//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
दुनिया भले
ही बदल जाए लेकिन पुलिस कभी नहीं बदलती। किसी जमाने में राजे-रजवाड़ों,
सामंतों-बादशाहों
के सिपाही भी आम जनता को ऐसे ही कूटते थे। फिर अंग्रेज़ आए तो उनके सिपाही भी जनता
को ऐसे ही कूटा करते थे। फिर अंग्रेज गए और जनता की, जनता
के लिए,
जनता
द्वारा वाली सरकार बनी, उसने भी
मौके-बेमौके जनता को ऐसे ही कूटा। किसी की भी सरकार रहे पुलिस जनता को ऐसे ही
कूटती है। इमरजेंसी में पुलिस ने जनता को ऐसे ही कूटा। पश्चिम बंगाल में बरसों बरस वामपंथी सरकार रही
उसकी पुलिस ने भी जनता को ऐसे ही कूटा। जे पी के आंदोलन से उपजी सरकारों की पुलिस
ने भी जनता को ऐसे ही कूटा, साम्प्रदायिक
बहुसंख्या के बल पर बनी सरकारों की पुलिस ने अल्पसंख्यक जनता को ऐसे ही कूटा और
अब 2014
के बाद जब बहुत सारे बेवक़ूफ़ों के खयाल से देश सही मायने में आज़ाद हुआ है तब भी
दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की, दुनिया के
सबसे लोकप्रिय नेता की नए भारत की पुलिस भी जनता को वैसे ही कूट रही है जैसे इतिहास की सभी सरकारों की
पुलिस जनता को कूटती आ रही है। नहीं नहीं, यह
पुलिस ठीक वैसे नहीं कूटती जैसे पहले की किसी भी सरकार की पुलिस कूटती थी,
यह
तो पार्टी विथ डिफरेंस वाली सरकार की पुलिस है, इसकी
पुलिस के कूटने में भी एक अनोखा डिफरेंस दिखायी देता है। उसका जनता को कूटना यानी
पूरी शिद्दत,
मनोयोग
और लगन से कूटना होता है। यानी कूटने की क्रिया सही मायने में कूटने की क्रिया
होनी चाहिए,
सिर
और हाथ-पाँव बुरी तरह टूटना चाहिए, सड़क खून
से लथपथ हो जाना चाहिए, आसमान
इंसानी चित्कार की गूँज से गुँजायमान हो जाना चाहिए । ऐसी कुटाई होना चाहिए,
ऐसी कुटाई होना चाहिए कि न हिटलर-मुसोलिनी की पुलिस ने कभी की हो और न अंग्रेजों
की पुलिस ने किसी उपनिवेश की जनता की करने की हिम्मत की हो। ऐसी कुटाई ऐसी कुटाई
कि अहिंसा का भारतीय नैरेटिव दुनिया भर के सामने सरासर झूठा साबित हो जाए।
दुनिया बदल
जाए तो बदल जाए लेकिन पुलिस कभी नहीं बदलती। जो पुलिस विपक्षी पार्टी के
कार्यकर्ताओं की बेरहमी से धुनाई करती है, वही
पुलिस उस विपक्षी पार्टी के सत्ता में आते ही फिर पूर्व सत्ताधारी पार्टी के
कार्यकर्ताओं की बेदम धुनाई करने लगती है। फिर कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाए
तो पुलिस दूसरी विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं की ठुकाई करने लगती है। लेकिन
पुलिस का ऐसा भी एक कट्टर उसूल होता है की सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो,
लोकतंत्र
का कितना भी लुभावना मुखौटा लगाए हुए हो, आम जनता से
सामना होते ही वह बेदर्दी से आम जनता को धुनने लगती है। मतलब पुलिस हर वक्त सत्ता
के बचाव में लगी रहती है। सत्ता चाहे किसी तानाशाह की हो चाहे किसी लोकतांत्रिक
ढंग से चुनी हुई सरकार की हो। तानाशाह तो तानाशाह होता है उसका काम ही होता है
जनता के सिर पर डंडा तानकर शासन करना लेकिन लोकतांत्रिक सरकार की पुलिस को भी लोक
के ऊपर ही डंडा चलाने में जितना मज़ा आता है ना उतना मज़ा तो तानाशाह की पुलिस को
भी नहीं आता होगा।
पुलिस कभी
नहीं बदलती चाहे जनता बदल जाए, देश बदल
जाए। चाहे भारत,
पाकिस्तान,
बांग्लादेश,
श्रीलंका,
म्यांमार
की जनता हो,
चाहे
चेचन्या,
रूस,
मेक्सिको,
फिलीपींस,
अमेरीका
की जनता हो पुलिस उसे किसी न किसी बहाने से कूट ही देती है। जनता भले ही बदल जाए,
कहीं
की जनता शांत सौम्य शालीन हो, कहीं की
जनता दंगाखोर हुड़दंगबाज हो, कहीं की
जनता जिद्दी हो आंदोलनजीवी हो, कहीं की
जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग हो या कहीं की जनता निपट अनपढ़ गंवार भोली-भाली हो
या कहीं की जनता भले ही भक्तिमार्ग का अनुसरण करने वाली हो,
पुलिस
कभी नहीं बदलती। मौका लगते ही निरपेक्ष भाव से सबकी हड्डियाँ तोड़ती है।
पुलिस कभी
नहीं बदलती चाहे निज़ाम बदल जाए, कानून बदल
जाए,
लॉ
एंड आर्डर बदल जाए, अदालत बदल जाए,
मुंशी
वकील जज बदल जाए। पुलिस वैसी की वैसी बेरहम, बेदिल,
बेदर्द,
बेदिमाग,
बेशऊर
होती है चाहे कितनी भी संवेदनशील, मानवीय,
परोपकारी,
परहितकारी,
जनप्रिय
सरकार सत्ता में हो। पुलिस वैसी ही दबंग, दुस्साहसी,
दुर्दांन्त,
दुष्ट,
दुखदाई
होती है चाहे कितनी भी सीधी-साधी, शरीफ,
भोली-भाली,
शांतिप्रिय
और अहिंसक सरकार सत्ता में हो। पुलिस तब भी नहीं बदलती चाहे गुंडे-बदमाशों,
असामाजिक
तत्वों,
चोर-लुटेरों,
तस्करों
माफियाओं की सरकार हो।
पुलिस कभी
नहीं बदलती चाहे कोई भी सरकार हो। पुलिस वैसी ही, उतनी
ही शिद्दत से,
उतने
ही जोश से,
उतनी
ही प्रतिबद्धता से, उतने ही सेवाभाव से,
उतने
ही समर्पण से सत्ताधारी के पैरों में नतमस्तक होती है, उसकी
जी हुजूरी करती है, उसकी चमचागिरी करती है,
उसके
तलवे चाटती है,
उसके
सामने दुम हिलाती है चाहे कोई भी सरकार सत्ता में हो, पुलिस
बराबर अपने आका का हुक्म बजा लाती है। चाहे बच्चे हों, छात्र
हों,
पुरुष
हो,
महिला
हो,
मजदूर
हों,
किसान
हों,
कर्मचारी
हों,
डाक्टर
हों,
इंजीनियर
हों,
वैज्ञानिक
हों,
शिक्षक
हो,
पुलिस
अपने सगे बच्चा-बच्ची और माँ-बाप को भी नहीं बख्शती है जब अपनी पर आती है। पुलिस
कभी नहीं बदलती है।
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