Wednesday, February 16, 2011

अच्छी जगह बैठे हैं


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जनसंदेश टाइम्स लखनऊ में प्रकाशित
            अक्सर कई लोग गर्व से अपनी गरदन ऊँट की तरह ऊँची किये हुए आत्मप्रशंसा करते हुए मिल जाते हैं-‘‘भगवान के आशीर्वाद से अच्छी जगह बैठे हैं।’’ भगवान के आशीर्वाद पर तो जितना ज़ोर ज़रूरी है, होता है, परन्तु ज़्यादा ज़ोर होता है-‘‘अच्छी जगह बैठे है’’ पर। सुनकर ऐसा लगता है जैसे किसी सिंहासन-विंहासन पर बैठे जनता के दुखदर्द दूर कर रहे हों या किसी धर्मात्मा की गद्दी पर विराजमान धर्मार्थ लंगर-वंगर चलाकर दीन-दुखियों की सेवा कर रहे हों, परन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है। वे किसी सरकारी कुर्सी पर जमे मोटी तनख्वाह के अलावा तगड़ी रिश्वत भी बटोर रहे होते हैं। अकेली तनख्वाह से उन्हें ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने का एहसास नहीं होता, वह होता है अच्छी ऊपरी आमदनी से। ऊपरी आमदनी अच्छी न हो या कुर्सी पर सूखी तनख्वाह के अलावा कुछ ऊपरी; नसीब न होता हो तो वह क़तई ‘‘अच्छी जगह’’ नहीं हो सकती, भले ही तनख्वाह खूब मिल रही हो।
          सरकारी दफ्तरों में तो चपरासी भी अगर मलाई मार रहे अफसर की घंटी पर बैठा हो तो वह भी मूँछों पर ताव देकर शेखी बघारता है-‘‘अच्छी जगह’’ बैठे हैं। दफ्तर का डफर से डफर आदमी भी जिसे सबसे निकृष्टतम काम में लगाया गया हो, अगर पच्चीस-पचास रुपये की ऊपरी आमदनी पर हाथ साफ कर लेता है तो वह भी ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने के एहसास से भरा रहता है।
          अच्छी रेलमपेल वाले चौराहे पर विराजमान भिकारी जब अच्छी कमाई कर रहा होता है तो इस गर्व से फूला हुआ रहता है कि वह ‘‘अच्छी जगह’’ बैठा है। टोलटैक्स नाके पर उगाही करने वाला कर्मचारी उगाही में चोरी-चुंगी की सुविधाओं के कारण अपने आपको अच्छी जगह बैठा महसूस करता है। मरघट में लकड़ी की टाल पर तौल में डंडी मारकर चार पैसे तनख्वाह से अधिक पा जाने वाला इंसान भी अपने इस घटियापन पर ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने का दंभ लिए घूमता है।
          क्या ज़माना आ गया है। किसी को ईमानदारी और मेहनत से काम करते हुए ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने की अनुभूति कभी नहीं होती, ऐसी जगह बैठे हर आदमी को हर वक्त यह एहसास कचोटता रहता है जैसे उसे नर्क में बिठा दिया गया हो।

6 comments:

  1. यथार्थ सत्य है यह व्यंग्य.

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  2. बहुत सटीक व्यंग्य।

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  3. बिलकुल सही कहा सर आजकल आदत से मजबूर ईमानदार आदमी अपना ईमान तो छोड़ नहीं सकता हाँ वो यह गम ज़रूर मनाता है कि वो ईमानदार क्यों है.चारित्रिक रूप से सही होने के बावजूद "अच्छी जगह बैठे होने की अनुभूति" ऐसे इंसान के लिए दुर्लभ ही होती है.

    सादर

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  4. बहुत सटीक परिभाषा अच्छी जगह की.

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  5. अच्छी जगह बैठने का अर्थ सच में अब यही रह गया है।

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  6. तम्बत जी, से मैं पूरी तरह सहमत हूँ,
    अपने जीवन में , मैंने भी यह सत्य यह अनुभव किया है,
    लोगों को अक्सर यह कहते सुना है,
    फलां-२ नौकरी कर रहें हैं, तनखा इतनी है, ..ऊपर कि कमाई उतनी..
    अच्छी जगह बैठे हैं..
    नेता, पुलिस, ठेकेदार, पूंजीपति, मास्टर, चपरासी, ...
    कितने ही नाम गिने काम है..
    जो यह दम भरते है कि अच्छी जगह बैठे हैं..
    दुसरो कि मजबूरी, हालात, और मौका परस्ती पर मौज करते ये लोग
    स्वयं को महान समझते है,

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