Wednesday, December 28, 2011

बंद मुँह और खुले मुँह की लीला


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             
थोबड़े पर मुँहनामक खोह कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है, हालिया चेतावनीपूर्ण बयानबाज़ी से यह समझा जा सकता है। अमरराजनेता अमरसिंह के मुँह के बारे में यही चेताया जा रहा है, कि अगर वह खुल गया तो कई फँसेंगे। इस चेतावनी से यह भी ज़ाहिर होता है कि देश में ऐसे कई मुँह हैं जिनके खुलने से फँसनेवालों की लाइन लग जाएगी और फँसनेवाले वही सब होंगे जिन्होंने देश की मट्टी-पलीत कर रखी है। इस लिहाज़ से बंद मुँह वाले सभी बंदे खुफियातंत्र के लिए बड़े काम के हैं, उनकी ज़रा अच्छे से खातिर-तवज्जों की जानी चाहिए।
यह ठीक है कि मुँहव्यक्ति की निजी संपत्ति होता है, वह उसे खोले या बंद रखे यह उसकी मर्ज़ी, मगर ऐसे मुँहोंको खुलवाने के लिए बातोंऔर लातोंदोनों की पुख्ता व्यवस्था अवश्य कर रखी जानी चाहिए, जो कानून को ठेंगा दिखाने वालों के बारे में देश के उत्कृष्ठ जासूसीकर्मियों से ज़्यादा जानकारियाँ रखते हैं। मुँह भले ही निजी हो मगर उसका खोलना-बंद रखना सरकार के कंट्रोल में होना चाहिए, ताकि राष्ट्रहित में इसे जब, जहाँ, जितना ज़रूरी हो, खुलवाने का सुभीता रहे।
मुँहकुल्हड़नुमा वह शारीरिक संरचना है जिसमें लोग अक्सर स्वार्थ का दही जमा कर रखते हैं। जब तक स्वार्थ सधता रहे इसमें दही जमा रहता है, और लोग फँसने से बचे रहते हैं। जहाँ स्वार्थसंधान में बाधा आई कि लोग दही उलटकर अपने मुँहको खोलने की धमकी देने लगते हैं और किसी की भी लुटिया डूबाने पर उतारू हो जाते हैं। अपने अमर बाबू के मुँह को दुनिया आजकल बड़े उत्साह और विश्वास से देख रही है कि कब यह चरमराकर खुले और हमें खुश होकर तालियाँ पीटने का अवसर मिले।
किसी की आत्मा जागृत हो जाए तो बरसों-बरस मुँहके बंद रहने से भीतर दबी पड़ी नापाक करतूतों की फाइलें, फ्लापियाँ, सी.डी.याँ, खदबदाने लगती हैं, और क्षणिक आवेश के कारण जब उसका मुँह खुल जाता है तो भूकम्प आ जाता है और फिर कई गगनचुंबी स्तंभों को धराशायी होना पड़ता है। वह धराआमतौर पर तिहाड़ जेल की होती है। कुछ लोगों को जहाँ किन्ही मुहोंके खुलने से तिहाड़वास हो जाता है तो वहीं किसी-किसी को उसकामुँह खुल न जाए इस डर से तिहाड़वासी बना दिया जाता है। बैठो बेटा अंधेरी कोठरी में, और खोलो अपना मुँहकितना खोलना है।
देखा जाए तो शरीर में मुँहकी भूमिका बड़ी ही चुनौतीपूर्ण है। आँखों से देखी, कानों से सुनी असामाजिक-असांस्कृतिक करतूतों की रामकहानी को कंठ से फूटकर बाहर निकलने से इसे बलपूर्वक रोकना पड़ता है। फिर चाहे वह दही जमा कर रोके, मुखाग्र को मोची से सिलवाकर, या उस पर चौड़ा टेप चिपकाकर रोके, वह रोकता है, और यही मुँह का वह कुकृत्य है जिसकी वजह से देश में आचारकी इतनी समस्या व्याप्त है। स्वेच्छाचार हो, भ्रष्टाचार हो, दुराचार हो, व्यभिचार हो, सब कुछ उन मुँहों के चुप रहने के कारण ही फूलता-फलता है। जबकि आज ज़रूरत यह है कि मुँह खुले और तबियत से खुले। भले ही डाँटने-डपटने, गाली देने, कोसने, निंदा करने  के लिए खुले, यहाँ तक कि पात्र बदमाशों के मुँह पर थूकने के लिए ही सही, मगर खुले, तब देखिए देश में आचारका इतना संकट न रहे। लोग राम-राज्य का अनुभव करने लगें।
मगर, कभी-कभी ऐसा भी होता है कि देश में कुछ लोगों का मुँहजब खुलता है तो भीषण बदबू का असहनीय भभका छूटकर बाहर निकल पड़ता है और पूरे समाज को सड़ाने लगता है। लोग इस बदबू और सड़ांध को ईत्र की खुशबूसमझकर सुख की फर्जी अनुभूतियों में डूब-उतरा ही रहे होते है कि घात में बैठे लोग पलक झपकते ही उनका सब कुछ लूट ले जाते हैं।
इसलिए बंद मुहों को खुलवाने और खुले मुँहों को बंद करवाने के लिए कोई कठोर वैधानिक प्रावधान कर इन्हें कानून के दायरे में लाना चाहिए। मेरी राय में तो देश के सारे मुहों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाना बहुत ही बढ़िया रहेगा। सरकार को इस काम के लिए एक अलग विभाग खोलकर तमाम मुहों की निगरानी का चाक-चैबंद प्रबंध करना चाहिए। जब सारे बंद मुँह खुलेंगे और खुले संडांध मार रहे मुँह बंद हो जाएँगे तब देश का सचमुच भला हो जाएगा। 
शुक्रवार 23-29 दिसम्‍बर में प्रकाशित       

4 comments:

  1. Aaapne sabit kar diya hai ki ...

    अभिव्यक्ति का गला घोटना ब्लोगिंग में मुमकिन ही नहीं है .

    Khair , Ab aap sher sunen ,

    बहार हो कि खिज़ां मुस्कुराए जाते हैं,
    हयात हम तेरा एहसाँ उठाए जाते हैं |
    सुलगती रेत हो बारिश हो या हवाएं हों,
    ये बच्चे फिर भ़ी घरौंदे बनाए जाते हैं |
    ये एहतमाम मुहब्बत है या कोई साज़िश,
    जो फूल राहों में मेरी बिछाए जाते हैं |

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  2. मुँह का खुला या बन्द रखना शारीरिक कम राजनैतिक अधिक है।

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  3. प्रमोद जी हम आपके व्यंग के बहुत बड़े दीवाने हैं लेकिन अफसोस कि आपका व्यंग संग्रह ही नही मिल रही

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