शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

जनता की सेवा

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

वे कह रहे थे कि आखरी साँस तक जनता की सेवा करते रहेंगे। अजीब ज़बरदस्ती है। जनता चाहे या न चाहे लेकिन आप बिना बात उसकी सेवा करते रहोगे। यह भी कोई बात हुई? चलो उमड़ा ही आ रहा हो बहुत सेवाभाव तो अपने से बड़े-बज़ुर्गों, गुरुओं, सीनियरों की सेवा करो, उनके हाँथ-पाँव दबाओ, उनको तो आपने मार्गदर्शक मण्‍डल में डाल रखा है और आज तक कोई मार्गदर्शन लेने की ज़हमत भी नहीं उठाई और बेचारी जनता की सेवा कर-करके उसे निठल्‍ला कामचोर बनाने की योजना बना रखी है। श्रीमान जी जनता थक गई है आपसे सेवा कराते कराते। पहले ही आप उसकी काफ़ी सेवा कर चुके हो, सेवा क्या आपने तो अपनी पूरी सरकार ही झौंक दी जनता की सेवा करने में। अठारह-अठारह घंटे ऐट ए टाइम सेवा की है आपने । भारत तो भारत आपने तो दुनिया भर में घूम-घूमकर जनता की सेवा कर मारी। आपके एक मंत्री ने तो एप्स्टीन के आइलैंड पर जाकर जनता की सेवा की। आपके अन्य मंत्री सांसद गण भी तब तब घर में बैठे बैठे जनता की सेवा करते रहते हैं जब जब वे संसद में बैठे राष्‍ट्रीय सेठों की सेवा नहीं कर रहे होते हैं।

अब रहने भी दो आदरणीय, बहुत सेवा कर ली आपने। और ज़्यादा सेवा करोगे तो जनता को बदहज़मी हो जाएगी। आपने नोटबंदी करके जनता की पर्याप्‍त सेवा कर ली, आपने जीएसटी लाकर जनता की प्राणप्रण से सेवा कर ली, आपने किसानों की चिर सेवा करने के लिए तीन क़ानून बना दिए थे लेकिन किसान मूर्ख साबित हुए, उन्होंने आपको अपनी सेवा का मौका न देकर कानून वापस करवा दिए। आपने तूफान महँगाई का रिकॉर्ड कायम कर क्या कम सेवा की है जनता की जो आप बेरोज़गारी का भी रिकॉर्ड क़ायम कर जनता की सेवा करना चाहते है? आप देश की हर चीज़ अपने एक अकेले दोस्त को दान में देकर जनता की सेवा करना चाहते हैं। जंगल उसे देकर जनता की सेवा कर रहे हैं, आदिवासियों की ज़मीन उसको देकर जनता की सेवा कर रहे हैं, पोर्ट, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बैंक, एलआईसी आदि आदि सब अपने प्यारे दोस्त को देकर जनता की सेवा कर रहे हैं, इतना काफ़ी नहीं है जो आप दुनिया के सामने अभी और भी जनता की सेवा करने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं ? अजी आपके बाकी के छोटे-मोटे दोस्‍त भी काफी बड़ी-बड़ी रकम के चुनावी बाँड खरीदते हैं आपके लिए, भर-भर कर चंदा देते हैं आपकी पार्टी को, गाड़ी-घोड़े चार्टर प्‍लेन वगैरह भी देते रहते हैं भागने दौड़ने और उड़ने के लिए और चाहते हैं कि उनकी भी थोड़ी बहुत सेवा की जाए आपके द्वारा लेकिन आगे आकर कुछ भी कहने से डरते हैं कि कहीं उन्हें भी अपने दोस्त के हवाले करके आप उनकी भी सेवा ना कर डालो।

यह ठीक है कि जनता की सेवा करना बड़े पुण्य का काम है और आप किसी भी कीमत पर यह पुण्य कमाना चाहते हो लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है साहब। आख़िर कितनी सेवा करोगे जनता की। विपक्ष को भी थोड़ी बहुत जनता की सेवा करने का अधिकार है कि नहीं है ? वह भी चाहता है कि आपकी तरह जनता की सेवा करके पुण्‍य कमाए, लेकिन आप उन्‍हें कोई मौका ही नहीं देना चाहते। साम दाम दंड भेद अपनाकर जनता की सेवा करने का मौका बस खुद अपने ही पास हड़पे रखना चाहते हो। यह अच्‍छी बात नहीं है। यह सरासर अन्‍याय है। हमारे देश में लोकतंत्र है, इसलिए सभी को बराबरी से जनता की सेवा करने का मौका मिलना चाहिए। ऐसा कैसे चलेगा कि बस आप ही आप जनता की सेवा करते रहो और दूसरा कोई जनता की सेवा के करने के लिए हाथ-पाँव मारे तो उसे देशद्रोही का खिताब दे दिया जाए।

देखिए साहब, समय बड़ा खराब चल रहा है, जनता के दिमाग का कोई भरोसा नहीं। कहीं वह अपनी सेवा खुद ही कर लेने के क्रांतिकारी मूढ़ में आ गई तो फिर आपको ज़िंदगी में कभी जनता की सेवा करने का मौका नहीं मिलेगा। थोड़ा सोच समझ कर सेवा कीजे जनता की साहब। समय खराब चल रहा है।

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सोमवार, 2 नवंबर 2026

एपस्टीन का भूत

//व्‍यंग्‍य - प्रमोद ताम्‍बट//

अब तक मैं यह दृढ़ता से मानता था कि भूत-प्रेत, जिन्न-पिशाच आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता, यह सब इंसानों की कपोल कल्पनाएँ हैं और किसी न किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक डेफिशियेंसी का नतीजा हैं लेकिन जबसे रहस्‍यमय रूप से मरे हुए मिस्टर एपस्टीन ने सामने आकर दुनिया भर के राजनीतिज्ञों की नाक में दम करना चालू किया है मैं मानने लगा हूँ कि निश्चित ही भूत-प्रेत, जिन्न-पिशाच न केवल होते हैं बल्कि वे बाकायदा लोगों की नींद भी हराम करते हैं। एपस्टीन का भूत बार-बार फ्लोरिडा के एक कब्रिस्तान की किसी अनाम कब्र में दफ्न कॉफिन से निकलकर लोगों की नींद हराम करता रहता है। वह वहाँ से यहाँ सात समंदर पार देवी-देवताओं की सिक्युरिटी से लैस भारतवर्ष के आसमान में अवतरित होकर दिल्ली के रायसीना हिल्स एरिया में मंडराने लगता है और जब वह वहाँ मंडरा रहा होता है तो पूरे भारतवर्ष में नैतिकता के सिपहसालारों की धड़कनें तेज़ गति से ऊपर-नीचे होने लगती हैं और कुछ संस्कारों के पुतले तो सीधे वेंटीलेटर पर ही चले जाते हैं।

लेकिन नैतिकता के कुछ सिपहसालार ऐसे भी होते हैं जिनकी सेहत पर चाहे कुछ भी हो जाए कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐयाशियों के समाचार, वीडियो, सीसीटीवी फुटेज उनकी नींद नहीं उड़ाते क्योंकि उनका ध्यान हमेशा अपने लक्ष्य की ओर होता है। ताँगे में जुते घोड़े की तरह वे अपनी आँखों पर बँधी पट्टी के नियंत्रण में इधर-उधर ना ताककर बस सामने ही देखते चलते हैं, चाहे फिर एपस्टीन का भूत उन्हें मल्टीप्‍लेक्स के बड़े से बड़े पर्दे पर उनके प्रिय हीरो द्वारा अभिनीत पूरी की पूरी फीचर फिल्म ही क्यों न दिखा दे। वे कुकर्म के आरोपियों को फूलमालाओं से लादने, मिठाइयाँ बाँटने में ज़्यादा आनंद महसूस करते हैं, उनका हीरो चाहे एपस्‍टीन की ऐशगाह में ऐयाशी करे चाहे रेड लाइट एरिया में, उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता । एपस्‍टीन का भूत उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

एपस्टीन के भूत की यह खासियत है कि वह जन्म जन्म के बदमाश और लुच्चों को बिल्कुल परेशान नहीं करता बस महान संस्कारी लोगों की ही नींद उड़ाता है। अमरीकी प्रथम पुरुष ट्रम्प से ज्‍़यादा बदनाम इंसान दुनिया भर में भला कौन है इस समय। एपस्‍टीन की ऐशगाह में से छनकर बाहर निकलकर आने वाली तमाम अश्लील तस्वीरों में ट्रम्प जी ही अब तक सबसे ज़्यादा बार दिखायी दिए हैं और उनकी ऐयाशियों के चर्चे भी दुनियाभर में आम हैं, लेकिन एपस्टीन का भूत ट्रम्प को बिल्कुल परेशान नहीं करता। वह आराम से दुनिया का दारोगा बना दादागिरी छाँटता फिरता है । उसे रत्ती भर भी डर नहीं लगता कि एप्सटीन के साथ नाम जुड़ने पर अमेरिका की जनता उसे कुर्सी से उतार फेंकेगी या तोड़ेगी-फोड़ेगी। लेकिन हमारे यहाँ के रात दिन पूजा पाठ अनुष्ठान में लगे रहने वाले संस्कारी और चरित्रवान लोग एपस्टीन का भूत सामने आते ही निश्चित ही हनुमान चालीसा का पाठ करने लगते होंगे। भारतीय हनुमान भक्त यह जो मानते हैं कि- “भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे” का पाठ करने के बाद दुनिया का चाहे जितना भी ताकतवर भूत हो निकट आ ही नहीं सकता। लेकिन, एपस्टीन के भूत के मामले में यह चौपाई महज़ अफवाह साबित हो रही है। एपस्टीन का भूत बार-बार बाहर आ जाता है और एसपीजी, एनएसजी सुरक्षा घेरे को तोड़कर एकदम निकट आकर कुर्सी के ठीक ऊपर मंडराने लगता है। देखने वालों को धुकधुकी लगी रहती है कि कुर्सी लेकर अब उड़ा कि तब उड़ा। जाने कब वह सत्‍ता के सारे स्‍तंभों को धता बताकर कुर्सी, सत्‍ता और सत्‍ताधारी हर शक्ति को हवा में अदृष्‍य कर दे।

अच्छा, भूत हो या न हो, उसके नाम मात्र से लोगों के हाथ के तोते ही नहीं इस प्रजाति के सभी पक्षी न जाने कहाँ उड़ जाते हैं। किसी भी कारण से एपस्टीन के आईलेंड के आसपास तक से गुजरे लोगों का भी यही हाल है, वे तोतों की तरह इधर-उधर उड़ते-फिरते नज़र आते हैं। लेकिन हमारे देश में एपस्टीन के भूत का नाम सुनते ही विपक्षी पार्टियों, विरोधी विचारधारा वाले सभी लोगों में नया उत्‍साह, नई स्फूर्ति, नई जान आ जाती है। वे बेसब्री से पलक पावड़े बिछाकर बैठ जाते हैं कि एपस्टीन का भूत इस बार ज़रूर कोई नया फोटो या फाइल उनके हाथ में पकड़ा कर जाएगा जिससे ज़रूर उनका राजनैतिक वनवास समाप्त होकर नई संभावनाएँ पैदा हो जाएँगी और उन्हें सत्ता का आनंद लूटने का मौका मिलेगा। लेकिन सत्ता पक्ष अपनी नीम चुप्पी और इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देने का अजर-अमर टोटका अपनाकर, और ईडी, सीबीआई इन्कमटैक्स का मंत्र फूँककर विपक्ष की तमाम आशाओं पर पानी फेर देता है।

फिलहाल एपस्टीन का भूत भारत भूमि के आसमान पर फिर से मंडरा ज़रूर रहा है लेकिन विपक्ष में खड़ी एक बहुत बड़ी फौज को कोई बड़ा फायदा नहीं पहुँचा पा रहा है और छोटे-मोटे डेंट से पक्ष को कोई फर्क पड़ना कब का बंद हो चुका है लेकिन आसमान में मंडरा रहे एपस्टीन के भूत को देखकर किसी अज्ञात बड़े डेंट के डर से उसकी नींद भी उड़ी हुई है।

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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

दरबारी सुरक्षा में चोरों की बजती बंसी

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

राजा ने चोरों के एक प्रतिनिधिमंडल को गोपनीय रूप से मिलने के लिए बुलाया । चोरों के आते ही राजा ने अन्य प्रतिनिधिमंडलों को जल्दी-जल्दी चलता कर चोरों के प्रतिनिधिमंडल को चर्चा के लिए बुला लिया और उनकी राजसी आवाभगत तथा पीने-खाने की बेहतरीन व्यवस्था का जायज़ा लेते हुए कहा- राज्य को आज आप लोगों की सेवा की सख्त ज़रूरत आन पड़ी है।

चोरों का प्रतिनिधिमंडल बोला- आपकी आज्ञा सर-आखों पर, बताइए महाराज, हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं ?

राजा का खास मंत्री बोल पड़ा- सेवा-वेवा गई चूल्‍हे में। आप लोगों ने दरबार के साथ बदमाशी चालू कर दी है। दरबार को आने वाला चोरी का हिस्सा दिन पर दिन कम होता जा रहा है। ये सरासर गलत बात है। दरबार तुम लोगों को इस नामाकूल हरकत की कड़ी से कड़ी सज़ा दे सकता है, समझे ?

चोरों का नेता बोला- महाराज हम तो पूरी मेहनत और लगन से कोशिश कर रहे हैं। ज़्यादा से ज़्यादा चोरियाँ कर रहे हैं और दरबार का हिस्‍सा समय पर खज़ाने तक पहुँचा रहे हैं। लेकिन फिर भी आजकल हमारे साथ बड़ा अत्याचार हो रहा है आपके राज में। पुलिस वाले बड़ी गंभीरता से चोरों की पकड़-धकड़ के काम में लगे हुएँ हैं। हमारा स्वतंत्रतापूर्वक चोरी करना मुश्किल हो गया है, जबकि हम चोरी में बराबर पुलिस को भी हिस्सा देते चले आ रहे हैं।

राजा बोला- पुलिस को पकड़-धकड़ के काम के लिए ही रखा गया है तो वे तो अपना काम मुस्‍तैदी से करेंगे ही। आप लोग अपने कौशल को और उन्नत कीजिए। पुलिस से बच निकलने के नए-नए तरीके निकालिए। दरबार आपका पूरा साथ देगा।

चोर प्रतिनिधि बोला- महाराज, पुलिस से बचने में ही हमारी सारी शक्ति समाप्त हो जाती है । आखिर हम कब तो चोरी करें और कब पुलिस से बचने का कौशल उन्नत करें। इसी फालतू की उठापटक में हमारा सारा समय बर्बाद हो जाता है और हमारी नेट इंकम कम हो जाती है। इसीलिए दरबार के हिस्से में भी गिरावट आ जाती है। ऊपर से छोटे-मोटे दरबारी अफसर-कर्मचारी भी परेशान करने लगते हैं। फिर अलग से उन्हें भी दो। ऐसे बाँटते ही रहेंगे तो कैसे चलेगा महाराज?

राजा बोला- देखो, जिसको जिस काम के लिए रखा गया है उसको तो वह काम करना ही पड़ता है। फिर दरबार का संरक्षण मिला हुआ हो तो दरबारी थोड़ा बहुत तो उन्‍मत्‍त हो ही जाते हैं ।

चोर बोले- हम भी तो दरबार के लिये ही काम करते है महाराज। हमें भी संरक्षण मिलना चाहिए। यकीन मानिए हमें दरबार का संरक्षण मिल जाए तो हम राज्य का खज़ाना लबालब भर देंगे। राज्‍य को दूसरा कोई दंद-फंद करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।  

राजा और खास मंत्री ने इस बात को गंभीरता से लेकर तुरंत आपस में गहन मंत्रणा की और फिर राजा अपने मोर का दाना खिलाता हुआ बोला- ठीक है। राज्य में चोरों को उनके किए गए चोरी के समस्त कार्यों के लिए दीवानी या आपराधिक मुकदमों और सजाओं से सुरक्षा प्रदान करने हेतु दरबार द्वारा शक्तिशाली कानून बनाकर संरक्षण प्रदान किया जाएगा। चोर संप्रदाय राज्य के हित में भरपूर चोरियाँ करें और निश्चिंत रहें।

सारे चोर ख़ुशी से कूँदते हुए चिल्लाए- हुर्रे हुर्रे हुर्रे।

और फिर राज्य में जोर-शोर से चोरियाँ होना चालू हो गईं। चोरी होती, लोग रोते-गाते पुलिस के पास जाते, पुलिस एक्‍शन मोड़ में आती, चोर को पकड़ती, चोर कानून का पोथा पलटकर दिखा देते और चोरों को दरबारी संरक्षण का प्रावधान देखकर पुलिस चुप लगा जाती। मामला ठंडा पड़ जाता। दिन पर दिन राज्‍य में चोरियाँ बढ़ती गईं, बढ़ती गईं । तंग आकर पुलिस ने चुप लगाना बंद कर चोरी की शिकायत करने आने वालों को ही डरा धमकाकर, एफ.आई.आर, पिटाई, मुकदमा, बामशक्‍कत सज़ा और अंडा सेल इत्‍यादि का डर दिखाकर भगाना चालू कर दिया। यहाँ तक कि चोर लोग पुलिस वालों तक के यहाँ भी चोरियाँ करके भागने लगे लेकिन पुलिस वालों को मजबूरी में अपना मुँह सिले बैठे रहना पड़ता था क्‍योंकि चोरों को कानूनी संरक्षण था ।

चोरों के औसान बढ़‍ते गए और उन्‍होंने राज्य के खज़ाने में भी सेंध मारना शुरू कर दिया परंतु खज़ाना मंत्री, खास मंत्री और राजा के पास चुप रहने के अलावा दूसरा कोई चारा ही नहीं था क्‍योंकि रायता तो उन्‍हीं का फैलाया हुआ था । चोरी के धंधे ने एक असाध्य रोग की तरह पूरे राज्य को अपने शिकंजे में ले लिया। सबसे ज़्यादा क्रांतिकारी परिवर्तन तो यह आया कि आम गऊ जैसी सीधी-साधी प्रजा भी धड़ल्ले से चोरी के कारोबार में कूद पड़ी क्योंकि राज्य में चोरों के लिए भय मुक्त वातावरण तथा दीवानी या आपराधिक मुकदमों और सजाओं से सुरक्षा प्रदान करने वाला कानून लागू था।

चोरों के आतंक से ग्रस्‍त इस राज्‍य की देखा-देखी आसपास के राज्‍यों में भी विभिन्‍न  महकमों में मुकदमों और सज़ाओं से सुरक्षा प्रदान करने वाले कानून लागू होने लगे। किसी ने कानून, गृह और रक्षा मंत्रालय के लिए यह कानून लागू कर दिया किसी ने चुनाव आयोग के लिए । दरबारी सुरक्षा के घेरे में चारों ओर चोरों की बंसी बजने लगी और कुछ लोग बंसी की उस धुन पर सिर हिला-हिलाकर आनंद की अनुभूति में तैरने-उतराने लगे ।

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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सवाल पूछने का सवाल

// व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

कोई माने या न माने पढ़ाई-लिखाई का सीधा संबंध सवाल से है। आपने अगर ज़रा भी पढ़ने-लिखने की ज़हमत उठाई है तो फिर आपको सवालों से रूबरू होना ही पड़ेगा और उनके जवाब भी देना पड़ेगा। लेकिन आजकल कुछ लोग सवाल पूछने पर बुरी तरह बिदकने लगे हैं। सवाल-जवाब के सार्वजनिक मंच छोड़कर भागने लगे हैं। जैसे सवाल न हों बर्र या ततैया हों और अपने तीखे डंक में धार लगाकर मारने के लिए दौड़ी चली आ रहीं हों । उसपर सवाल पूछने वाले के साथ चारों तरफ जैसा शत्रुतापूर्ण माहौल बना दिया जाता है उससे ऐसा लगने लगा है कि जल्‍द ही इस देश में सवाल पूछने को दुर्दांत अपराध माना जाने लगेगा। सवाल पूछने वाले को देशद्रोही घोषित कर जेल भेज दिया जाने लगेगा।

परम्पराएँ प्रचलन में आती हैं तो फिर स्थापित होती चली जाती हैं। सोचिए कि कहीं स्कूल में बच्चे से सवाल पूछने के जुर्म में उनके अभिभावक मास्टरजी के ऊपर मानहानि का मुक़दमा ठोकने लगें तो? जैसे बच्‍चे को एक थप्‍पड़ भर पर कई माँ-बाप, जो ख़ुद मास्‍टरों से पिट-पिट कर ही बड़े हुए होते हैं, मास्टर जी पर कार्पोरल पनिशमेंट के आरोप में जुवेनाइल जस्टिस एक्‍ट के अन्‍तर्गत एफ.आई.आर दाखिल करवा देते हैं वैसे ही सवाल पूछने पर थाना-पुलिस होने लगे तो ? राजनीतिज्ञों की सवालों से भागने बिदकने की प्रवृत्ति बच्चों तक आने में कितनी देर लगेगी । कभी न कभी आ ही जाएगी। आखिर राज‍नीतिज्ञ ही तो हमारे मार्गदर्शक दिशादर्शक हैं । मास्टर जी सवाल करेंगे और बच्चे बिदक कर अपने माँ-बाप को बुला लाएँगे। या हो सकता है बच्‍चे मास्टर जी को क्‍लास में ही कूट कर सवाल पूछने के अपराध का दंड देना शुरू कर दें।

इसका उल्टा भी हो सकता हैं। कुछ बच्चे सवाल पूछ-पूछ कर मास्साब का जीना हराम किये रहते हैं। तो हो सकता है मास्टर जी बच्‍चों के सवाल पूछने पर भाग कर प्रिंसिपल के पास पहुँचने लगें और ऐसे सवालखोर बच्चों को स्कूल से निकालने की सिफारिश करने लगें ? बदले माहौल में स्कूलों की दीवारों पर शिक्षाप्रद कोटेशंस के स्थान पर स्कूल प्रबंधन की धमकियाँ लिखी जाने लगे तो कोई आश्‍चर्य नहीं ? जैसे- ‘कक्षा में सवाल पूछने पर दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी’, या ‘मास्टर जी से व्यर्थ सवाल न पूछकर अनुशासन बनाए रखे’, या ‘नो सवाल नो बवाल’, या ‘सवाल पूछकर अपना और मास्टरजी का समय नष्‍ट न करें’, या ‘सवाल पूछने वाले छात्रों को मुर्गा बनने की सज़ा दी जाएगी’, या ‘सवाल पूछने पर स्कूल निकाला दे दिया जाएगा’, वगैरह वगैरह। क्या हो अगर सवाल पूछना सम्‍मान को ठेस पहुँचाने वाला सवाल हो जाए। ऐसा हुआ तो कोई किसी से सवाल ही नहीं पूछ सकेगा और न किसी को कोई जवाब देने की ज़रूरत भी होगी। यह राष्‍ट्रीय पटल पर कितनी सुविधाजनक परिपाटी होगी। दुनिया भर का भ्रष्‍टाचार करो, चुनाव चुरा लो, लोकतंत्र को डकार जाओ न कोई सवाल पूछकर बवाल करेगा न किसी के प्रति जवाबदेही होगी।

हमारे सौभाग्‍य से विधानमंडलों, विधानसभाओं, राज्यसभा, लोकसभा में सवाल पूछे जाने की परंपरा अब तक जीवित है। संबंधित विभाग के अफसर मंत्री पूरी लगन से झूठा-सच्चा ही सही मगर बड़े तगड़े होमवर्क और सैकड़ों गोपालगाँठों के बाद आखिर जवाब दिया करते हैं। जवाब पर फिर सवाल, और फिर जवाब, फिर सवाल फिर जवाब का एक सिलसिला सा चलता रहता है जिससे लोकतंत्र के चलायमान होने का आभास होता रहता है । क्या पता किस दिन एक विधेयक अथवा अध्यादेश लाकर इस परंपरा का दाहसंस्कार कर दिया जाए और सवाल पूछने वालों को राजद्रोही घोषित करने का राजधर्म निभाना शुरू कर दिया जाए।

क्या हो अगर देश भर में किसी भी स्कूल कॉलेज के किसी भी स्टैण्डर्ड के किसी भी इम्तिहान में सवाल पूछ कर परीक्षा लेने की परिपाटी एकदम बंद कर दी जाए और पढ़ने-लिखने को भी निंदनीय कर्म माना जाकर वर्णव्यवस्था में शूद्रों से भी निम्न कोटि की एक नई जाति बनाकर सवाल पूछने को निकृष्‍ट कर्म घोषित कर दिया जाए, सवाल पूछने वाले को अछूत माना जाने लगे। कोई अचरज नहीं होगा कि किसी से सवाल पूछे जाने पर उसकी घोर मानहानि हो पड़े, बल्कि सवाल पूछते सुन भर लिए जाने से लोगों की भावनाएँ ही आहत हो जाएँ और वह लाठी डंडे की सहायता से सवाल पूछने वाले की सारी जिज्ञासाएँ शांत कर दे। सवाल से बिदकने वाले बेख़ौफ़ दबंगई से घूमें-फिरें और सवाल पूछने वाले की हमेशा घिग्घी बँधी रहे।

वो दिन दूर नहीं जब सवाल विरोधी लोग पुस्तकें और अखबारी आलेख लिखेंगे- ‘सवालों से कैसे बचें’, ‘सवाल को टल्‍ला कैसे मारें’, या ‘सवालों का प्रतिकार कैसे करें’।  मोटिवेशनल स्पीकर स्पीच देंगे- ‘सवालों से कैसे भगें’, ‘सवालों से कैसे चिड़ें’, ‘सवालों की परवाह छोड़ें’ आदि।  धर्म गुरुओं के प्रवचन का विषय होगा- ‘सवाल मुक्ति और मानसिक शांति’, या ‘सवालों से बचो’ या ‘सवाल पूछने वाले का नाश हो’ आदि आदि। ट्रक वाले अपने ट्रकों के पीछे लिखवा कर चलेंगे- ‘सवाल पूछने वाले तेरा मुँह काला’, ‘सवाल पूछने वाले बच्‍चे तेरे जीये, बड़े होकर तेरा खून पीये’, ‘चुप रहोगे तो बार बार मिलोगे, सवाल पूछोगे तो हरिद्वार में मिलोगे’ वगैरह ।

बहरहाल, सवाल पूछना एक बड़ा टेढ़ा सवाल हो गया है। सवाल पर इतने सवाल उठने लगे हैं कि ऐसा लगता है आने वाले कुछ समय बाद सवाल नाम की बला ही इस दुनिया से रुख़सत हो जाएगी। दुनिया की कोई भी गतिविधि, कारोबार, क्रियाकलाप, वाद-विवाद, ज्ञान-विज्ञान-अज्ञान, रहस्‍य सब कुछ सवालों के दायरे से वाहर हो जाएगा। सवाल का अस्तित्‍व ही दुनिया से समाप्‍त हो जाएगा। और जब सवाल ही नहीं रहेगा तो न जवाब रहेगा और न जवाबदेही ही रहेगी। इससे बढ़िया व्‍यवस्‍था और क्‍या हो सकती है।

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शनिवार, 25 जुलाई 2026

पुलिस कभी नहीं बदलती है

 //व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

दुनिया भले ही बदल जाए लेकिन पुलिस कभी नहीं बदलती। किसी जमाने में राजे-रजवाड़ों, सामंतों-बादशाहों के सिपाही भी आम जनता को ऐसे ही कूटते थे। फिर अंग्रेज़ आए तो उनके सिपाही भी जनता को ऐसे ही कूटा करते थे। फिर अंग्रेज गए और जनता की, जनता के लिए, जनता द्वारा वाली सरकार बनी, उसने भी मौके-बेमौके जनता को ऐसे ही कूटा। किसी की भी सरकार रहे पुलिस जनता को ऐसे ही कूटती है। इमरजेंसी में पुलिस ने जनता को ऐसे ही कूटा।  पश्चिम बंगाल में बरसों बरस वामपंथी सरकार रही उसकी पुलिस ने भी जनता को ऐसे ही कूटा। जे पी के आंदोलन से उपजी सरकारों की पुलिस ने भी जनता को ऐसे ही कूटा, साम्‍प्रदायिक बहुसंख्‍या के बल पर बनी सरकारों की पुलिस ने अल्‍पसंख्‍यक जनता को ऐसे ही कूटा और अब 2014 के बाद जब बहुत सारे बेवक़ूफ़ों के खयाल से देश सही मायने में आज़ाद हुआ है तब भी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की, दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता की नए भारत की पुलिस भी जनता को वैसे  ही कूट रही है जैसे इतिहास की सभी सरकारों की पुलिस जनता को कूटती आ रही है। नहीं नहीं, यह पुलिस ठीक वैसे नहीं कूटती जैसे पहले की किसी भी सरकार की पुलिस कूटती थी, यह तो पार्टी विथ डिफरेंस वाली सरकार की पुलिस है, इसकी पुलिस के कूटने में भी एक अनोखा डिफरेंस दिखायी देता है। उसका जनता को कूटना यानी पूरी शिद्दत, मनोयोग और लगन से कूटना होता है। यानी कूटने की क्रिया सही मायने में कूटने की क्रिया होनी चाहिए, सिर और हाथ-पाँव बुरी तरह टूटना चाहिए, सड़क खून से लथपथ हो जाना चाहिए, आसमान इंसानी चित्‍कार की गूँज से गुँजायमान हो जाना चाहिए । ऐसी कुटाई होना चाहिए, ऐसी कुटाई होना चाहिए कि न हिटलर-मुसोलिनी की पुलिस ने कभी की हो और न अंग्रेजों की पुलिस ने किसी उपनिवेश की जनता की करने की हिम्‍मत की हो। ऐसी कुटाई ऐसी कुटाई कि अहिंसा का भारतीय नैरेटिव दुनिया भर के सामने सरासर झूठा साबित हो जाए।

दुनिया बदल जाए तो बदल जाए लेकिन पुलिस कभी नहीं बदलती। जो पुलिस विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बेरहमी से धुनाई करती है, वही पुलिस उस विपक्षी पार्टी के सत्ता में आते ही फिर पूर्व सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बेदम धुनाई करने लगती है। फिर कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाए तो पुलिस दूसरी विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं की ठुकाई करने लगती है। लेकिन पुलिस का ऐसा भी एक कट्टर उसूल होता है की सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, लोकतंत्र का कितना भी लुभावना मुखौटा लगाए हुए हो, आम जनता से सामना होते ही वह बेदर्दी से आम जनता को धुनने लगती है। मतलब पुलिस हर वक्त सत्ता के बचाव में लगी रहती है। सत्ता चाहे किसी तानाशाह की हो चाहे किसी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार की हो। तानाशाह तो तानाशाह होता है उसका काम ही होता है जनता के सिर पर डंडा तानकर शासन करना लेकिन लोकतांत्रिक सरकार की पुलिस को भी लोक के ऊपर ही डंडा चलाने में जितना मज़ा आता है ना उतना मज़ा तो तानाशाह की पुलिस को भी नहीं आता होगा।

पुलिस कभी नहीं बदलती चाहे जनता बदल जाए, देश बदल जाए। चाहे भारत, पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, श्रीलंका, म्‍यांमार की जनता हो, चाहे चेचन्‍या, रूस, मेक्सिको, फिलीपींस, अमेरीका की जनता हो पुलिस उसे किसी न किसी बहाने से कूट ही देती है। जनता भले ही बदल जाए, कहीं की जनता शांत सौम्‍य शालीन हो, कहीं की जनता दंगाखोर हुड़दंगबाज हो, कहीं की जनता जिद्दी हो आंदोलनजीवी हो, कहीं की जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग हो या कहीं की जनता निपट अनपढ़ गंवार भोली-भाली हो या कहीं की जनता भले ही भक्तिमार्ग का अनुसरण करने वाली हो, पुलिस कभी नहीं बदलती। मौका लगते ही निरपेक्ष भाव से सबकी हड्डियाँ तोड़ती है।

पुलिस कभी नहीं बदलती चाहे निज़ाम बदल जाए, कानून बदल जाए, लॉ एंड आर्डर बदल जाए, अदालत बदल जाए, मुंशी वकील जज बदल जाए। पुलिस वैसी की वैसी बेरहम, बेदिल, बेदर्द, बेदिमाग, बेशऊर होती है चाहे कितनी भी संवेदनशील, मानवीय, परोपकारी, परहितकारी, जनप्रिय सरकार सत्‍ता में हो। पुलिस वैसी ही दबंग, दुस्‍साहसी, दुर्दांन्‍त, दुष्‍ट, दुखदाई होती है चाहे कितनी भी सीधी-साधी, शरीफ, भोली-भाली, शांतिप्रिय और अहिंसक सरकार सत्‍ता में हो। पुलिस तब भी नहीं बदलती चाहे गुंडे-बदमाशों, असामाजिक तत्‍वों, चोर-लुटेरों, तस्‍करों माफियाओं की सरकार हो।

पुलिस कभी नहीं बदलती चाहे कोई भी सरकार हो। पुलिस वैसी ही, उतनी ही शिद्दत से, उतने ही जोश से, उतनी ही प्रतिबद्धता से, उतने ही सेवाभाव से, उतने ही समर्पण से सत्‍ताधारी के पैरों में नतमस्‍तक होती है, उसकी जी हुजूरी करती है, उसकी चमचागिरी करती है, उसके तलवे चाटती है, उसके सामने दुम हिलाती है चाहे कोई भी सरकार सत्‍ता में हो, पुलिस बराबर अपने आका का हुक्‍म बजा लाती है। चाहे बच्‍चे हों, छात्र हों, पुरुष हो, महिला हो, मजदूर हों, किसान हों, कर्मचारी हों, डाक्‍टर हों, इंजीनियर हों, वैज्ञानिक हों, शिक्षक हो, पुलिस अपने सगे बच्‍चा-बच्‍ची और माँ-बाप को भी नहीं बख्‍शती है जब अपनी पर आती है। पुलिस कभी नहीं बदलती है।

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मंगलवार, 16 जून 2026

G7 शिखर सम्मेलन और ट्रम्‍प-मोदी जंगी मुठभेड़

// व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

        फ्रांस में होने वाले जी7 शिखर सम्मेलन में विश्व दारोग़ा ट्रम्प और विश्वगुरु मोदी जी की जंगी मुठभेड़ होने वाली है। ट्रम्प वैसे तो हाल ही की अपनी हरकत के बाद भारतीय अधिकारियों की फटकार से डरा सहमा होगा और मोदी जी से मिलने में उसकी जान सांसत में अटकी पड़ी होगी, और वह एक याचना प्रधान माफीनामा याद कर के आनेवाला होगा, लेकिन ट्रम्प कितना भी रोए-गाए मगर मोदी जी को अपने तेवर बिल्कुल भी ढीले नहीं छोड़ने चाहिए। हो सकता है मोदी जी ट्रम्प पर द्रवित होकर अपनी लाल आखें होटल के कमरे पर ही छोड़कर निकल जाएँ उससे मिलने, या बच्चाल मोदी जी की लाल आखों से डर न जाए इसलिए महँगा वाला काला चश्मा पहन कर मीटिंग में जाएँ लेकिन देश की जनता की भावनाओं को ध्यान में रखकर मोदी जी को ट्रम्प के ऊपर रत्ती भर भी तरस नहीं खाना चाहिए, एक सौ चालीस करोड़ भारतीय जनता इस समय ट्रम्प से बेहद नाराज़ है इसलिए उसे उसकी औक़ात दिखा ही देनी चाहिए मोदी जी को।

हमें पता है कि मोदी जी बेहद गुस्से में G7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने गए हैं क्योंकि युद्धखोर ट्रम्प के सैनिकों ने 3 भारतीय नागरिकों की निर्मम हत्या करके दोनों के बीच की जिगरी दोस्ती का मज़ाक उड़ाया है। समय-समय पर बेइज़्ज़ती करने और मखौल उड़ाने, भारतीय नागरिकों को रस्सी से बाँधकर अमेरिका से हकालने जैसी घटनाओं और भारत को नरक का द्वार कहने जैसी ट्रम्‍प की धृष्‍टताओं से वैसे ही मोदी जी का गुस्सा सातवे आसमान पर है और हत्‍याओं की इस घटना ने तो उन्हें इतना प्रचंड गुस्सा दिला दिया है कि हमें डर है वे कहीं शिवजी की तरह अपना तीसरा नेत्र खोलकर ट्रम्प को भस्म ही न कर दें।

मुझे इन दोनों परम मित्रों के बीच संभावित बातचीत का नज़ारा दिखाई दे रहा है।  

ट्रम्प बायी तरफ़ से प्रवेश करते हैं और मोदी जी दायी तरफ़ से। मोदी जी ना बाहें फैलाए आगे बढ़ते हैं ना ही तपाक से ट्रम्प के गले पड़कर उसकी पीठ ठोकते हैं। बल्कि मोदी जी खा जाने वाली नज़रों से ट्रम्प को घूरते हुए दाया पैर डायस पर ज़ोर से पटक कर ट्रम्प के बगल में जा खड़े होते हैं और फोटोग्राफरों को इशारा करते हैं। फ़ोटोग्राफ़र इशारा समझ जाते हैं। दनादन फ़ोटो खींचते हैं। ट्रम्प मोदी के पैरों में गिर पड़ता है और दया और याचना की नज़रों से गर्दन उठाकर मोदी जी की ओर देखता है। मोदी जी घृणा से चेहरा घुमा लेते हैं, ट्रम्प भी उनके चेहरे के साथ ही पूरा घूम जाता है और मोदी जी के पैर पकड़ लेता है। मोदी जी कनखियों से अपने साथ गए भारतीय कार्पोरेट प्रतिनिधि मंडल की और देखते हैं और गर्व से गरदन ऊँची करके सम्‍मेलन स्‍थल की छत को देखने लगते हैं। लेकिन थोड़ी ही देर बाद मोदी जी पसीज जाते हैं और ज़मीन पर लोट रहे ट्रम्प को कंधे पकड़कर उठाते हैं जैसे कृष्‍ण  भगवान सुदामा को उठा रहे हों, और भींच कर गले लगा लेते है। मोदी जी भावुक होकर ट्रम्प से कहते है- माय फ्रेंड डोलांड, उठो। गलती तो इंसान से ही होती है, लेकिन मेरा सीना छप्पन इंच का है, मैं तुम्हें माफ़ करता हूँ। कार्पोरेट प्रतिनिधि मंडल तालियाँ पीटता है।

ट्रम्प रोते हुए कहता है- माय फ्रेंड मोडी, यू आर ग्रेट।

मोदी कहते हैं- काहे के ग्रेट, तुमने मेरा जीना हराम करके रखा है। आए दिन धमकियाँ देते रहते हो।

ट्रम्प कहता है- कैसी बातें कर रहे हो तुम? मैं भला क्‍यों तुम्‍हें धमकियाँ दूँगा? वह सब बकवास वाले वीडियों एआई से बना-बनाकर डाल रहें हैं लोग। तुम ठहरे संत आदमी, बिल्कुल पाक और दूध के धुले इंसान हो ? मैं तुम्‍हारे बारे में उल्‍टा सीधा क्‍यों बोलूँगा?

मोदी जी कहते हैं - वही तो मैं कहूँ, माय फ्रेंड डोलांड ऐसा कमीना नहीं हो सकता जो मेरा पोलिटिकल केरियर खत्‍म करने की धमकी दे । देखो हमारा दृढ़ संकल्‍प है कि वेनेजुएला का तेल ही हम ख़रीदेंगे चाहे वह हमें किसी भी भाव पडे़। रशिया और ईरान की तरफ मुड़कर भी नहीं देखेंगे। मेरे देश के लोग मेरे प्रेम में पाँच हज़ार रुपये लीटर तक तेल खरीदने को तैयार हैं। बस इन एआई से फर्जी वीडियों बना-बनाकर डालने वालों को पकड़कर मेरा सुख चैन लौटा दो।

ट्रम्प फिर अपने असली रूप में आकर कहता है- सुनो तेल तो तुम्हें झक मार कर ख़रीदना ही पड़ेगा, और जो-जो हम चाहें सब खरीदना पड़ेगा। जहाँ तक फर्जी वीडियों बनाने वालों की बात है तो वो तो आगे भी आते रहेंगे, मैं कुछ नहीं कर सकता।

मोदी जी कहते है- कैसी बातें करते हो डोलांड? चलो टैरिफ़ ही कम कर दो। इस शिखर सम्‍मेलन से मुझे कुछ तो ले जाने दो। मेरे देशवासियों को जवाब देना पड़ता है मुझे।

ट्रम्प कहता है - और कितना कम कर दूँ 50 का 18 कर दिया। तुम तो पहले तुम्हारे लोगों को फटकार-वटकार की नौटंकी बंद करने को कहो नहीं तो अबकी बार मैं 100 % टैरिफ ठोक दूँगा।

मोदी जी अचरज से कहते हैं- अरे? किसने फटकारा तुम्‍हें? मैं देखता हूँ वापस जाकर उसे। लेकिन तुम मेरे फ्रेंड हो कि नहीं ? तो ये सब टैरिफ-वैरिफ़ का नाटक क्यों? हमारा देश तुम्हारा ही तो है, चाहे जो डील साइन करवा लो। घर की ही तो बात है। मगर दिखाने के लिए ही सही थोड़ा रहम करो, लोग हमारी फ्रेंडशिप पर शक करने लगे हैं।

ट्रम्प कहता है- देखो मोदी माय फ्रेंड, फ्रेंडशिप अपनी जगह बिज़नेस अपनी जगह। तुम्हारे कॉर्पोरेट हमारे यहाँ से कमा कर ले जाएँगे तो थोड़ा बहुत हक तो हमारा भी बनता है डियर।

मोदी जी बोले- माय डियर डोलांड, तुम्हारे कॉर्पोरेट भी तो हमारे यहाँ से कमाते हैं, हम तो टैरिफ माँगते नहीं, तुम भी मत माँगो।

ट्रम्प बोला- माय फ़्रेंड मोडी, हम तुम्हारे यहाँ से सारा धंधा समेट लें तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला, तुम में दम हो तो तुम भी हमारे यहाँ से सारा बिज़नेस समेट लो।

मोदी जी हँसने लगते हैं और कार्पोरेट प्रतिनिधिमंडल की ओर देखते हुए कहते हैं - कैसी बातें करते हो डोलांड, जिनकी वजह से मैं प्रधानमंत्री बना और आगे भी बना रहने वाला हूँ उनके साथ धोखा करूँ, ये हो नहीं सकता। उनके लिए तो मेरी जान भी हाजि़र है।  

ट्रम्प बोला- तो फिर फ़ालतू की डिमांड मत करो । याद रखना हमारे किसी भी भारत विरोधी कदम पर अपना मुँह खोला तो मेरे पास तुम्‍हारे बारे में काफी कुछ विस्‍फोटक है।  

मोदी जी बोले- तो ठीक है तो फिर मैं भी मुँह में दही जमाकर बैठूँगा, तुम भी कुछ मत बोलो।

ट्रम्प बोला- मुझे न बोलने को कहने वाले तुम कौन होते हो मोडी?

मोदी जी ने फिर गुस्से में ट्रम्प को देखा और जैसे गुस्से में तमतमाते हुए गए थे वैसे ही वापस आ गए।

शिखर सम्‍मेलन का मोदी-ट्रम्‍प मुठभेड़ का सेशन समाप्‍त हो गया। भारतीय मीडिया ने ब्रेकिंग न्‍यूज चलाना शुरु किया- प्रधानमंत्री का मास्‍टर स्‍ट्रोक, ट्रम्‍प के सामने सीना तानकर खड़े हुए। इतिहास में किसी प्रधानमंत्री ने अमेरिका के सामने इतना सीना नहीं फुलाया।  ट्रम्‍प-मोदी की ऐतिहासिक मुलाकात को दुनिया आँखें फाड़ती देखती रही। पूरी दुनिया में भारत का डंका बजा। पाकिस्‍तान के सीने पर साँप लोटा, आदि आदि।

देश में चारों तरफ हर्षोल्‍लास का वातावरण हो गया।

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सोमवार, 15 जून 2026

फटकार लगाने का रिकार्ड

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

अभी हाल ही में भारत ने अमेरिका को फटकार दिया। फटकार समझते हैं ना जैसे गेहूँ को सूपड़े से फटकारते हैं ना वैसा ही कुछ। भारत के आला फटकार अधिकारियों ने अमेरिका को ऐसा पटक-पटक के फटकारा है कि उसकी बेचारे की तो घिग्घी सी बँध गई । सारे सैन्‍य  अधिकारी पैंटागन के अफसर अमरीकी गृह मंत्रालय के लोग, मंत्री इधर से उधर भागते फिर रहे हैं जिनकी गलती से भारत के तीन बेकसूर नागरिक सामरिक हमले में मारे गए और कुछ घायल हो गए। अमेरिकी परमसत्‍ता में भारी हड़कंप मचा हुआ है जैसे कोई तूफान आ गया हो। ऐसा जबरदस्‍त असर हुआ है हमारे आला अधिकारियों, विदेश मंत्रालय की अमेरिका को लगाई गई फटकार का। ट्रम्प तो घर से बाहर ही नहीं निकल रहा, उसे ईरानी हमले से ज़्यादा भारतीय फटकार से डर लग रहा है। डायपर पहन कर घूम रहा है बेचारा, यह सोचकर कि कहीं वो गलती से व्हाइट हाउस के दालान में निकल आए और इधर-उधर कहीं से फिर भारत की फटकार आ टपके तो कहीं पतलून ही न गीली हो जाए।

फटकार भी बड़ी बढ़िया चीज़ है सच में। और कुछ न करते बन रहा हो तो फटकार लगा दो और प्रेस कांफ्रेंस कर के सबको बता दो कि हमने फटकार लगा दी है। जनता संतुष्ट हो जाएगी। कुछ ज़्यादा ही किरकिरी हो रही हो तो कड़ी फटकार लगा दो या लगाओ भले ही नरम मुलायम सी फटकार मगर बताओ सबको कि हमने कड़ी फटकार लगा दी है, सामने वाला डर के मारे काँप रहा है। सामने वाले के कानों पर भले जूँ न रेंगी हो लेकिन कड़ी फटकार की बात में इतनी ताक़त है कि बड़े से बड़े असंतोष को दबा दे। मीडिया सेल और व्‍हाट्सअप प्रोपोगंडा वीरों को भी आक्रमण का जवाब देने के लिए कुछ तो होना चाहिए न, तो फटकार से बढ़िया दूसरा कोई मास्‍टर स्‍ट्रोक हो ही नहीं सकता।  

ये जो फटकार हमारी सरकार के लोगों ने अमेरिका को लगायी है ना, इसका ऐतिहासिक महत्व है। देश की आज़ादी के इतिहास में आज तक कभी किसी दल की सरकार ने, किसी राजनेता ने, किसी अच्छे खाँ ने अमेरिका को कभी कोई फटकार नहीं लगाई है, और अगर लगाई भी है तो ऐसी फटकार तो बिल्कुल ही नहीं लगाई है कि अमेरिकी सत्ता सूखे पत्ते की तरह थर-थर काँपने लगी हो। और कड़ी फटकार लगाने का दुस्साहस तो आज तक कोई शासन-प्रशासन कर ही नहीं पाया। वो तो हमारी ही सरकार में हिम्‍मत थी जो उसने अमेरिका को फटकार लगा दी। आने वाले सैंकड़ों बरसों तक ऐसी फटकार लगाने वाली कोई सरकार आने ही नहीं वाली है। फटकार लगाने का यह रिकार्ड हमेशा-हमेशा हमारे ही नाम रहेगा।

इस फटकार का ऐतिहासिक के साथ-साथ कूटनीतिक महत्व भी है। सारी दुनिया को पता चल गया है कि भारत को भले ही अमेरीका साम्राज्‍यवाद से अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए दूसरा कोई धाँसू एक्शन लेने में डर लगता है लेकिन उसे कड़ी फटकार लगाना खूब आता है। और अब जब भारत ने अमेरिका को निर्णायक रूप से फटकार लगा दी है और वो भीगी बिल्ली बना बैठा है तो दुनिया के दूसरे सारे मुल्क भारत का लोहा मान रहें हैं और अपने-अपने ईश्‍वर से प्रार्थना कर रहें हैं कि कहीं कभी भारत उन्हें भी कड़ी फटकार न लगा दें। लेकिन भारत इतने गिरा हुआ नहीं है जो चाहे जिसको फटकारता फिरें। हाँ कुछ मुल्क हैं जिनके दूध माँगने पर हमारे लोग खीर देने और कश्मीर माँगने पर चीर देने की हिंसक मंशा बारम्‍बार प्रकट करते रहते हैं, मगर अमेरिका का और भारत का रिश्ता थोड़ा अलग है उसको चीरने-चारने की बात थोड़ी हास्यास्पद सी हो जाएगी, कोई मानेगा भी नहीं कि भारत अमेरिका के साथ ऐसा कुछ कर सकता है, इसलिए यह चीरना-चारना आस-पड़ोस वालों तक ही सीमित रहे तो अच्‍छा है, अमेरिका को तो बस फटकार भर दो तो काम चल जाता है, और भारत ने अभी-अभी अमेरिका को फटकार कर अपना राजधर्म निभा दिया है।  

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