Friday, June 3, 2011

रेलों में दुनिया जहान


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//      
          सुदूर अन्तरिक्ष की यात्रा जितनी सरल होती जा रही है, भारतीय रेल की यात्रा करना उतना ही कठिन होता जा रहा है, क्योंकि वे दिन-रात, बारहों महीने हर घड़ी हर पल मुसाफिरों और उनके सामान से गचागच भरी होती हैं। आजकल गर्मी की छुट्टियों में तो जिसे देखो वह बोरिया-बिस्तर लपेटे रेलों में भीड़ बढ़ाने के लिए दौड़ा पड़ रहा है।
          एक तरह से देखा जाए तो यह ठीक भी है, क्योंकि जो लोग रेलों में भीड़ मचाने की महती जिम्मेदारी सम्हाले हुए हैं यदि वे सभी एक ही समय में रेल की बजाय किसी भी शहर में उपस्थित हो जाएँ तो शहर की सारी व्यवस्थाएँ चरमरा कर धराशायी हो जाए। एक मायने में भारतीय रेलें लाखों लोगों को अपनी छाती पर लिए आबादी से फटे पड़ रहे हमारे शहरों को अनावश्यक बोझ से बचा रही हैं, भले ही उस बोझ से रेल की पटरियाँ चपटी हुई जा रही हों।
          आपको कभी रेल में सफर करने की आपात स्थिति का सामना करना पड़े तो मजाल है आप किसी भी शहर के लिए किसी भी श्रेणी में, किसी भी कोटे में, किसी भी प्रकार का आरक्षण पाने में सफल हो जाएँ। आप यदि मन कड़ा करके तत्कालकोटे तक में लुटने को तैयार बैठे हों तब भी आपको भारतीय रेलवे की तरफ से यह सौभाग्य नहीं मिल पाएगा। आप दिल्ली जाना चाहेंगे तो उधर की सारी रेलें लदीफदी मिलेंगी, और मुंबई जाना चाहेंगे तो उधर की भी रेलें आपको फुल मिलेंगी। ऐसा नहीं होगा कि तमाम भीड़ दिल्ली जा रही हो तो मुंबई की ओर जाने वाली गाड़ियाँ खाली मिल जाए और आप आराम से बर्थ पर पॉव पसार कर सफर कर सकें। बिहार की तो किसी भी ट्रेन में, आप कहीं लेट्रिन में बैठकर सुभीते से सफर न कर लें इसलिए बिहारी पहले ही से लेट्रिन में बिछाअत करके डले हुए मिलेंगे और आपके छत की ओर आशा की नज़र से देखने से पहले ही वे छत पर जा चढ़ेंगे।

9 comments:

  1. बढ़ती हुयी माँग के साथ न चल पाना चुनैती है हमारे लिये।

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  2. बहुत बढ़िया व्यंग्य किया है सर!

    सादर

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  3. निर्मल हास्य और व्यंग्य का मिश्रण बहुत अच्छा बधाई लेकिन एक शब्द अखर रहा है बिहारी , बिहारी ही क्यों बंगाली ,पंजावी मद्रासी या अन्य कोई क्यों नहीं ?

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  4. बिल्कुल, यही हालत हो जाती है गर्मियों में तो...सटीक चित्रण.

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  5. बहुत बढिया लिखा है प्रमोद जी,
    ट्रेनो की हालत तो बहुत खराब हो गयी है।
    एक बार मैने टायलेट में भी लोगों को खड़े होकर आते देखा है।

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  6. आपके व्यंग्य काफी तीखे हैं !

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  7. सस्ती और सुरक्षित रेल ! हर कोई इससे सफर कर लेता है ! एकता की सबसे जोर और बेजोड़ उदाहरण !

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