Thursday, September 23, 2010

ओय ओय, फुट ब्रिज गिर गया



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            ओय ओय ओय ओय, फुट ब्रिज गिर गया, फुट ब्रिज गिर गया, बच्चे लोग ताली बजाओं। आज हम विध्नसंतोषियों के लिए बहुत खुशी का दिन है। हम ना कहते थे-भ्रष्टाचार चल रहा है, भ्रष्टाचार चल रहा है! कोई सुन ही नहीं रहा था, हम इतनी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे कि-धाँधली चल रही है, मगर कोई सुनने को ही तैयार नहीं था। अब देख लिया अपनी आँख से भ्रष्टाचार का नमूना- फुट ब्रिज गिर गया। चलो अपना अपना हाथ आगे करो, अब लड्डू बँटने वाले हैं।
            दो-तीन दिन पहले टुरिस्ट बस पर फायरिंग हुई, कुकर बम फूटा हमारे लिए बड़ी खुशी की बात थी। हम चिल्ला रहे थे-सुरक्षा कमज़ोर है, सुरक्षा कमज़ोर है, किसी के कान पर जूँ रेंगने को तैयार न थी, रेंगेगी भी कैसे, लोगों के सिरों में जूँ है कहाँ आजकल जो कानों पर आकर रेंगे! अब तो मानोगे, कि दो-चार ब्लॉस्ट और होंगे, या ठीक कॉमनवैल्थ खेलों के उद्घाटन में ही धम-धम होगी तभी मानोगे, कि हम सही कह रहे थे। हम हमेशा सही कहते हैं, कहते रहते हैं, कहते रहते हैं, तुम लोग सुनते कहाँ हो! अब तो सुनोगे झक मार के। हमारे लिए इससे बड़ा खुशी का मौका दूसरा नहीं। दो-चार धमाके और हों तो मजा आए।
            सालों से पानी नहीं बरसा ढँग से, गटर और जमुना में फर्क करना मुश्किल था। अब कॉमनवैल्थ होने को हैं तो देख लो, पानी बरस- बरस कर हमारा समर्थन कर रहा है। छतें टपक रहीं हैं, खुद भी टपक जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। पानी शहर में घुसा चला आ रहा है, सारी पोलें खोल रहा है, दुनिया देख रही है, कोस रही है कि - जो देश अपना गटर सिस्टम सही नहीं कर सकता उसे कॉमनवैल्थ कराने की जिम्मेदारी किस उल्लू के पट्ठे ने दी है। हम यहीं तो कह रहे हैं इतने दिन से - कि लापरवाहों, अकर्मण्यों, मक्कारों का देश है यह, चोट्टों, भ्रष्टाचारियों का देश है यह, इनसे कुछ होना-हवाना नहीं है, काहे को तो इतनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी गई इन्हेंं। कंडे थोपने भर की औकात है इनकी, वही करते रहते तो ही ठीक था।
            अब देखो, खेल गॉव में कितनी गंदगी मचा के रखी है, जैसे सुअरबाड़ी हो। विदेशी खिलाड़ियों के बिस्तरों पर कुत्ते सो रहे हैं। जिन मजदूरों की औकात दो कौड़ी की नहीं वे भी कमीशन के गद्दों पर लोट लगा रहे हैं। इनका बस चले तो दुनियाभर के ढोर-डंगरों को भी वहाँ लाकर बसा दें।
            हम ना कहते थे, जिम्मेदारी तो किसी एक में नहीं है, आज़ाद देश मिल गया है तो सब साले मकरा गए हैं। देश की इज्ज़त का किसी को रत्ती भर खयाल नहीं है। अब हमी को देख लो, बकर-बकर हमसे चाहे जितनी करवा लो, टाँग खिचाई, टाँग अड़ाई, छिलाई, जग-हँसाई हमसे चाहे जितनी करवा लो, निंदा, आलोचना, बुराई हमसे जी भर के करवा लो, मगर बाकी दिनों में, जब कोई कॉमनवैल्थ सिर पर नहीं होता, हम कहाँ भाड़ झोकते रहते हैं, हमसे कोई मत पूछना।

13 comments:

  1. एक मन्त्री तो बहुत प्रसन्न होंगे।

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  2. अभी कमीशन बेठे गा, खुब बक बक होगी, बस फ़िर सब चुप हो जायेगे, जनता भी जल्द ही इसे भुल जायेगी, ओर फ़िर यही लोग फ़िर से खुन चुसेगे हम सब का, इस से ज्यादा कुछ नही होने का देखे आप भी, न किसी को सजा होगी ना कोई जेल जायेगा, क्योकि जनता जागरुक नही, इसी लिये....

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  3. डा सुभाष रायSeptember 24, 2010 at 12:44 AM

    प्रमोद भाई, असली खेल से पहले ही जिन्होंने भ्रष्टाचार के खेल में मेडल हथिया लिये हैं, वे तो अपने घरों की पुताई-लिपाई में लग गये होंगे, दीवाली आने को है. दीवाला झेलें मनमोहन. मीटिंग कर रहे हैं ताकि कोई स्टेडियम दर्शकों को लिये-दिये जमीन पर न आ जाय. अभी तो बहुत कुछ होना है. देखते जाइये. धूं, धांय, धड़ाम, जै सिया राम.

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  5. बहुत अच्छा व्यंग है.

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  6. Good Satire. Coming to Bhopal on 28th Sept. for Official work.
    Niranjan Shrotriya
    9827007736

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  7. आज़ाद देश मिल गया है तो सब साले मकरा गए हैं- बड़ी गहरी चोट...बधाई.

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  8. अच्छी प्रस्तुति।

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  9. dukhad hai ki ye sare sach kah-sun-likhg-padh vahi rahe hein jinme sharm bacchi hai par un besharmo ka kya kare jin par ye sab likha jaa rahaa hei?-sanjay bhardwaj

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  10. अच्छा व्यंग भी और कटु सत्य भी

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