Friday, September 30, 2011

फँसने-फँसाने का सीज़न


व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
  आजकल फँसने-फँसाने का सीज़न चल रहा है। इधर कोई अपने कर्मकांडों से खुद फँस रहा है अथवा दूसरों के कुकर्मों से फँसा-फँसा फिर रहा है़, उधर कोई हाथ में जाल-पिंजरे लिये किसी के फँसने की संभावनाएँ तलाश रहा है। कोई मकड़ी की तरह जाल सा ताने चुपचाप ताक में बैठा है कि कोई कीड़े-मकौड़े सा आए और उसके जाल में फँस कर फड़फड़ाने लगे। आँख पर पट्टी-बाँधे, नाक और कान में रुई के फोहे घुसेड़े सूँघने-सुनने के काम से फारिग़, खुद फँस जाने वाली हरकतें कर, ‘फ़सानाबनने वालों की भी देश में इन दिनों कोई कमी नहीं है।
फँसने वाली हरकतें करने वाला हर शख्स अपने फँसने की संभावनाओं से अच्छी तरह वाकिफ होकर भी फँसने वाली हरकतों से बाज नहीं आता, बल्कि फँसाने के लिए ताक में बैठे बहेलिए की तरफ बेशर्मीपूर्वक यह दुराग्रह रखता है कि वह उसके साथ दोस्ताना अदा से पेश आएँ और उसे फँसाने वाली नीच हरकतें ना करें! जो चाहिये ले-लवा कर बस आँख मूँदे फँसने वाले की फँसने वाली हरकतों को पूरी तौर पर नज़र अंदाज़ करता रहे।
देखा जाए तो पहले मात्र चोरों-सेंधमारों और लुटेरे-पिंडारियों के फँसने-फँसाने के किस्से सुने जाते थे मगर आजकल तो तथाकथित शरीफ लोगों को एक-एक बाद एक लाइन लगाकर  फँसते हुए देखा जा रहा है। चोर-उचक्के खुद हतप्रभ हैं कि दूसरों को फँसा-फँसाकर सलाखों के पीछे ला पटकने का कानून बनाने वाले आजकल खुद ही फँसे चले जा रहे हैं। राजा, कलमाड़ी, कनिमोझी, ने फँसने वाली हरकतें करते वक्त एक सेकन्ड के लिये भी रुक कर मगजमारी नहीं की होगी, कि आगे कहीं फंदा तो नहीं लगा हुआ है! अपन कहीं फँसकर अपराधियों के तीर्थ स्थल तिहाड़ में तो नहीं पहुँच जाऐंगे। बस आँख बंद कर चल पड़े, चलते चले गए, चलते चले गए, अंततः बुरी तरह फँस मरे। फँसाने वालों के औसान देखिए अब गृहमंत्री और प्रधानमंत्री को भी फँसाने के लिये पुख्ता इंतज़ाम किये जा रहे हैं।
जो भी हो, इतिहास ने कानून की आँख पर काली पट्टी बाँधी ही इसलिए है ताकि वह राजा और रंक का फर्क न कर जो मिल जाए उसे फँसा ले, किसी खाँ के साथ मुरव्वत न करे।

6 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया सर!
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    कल 01/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. ये तो सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं|

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  3. इससे अंदाज लगाईये कि फंसने-फंसाने का यह खेल नीचे से उपर की दिशा में कितनी तरक्की कर रहा है ।

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  4. सूत्रों से ही सूत्र निकल रहे हैं।

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  5. फसने फ़साने का ये खेल अन्ना जी और बाबा जी ने जनता के सहयोग से सुरु करवाया है ..देखिये मुकाबला कहाँ तक जाता है ...सादर !!

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  6. देखिये..यह फस्सुवल कहाँ जाकर थमती है...थमना तो होगा ही वरना देश कैसे चलेगा... :)

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