बुधवार, 10 जून 2026

मूर्ख वैश्विक सांड

पृथ्‍वी पर एक विशाल जंगल में एक भीषण शक्तिशाली साँड़ रहता था। कहने को तो वह शक्तिशाली साँड़ था परन्‍तु देखने-सुनने में वह मूलत: बड़ा भौंदू मूर्ख और बेअकल था। उसकी हरकतें ही ऐसी थी कि दुनिया में कोई उसे गंभीरता से लेता ही नहीं था, उसके अंध भक्‍त तक नहीं। आप यह मत समझिये कि सूरत और सीरत से वह हमारे भारतीय बाजारों में हुड़दंग मचाता, दुकानों में घुसकर तोडफ़ोड़ करता, लोगों के पीछे दौड़ता-खदेड़ता पाया जाने वाला छुट्टा आवारा साँड़ जैसा कोई साँड़ होगा। नहीं, बल्कि उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक, ख़ूँख़ार, रक्तपिपासु, आततायी, मानवताख़ोर साँड़ था जो दुनिया भर में घूम-घूमकर लोगों को सींग और गधे की तरह लात मारता फिरता था। यही नहीं बल्कि वह दादागिरी धौसदपट से अपनी शर्तों पर दुनिया को हाँकना चाहता था। यहाँ तक कि वह दूसरे जंगलों के सीधे-साधे गऊ बैलों को जबरिया उठा भी लेता था जो बेचारे शांतिपूर्वक अपनी अपनी चरनोई में घास चर रहे होते थे। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने वेनेजुएला नामक जंगल के एक सीधे-साधे बैल को एक कोवर्ट आपरेशन करवा कर उठवा लिया था जैसे वह बैल उसका कुछ खाकर बैठा हो या उसने इस गुंडे साँड के जंगल की ज़मीन-अमीन दबा ली हो।

दुनिया के दूसरे जंगलों के ज़्यादातर बैल वे चाहे ताकतवर हों या कमज़ोर इस वैश्विक साँड़ से ख़ौफ़ खाते थे और उसकी चमचेगिरी, लल्लो-चप्पों जी-हुज़ूरी करते दिखायी देते थे। कुछ कुछ जंगलों के बैल तो उसके सामने पूरा लेट ही जाते थे जैसे याचना कर रहे हों कि आइए सर हमें रोंदते हुए हमारे ऊपर से निकल जाइए, हमारी संप्रभुता को कुचलिए, हमारी स्वतंत्रता को मसलिए, हमारी आवाम को टैरिफ की चक्की में पीस दीजिए, हम आपके जन्‍म जन्‍म तक आभारी रहेंगे । और कुछ तो उस वैश्विक साँड़ के चारों खुरों को चाट-चाटकर चाँदी की तरह चमकाए रखने के लिए हर वक्‍त अपनी जीभ तैयार रखते थे।

उस शक्तिशाली साँड़ को बिना बात दुनिया भर के जंगलों और उनकी सरकारों से पंगा लेने की बुरी आदत थी। वह सारी दुनिया को अपने बाप की जागीर समझता था। उसे लगता था कि वह सारी दुनिया का इंस्पेक्टर जनरल है जिसका हक है सारी दुनिया से उठक-बैठक लगवाना और लूटपाट की हद तक हफ्ता वसूली करके अपने जंगल और वहाँ के जानवरों को को खुश रखना। दुनिया भर में ज्‍़यादातर लोगों को यह लगता था कि वह वैश्विक साँड़ ज़रूर  गाँजा-भाँग या कोई दूसरा सस्‍ता नशा किये रहता है लेकिन उसका नशा दरअसल साम्राज्‍यवाद का नशा था, एकाधिकार पूँजी का नशा था जिसकी प्‍यास पृथ्‍वी पर मौजूद कोई भी पदार्थ पी लो कभी बुझती ही नहीं थी। अपने इस नशे में चूर यह वैश्विक साँड़ पूरी पृत्‍वी पर चारों ओर दनदनाता फिरता था।

इस साँड़ के पूर्वज हालाँकि कई बार कई जंगलों में मुँह की खा चुके थे और पिट-पिटा कर लहूलुहान से घर आकर कई साल तक अपनी मरहम पट्टी करवाते रहे थे लेकिन फिर भी इस जंगल का कोई भी साँड़ अपनी पुश्‍तैनी हरकतों से बिल्कुल बाज नहीं आता था। इस साँड़ की भी वही आदत है कि वह लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर अलोकतांत्रिक तरीके से स्वतंत्र संप्रभु जंगलों के अंदर घुसकर उन पर अलोकतांत्रिक होने का आरोप लगाता है और वहाँ की सरकार को अस्त-व्यस्त करके अलोकतांत्रिक तरीकों से धराशायी कर देता था और वहाँ के चुने हुए बैलों को पदच्‍यूत करके अपने चमचों, खरीदे हुए गुलाम गीदड़-लूमड़ो को वहाँ की सत्ता में बिठाकर उस जंगल की हरियाली खुशहाली और धन-संपदा को धीरे-धीरे पूरा चर जाता था। दुनिया में किसी की हिम्मत नहीं होती है कि उस साँड़ को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय नियमों-कानूनों का हवाला देकर रोके या लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देकर उसकी साँड़त्व पूर्ण हरकतों पर अंकुश लगाए। बहुत से जंगलों के बैल तो उस वैश्विक साँड़ के साँड़त्व में ही अपना अहोभाग्‍य समझते थे और दिन-रात उस साँड़ की पूजा-अर्चना में लगे रहते।

इस साँड़ का पूर्वज एक बार वियतनाम नामक एक छोटे से जंगल में पहुँच गया लेकिन वहाँ उसने तेरह साल तक वियतनामी पशुओं के जूते खाए । मजे की बात यह है कि इन तेरह सालों में उस वैश्विक साँड़ के जंगल में पाँच साँड़ सत्‍ता में आए और सभी मुँह की खाकर चले गए परंतु न वियतनामी बैलों ने हार मानी न वहाँ के छोटे-बड़े पशुओं ने। वैश्विक साँड़ की पूरी पलटन को खदेड़कर ही दम लिया। दुनिया भर के जंगलों के पशुओं को लगा कि तेरह साल पिटने के बाद तो साँड़ की पूँछ सीधी हो गईं होगी लेकिन वह तो कुत्ते की दुम की तरह टेढ़ी ही थी बल्कि और भी ज़्यादा टेढ़ी हो गई थी । इसके बाद भी वह ईरान, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया आदि जंगलों में मुँह की खाता फिरा। एक बार वह अपने एक पड़ोसी छोटे से सीधे-साधे लाल जंगल क्‍यूबा पर आँखें तरेरने लगा तो क्‍यूबा के शुभचिंतक एक दूसरे बड़े वैश्विक लाल साँड़ ने अपने नथूने फड़फड़ाए और पिछली टाँगों पर दो कुदक्‍कड़े लगाए तो यह शक्तिशाली साँड़ शक्तिवि‍हीन बन के अपनी माँद में घुस गया। अभी हाल ही में वह अपने एक दुष्ट छोटे भाई के साथ मिलकर ए‍क बार फिर ईरान नामक एक छोटे से जंगल में आ कूँदा लेकिन ईरान ने दोनों साँड़ भाइयों का वो हाल किया कि ये दोनों साँड़ इतिहास में मुँह दिखाने के लायक तक नहीं रह गए हैं। दरअसल लम्‍बे समय से उस आततायी साँड़ की नज़र ईरान के काले सोने पर थी और उसे लूटने के इरादे से ही वह उस पर दादागिरी झाड़ रहा था और जिस तरह उसने साम दाम दंड भेद अपनाकर पूरे अरेबियन जंगल के काले सोने पर कब्‍ज़ा कर रखा था उसी तरह वह ईरान के काले सोने को भी अपने बाप का माल समझकर हड़पना चाहता था लेकिन ईरानी जंगल के पशु और बैल्‍ दिखने में ही सीधे-साधे थे लेकिन उनके इरादे अपने से भी कई गुणा बड़े और भारी-भरकम इस वैश्विक साँड़ से भी कई गुणा ज्‍़यादा बुलंद थे।

अभी इन दिनों ईरान नामक जंगल के साथ उस वैश्विक साँड़ की जद्दोजहद चल ही रही है, बल्कि ईरान ने उसे कई जगह पटकनी दे दी है लेकिन फिर भी उसकी हिमाक़त तो देखो, उसने इस घायल और लोहूलुहान हालत में भी अपने अगले शिकारों की घोषणा कर दी है कि अब वह क्यूबा और ग्रीनलैंड पर सींग चलाएगा। किसी ने सच ही कहा है, मूर्ख का अति आत्‍मविश्‍वास गज़बनाक होता है। लेकिन यही गज़बनाक अति आत्‍मविश्‍वास एक दिन इस मूर्ख वैश्विक साँड़ को अवश्‍य ही धूल चटा देगा, दुनिया भर के बड़े-बड़े जंगलों के बैलों का भले न हो लेकिन छोटे-छोटे जंगलों के बैलों और अमन पसंद जंगली पशुओं का तो यही आत्‍मविश्‍वास है।

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गुरुवार, 20 मार्च 2025

ट्रम्प की लात

//व्‍यंग्‍य - प्रमोद ताम्बट //

ट्रम्प की घास न डालने वाली ट्रेजडी का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि उसने हमारे पृष्ठ भाग पर कस के लात मार दी। लात भी ऐसी मारी कि हाथ में हथकड़ी और पैर में बेड़ी होने के कारण हम अपने पृष्ठ भाग का बचाव भी नहीं कर पाए न ही सहला पाए । जबकि नेपाल, पाकिस्तान जैसे देशों को और तो और चीन को भी ट्रम्प ने सहलाने की सुविधा दे दी क्योंकि उन्हें हथकडि़यों बेडि़यों में नहीं जकड़ा गया। हमारे साथ हमारे उस प्रिय दोस्त ने ऐसा कट्टर दुश्मनों जैसा सुलूक क्यों किया हमारा कोई राष्ट्रवादी कूटनीतिज्ञ बता ही नहीं रहा है। इधर अमेरिका के प्रति खानदानी अनुराग के कारण ‘आह’ तो हमारे मुँह से निकल ही नहीं रही है। ट्रम्प जी कहीं बुरा न मान जाए। बिना बुरा माने उन्होंने हमारा बहुत सारा आर्थिक नुकसान कर दिया है, खुदा न खास्ता अगर ट्रम्प जी बुरा मान जाते तो न जाने क्या गज़ब ढा देते। यह नुकसान विगत ग्यारह सालों की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।
पिछले सतहत्तर सालों में देश में भले ही कुछ न हुआ हो लेकिन ऐसी लात भी कभी नहीं घली कि शर्म के मारे पानी-पानी भी न हुआ जा रहा हो। छप्पन इंच की छाती भले ही नहीं थी किसी नेता की लेकिन दुनिया के बड़े से बड़े गुंडे तक ऐसी ज़लील हरकत करने की हिम्मत पहले कभी नहीं जुटा पाए कि गुलामों की तरह भारतीयों को देश निकाला दे दिया गया हो। लात मारना तो दूर मारने के लिए लात उठाने का उपक्रम तक नहीं कर पाया कोई। लेकिन देखिए इज़्जत का पंचनामा करने वाली ऐसी हरकत की गुस्तााखी ट्रम्प ने तब कर के दिखा दी जब दुनिया में हमारी ओर आँख उठाकर देखने की हिम्मत किसी में नहीं है। चारों दिशाओं में हमारा डंका बज रहा है। यह बात अलग है कि वह डंका बजता हुआ दुनिया में और किसी को सुनाई नहीं देता।
एक सो इकत्तीस साल पहले तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्यवादी गुंडों ने हमारे देश के एक दुबले-पतले से इंसान को धक्का मार कर ट्रेन से उतार दिया था, तो उसने हिन्दुरस्तान वापस आकर वो तूफ़ान खड़ा किया कि उस तूफ़ान में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की गुंडागर्दी तिनकों की तरह हवा में उड़ गई, जबकि उस वक्त हमारे पास न कोई ताक़त थी न ही हौसला। मगर आज हम दुनिया के तथाकथित पाँचवे ताकतवर मुल्क हैं, 5 ट्रिलियन की इकानॉमी के मुहाने पर खड़े हैं। हौसले की बात तो न ही की जाए तो बेहतर है, विश्वगुरु होने के नाते वह हम में ठूस-ठूस कर भरा हुआ है। फिर भी अमेरिकन साम्राज्यवादी गुंडों के सामने हम पंगु और लाचार से खड़े हुए हैं। न केवल लाचार खड़े हैं बल्कि अपने पृष्ठ भाग को लात खाने के लिए स्व्तंत्र भी छोड़ रखा है कि आओ और लतिया लो जितना लतियाना है, हम उफ तक नहीं करेंगे। हमने मुँह सिल रखा है अपना।
देखने की बात यह है कि लगातार लातें खाने के बाद अब हम क्या करेंगे। लात से पड़ गए नील को सहलाकर, मलहम वगैरा लगाकर फिर अमेरिका की लात खाने पहुँच जाएँगे या ट्रम्प की उस लात को ही मरोड़ डालेंगे जो हमारी तशरीफ पर जमकर बरसी है और दुनिया के सामने बैंड बाजे के साथ हमारा जुलूस भी निकाला गया है । गनीमत है कि अमेरिका में बैंड-बाजे के आगे-आगे डांस करने का रिवाज़ नहीं है वर्ना वे बेड़ी-हथकड़ी डालकर लाए गए भारतीय दूल्हों के सामने नागिन डाँस पर नाचते हुए उन्हें भारत लाते, और हम तमाशबीनों की तरह तमाशा देखते रहते जैसे कि अब भी देख ही रहे हैं।
हमने लाल आँखें दिखाने वालों को कुर्सी पर बिठाया था ताकि दुनिया के सारे मुल्क डर के मारे हमें नज़रें नीची रखकर ही देखें, लेकिन हो उल्टा रहा है। लाल आँखों वाले नज़रें झुकाकर हममें लातें घलते हुए देख रहे हैं, उन्होंने ट्रम्प की लात को कनखियाँ भी दिखाने की कोशिश नहीं की।
ताज्जुब की बात तो यह है कि मीडिया ने ट्रम्प की लात के पवित्र होने के कसीदे नहीं कसे। वाट्सअप यूनिवर्सिटी ने ट्रंप की लात का गुणगान नहीं किया, उसकी आरती नहीं उतारी । यह बिल्कुल भी अच्छीे बात नहीं है। जब तक ट्रम्प की लात का महिमामण्डन नहीं होगा तब तक ट्रम्प और ट्रम्प के परम भारतीय मित्र खुश कैसे होंगे, शाबासी कैसे देंगे। हमारे प्यांरे घुसपैठिये दोबारा, तिबारा, चौबारा चोर रास्ते से अमेरिका में घुसकर पकड़ाएँगे कैसे और ट्रम्प की लात बार-बार हमारे पृष्ठ भाग पर पडे़गी कैसे। आखिर ट्रंप की लात भी हमारे लिए किसी ईनाम से कम थोड़ी न है।
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मंगलवार, 18 मार्च 2025

हज़ार मर्ज़ों की दवा खरीददारी की बीमारी

//व्‍यंग्‍य- प्रमोद ताम्‍बट//

सपनों में आप खुद को झोला उठाए बाज़ार में घूमते दिखायी दें, बड़े-बड़े शो रूम मॉल्स की चकाचौध आँखों के सामने पिक्‍चर सी घूमती रहें, फ़ूड जोन, खस्ता चाट-पकौड़ी की खुशबुओं से नथूने फड़कते रहें, कदम बार-बार बिस्‍तर पर ही आपो-आप बाज़ार की ओर चल पड़ने को आतुर हों और साथ-साथ हाथ में प्रचंड खुजली सी भी मचती रहे तो समझ लीजिए आपको खरीददारी की बीमारी ने जकड़ लिया है। इस स्थिति में आप जब तक बाज़ार जाकर चार-छः घंटों का क़त्ल कर के आठ दस झोले-झाँगड़े हाथों में लटकाएँ ओला-उबर से थके-हारे घर नहीं लौटोगे तब तक इन रोज़ परेशान करने वाले सपनों की वजह से आपको रात-रात भर नींद नहीं आएगी । यदि आप घोड़े बेचकर चैन से सोना चाहते हैं तो आपको समय-समय पर बाज़ार की तरफ दौड़ लगाना ही पड़ेगी चाहे आपकी जेब में पैसे हों या न हों।

यकीन मानिए इस चरम पूँजीवादी मारामारी के दौर में खरीददारी की यह संक्रामक बीमारी आम आदमी के लिए अपने-आप में ख़ुद एक बहुत बड़ी प्राणदायी दवा बन गई है। दुनिया में कुछ भी उठापटक चलती रहे, बाज़ार उन्‍वान पर हों या ध्‍वस्‍त होते रहें, अर्थव्‍यवस्‍था रेंग रही हो या उड़ रही हो, आपकी माली हालत खस्‍ता हो तब भी खरीददारी की यह बीमारी स्‍थाई भाव से अपनी जगह बनी रहती है और बाकायदा स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक टॉनिक का सा काम भी करती रहती है। इस दवा के सामने कोई ताकतवर से ताकतवर लाइफ़ सेविंग ड्रग भी टिक नहीं सकती। कभी तबियत नासाज़ रहे रात भर नींद न आए या उचटी-उचटी सी आती-जाती रहे, सुबह उठते से ही आँखों के आगे अंधियारा सा छाया रहता हो। रह रह कर घुमेरी आती हो। चाय-नाश्ते की भी इच्छा ना हो। नहाने धोने सजने संवरने, तैयार होकर मटकने का भी मन न हो, प्राण निकले पड़ रहें हों तो आप फौरन अपना क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड उठाकर बाज़ार की तरफ़ निकल जाइये, बस फिर देखिए कैसे आपके प्राण वापस लौट आते हैं। कहीं जम के मुँह की खानी पड़ी हो, कहीं पिट-पिटा कर आएँ हों, परीक्षा में फेल हो गए हों, प्रेमी-प्रेमिका से ब्रेकअप हो गया हो, इंडिया क्रिकेट मैच हार गई हो, मूढ बेहद खराब हो, बस उठकर चल दीजिए बाज़ार की ओर।  बाज़ार में अगर आपने डॉक्टर की फ़ीस, पैथालॉजिकल टेस्‍टों और दवाओं की कुल कीमत से एक चौथाई कम रकम भी यदि खर्च कर ली तो समझ लीजिए आपकी बीमारी चंद लम्‍हों में छूमंतर  हो जाएगी। यकीन न हो तो आज़मा कर देख लीजिए।

बात दरअसल यह है कि वैश्विक व्यापार व्यवसाय लॉबी ने खरीददारी की इस बीमारी को एक महत्वपूर्ण अल्टरनेटिव थेरेपी के रूप में ईजाद किया है और उसे गीता-रामायण से भी ज्‍़यादा प्रचारित प्रसारित किया है क्योंकि उनका मानना है कि उपलब्ध दवाओं से हमेशा की तरह बस मर्ज़ ही बढ़ते रहें और मरीज़ दम तोड़ते रहें तो उनके व्यापार-धंधों का क्या होगा। एक दिन दुनिया का सम्‍पूर्ण बाज़ार ख़रीददार विहीन हो जाएगा। दुकानों शोरूमों पर ताले लग जाएँगे। कॉर्पोरेट दफ्तर और बिज़नेस हब सूने हो जाएँगे। तिजोरियाँ भूखे पेट पड़ी रहने का मजबूर हो जाएँगी। सरकारों के पास भी करने के लिए कोई काम नहीं रहेगा। इसलिए उन्होंने बहुत शोध-अनुसंधानों के पश्चात यह थेरेपी ईजाद की है और अब इसका उपयोग घर-घर में किया जाकर स्‍वास्‍थ्‍य लाभ लिया जाने लगा है।

मगर इधर चिकित्सा विज्ञान की दवा-गोली इंजेक्शन ब्राँच ने इस बात पर गंभीर आपत्ति ली है और हड़ताल इत्‍यादि करने की धमकी देकर विरोध दर्ज करा रखा है क्योंकि उनके मुताबिक अगर ख़रीददारी से ही मरीज़ ठीक होते रहे तो उनके दवा-गोली निर्माण के धंधे पर संकट आ सकता है। अस्पतालों, दवा-दारू की फैक्ट्रियों दुकानों, पैथोलॉजी सेंटरों, आधुनिक टेस्ट प्रणालियों के भट्टे बैठ सकते हैं।

आम पब्लिक को भी यदि अपनी बीमारियों को ठीक करने के लिए दवा-दारू और खरीददारी में से कोई एक सुविधा चुनने के लिए कहा जाए तो वह भी शर्तिया खरीददारी को ही चुनेगी, क्योंकि पैसे तो आख़िर दोनों प्रकार की बीमारियों में खर्च होते हैं चाहे वह खरीददारी की बीमारी हो अथवा शा‍रीरिक बीमारी। जिस बीमारी से बांछे खिल-खिल उठती हों वह बीमारी है असल बीमारी। खरीददारी की बीमारी दुनिया की एक मात्र ऐसी बीमारी है जो खुद तो खतरनाक बीमारी है मगर हज़ार मर्ज़ों दवा भी है।

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सोमवार, 17 मार्च 2025

ट्रेन का इंतज़ार करता आदमी

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 

ट्रेन अपने निर्धारित समय से प्लेटफार्म पर आ जाए यह अपने आप में बहुत ही विस्मयकारी बात होती है। समय पर आ गई ट्रेन को प्लेटफार्म पर खड़ा यात्री भौंचक्‍का  सा ताकता रहता है, सोचता है चढ़ू कि न चढ़ू! चढ़ जाऊँ तो ऐसा न हो कि किसी और ट्रेन में चढ़ कर किसी और स्टेशन पर उतार दिया जाऊँ। वह असमंजस में होता हैं कि समय से आ गई यह ट्रेन कहीं वो ट्रेन तो नहीं जिससे हमें जाना ही नहीं है। क्योंकि जिस ट्रेन से हमें जाना होता है वह तो कभी समय पर आने की आदी ही नहीं होती ।

ट्रेन का इंतज़ार करते आदमी को देखिए, दुनिया भर की उदासी थोबड़े पर लिए वह इत्मिनान से ट्रेन का इंतज़ार करता रहता है। उसका इत्मिनान इतना गहरा होता है कि उस दिन ट्रेन न भी आए तब भी वह इत्मिनान से प्‍लेटफार्म पर डला ट्रेन का इंतज़ार करता उदास बैठा रह सकता है। क्‍योंकि बिना घंटों ट्रेन का इंतज़ार किए ट्रेन में चढ़ने को मिल जाए ऐसी भारतीय ट्रेन लानत के समान है ।

समय पर आ गई ट्रेन में पूछताछ कर आदमी चढ़ भी जाए लेकिन अपनी सीट पर बैठने में उसे बड़ा डर लगता रहता है कि कहीं वह ग़लत ट्रेन में न चढ़ गया हो और उस ट्रेन का उस सीट का सही यात्री अगर उसकी खोपड़ी पर आकर खड़ा हो जाये तो वह क्या करेगा। समय पर आ गई ट्रेन अगर निर्धारित समय से 2 घंटा लेट चल रही दूसरी कोई ट्रेन निकली तब तो वह बेटिकट हो जाएगा । ऐसे में अगर टीसी भी भाँप गया कि मुर्गा आ फँसा है तो वो अलग जुर्माना और बेइज्जती दोनों साथ-साथ करेगा।

ऐसे बेटिकट यात्री की दास्तान भी बड़ी दर्दनाक होती है । वह टिकट होते हुए बिना टिकट होता है और भी रेलवे एक्ट, 1989 के सेक्शन 138 के मुताबिक बिना टिकट यात्रा करना दंडनीय अपराध है । उसे जुर्माने के साथ-साथ जेल की हवा भी खाना पड़ सकती है। तो क्यों इत्ती रिस्क लेना। ट्रेनें चले जितना लेट उन्हें चलना है कम से कम आदमी सही ट्रेन में बैठ कर जुर्माने और जेल से तो बच जाएगा।  

ट्रेन अगर समय पर प्लेटफार्म पर आ लगे और आदमी समय पर घर पहुँच जाए तो बीवी आदमी को पहचानने से साफ इनकार कर सकती है। बेकार में थाना पुलिस भी हो सकती है। उससे बेहतर है कि ट्रेनें बदस्तूर लेट चलती रहें कोई परेशानी नहीं। आदमी महोदय प्लेटफार्म की निपट ठंडी बेंच पर पटरियों पर से आने वाली दुर्दांत बदबू को सूँघते हुए घंटों डले रह सकते हैं। ट्रेन का इंतज़ार करते आदमी के पास समय का कोई अभाव नहीं होता।

ट्रेन का इंतज़ार कर रहा आदमी बार-बार चाय पीता है। गुटका तमाकू खैनी भी खाता रहता है। भूख लगती है तो समोसा ब्रेड पकोड़ा और नहीं लगती है तब भी चिप्स कुरकुरे या हल्दीराम का कुछ न कुछ चुगता रहता है। इससे अर्थव्यवस्था ऊपर उठती है। मेरी तो राय है कि हर स्टेशन के हरेक प्लेटफार्म पर एक-एक गाँजा-भांग और कंपोजिट दारु की दुकान भी खोल देना चाहिए और ट्रेन का इंतज़ार करते आदमी को चखना-सोड़ा पानी इत्‍यादि की पर्याप्‍त सुविधाएँ उपलब्‍ध कराना चाहिए। ट्रेनों को अनिश्चितकालीन विलंब से चलने के सख्‍़त निर्देश दे दिए जाना चाहिए ताकि लोग नशा-पत्ता कर प्‍लेटफार्म पर टुन्न पड़े रहें । सरकारी खज़ाना भी भरता रहे और इतमिनान से ट्रेन का इंतज़ार भी होता रहे।

मेरे मत में तो लेट चल रही ट्रेन का इंतज़ार करते आदमी को मुफ्त ख़ान-पान और दूसरे इंसेंटिव देना चाहिए। ताकि ज़्यादा से ज़्यादा तादात में आदमी रेलवे स्टेशन पर आकर रात-दिन ट्रेन का इंतज़ार करें। इस काम के लिए थोड़ा बहुत पारिश्रमिक भी दिया जा सकता है। इससे बेरोज़गारी की विकट समस्या का भी निदान होगा। झुंड के झुंड बेरोज़गार युवा स्टेशन पर आकर ट्रेन का इंतज़ार किया करेंगे और चार पैसे कमा कर अपना घर चलायेंगे।

चुनावी राज‍नीति की दृष्टि से भी ट्रेन के इंतज़ार में प्‍लेटफार्म पर पड़े आदमी का काफी महत्‍व हो सकता है। नेता लोग उसे ट्रेनों का हमेशा लेट होना सुनिश्चित करने और इंतज़ार की महत्‍वपूर्ण घड़ियों में दी जाने वाली मुफ्त सुविधाओं से संबंधित झूठे वादों के पुलिंदे पकड़ाकर उसका वोट झड़ा सकते हैं। कोई वादा न भी किया जाए तब भी वह हमेशा की तरह उम्‍मीदा नाउम्‍मीदा वहीं पड़ा रहेगा । यही भारतीय रेल यात्री की नियति है।

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मंगलवार, 4 मार्च 2025

ट्रम्प क्यों कपड़े फाड़ रहा है

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 

देखा आपने, ट्रम्प आजकल किस कदर कपड़े फाड़ रहा है? और कुछ फाड़ता तो समझ में आता मगर खुद आप अपने कपड़े फाड़ रहा है यह बड़ी ताज्जुब वाली बात है। चाहता तो काग़ज़ फाड़ लेता, कॉपी-किताब फाड़ लेता, किसी ओर के नाम का बिल फाड़ लेता, दरी-चादर, रज़ाई-गद्दे-तकिये फाड़ लेता, वाइट हाउस के ऊँचे-ऊँचे परदे फाड़ लेता मगर ऐसा क्या हो गया कि अगला अपने खुद के कपड़े फाड़ने पर उतारू है।

एक बात लेकिन ग़ज़ब हो रही है। कपड़े वह अपने फाड़ रहा है और उसकी इस नितांत निजी कार्यवाही के फलस्‍वरूप  नंगा कोई और ही हो रहा है। होना यह चाहिए था कि नग्नता उसकी खुद की सामने आना चाहिए थी लेकिन वह तो कम्बख़्त हमाम में भी सूट-बूट डाटे डायस के पीछे खड़ा होकर प्रेस कान्‍फ्रेंस पर प्रेस कांफ्रेंस किये जा रहा है और नंगा किसी और को होना पड़ रहा है। यह सरासर मानवाधिकार हनन का मामला है नग्‍नता बचाओ नग्‍नता छुपाओ संस्‍थाओं ने इसका संज्ञान लिया जाना चाहिए।

वैश्विक चिंता की बात यह है कि वह यदि अपने कपड़े फाड़ना मुल्तवी कर के इधर नंगे  हो रहे महानुभाव के ही कपड़े फाड़ना शुरू कर दे तो क्या होगा? एक नई कहावत अस्तित्व में आ जाएगी- नंगे के कपड़े फाड़ना। यह एक नया राजनीतिक समीकरण टाइप बन गया लगता है जिसका भावार्थ यह है कि नंगों के बदन पर भी लकदक कपड़े होते हैं जिसे कोई भी दूसरा छिछोरा व्यक्ति ख़ुद अपने कपड़े फाड़कर निर्वस्त्र कर सकता है।

हमारे यहाँ तो लोग अपनी खुद की शादी में जो सूट सिलवाते हैं उसे बेटे की शादी तक में रगड़ते हैं लेकिन ट्रम्प की दरियादिली देखिए नवे-नकोरे इतने महँगे-महँगे रेमंड के सूट (माफ कीजिए लेखक को एक इसी ब्रांड का नाम पता है ) जो उसने हाल ही में शपथ ग्रहण समारोह के ठीक पहले सिलवायें थे, इस तरह बेदर्दी से चर-चर करके फाड़ रहा है। शर्म यहाँ भारत में हमको आ रही है, क्योंकि नंगा तो हमारा आदमी हो रहा है। ख़ुद अपने कपड़े फाड़ कर ख़ुद नंगा होये या हमारे दुश्मनों को नंगा करे, हमारे विरोधियों को नंगा करे, अजी चाहे तो हमारे दोस्तों को भी नंगा कर ले तब भी हमें कोई परेशानी नहीं, मगर ट्रम्प तो एक तरह से हमी को नंगा करने पर उतारू है भले ही कपड़े अपने खुद के फाड़ रहा है।

हमें आशंका है कि ट्रम्प अभी और कपड़े फाड़ेगा। अपने सारे सूट, पैंट-शर्ट यहाँ तक कि कच्छे बानियान तक फाड़ लेगा क्योंकि उसे पता है कि हम अभी और नंगे हैं। हमें डर है कि हमारी नंगाई को सरे आम करने के लिए कहीं वह अपनी खाल ही न फाड़ ले क्योंकि कपड़ों के बाद तो फिर खाल ही का नम्‍बर आता है फाड़ने के लिए। और अगर उसने अपनी खाल फाड़ ली तो कसम से हम कहीं मुँह दिखाने के लायक भी रहेंगे या नहीं कह नहीं सकते। क्‍योंकि उसने अगर अपनी खाल फाड़ी तो हमारी सौ साल से चली आ रही नग्‍नता के दर्शन न हो जाएँ यह हमारी सबसे बड़ी चिंता है।

यह हमारा दुर्भाग्‍य है कि हमारे पास न तो यह हुनर है न ही ऐतिहासिक बाध्‍यता कि कपड़े हम अपने फाड़े और नंगा ट्रंप हो जाए। कपड़े हम अपने फाड़ें और नंगा अमरीकी प्रशासन हो जाए। कपड़े हम अपने फाड़ें और नंगा अमरीकी साम्राज्‍यवाद हो जाए। क्‍योंकि यह हमारे खून में ही नहीं रहा कभी। हम हमेशा से साम्राज्‍यवाद की चिरोरी चमचागिरी के आदी हैं। हमारे बदन पर साम्राज्‍यवादी तमगों की भरमार है हम अपने कपड़े फाड़ें तो कैसे फाड़ें ? हमने ट्रंप का नमक खाया है।

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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

कुएं में कूदने के लिए टर्नआउट

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

लो साब, मुझे अब पता चला कि 2024 में मैंने वोट डालने के लिए बूथ की तरफ़ जो टर्न लिया था उसके लिए अमेरिका ने पैसा दिया था, यह बात अलग है कि वह पैसा मुझे आज तक मिला ही नहीं है। 2024 में ही क्यों, उसके पहले 2019 में भी मैंने वोट डाला था और 2014 में भी। मतलब हर बार जब मैं वोट डालने के लिए बूथ की तरफ़ टर्न होता हूँ तो उसके लिए अमेरिका पैसा भेजता रहा है लेकिन वो पैसा मुझ तक कभी पहुँचता ही नहीं है, बीच में ही उसे कोई खा जाता है।

पहले कोई बूथ की तरफ टर्न ही नहीं होता था। खास कर के नौजवान कभी टर्न नहीं होता था क्‍योंकि उसका सोचना था कि वोटों की राजनीति से इस देश का कभी भला नहीं होने वाला। फिर अचानक पता नहीं कैसे नौजवान न केवल बूथ की ओर टर्न होने लगा बल्कि भर-भर के वोट भी डालने लगा। बड़ी तादात में नौजवान टर्न होकर वोट डालकर बदलाव के सपने देखने लगा। पता नहीं किसने किसको कितना पैसा भेजा था जो नौजवान लोगों में यह क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया था और वे देशभक्‍त वोटर बन गए। सभी हर बार बूथ की तरफ़ टर्न होकर किसी न किसी को वोट डालकर आने लगे मगर हर बार सबको इसी तरह बेवकूफ बनाया जाता रहा है। वो तो भला हो विश्‍व साहूकार ट्रम्प का जो उसने दुनिया भर को बता दिया कि लोकतंत्र से निराश लोगों के बूथ पर टर्नआउट होकर वोट डालने के लिए उन लोगों ने बड़ी भारी मात्रा में इधर डॉलर भेजा था। कौन कम्बख़्त सारा पैसा खा गया किसी को कुछ पता ही नहीं चला।

अब तो मुझे बुरी तरह शक होने लगा है कि हमारे देश के लोग जो कुछ भी हिलना-डुलना करते हैं अमेरिका सब के लिए पैसा देता है। मसलन देश क्या खाए-पीये, क्या सोचे-विचारे, क्या दुःख मनाए क्या खुशी मनायें, कब ताली-थाली बजाए, कब गोबर-गोमूत्र से नहाए, कब किसकी जय-जयकार करे, कब किसकी इज़्ज़त की मट्टी-पलीत कर दे, सबके लिए अमेरिका अवश्य ही पैसा भेजता होगा। पैसा किसी को मिलता नहीं यह बिल्कुल अच्छी बात नहीं है। लोग इतने भक्तिभाव से अमेरिका की फंडिंग का मकसद पूरा करते हैं तो लोगों को उनके लिए आया पाई-पाई पैसा दिया जाना चाहिए।

हाल ही में लोग बड़ी मात्रा में वेलेंटाइन वीक मनाने के लिए टर्न हुए, अवश्य ही इसके लिए भी अमरीका से पैसा आया होगा ताकि भारतीय लोग देशी के साथ-साथ विदेशी मार्केट को भी सीपीआर दे सकें । अभी कुंभ में बड़ी भारी संख्या में श्रद्धालुओं का टर्नआउट हो रहा है। इससे पहले कभी किसी कुंभ में ऐसा पागलपन भरा टर्नआउट देखने को नहीं मिला। बताइये भला इतनी बड़ी तादात में श्रद्धालुओं का कीचड़ में नहाने के लिए प्रयागराज की तरफ़ टर्न होने का कोई जायज़ कारण नज़र आता है क्या, सिवा इसके कि इस टर्नआउट के लिए भी अरबों-खरबों डॉलर अमेरिका से आया हो! पिछले कई सालों में धर्म और धर्मान्धता की तरफ़ बल्‍क टर्नआउट को देखते हुए भी यही शक गहराता है कि अमेरिका ज़रूर ही अपने बजट में कटौती कर के भारत को इसके लिए पैसा भेजता होगा और इससे यह भी खुलासा होता है कि हमारा देश जल्दी से जल्दी विश्वगुरु बन जाए अमेरिका को इसकी चिंता भी बहुत लगी रहती होगी और वह इसके लिए अपने बजट में विशेष प्रावधान भी करता होगा। इधर आकर पैसा जाता कहाँ है बस यही बात समझ में नहीं आती।

अमेरिका को दुनिया का बाप ऐसे ही तो नहीं कहा जाता । वाकई वो बाप बनकर सबकी आकांक्षाएँ पूरी करता है। जिसको जिस चीज़ के लिए पैसा चाहिए वह सांताक्‍लाज़ की तरह घर आकर देकर जाता है। बांगलादेश के लोगों को भी उसने अपने ही देश में आग लगाने के लिए पैसा दिया और उनका घर फूँक तमाशा भी देखा। दुनिया में जहाँ कहीं भी पैसे की आवश्यकता देखी जाती है अमेरिका वहाँ पैसा पहुँचाकर पब्लिक टर्नआउट की अपनी साम्राज्यवादी ज़िम्मेदारी अवश्य पूरी करता है।

अभी आजकल मुझे एक मर्सिडीज़ बेंज ख़रीदने के लिए शोरूम की तरफ़ टर्न होने की बड़ी इच्छा हो रही है, कोई बता सकता है क्या कि इसके लिए अमेरिका मुझे पैसा देगा या नहीं देगा। लोग प्रेस-मीडिया ख़रीद रहें है, पुलिस-प्रशासन ख़रीद रहे हैं, अदालत-क़ानून  ख़रीद रहे, लोकतंत्र के सारे स्तंभों को ख़रीदकर अपनी जेब में रख रहे हैं, कहीं से तो पैसा आ ही रहा है तब तो न इतनी खरीददारी चल रही है । अब पता चला अमेरिका हर चीज़ के लिए पैसा बाँटने के लिए तैयार बैठा हुआ है। बस टर्नआउट भर होने के लिए तैयार रहना है। कोई हमें कुएं में कूदने के लिए टर्नआउट कराना चाहे तो अमेरिका से पैसा लेकर करा सकता है। हम तैयार हैं।  

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शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

मोक्ष के दरवाज़े पर आपका स्‍वागत है

 //व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

 कुंभ यात्रियों की भीड़ से खचाखच से भी ज्‍़यादा भरे दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मचने से कई लोग मारे गए। इससे पहले कि कोई परम ज्ञानी संत घोषणा करे कि चूँकि मरने वाले कुंभ यात्री थे इसलिए भले ही लोग कुंभ की भगदड़ की बजाय स्टेशन की भगदड़ में मरें हों टिकट उनकी भी मोक्ष की ही कटेगी, मैं संतों से अपील करना चाहता हूँ कि मृतकों को भले ही मोक्ष मिले लेकिन भगदड़ के दोषियों को भी तो कुछ न कुछ मिलना चाहिए। मोक्ष के एजेंटों को यह साफ़ करना चाहिए कि भगदड़ के असली दोषी हैं कौन और मोक्षधाम में उनके लिए क्या सजा मुकर्रर की जाएगी? की भी जाएगी या वे वहाँ भी ले दे के छूट जाएँगे।

इधर अर्बन नक्सल लोग सवाल दाग़ रहे हैं कि गलती किसकी है, गलती किसकी है। हमको मालूम है कि सबको मालूम है गलती किसकी है, फिर भी गलती किसी की नहीं निकलने वाली और आरोप-प्रत्‍यारोप का सिलसिला हमेशा की तरह यूँ ही चलता रहेगा। विश्‍वस्‍त सूत्रों के अनुसार दक्षिण पंथियों द्वारा इस मामले में पश्चिमी वैज्ञानिक जेम्स वाट को फँसाया जा सकता है जिसने भाप के इंजिन का आविष्कार किया था। न वो यह वाहियात आविष्कार करता, न ट्रेन बनती, न रेलवे स्टेशन बनाना पड़ता, न स्टेशन पर भगदड़ मचती, न लोग मरते।

उधर वामपंथी सारा दोष वेदव्यास पर थोप सकते हैं। न वे विष्णु पुराण लिखते, न समुद्र मंथन होता, न अमृत निकलता, न इंद्रपुत्र अमृत कलश लेकर भागते, न प्रयागराज में कलश से अमृत टपकता, न प्रयागराज कुंभ का आयोजन होता, न लोग घर का बाल्‍टी मग्‍गा छोड़कर कुंभ स्नान के लिए पगलाते, न स्टेशन पर भीड़ लगाते, न भगदड़ मचती न लोग मरते।

कोई चाहे तो वास्कोडिगामा पर आरोप थोप सकता है उसने भारत की खोज क्यों कर दी जहाँ पौराणिक गपोडि़यों की बातों में आकर हर बारह साल में कुंभ का मेला भरता है। नदी में नहाने के लिए भीड़ लगती है, भगदड़ मचती है और लोग मरते हैं । किसी की इच्छा हो तो उसको दोष दे ले जिसने दिल्ली बसाई और उसे भी जिसने दिल्ली को राजधानी बनाया। फिर जिस किसी ने दिल्ली तक रेलवे लाइन और रेलवे स्टेशन का प्रस्ताव बनाया है उसकी भी लगे हाथ ऐसी तैसी कर ली जाए । न भारत की खोज होती न दिल्‍ली बसती न स्‍टेशन बनता न ट्रेनें चलती न लोग इकट्ठे होते न भगदड़ मचती न लोग मरते।

किसी की इच्छा हो तो दूरसंचार विज्ञान और टेक्नोलॉजी को कोस ले, न ये बलाएँ होतीं न संचार माध्यम होते न टी वी, मोबाइल होता न इंटरनेट होता, न फेसबुक वाट्सअप यूनिवर्सिटी होती न घर-घर में कुम्भ स्नान की महिमा का बखान पहुँचता न अंधविश्वासु लोग काम-धाम छोड़कर जत्थे के जत्थे बनाकर अपने पाप धोने के लिए प्रयागराज की और दौड़ पड़ते, न भगदड़ होती न लोग मरते। वैसे पापी, पाप और उसकी पानी में धुलनशीलता की अंध-अवधारणा का भी कम दोष नहीं लोगों को मौत की और दौड़ लगाने को मजबूर करने के लिए। लोग पापों से दूर रहकर धुले-पुछे नहीं रहना चाहते पाप करके मटमैली गंगा में डुबकी लगाकर पापों से मुक्ति चाहते हैं। उन्‍हें पता नहीं है लाखों की तादात में प्रदूषित पानी में उतरकर उन्‍हें पुण्‍य तो नहीं छूत के रोग अवश्‍य मिल सकते हैं।

किसी और को किसी और पर दोष थोपना हो तो थोप लो। किसी पर कुछ थोपने में कोई खर्चा थोड़ी न आता है। सब के ऊपर दोषारोपण आरोप प्रत्यारोप कर लो लेकिन भूल कर भी असली मुजरिम को कुछ भी न कहना। क्‍योंकि जानते सब हैं लेकिन पहचानता कोई नहीं है कि आख़िर कौन है असली मुजरिम जो बार-बार ऐसे धार्मिक सामाजिक जमावड़ों में भगदड़ का सूत्रपात करता है? कौन भगदड़ की वस्तुस्थिति पैदा करता है। आपको शायद अचानक याद नहीं आयेगा लेकिन मैं याद दिला देता हूँ। पागलपन की हद तक अंधश्रद्धा, अंधआस्‍था, अंधविश्‍वास, अंधाचरण, अुधानुकरण, अंधभक्ति, अंधासक्ति आदि-आदि न हो तो न फालतू का जमावड़ा हो, न भगदड़ मचे, न लोग कुचले जाएँ, न मौत का तांडव हो। याद आया कुछ, नहीं ? तो तुम्‍हारा कुछ नहीं हो सकता।  तुम ज़रूर अगली भगदड़ और मौत के तांडव के साक्षी बनने के लिए पूरी तौर पर तैयार हो। मोक्ष के दरवाजे पर अवश्‍य ही तुम्‍हारे जोर-शोर से स्‍वागत के लिए पूरी तैयारियाँ हैं।