Wednesday, August 24, 2011

आने वाला समय कुत्तों का है

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
           हमारे इर्द-गिर्द इन दिनों बेशुमार कुत्तेहो गए हैं। कोई इंसान अपने-आप से कुत्ते की तुलना कर बुरा न मान बैठे तो कहा जा सकता है कि हमारा समाज आजकल कुत्तोंके प्रकोप से पीड़ित है। मनुष्यों के बैठने की हर संभव जगह पर कुत्ते बैठे हुए हैं। इसका हरगिज़ यह अर्थ ना लगाया जाए कि बैठने की हर सम्मानित जगह पर बैठी हर मानवीय आकृति कुत्ता है। मगर सच तो यह है कि अगर यही हाल रहा तो दिन दूनी रात चैगुनी गति से बढ़ते जा रहे, ये आवारा कुत्ते जो आजकल सभी जगहों पर अतिक्रमण कर अड्डेबाजी करते नज़र आते हैं, एक ना एक दिन जबरदस्ती लोगों के घरों में घुसकर सोफों, बिस्तरों, टेबल-कुर्सियों पर आसन जमाए हुए मिलेंगे, जैसे किन्ही-किन्ही रईसों के घर के बिगडैल पालतू कुत्ते इन्सानी सुविधाओं का पूरी स्वतंत्रता के साथ उपभोग करते हुए दिखाई देते हैं। यहाँ तक तो ठीक है, गज़ब तब हो जाएगा जब इन कुत्तों के झुँड सार्वजनिक संस्थानों, सरकारी दफ्तरों, सचिवालयों, मंत्रालयों तक में घुस पडेंगे व आधिकारिक कुर्सियों पर कब्ज़ा जमाए नज़र आने लगेंगे। और तो और इन्सान की कमज़ोर इच्छा शक्ति का फायदा उठाकर सीधे विधानमंडलों, विधानसभाओं, लोकसभा तक में भी काबिज़ हो जाएँ तो मुझे इसमें कोई बड़ी बात नज़र नहीं आती।
          कभी छटे-छमाहे आप बाग-बगीचे में तफरीह के लिए जाओ, नदियों-ताल-तलैयों, समुन्दर किनारे सैर-सपाटे के लिए निकलो, पहाड़ पर सेहत बनाने के इरादे से पहुँचों और थक जाने पर पृष्ठ भाग कहींे रखकर थोड़ा सुस्ताने की सोचो तो मजाल है जो आपको अपना इरादा पूरा करने में सफलता मिल जाए। बैठने लायक उपलब्ध हर जगह पर आपसे पहले कमबख्त कुत्ते जमें हुए मिलेंगे, आप मुँह टापते रह जाओगे। कुत्ते नहीं तो फिर उनकी फैलाई गंदगी के अवशेष अवश्य मिलेंगे ताकि आप उस जगह का इस्तेमाल बैठने के लिए न कर सको।
          मैंने एक दिन चलते-फिरते, सड़क पर बेफिक्री से पसरे एक बूढे़ कुत्ते से इसकी कैफियत पूछी, तो वह अपने आसपास डले आठ-दस सड़ियल कुत्तों की ओर नज़र घुमाता हुआ बोला - तो क्या करें ! फाँसी लगा लें ! पैदा हुए हैं तो कुछ तो करेंगे। तुम तो ले जाओगे नहीं हमें अपने घर, तो फिर जहाँ जगह मिलेगी वहीं न कब्ज़ा जमाएँगे !
मैंने कहा    -     भई ऐसे तो आप लोगों के भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। इतनी तादात में पैदा होते रहोगे तो ना रहने की जुगाड़ हो पाएगी ना खाने की।
कुत्ता बोला   -     छीना-झपट्टी करेंगे और क्या, जैसे तुम लोग करते हो। लोगों के घरों में घुसकर किचन पर हमला करेंगे। तवे पर से रोटी लेकर भागेंगे! मगर तुम्हारी तरह भीख नहीं माँगेंगे, अपनी फितरत में भीख माँगना है ही नहीं बाबू।
मैंने कहा    -     तमीज़ से बात करों, मैं तुम्हें भिकारी नज़र आ रहा हूँ।
कुत्ता बोला   -     अरे तुम नहीं तो तुम्हारे भाई-बंदे, सैंकड़ों नज़र आते हैं भीख माँगते हुए। चौक-चौराहों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक सभी जगह हाथ फैलकर माँगते    हुए नज़र आते हो तुम लोग ! हमें देखा है कभी ?
मैंने कहा    -     फालतू बात मत करों, लोग डंडे लगाएँगे तो अकल ठिकाने आ जाएगी तुम्हारी ?
कुत्ता बोला   -     अरे हौ, लगा लिए डंडे। आदमियों में क्या कम हैं कुत्ते, एक ढूँढ़ो हज़ार मिलते हैं। कितनों को डंडे लगा लिए तुम लोगो ने ? इंसानों की कुत्तागिरी से तो निपट पाते नहीं तुम लोग, हम पर क्या डंडा चलाओगे !
मैंने कहा    -     अपनी तुलना हमसे मत करो, कुत्ते हो, कुत्ते की तरह अपनी औकात में रहो।
     इस पर वह कृषकाय बूढा कुत्ता तुरंत दाँत भींचकर मुझ पर गुर्राने लगा। उसके इस आक्रामक मुद्रा में आते ही आसपास बैठे सभी कुत्ते उसके समर्थन में सावधान की मुद्रा में खडे़ होकर मुझे कटखनी निगाहों से घूरने लगे। मैंने पुचकारने, सीटी बजाने के पुराने उपायों से उन्हें शांत करने का भरसक प्रयास किया, मानते ना दीखने पर इसी मौके के लिए कंधे पर टंगे झोले में रखी बाँसी रोटी उनके सामने डालने का बहुउपयोगी उपाय आज़माकर उन्हें शांत किया। फिर धीरे से उस बूढे़ कुत्ते पर सवाल दागा - वैसे बाय द वे, एक सीज़न में कित्ते पैदा कर लेते हो ?
वह बोला    -     कहाँ बाबा, अब कहाँ दम रह गई। इन पट्ठों की बात अलग है, सीज़न भर में बीस-तीस एक-एक पैदा करता है। फिर वे भी जल्दी-जल्दी बड़े होकर काम में लग जाते हैं। प्रायवेट बैंकों के चक्रवर्ती ब्याज की तरह बढ़ते ही चले जाते है।
मैने कहा    -     भाई, स्थिति विस्फोटक है। जनसंख्या से इंसान ही परेशान है तुम और टुल्लर पर टुल्लर पैदा करोगे तो कैसे चलेगा भाई ?
वह बोला    -     ज़बान सम्हाल कर बोलो, भाई बोल रहे हो मुझे!
मैंंने कहा   -     तुम लोग इंसानों का जीना हराम करते जा रहे हो।
वह बोला    -     इसमें हमारी क्या गलती है ? तुम्ही लोग पशुप्रेम-पशुप्रेम का राग अलापते हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हो। फालतू का नाटक साला। जंगलों में लोग जानवरों का शिकार कर-करके खा रहे हैं, वहाँ क्यों नहीं दिखाते पशुप्रेम? एई........, रोज़ाना देश में करोड़ों मुर्गा-मुर्गी और लाखों बकरे तुम लोग चट कर जाते हो वहाँ दिखाओं जाकर अपना पशुप्रेम! हम पर दिखाओगे तो यही हाल होगा।
मैंने कहा    -     मगर इस कदर आबादी बढ़ाते चले जाओगे भैया तो हम कहाँ जाएँगे ?
कुत्ता बोला   -     तो करवाओ ना हमारी नसबंदी, किस ने मना किया है ?
मैंने कहा    -     हम अपना टार्गेट तो पूरा करवा नहीं पाते, तुम्हारी और कहाँ से करवाते फिरें।
कुत्ता बोला   -     तो फिर भुगतो। हमारे पास तो एक ही काम है, हम तो करेंगे। तुममें दम हो तो तुम रोक लो।
मैंने कहा    -     पालतूपन, वफादारी, लाड़-प्यार-दुलार, दोस्ती, सब कुछ भूल गए एहसान फरामोश। हमने जबरन तुम्हारी इन बड़ी-बड़ी क्वालिटियों पर निबंध लिख-लिखकर बच्चों को रटवाए, मगर तुम लोग अब बिल्कुल पहले जैसे नहीं रहे।
वह बोला    -     बासी सूखी रोटियाँ और चुसी-चुसाई हड्डियाँ खिला-खिलाकर हमसे दूसरों पर भुकवाते हो तुम लोग, फ्री-फंड में चैकीदारी करवाते हो, अब हम बहुसंख्यक     होने लग पड़े हैं तो यहाँ खड़े पूँछ हिला रहे हो।
मैं बोला     -     क्यों, अपनी खुराक से ज़्यादा तुम्हें खिलाते-पिलाते हैं, ठंड में मोटे-मोटे स्वेटर पहनाते हैं, सोने के लिए नर्म-मुलायम गद्दे लगाते हैं ऊपर से तकिये की भी व्यवस्था करते हैं हम, तुम कुत्तों के लिए, भूल गए ?
वह बोला    -     अपने लैड़ू कुत्तों की बात मत करो। अरे हम तो आवारा सड़क पर पड़े हैं, कौन पूछता है हमें। अब जागरूक होकर हम अपनी तादात बढ़ा रहे हैं, आतंक फेला रहे हैं तो तुम्हारी फूँक सरक रही है।
मैंने कहा    -     ये मत भूलो, हम लोगों के बासी बचे-खुचे पर ज़िन्दा हो तुम लोग।
वह बोला    -     फालतू बातें मत करो, तुम्ही लोग कहते हो ना, कि बासी बचे ना कुत्ते खाएँ ? गिन-गिन के रोटी बनाते हो, बासी बचता भी है कुछ तुम्हारे घर में ?
मैंने कहा    -     इसीलिए ना, कभी सुअर का बच्चा पकड़कर खा जाते हो, कभी बकरी का।
कुत्ता बोला   -     धीरे-धीरे तुम्हारे बच्चे भी पकड़ने लगेंगे, कर लो क्या करते हो।
मैने कहा    -     तुम्हारा यह स्टेटमेंट हद दर्ज़े का खतरनाक है, मैं पीटा वालों से शिकायत करूँगा।
कुत्ता बोला   -     करो करो, पीटा वाले तुम्हें ही पीट-पीटकर न भगा दें तो मेरा नाम कुत्ता नहीं। उनका मिशन जानवरोंकी सुरक्षा है इंसानोंकी सुरक्षा नहीं, समझे। अपनी भद पिटवानी हो तो ज़रूर जाओ पीटा वालों के पास।
मैंने कहा    -     बेटा, बहुत उड़ रहे हो, अभी मुन्सीपाल्टी को फोन करके पिंजरा मँगवाता हूँ......
कुत्ता बोला   -     हाँ हाँ, मँगवाओं, और खुद बैठ जाना पिंजरे में, अच्छे लगोगे ?
मैंने कहा    -     तुम सबको पकड़कर बधिया न करवाया तो कहना बेटा.........!
कुत्ता बोला   -     वरुण की मम्मी का नाम सुना है कभी.......? तुम्हारे बाप में भी दम नहीं है पिंजरा लगवाने की, बधिया करवाना तो बहुत दूर की बात है। चल भाग यहाँ से......मुझे बेटा कह रहा है! अबे बाप हूँ मैं तेरा..........
     और उस बूढे कुत्ते की इस दुत्कार को सुनते ही आसपास जमा सारे कुत्ते मुझे निशाना बनाकर समवेत स्वर में भौंकने लगे। एक की नज़र जैसे ही मेरी पतलून की ओर गई मैंने अपना पाँव सर पर रखा और भाग खड़ा हुआ, दूर से कुत्ते के चरण स्पर्श करता हुआ बोला - हौ मेरे बाप माफ कर दे मुझे।
     कभी आदमी की एक हुश से टाँगों के बीच पूँछ घुसेड़कर कॉई-कॉई चीखते भाग खड़े होने वाले ये कुत्ते इन दिनों ग़जब के हौसलाकुन हो गए हैं, इंसान की ज़ात को कुछ समझ ही नहीं रहे। हम अपने-आप को बचाने के लिए और कुछ तो कर नहीं सकते बेहतर है कि सचमुच उन्हें अपना बाप मान लें और सुबह-शाम उनके सामने कोर्निश करें, शीश नवाएँं। सच है, प्रजातंत्र में मेजॉरिटी जिसकी होती है राज उसी का चलता है। कुत्ते आजकल अंधाधुध मेजॉरिटी बढ़ाते चले जा रहे हैं, आने वाला समय कुत्तों का है।

2 comments:

  1. यही बात गुज़रे ज़माने वाले कहा करते थे इस लिहाज़ से तो यह ज़माना ही कुत्तों का चल रहा है आने वाला तो कुतियों का होगा।

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  2. पता नहीं किसका किसका ज़माना आने वाला है।

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