आलोचना, बुराई हमसे जी भर के करवा लो, मगर बाकी दिनों में, जब कोई कॉमनवैल्थ सिर पर नहीं होता, हम कहाँ भाड़ झोकते रहते हैं, हमसे कोई मत पूछना।

Saturday, September 18, 2010

संतई के कारोबार की डांवाडोल नींव


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          आजकल साधु-संतों, महंतों-मठाधीशों का कार्यभार पृथ्वी पर पहले की अपेक्षा काफी बढ गया है। पहले उन्हें मात्र वैराग्य धारण कर कन्दराओं में जाना होता था और शेष जीवन ईश्वर की अनंत खोज में बिता देना होता था। ज़्यादा से ज़्यादा दो-चार साल में कभी-कभार बाहर आकर कान्ट्रेक्ट बेसिस पर धर्म की रेडीमेड ध्वजा ऊँची रखने के लिए प्रवचन, सत्संग कर लेना पड़ता था। परन्तु, आजकल बेचारों को सक्रिय राजनीति से लेकर सेक्स रैकेटों के संचालन, षड़यंत्र, हत्या, बलात्कार, ड्रग ट्रॉफिकिंग, ब्लेकमेलिंग जैसे शुद्ध सांसारिक (कु)कर्मों की जिम्मेदारी भी निभाना पड़ रही है। धर्म के प्रचार-प्रसार के ज़रिए विज्ञान की ऐसी-तैसी करने के ऐतिहासिक मनोरथ के साथ-साथ इन (कु)कर्मों की दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी से दबकर बेचारे हलकान हुए चले जा रहे हैं, प्रभु की प्राप्ति के प्रयासों के लिए समय ही नहीं मिल रहा है।
          जबसे ईश्वर से पृथ्वी के पाप सम्हलना मुश्किल हुए, और भारत की धर्म-परायण आम जनता को पक्का भरोसा हुआ कि पर्याप्त मात्रा में पाप-दुराचार बढ़ने के बावजूद भी पृथ्वी पर कोई भगवान-वगवान अवतार लेने के मूड़ में नहीं हैं, तभी से पब्लिक ने मामले को लोकतांत्रिक ढंग से स्व-कर-कमलों से सुलझाने की जगह इन साधु-संतों के हवाले कर दिया, और भारी-भरकम पढ़ाई के डर से अथवा ज़्यादा ही पढ-लिख जाने के कारण साधु बन गए इन ज्ञानियों-ध्यानियों ने विषय विशेषज्ञों को लात मारकर, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक उत्थान का यह काम स्वयं देखना चालू कर दिया, जो उनके खानदान तक में किसी ने कभी नहीं देखा। जगह-जगह मठ-आश्रम खुलना प्रारम्भ हो गए, जिनके वातानुकूलित चेम्बरों में पसरकर मोटे-ताजे गुरू-महात्मा अपनी अमृतवाणी से सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पापियों का उद्धार करने में लग गए। मगर, पृथ्वी को पतन के गर्त में ले जाने की इच्छुक कलियुगी शक्तियों ने धर्म की ध्वजा के इन वाहकों की मति की नृशंस हत्या कर उनसे ऐसे सांसारिक (कु)कर्म करवा लिए कि उनके सामने अब जेल की सलाखों के पीछे बैठकर सुस्ताने के अलावा कोई चारा नहीं है। अन्दर, सादे भजन तक सुनने के लिए श्रोता मिलने की कोई संभावना नहीं है। आत्मा तो थी ही कैद शरीर के पिंजरे में, शरीर भी लोहे के पिंजरे में बैठकर फड़फड़ाने को मजबूर है। लोग अलग चप्पलें लेकर बाहर खड़े हैं, जमानत कराकर बाहर निकलें तो टाट गंजी करें।
          इधर-उधर फटके खाते फिर रहे देश के बेरोज़गार नौजवानों के लिए इन ज्ञानियों-ध्यानियों द्वारा छोड़े गए पद चिन्हों पर अपने पाँव रख कर खड़े होने का बढ़िया रास्ता खुला है। बड़े-बडे वातानुकूलित मठ-आश्रम, महँगी गाड़ियाँ, सुख-समृद्धि-आनन्द! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों को बेरोकटोक, तन-मन से भोगने का रोमांटिक अवसर आखिर किस धंधे में मिलता है ! किसी बेरोज़गार को चोरी-चकारी, लूट-डकैती, नकबजनी, अपहरण, बलात्कार इत्यादि अंजाम देकर खामोखां इंडियन पीनल कोड का कोपभाजन बनने की अब कोई ज़रूरत नहीं है। बस संतई का चमत्कारी चोला धारण कर लिया जाए, बाकी सारे सुख आपो-आप पीछे-पीछे चले आएंगे। वी.आई.पी. भक्तजनों की लबालब श्रद्धा व केश और काइंड चढावों की ऐसी रेलमपेल इस फील्ड में रहती है कि दूसरे किसी धंधे से इसकी तुलना की ही नहीं जा सकती।
            स्त्री सुख से वंचित ब्रम्हचारी कुँवारों, विधुर, रंडुओं को भी एक उत्साहवर्धक मौका हाथ आया है, वे दूसरों की औरतों को देखकर जलने की बजाय स्वयंभू संत का चोला धारण कर दस-बीस सुन्दर स्त्रियों का एक भरापूरा हरम चलाकर, पोल खुलने तक तो मजे कर ही सकते है। अपनी निजी अय्याशी के अलावा हरम के माल की कमीशन आधारित आॅर्डर पर घर-पहुँच सप्लाई देकर बडे़-बडे़ ग्राहक भक्तों की कृपा प्राप्त की जा सकती है ताकि देह व्यापार के इस परम्परागत कारोबार पर धर्म की सीढ़ी लगाकर, अर्थ और राजनीति के स्वार्थ साधे जा सकें, जिनके सधे बिना प्रभु से मिलाने का सपना दिखाकर भक्तजनों को बेवकूफ बनाना भी संभव नहीं है।
            कर्म से कांड बन गए इस मार्मिक प्रकरण में कैमरा नामक यंत्र की दुष्टता से संत-महंत समाज को उठाना पड़ी परेशानी बेहद लज्जाजनक है। वास्तव में समय का तकाज़ा यह है कि कुकर्म करते समय भले ही भगवान से ना डरा जाए मगर विज्ञान के इस चमत्कारी यंत्र से थोड़ा डरकर ही चला जाए। इस यंत्र की खासियत होती है कि इसके पीछे एक दुष्ट आँख होती है जो वही सब कुछ देखने की आदी होती है जो इंसान देखकर भी अनदेखा करनां चाहता है। कुछ ऐसा-वैसा देखा हुआ यदि सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय सार्वजनिक हो गया तो खामोखां उस छोटी सी लंगोटी को भी छोड़ गली-गली चैराहे-चैराहे भागते फिरना पडे़गा जिसके दम पर संतई के तमाम कारोबार की नींव धरी है, और कहीं कोई ठौर-ठिकाना मिल जाएगा ऐसी संभावना आज की तारीख में तो बिल्कुल नहीं है। 
मासिक पत्रिका सबलोक के मार्च 2010 अंक में प्रकाशित।        

Tuesday, September 14, 2010

एक पखवाड़ा मुकर्रर है हिन्दी की मातमपुर्सी के लिए

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
हिन्दी भाषी होने के नाते आज के दिन हमें अपनी भाषा पर गर्व करना सिखाया गया है, मगर सच्चाई यह है कि स्वातंत्रोत्तर काल में जैसे-जैसे हिन्दी आन्दोलन फलता-फूलता पल्लवित होता गया है, वैसे-वैसे देश में हिन्दी की खटिया-खड़ी होती देखी गई है। कुछ तो देश के कर्ता-धर्ताओं ने उसे गर्व करने लायक नहीं छोड़ा, रही-सही कसर हम जैसे सैकड़ों लिख्खाड़ पूरी कर रहे हैं जिन्हें अपने शिक्षणकाल में हिन्दी के पर्चे में कभी तैतीस से ज़्यादा अंक नसीब नहीं हुए। दरअसल वस्तुस्थिति तो तैतीस अंक प्राप्त करने लायक भी नहीं थी परन्तु मास्टरनियों की रहमदिली और हिन्दी के प्रति ‘हिन्दी ही तो है, क्या फर्क पड़ता है’ के उदारता भाव के कारण हमारा भविष्य वर्ष-प्रतिवर्ष सुरक्षित होता चला गया, और अब हम हिन्दी के भविष्य का ‘बिस्तर गोल’ करने में सक्रिय सहयोग देकर ‘खटिया खड़ी बिस्तर गोल’ वाला चालू मुहावरा चरितार्थ करने में लगे हुए हैं।
    हिन्दी का बंटाधार करने वालों में प्रायमरी, मिडिल स्कूल के क्रीड़ा, संगीत व चित्रकला मास्टरों से लेकर बड़े-बडे़ सूरमा भाषा विशेषज्ञों का भी सश्रम योगदान रहा है। हिन्दी फिल्म-टी.वी. वाले विद्वजनों ने भी बहती गंगा में हाथ धोकर हिन्दी की ‘वाट’ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्म वालों ने इस श्रमसाध्य कार्य के लिए अवार्ड हासिल किए तो क्रीड़ा-संगीत-चित्रकला शिक्षकों ने, जो अक्सर हिन्दी शिक्षकों के टोटे में जबरदस्ती हिन्दी पढ़वाने के उपयोग में आते हैं, हिन्दी का क्रियाकर्म बाकायदा तनखा लेकर किया, साथ में इंक्रीमेंट भी लिए। वे बेचारे पढ़ाई के बोझ से घबराकर प्रदर्शनकारी कलाओं की शरण में पहुँचे होते हैं, उन्हें फिर घर में होमवर्क से मगजमारी के बाद बच्चों को हिन्दी पढ़ाने की बेगारी करना पड़ती है, नतीजतन हिन्दी का सत्यानाश करने वाली विदूषी पीढ़ी जन्म लेती है, कालान्तर में मौका पड़ने पर जिसे हिन्दी में अर्जी लिखना भी नहीं आता, जिसकी ज़रूरत हमारे देश में कदम-कदम पर पड़ती है।
    देश के भाषा विशेषज्ञों का तो दुनिया में कोई सानी ही नहीं है। उन्होंने हमेशा चौकस रहते हुए इस बात का ध्यान रखा कि कैसे हिन्दी को ना समझ में आने वाली क्लिष्टतम भाषा बनाए रखा जा सके ताकि लोग अपनी राष्ट्र भाषा को जन्म-जन्मान्तर तक समझ ही ना पाएँ और इससे बिदककर अंग्रेजी की शरण में जा खडे़ हों या गाली- गलौच की सुप्रचलित भाषा का आदान-प्रदान कर अभिव्यक्ति की अपनी समस्या खुद ही सुलझा लें, भूलकर भी हिन्दी के दरवाज़े पर आकर खड़े ना हों।
    फिल्म वालों ने तो गज़ब ही कर डाला। पब्लिक के मुँह में ऐसी छिछोरी भाषा परोस दी कि हिन्दी का भूत दशकों से जान बचाता भागता फिर रहा है। इन फिल्मचियों ने ‘अख्खे’ देश को अनोखी बम्बइया भाषा में पिरो कर रख दिया है। इस मामले में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक वास्तव में भारत एक है। गुजरात से लेकर बंगाल तक भारत के एक होने का मतलब भी यही है कि भले ही देश के हर कोने में स्थानीय भाषा का बोलबाला और हिन्दी का मुँह काला हो मगर – ‘सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे’ का रचनात्मक अर्थ गली-गली में लोग बखूबी जानते हैं। जन-गण-मन अधिनायक से ज्यादा आरेला ए, जारेला ए, खारेला ए, पीरेला ए, खाली-पीली बोम मारेला ए जैसी उच्चकोटि की शब्दावली देश के हर गली-कूचे में आसानी से समझ ली जाती है। हमारे मध्यप्रदेश में भी आरिया हे, जारिया हे किस्म की हिन्दी का प्रचलन है, इसमें माँ-बहनों से निकटतम गुप्त संबंधों की खुली चर्चा साथ में और नत्थी कर हिन्दी की प्रतिष्ठा में अरसे से चार चाँद ठोके जा रहे हैं।
    हिन्दी आन्दोलन चल रहा है, चल रहा है, चलता चला जा रहा है, मगर पान-ठेलों, चौक-चौराहों, टी.वी., सिनेमा, सांस्कृतिक केन्द्रों, सरकारी गैर सरकारी दफ्तरों से लेकर संसद तक रोजाना इस अबला की अस्मत तार-तार होती रहती है। साल का एक पखवाड़ा मुकर्रर है, बीच बाज़ार में इसे घायल पड़ा देखकर मातमपुर्सी करने के लिए। जिसे मर्ज़ी हो मातमपुर्सी करे या फिर चाहे तो नजरें बचा कर निकल जाए।

Tuesday, September 7, 2010

डंडे के डर से गेहूँ का बँटना

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
    पिताजी बचपन में डंडे से पिटाई किया करते थे। उस वक्त बड़ा बुरा लगता था, अब समझ में आ रहा है कि ज़रूर हम भी उन दिनों ‘शरद पंवार’ जैसी हरकतें करते रहे होंगे। बड़ा कोई कुछ कह रहा है, और तो और साफ साफ आदेशात्मक लहज़े में कह रहा है, और हम हैं कि मानने को तैयार नहीं है, तो फिर सामने वाले के पास ‘डंडा चालन’ के अलावा दूसरा चारा क्या है।
    माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाई अनाज फालतू सड़ रहा है, गरीबों में बाँट दो, लेकिन नहीं, मंत्री जी हिलने को तैयार नहीं, जैसे ‘बाबा’ का माल हो। इधर गरीब बेचारे हाथ में फटी बोरी लेकर गेहूँ बँटने का इंतज़ार कर रहे थे, उधर कोर्ट के आदेश को मुफ्त की सलाह मानकर एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालने की हमेशा की ट्रिक चलाई जा रही थी। ऐसा लगता है जैसे हमारे मंत्री महोदयों को आम जनता के हक में देश चलाने के लिए किसी की फालतू सलाहों की कोई ज़रूरत नहीं। वे खुद जो चाहेंगे करेंगे, देखते हैं कौन क्या बिगाड़ लेता है। अपने इस जन्मजात गुण की वजह से ही तो शराफत के किसी दूसरे काम में लगने की बजाय राजनीति के धंधे में लगे हैं। किसी की सुनने-सुनाने की सभ्यता से मुक्त अपनी वाली चलाने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। इसीलिए उन्होंने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की भी गुड़ीमुड़ी कर के एक कोने में डाल दिया और खड़े हो गए हमारी मुर्गी की एक टाँग के शाही अन्दाज़ में, और जब कोर्ट ने डंडा फटकारा तो चट से दूसरी टाँग बाहर निकाल ली और फौरन समझ गए कि कोर्ट का आदेश हवा में उड़ाने के लिए नहीं मानने के लिए होता है।
    हमारे देश में यह बीमारी आजकल बढ़ती जा रही है। कोई किसी की बात मानना नहीं चाहता, सब अपनी-अपनी चलाने में मशगूल हैं। जब तक कोई डंडा हाथ में उठाकर खोपड़ी तोड़ने की मुद्रा में नहीं आ जाता तब तक सामने वाले को लगता ही नहीं कि कभी कान और मस्तिष्क का आम जनता के प्रति सहानुभूति जगाने वाला हिस्सा भी इस्तेमाल करना है।
दरअसल हमारे देश में इन दिनों हुक्मरानों को हमेशा डर लगा रहता है कि बाज़ारवाद के इस दौर में कोई चीज़ अगर मुफ्त में बाँट दी तो फिर दुनिया का दरोगा अमेरिका नाराज़ हो जाएगा। आखिर हमने परोपकारी राज्य की अपनी पुरानी परम्परागत दकियानूसी छवि से बड़ी मुश्किल से छुटकारा पाया है। हम पानी को तो बोतलों में भर कर बेचने की अपनी प्रतिबद्धता को सफलता से निभा ही रहे हैं, हवा बेचने की दिशा में भी एक ना एक दिन आगे बढ़ेंगे, ऐसे में मुफ्त गेहूँ बाँटने की बात हज़म होना मुश्किल तो है। अब देखना है डंडे के डर से भी अब गेहूँ बँटता है या नहीं।

Wednesday, September 1, 2010

हबीब तनवीर - जयन्ती, उन्होंने सिर्फ किया नहीं बल्कि बेहतरीन किया

हबीब साहब से हर मुलाकात की याद लम्बे समय से अब भी बिल्कुल तरोताज़ा है, हालाँकि उनसे रूबरू होने का मौका ज़्यादातर उनके नाटकों के ज़रिए ही हुआ, लेकिन एक ख़ास मुलाकात आज भी एक महत्वपूर्ण घटना के तौर पर जे़हन पर नक्श है। उन दिनों वे रंगमडल (भारत भवन) भोपाल के निर्देशक हुआ करते थे। सुप्रसिद्ध सिने निर्देशक सुधीर मिश्रा ख़ास हबीब साहब से मिलने के लिए भोपाल आए तो पहले से ही तय कार्यक्रम के मुताबिक मैं और पूर्व रंगकर्मी/समाजसेवी आलोक प्रतापसिंह उनके साथ भारत भवन पहुँचे। सच कह रहा हूँ, रंगमंडल के निर्देशक के उस चेम्बर में, जिसकी धज किसी ऊँचे प्रशासनिक अधिकारी के चेम्बर सी थी, हबीब साहब को बैठा देखकर मुझे बड़ा अजीब लगा। वे इस माहौल में एकदम डपेपिज लग रहे थे। दो-तीन घंटे की इस मुलाकात में काफी बातें हुई, सुधीर भाई और हबीब साहब ने अपनी फिल्म - ये वो मंज़िल तो नहीं की यादें ताज़ा की जिसका केन्द्रीय पात्र विश्वविद्यालयीन ज़माने के आलोक प्रताप सिंह पर आधारित था। आलोक प्रताप सिंह और मैं थे तो भोपाल गैसकांड आन्दोलन की बातों के साथ हमारे नुक्कड़ नाटक दास्तान-ए-गैसकांड की बातें भी चलीं, उन्होंने इस नुक्कड़ नाटक के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। इस मुलाकात के एक-दो दिन पहले ही मैंने के.जी. त्रिवेदी के एक नाटक राम की लड़ाई में अभिनय किया था जिसे हबीब साहब ने रवीन्द्र भवन की सबसे आगे की सीट पर बैठकर देखा था। उन्होंने तुरंत मुझे पहचान लिया और मेरे अभिनय की तारीफ की। इस दौरान हबीब साहब रंगमंडल के पुराने कलाकारों और प्रशासन के असहयोगात्मक रवैये के कारण भी काफी आहत महसूस हुए, जिसके नतीजे के तौर पर उन्हें बाद में रंगमडल छोड़ना पड़ा।
बहरहाल, जनपक्षीय सामाजिक राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना से लैस हबीब साहब ने जहाँ रंगकर्म के प्रति अपने समर्पण और अनोखे लोक प्रयोगों के ज़रिये जनसाधारण व रंगमंच की दूरी को पाटकर रख दिया था, वहीं दुनिया भर में भारतीय रंगमंच की धाक जमाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। भारत भर में और वैश्विक स्तर पर भी भारतीय रंगकर्म का परचम फहराने में देश की दूसरी कोई भी हस्थी सत्ता की निकटता के बावजूद सफल नहीं हुई जबकि लगातार विरोध और बाधाओं के बाद भी हबीब तनवीर ने सिर्फ अपनी रंग दृष्टि के दम पर यह संभव कर दिखाया। वे रंगकर्म का एक सम्पूर्ण संस्थान थे, एक समूचा अध्याय थे जिसके बिना भारतीय रंगमंच का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता। उन्होंने सिर्फ किया नहीं बल्कि बेहतरीन किया। उनकी अनुपस्थिति से भारतीय रंगमंच पर एक अजीब सा सन्नाटा खिच आया है, एक बड़ा निर्वात सा पैदा हो गया है जिसका भरना लगभग नामुमकिन सा लगता है।