Friday, April 15, 2011

न देख बुरा सुन बुरा बोल बुरा


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          न देख देख देख बुरा, न सुन सुन सुन बुरा, न बोल बोल बोल बुरा- न देख बुरा सुन बुरा बोल बुरा। गाँधी जी के तीन बंदरों के इस ऐतिहासिक उपदेश को अगर किसी ने हृदय से आत्मसात किया है तो वे है हमारे प्रधानमंत्री। वे न बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं, और न बुरा बोलते हुए आज तक किसी ने उन्हें देखा-सुना है। बोलने के मामले में बुरा तो क्या, मैं तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि देश की निन्यानवे फीसदी आबादी ने तो उन्हें कभी बोलते हुए भी नहीं सुना होगा।
          भ्रष्टाचार कितनी बुरी बात़ है, इसे आँख खुली रखकर देखना और भी बुरी बात़ है। राष्ट्रव्यापी घोटालों के ऊपर चल रहे फालतू शोरगुल पर फिज़ूल कान देना भी उतनी ही बुरी बात है। देखना, फिर सुनना और फिर इन बुरी-बुरी हरकतों पर जबरन कुछ बोलना प्रजातंत्र के किसी भी सच्चे पहरुए के लिए बहुत ही बुरी बात है, इसीलिए अपने आँख, कान और मुँह बंद रखकर हमारे प्रधानमंत्री अद्वितीय धैर्य का परिचय देते हुए देश को चला रहे हैं, और वह शान से चल रहा है।
          देश में चल रही तमाम ऊलजलूल और ऊटपटांग हरकतों के बारे में फालतू की सूचनाएँ और जानकारियाँ दिमाग में भंडारित रखकर वे उसे ओव्हरलोड नहीं करते। उनकी सरकार के मंत्री-संत्री, मंत्रालयों के अफसर-बाबू, देश की जनता के वी.आई.पी. प्रतिनिधि, कब, कहाँ, क्या-क्या लीला रचाते रहते हैं, वे नहीं मालूम रखते। कौन-कौन सी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उनके चिर शांति पूर्ण जादुई मौनकी आकांक्षी, अभिलाषी हैं, कौन-कौन से व्यापारिक घराने उनके, निर्लिप्त, निरपेक्ष समभाव के लाभार्थी है, वे नहीं पता रखते। देश के किस कोने में कौन-कौन, क्या-क्या गुलखिला रहा होता है उन्हें बिल्कुल पता नहीं होता। यदि पता हो भी तो किसी को कोई टेन्शन नहीं होता क्योंकि उन्हें कुछ निर्णायक करना तो है नहीं, यह सबको पता है।
          मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनके किचन में क्या-क्या साग-भाजी कब, किस मंडी से कितनी-कितनी मात्रा में कितने पैसों में खरीदी जाती है उन्हें बिल्कुल पता नहीं रहता होगा। यही कारण है कि उनकी कुर्सी बचाने के लिए किस पार्टी के किस-किस सांसद की खरीद किस-किस दर पर की गई और इस खरीदारी पर जेब किसने ढीली की, यह भी उन्हें नहीं पता चला होगा। एक प्रधानमंत्री स्तर के राजनीतिज्ञ के सिर पर देश के दूसरे कितने लफड़ों-झपड़ों का टेन्शन रहता है, उससे यह उम्मीद रखना सरासर बेवकूफी है कि कब, कहाँ, क्या चीज खरीदी गई। अर्थशास्त्री होने का मतलब यह नहीं कि वह हर चीज़ का हिसाब-किताब रखता फिरे।
महँगाई के स्थाई मुद्दे पर देश की जनता जब-तब इस बेकसूर आदमी को बिलावजह कोसने लगती है, जैसे अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर उसने कोई अपराध कर दिया हो। एक प्रधानमंत्री जो अर्थशास्त्र का प्रकांड पंडित हो, वह देश के शिखर आर्थिक मुद्दों को सुलझाने में अपनी ऊर्जा खर्च करेगा कि महँगाई जैसी टुच्ची चीज़ की चौकीदारी करता फिरेगा। भूमंडलीकरण अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की तीव्र गति से, आर्थिक शक्ति बनते जा रहे हमारे देश का प्रधानमंत्री आटा-दाल-चावल, आलू-प्याज़ जैसे घटिया माल का खुदरा मूल्य पता रखे यह आशा करना तो यार सरासर अमानवीयता है।
          देश में भीषण बेरोज़गारी है, गरीबी हटाने का सपना धन्नासेठ की तिज़ोरी में कैद है, लोग मूलभूत सुविधाएँ नहीं हासिल कर पाते, स्विस बैंक में किसका माल रखा है, यह सब अगर प्रधानमंत्री जी को नहीं पता है तो इसका कारण गाँधी जी के वही ‘‘न देख बुरा, सुन बुरा, बोल बुरा’’ का मायावी सिद्धांत है। देश में साधु-संत राजनीति मे घुसने के लिए धड़पड़-धड़पड़ करते रहते हैं, हमारे प्रधानमंत्री राजनीति में साधुत्व की चरम सीमा पर पहुँचे हुए संत हैं उन्हें सांसारिक तांडव के बारे में कुछ पता नहीं होता।

4 comments:

  1. बिलकुल सही बात कही है सर!

    सादर

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  2. ज़बरदस्त कटाक्ष! :-)

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  3. सांसारिक तांडव तो ध्यान में रखना पड़ेगा।

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  4. बहुते सटीक...अह्ह!!

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