Friday, November 25, 2011

आखिर सरकार का क्या बिगाड़ लेंगे!


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
सरकारें कितनी भी नालायक हों, मगर ऐसा नहीं है कि कोई उन पर विश्वास ही नहीं करता। लाख बुरा-भला कहें, गालियाएँ-जुतियाएँ, सत्ता से उखाड़े-पछाड़ें मगर कुछ विश्वास हैं जो कि सरकारों के नकारा होने के बावजूद उन पर से कभी नहीं उठते।
तमाम ऐसे सरकारी महकमें होते हैं जो अकर्मण्यता के लिये कुख्यात होते हैं, मगर आम जनता का विश्वास उनपर से कभी नहीं डिगता। जैसे पुल बनाने वाला महकमा है, कौन नहीं जानता कि ठेकेदार सीमेंट की चोरी करता है, लोहा खा जाता है, और सरकार का सेवाभावी इंजीनियर उसे ऐसा करने देता है। फिर भी आम जनता पुल के कभी भी भरभराकर गिर जाने के भय को ताक पर रखकर पूरे विश्वास के साथ पुल पर से गुजरती है।
तमाम सरकारों के पास पानी बाँटने वाला एक विभाग होता है। सभी जानते हैं कि ताल-तलैयों के प्रदूषित पानी को साफ कर पीने लायक बनाने के लिये आवंटित बजट, बिना पानी साफ किये ही साफ कर दिया जाता है, फिर भी जनता सरकारी नल से आए जल के प्रति कभी अविश्वास प्रकट नहीं करती, उसे अमृत समझकर गटागट पीती है।
रेलवे स्टेशनों पर मौजूद पानी की टंकियों की सफाई की रेलवे में कोई प्रथा नहीं होती और उसमें पहुँचाया जाने वाला पानी भी बैक्टेरिया, सूक्ष्म जीवों-कीटों की लालन-पालन, सरंक्षण-सवंर्धन स्थली होता है, मगर जनता-जनार्दन उस पानी को तृप्ति के जिस भाव के साथ पीती है, सरकार पर अविश्वास होता तो न पीती।
सरकार के एक महकमे का काम है नकली दवाइयों पर नज़र रखना। हम पूरे विश्वास के साथ दवा की दुकान से दवाइयाँ खरीदकर दनादन खाते हैं कि सरकार के लोगों ने ज़रुर नज़र रखी होगी। बाज़ार में खान-पान की वस्तुएँ हम कितने आत्मविश्वास के साथ चट करते हैं, यह मानकर कि खाद्य अमला पूरी ईमानदारी के साथ मिलावट की धरपकड़ करता होगा।
लोग सुबह-सबेरे उत्साहपूर्वक घर से निकलते हैं, नहीं जानते कि शाम को ज़िन्दा वापस लौटेंगे भी या नहीं, यह सरकारी कानून-व्यवस्था पर विश्वास नहीं तो और क्या है!
          कई क्षेत्रों में मक्कारियों की पूरी-पूरी सम्भावनाओं के बावजूद हम सरकारों पर आँख मूँदकर विश्वास करते हैं। ना भी करें तो आखिर उसका बिगाड़ भी क्या लेंगे!

6 comments:

  1. यह सब तो लोग मजबूरी मे झेलते हे,आप ने एक सच को बहुत सुंदर ढंग से दर्शाया हे,

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  2. सन्न्नाट....दिल जीत लेते हो भाई!!!

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  3. सबको कुम्भकर्ण का श्राप लगा है।

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  4. हा हा हा भारतीयों को अंजाम पता होने के बात भी काम करने की जेनेटिक बीमारी है। सब जानते हैं कि जिस घर के बाहर घोड़ी सज रही होती है। अंदर गधा सज रहा होता है। लेकिन फ़िर भी आदमी वरमाला नामक फ़ंदा गले मे डलवाने पहुंच ही जाता है कि नही।

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  5. और क्या उम्मीद कर सकते है?

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  6. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए आज 19/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिए एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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