शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सवाल पूछने का सवाल

// व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

कोई माने या न माने पढ़ाई-लिखाई का सीधा संबंध सवाल से है। आपने अगर ज़रा भी पढ़ने-लिखने की ज़हमत उठाई है तो फिर आपको सवालों से रूबरू होना ही पड़ेगा और उनके जवाब भी देना पड़ेगा। लेकिन आजकल कुछ लोग सवाल पूछने पर बुरी तरह बिदकने लगे हैं। सवाल-जवाब के सार्वजनिक मंच छोड़कर भागने लगे हैं। जैसे सवाल न हों बर्र या ततैया हों और अपने तीखे डंक में धार लगाकर मारने के लिए दौड़ी चली आ रहीं हों । उसपर सवाल पूछने वाले के साथ चारों तरफ जैसा शत्रुतापूर्ण माहौल बना दिया जाता है उससे ऐसा लगने लगा है कि जल्‍द ही इस देश में सवाल पूछने को दुर्दांत अपराध माना जाने लगेगा। सवाल पूछने वाले को देशद्रोही घोषित कर जेल भेज दिया जाने लगेगा।

परम्पराएँ प्रचलन में आती हैं तो फिर स्थापित होती चली जाती हैं। सोचिए कि कहीं स्कूल में बच्चे से सवाल पूछने के जुर्म में उनके अभिभावक मास्टरजी के ऊपर मानहानि का मुक़दमा ठोकने लगें तो? जैसे बच्‍चे को एक थप्‍पड़ भर पर कई माँ-बाप, जो ख़ुद मास्‍टरों से पिट-पिट कर ही बड़े हुए होते हैं, मास्टर जी पर कार्पोरल पनिशमेंट के आरोप में जुवेनाइल जस्टिस एक्‍ट के अन्‍तर्गत एफ.आई.आर दाखिल करवा देते हैं वैसे ही सवाल पूछने पर थाना-पुलिस होने लगे तो ? राजनीतिज्ञों की सवालों से भागने बिदकने की प्रवृत्ति बच्चों तक आने में कितनी देर लगेगी । कभी न कभी आ ही जाएगी। आखिर राज‍नीतिज्ञ ही तो हमारे मार्गदर्शक दिशादर्शक हैं । मास्टर जी सवाल करेंगे और बच्चे बिदक कर अपने माँ-बाप को बुला लाएँगे। या हो सकता है बच्‍चे मास्टर जी को क्‍लास में ही कूट कर सवाल पूछने के अपराध का दंड देना शुरू कर दें।

इसका उल्टा भी हो सकता हैं। कुछ बच्चे सवाल पूछ-पूछ कर मास्साब का जीना हराम किये रहते हैं। तो हो सकता है मास्टर जी बच्‍चों के सवाल पूछने पर भाग कर प्रिंसिपल के पास पहुँचने लगें और ऐसे सवालखोर बच्चों को स्कूल से निकालने की सिफारिश करने लगें ? बदले माहौल में स्कूलों की दीवारों पर शिक्षाप्रद कोटेशंस के स्थान पर स्कूल प्रबंधन की धमकियाँ लिखी जाने लगे तो कोई आश्‍चर्य नहीं ? जैसे- कक्षा में सवाल पूछने पर दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी’, या मास्टर जी से व्यर्थ सवाल न पूछकर अनुशासन बनाए रखे’, या नो सवाल नो बवाल’, या सवाल पूछकर अपना और मास्टरजी का समय नष्‍ट न करें’, या सवाल पूछने वाले छात्रों को मुर्गा बनने की सज़ा दी जाएगी’, या सवाल पूछने पर स्कूल निकाला दे दिया जाएगा’, वगैरह वगैरह। क्या हो अगर सवाल पूछना सम्‍मान को ठेस पहुँचाने वाला सवाल हो जाए। ऐसा हुआ तो कोई किसी से सवाल ही नहीं पूछ सकेगा और न किसी को कोई जवाब देने की ज़रूरत भी होगी। यह राष्‍ट्रीय पटल पर कितनी सुविधाजनक परिपाटी होगी। दुनिया भर का भ्रष्‍टाचार करो, चुनाव चुरा लो, लोकतंत्र को डकार जाओ न कोई सवाल पूछकर बवाल करेगा न किसी के प्रति जवाबदेही होगी।

हमारे सौभाग्‍य से विधानमंडलों, विधानसभाओं, राज्यसभा, लोकसभा में सवाल पूछे जाने की परंपरा अब तक जीवित है। संबंधित विभाग के अफसर मंत्री पूरी लगन से झूठा-सच्चा ही सही मगर बड़े तगड़े होमवर्क और सैकड़ों गोपालगाँठों के बाद आखिर जवाब दिया करते हैं। जवाब पर फिर सवाल, और फिर जवाब, फिर सवाल फिर जवाब का एक सिलसिला सा चलता रहता है जिससे लोकतंत्र के चलायमान होने का आभास होता रहता है । क्या पता किस दिन एक विधेयक अथवा अध्यादेश लाकर इस परंपरा का दाहसंस्कार कर दिया जाए और सवाल पूछने वालों को राजद्रोही घोषित करने का राजधर्म निभाना शुरू कर दिया जाए।

क्या हो अगर देश भर में किसी भी स्कूल कॉलेज के किसी भी स्टैण्डर्ड के किसी भी इम्तिहान में सवाल पूछ कर परीक्षा लेने की परिपाटी एकदम बंद कर दी जाए और पढ़ने-लिखने को भी निंदनीय कर्म माना जाकर वर्णव्यवस्था में शूद्रों से भी निम्न कोटि की एक नई जाति बनाकर सवाल पूछने को निकृष्‍ट कर्म घोषित कर दिया जाए, सवाल पूछने वाले को अछूत माना जाने लगे। कोई अचरज नहीं होगा कि किसी से सवाल पूछे जाने पर उसकी घोर मानहानि हो पड़े, बल्कि सवाल पूछते सुन भर लिए जाने से लोगों की भावनाएँ ही आहत हो जाएँ और वह लाठी डंडे की सहायता से सवाल पूछने वाले की सारी जिज्ञासाएँ शांत कर दे। सवाल से बिदकने वाले बेख़ौफ़ दबंगई से घूमें-फिरें और सवाल पूछने वाले की हमेशा घिग्घी बँधी रहे।

वो दिन दूर नहीं जब सवाल विरोधी लोग पुस्तकें और अखबारी आलेख लिखेंगे- सवालों से कैसे बचें’, ‘सवाल को टल्‍ला कैसे मारें’, या सवालों का प्रतिकार कैसे करें।  मोटिवेशनल स्पीकर स्पीच देंगे- सवालों से कैसे भगें’, ‘सवालों से कैसे चिड़ें’, ‘सवालों की परवाह छोड़ें आदि।  धर्म गुरुओं के प्रवचन का विषय होगा- सवाल मुक्ति और मानसिक शांति’, या सवालों से बचो या सवाल पूछने वाले का नाश हो आदि आदि। ट्रक वाले अपने ट्रकों के पीछे लिखवा कर चलेंगे- सवाल पूछने वाले तेरा मुँह काला’, ‘सवाल पूछने वाले बच्‍चे तेरे जीये, बड़े होकर तेरा खून पीये’, ‘चुप रहोगे तो बार बार मिलोगे, सवाल पूछोगे तो हरिद्वार में मिलोगेवगैरह ।

बहरहाल, सवाल पूछना एक बड़ा टेढ़ा सवाल हो गया है। सवाल पर इतने सवाल उठने लगे हैं कि ऐसा लगता है आने वाले कुछ समय बाद सवाल नाम की बला ही इस दुनिया से रुख़सत हो जाएगी। दुनिया की कोई भी गतिविधि, कारोबार, क्रियाकलाप, वाद-विवाद, ज्ञान-विज्ञान-अज्ञान, रहस्‍य सब कुछ सवालों के दायरे से वाहर हो जाएगा। सवाल का अस्तित्‍व ही दुनिया से समाप्‍त हो जाएगा। और जब सवाल ही नहीं रहेगा तो न जवाब रहेगा और न जवाबदेही ही रहेगी। इससे बढ़िया व्‍यवस्‍था और क्‍या हो सकती है।

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शनिवार, 25 जुलाई 2026

पुलिस कभी नहीं बदलती है

 //व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

दुनिया भले ही बदल जाए लेकिन पुलिस कभी नहीं बदलती। किसी जमाने में राजे-रजवाड़ों, सामंतों-बादशाहों के सिपाही भी आम जनता को ऐसे ही कूटते थे। फिर अंग्रेज़ आए तो उनके सिपाही भी जनता को ऐसे ही कूटा करते थे। फिर अंग्रेज गए और जनता की, जनता के लिए, जनता द्वारा वाली सरकार बनी, उसने भी मौके-बेमौके जनता को ऐसे ही कूटा। किसी की भी सरकार रहे पुलिस जनता को ऐसे ही कूटती है। इमरजेंसी में पुलिस ने जनता को ऐसे ही कूटा।  पश्चिम बंगाल में बरसों बरस वामपंथी सरकार रही उसकी पुलिस ने भी जनता को ऐसे ही कूटा। जे पी के आंदोलन से उपजी सरकारों की पुलिस ने भी जनता को ऐसे ही कूटा, साम्‍प्रदायिक बहुसंख्‍या के बल पर बनी सरकारों की पुलिस ने अल्‍पसंख्‍यक जनता को ऐसे ही कूटा और अब 2014 के बाद जब बहुत सारे बेवक़ूफ़ों के खयाल से देश सही मायने में आज़ाद हुआ है तब भी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की, दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता की नए भारत की पुलिस भी जनता को वैसे  ही कूट रही है जैसे इतिहास की सभी सरकारों की पुलिस जनता को कूटती आ रही है। नहीं नहीं, यह पुलिस ठीक वैसे नहीं कूटती जैसे पहले की किसी भी सरकार की पुलिस कूटती थी, यह तो पार्टी विथ डिफरेंस वाली सरकार की पुलिस है, इसकी पुलिस के कूटने में भी एक अनोखा डिफरेंस दिखायी देता है। उसका जनता को कूटना यानी पूरी शिद्दत, मनोयोग और लगन से कूटना होता है। यानी कूटने की क्रिया सही मायने में कूटने की क्रिया होनी चाहिए, सिर और हाथ-पाँव बुरी तरह टूटना चाहिए, सड़क खून से लथपथ हो जाना चाहिए, आसमान इंसानी चित्‍कार की गूँज से गुँजायमान हो जाना चाहिए । ऐसी कुटाई होना चाहिए, ऐसी कुटाई होना चाहिए कि न हिटलर-मुसोलिनी की पुलिस ने कभी की हो और न अंग्रेजों की पुलिस ने किसी उपनिवेश की जनता की करने की हिम्‍मत की हो। ऐसी कुटाई ऐसी कुटाई कि अहिंसा का भारतीय नैरेटिव दुनिया भर के सामने सरासर झूठा साबित हो जाए।

दुनिया बदल जाए तो बदल जाए लेकिन पुलिस कभी नहीं बदलती। जो पुलिस विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बेरहमी से धुनाई करती है, वही पुलिस उस विपक्षी पार्टी के सत्ता में आते ही फिर पूर्व सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बेदम धुनाई करने लगती है। फिर कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाए तो पुलिस दूसरी विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं की ठुकाई करने लगती है। लेकिन पुलिस का ऐसा भी एक कट्टर उसूल होता है की सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, लोकतंत्र का कितना भी लुभावना मुखौटा लगाए हुए हो, आम जनता से सामना होते ही वह बेदर्दी से आम जनता को धुनने लगती है। मतलब पुलिस हर वक्त सत्ता के बचाव में लगी रहती है। सत्ता चाहे किसी तानाशाह की हो चाहे किसी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार की हो। तानाशाह तो तानाशाह होता है उसका काम ही होता है जनता के सिर पर डंडा तानकर शासन करना लेकिन लोकतांत्रिक सरकार की पुलिस को भी लोक के ऊपर ही डंडा चलाने में जितना मज़ा आता है ना उतना मज़ा तो तानाशाह की पुलिस को भी नहीं आता होगा।

पुलिस कभी नहीं बदलती चाहे जनता बदल जाए, देश बदल जाए। चाहे भारत, पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, श्रीलंका, म्‍यांमार की जनता हो, चाहे चेचन्‍या, रूस, मेक्सिको, फिलीपींस, अमेरीका की जनता हो पुलिस उसे किसी न किसी बहाने से कूट ही देती है। जनता भले ही बदल जाए, कहीं की जनता शांत सौम्‍य शालीन हो, कहीं की जनता दंगाखोर हुड़दंगबाज हो, कहीं की जनता जिद्दी हो आंदोलनजीवी हो, कहीं की जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग हो या कहीं की जनता निपट अनपढ़ गंवार भोली-भाली हो या कहीं की जनता भले ही भक्तिमार्ग का अनुसरण करने वाली हो, पुलिस कभी नहीं बदलती। मौका लगते ही निरपेक्ष भाव से सबकी हड्डियाँ तोड़ती है।

पुलिस कभी नहीं बदलती चाहे निज़ाम बदल जाए, कानून बदल जाए, लॉ एंड आर्डर बदल जाए, अदालत बदल जाए, मुंशी वकील जज बदल जाए। पुलिस वैसी की वैसी बेरहम, बेदिल, बेदर्द, बेदिमाग, बेशऊर होती है चाहे कितनी भी संवेदनशील, मानवीय, परोपकारी, परहितकारी, जनप्रिय सरकार सत्‍ता में हो। पुलिस वैसी ही दबंग, दुस्‍साहसी, दुर्दांन्‍त, दुष्‍ट, दुखदाई होती है चाहे कितनी भी सीधी-साधी, शरीफ, भोली-भाली, शांतिप्रिय और अहिंसक सरकार सत्‍ता में हो। पुलिस तब भी नहीं बदलती चाहे गुंडे-बदमाशों, असामाजिक तत्‍वों, चोर-लुटेरों, तस्‍करों माफियाओं की सरकार हो।

पुलिस कभी नहीं बदलती चाहे कोई भी सरकार हो। पुलिस वैसी ही, उतनी ही शिद्दत से, उतने ही जोश से, उतनी ही प्रतिबद्धता से, उतने ही सेवाभाव से, उतने ही समर्पण से सत्‍ताधारी के पैरों में नतमस्‍तक होती है, उसकी जी हुजूरी करती है, उसकी चमचागिरी करती है, उसके तलवे चाटती है, उसके सामने दुम हिलाती है चाहे कोई भी सरकार सत्‍ता में हो, पुलिस बराबर अपने आका का हुक्‍म बजा लाती है। चाहे बच्‍चे हों, छात्र हों, पुरुष हो, महिला हो, मजदूर हों, किसान हों, कर्मचारी हों, डाक्‍टर हों, इंजीनियर हों, वैज्ञानिक हों, शिक्षक हो, पुलिस अपने सगे बच्‍चा-बच्‍ची और माँ-बाप को भी नहीं बख्‍शती है जब अपनी पर आती है। पुलिस कभी नहीं बदलती है।

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मंगलवार, 16 जून 2026

G7 शिखर सम्मेलन और ट्रम्‍प-मोदी जंगी मुठभेड़

// व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

        फ्रांस में होने वाले जी7 शिखर सम्मेलन में विश्व दारोग़ा ट्रम्प और विश्वगुरु मोदी जी की जंगी मुठभेड़ होने वाली है। ट्रम्प वैसे तो हाल ही की अपनी हरकत के बाद भारतीय अधिकारियों की फटकार से डरा सहमा होगा और मोदी जी से मिलने में उसकी जान सांसत में अटकी पड़ी होगी, और वह एक याचना प्रधान माफीनामा याद कर के आनेवाला होगा, लेकिन ट्रम्प कितना भी रोए-गाए मगर मोदी जी को अपने तेवर बिल्कुल भी ढीले नहीं छोड़ने चाहिए। हो सकता है मोदी जी ट्रम्प पर द्रवित होकर अपनी लाल आखें होटल के कमरे पर ही छोड़कर निकल जाएँ उससे मिलने, या बच्चाल मोदी जी की लाल आखों से डर न जाए इसलिए महँगा वाला काला चश्मा पहन कर मीटिंग में जाएँ लेकिन देश की जनता की भावनाओं को ध्यान में रखकर मोदी जी को ट्रम्प के ऊपर रत्ती भर भी तरस नहीं खाना चाहिए, एक सौ चालीस करोड़ भारतीय जनता इस समय ट्रम्प से बेहद नाराज़ है इसलिए उसे उसकी औक़ात दिखा ही देनी चाहिए मोदी जी को।

हमें पता है कि मोदी जी बेहद गुस्से में G7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने गए हैं क्योंकि युद्धखोर ट्रम्प के सैनिकों ने 3 भारतीय नागरिकों की निर्मम हत्या करके दोनों के बीच की जिगरी दोस्ती का मज़ाक उड़ाया है। समय-समय पर बेइज़्ज़ती करने और मखौल उड़ाने, भारतीय नागरिकों को रस्सी से बाँधकर अमेरिका से हकालने जैसी घटनाओं और भारत को नरक का द्वार कहने जैसी ट्रम्‍प की धृष्‍टताओं से वैसे ही मोदी जी का गुस्सा सातवे आसमान पर है और हत्‍याओं की इस घटना ने तो उन्हें इतना प्रचंड गुस्सा दिला दिया है कि हमें डर है वे कहीं शिवजी की तरह अपना तीसरा नेत्र खोलकर ट्रम्प को भस्म ही न कर दें।

मुझे इन दोनों परम मित्रों के बीच संभावित बातचीत का नज़ारा दिखाई दे रहा है।  

ट्रम्प बायी तरफ़ से प्रवेश करते हैं और मोदी जी दायी तरफ़ से। मोदी जी ना बाहें फैलाए आगे बढ़ते हैं ना ही तपाक से ट्रम्प के गले पड़कर उसकी पीठ ठोकते हैं। बल्कि मोदी जी खा जाने वाली नज़रों से ट्रम्प को घूरते हुए दाया पैर डायस पर ज़ोर से पटक कर ट्रम्प के बगल में जा खड़े होते हैं और फोटोग्राफरों को इशारा करते हैं। फ़ोटोग्राफ़र इशारा समझ जाते हैं। दनादन फ़ोटो खींचते हैं। ट्रम्प मोदी के पैरों में गिर पड़ता है और दया और याचना की नज़रों से गर्दन उठाकर मोदी जी की ओर देखता है। मोदी जी घृणा से चेहरा घुमा लेते हैं, ट्रम्प भी उनके चेहरे के साथ ही पूरा घूम जाता है और मोदी जी के पैर पकड़ लेता है। मोदी जी कनखियों से अपने साथ गए भारतीय कार्पोरेट प्रतिनिधि मंडल की और देखते हैं और गर्व से गरदन ऊँची करके सम्‍मेलन स्‍थल की छत को देखने लगते हैं। लेकिन थोड़ी ही देर बाद मोदी जी पसीज जाते हैं और ज़मीन पर लोट रहे ट्रम्प को कंधे पकड़कर उठाते हैं जैसे कृष्‍ण  भगवान सुदामा को उठा रहे हों, और भींच कर गले लगा लेते है। मोदी जी भावुक होकर ट्रम्प से कहते है- माय फ्रेंड डोलांड, उठो। गलती तो इंसान से ही होती है, लेकिन मेरा सीना छप्पन इंच का है, मैं तुम्हें माफ़ करता हूँ। कार्पोरेट प्रतिनिधि मंडल तालियाँ पीटता है।

ट्रम्प रोते हुए कहता है- माय फ्रेंड मोडी, यू आर ग्रेट।

मोदी कहते हैं- काहे के ग्रेट, तुमने मेरा जीना हराम करके रखा है। आए दिन धमकियाँ देते रहते हो।

ट्रम्प कहता है- कैसी बातें कर रहे हो तुम? मैं भला क्‍यों तुम्‍हें धमकियाँ दूँगा? वह सब बकवास वाले वीडियों एआई से बना-बनाकर डाल रहें हैं लोग। तुम ठहरे संत आदमी, बिल्कुल पाक और दूध के धुले इंसान हो ? मैं तुम्‍हारे बारे में उल्‍टा सीधा क्‍यों बोलूँगा?

मोदी जी कहते हैं - वही तो मैं कहूँ, माय फ्रेंड डोलांड ऐसा कमीना नहीं हो सकता जो मेरा पोलिटिकल केरियर खत्‍म करने की धमकी दे । देखो हमारा दृढ़ संकल्‍प है कि वेनेजुएला का तेल ही हम ख़रीदेंगे चाहे वह हमें किसी भी भाव पडे़। रशिया और ईरान की तरफ मुड़कर भी नहीं देखेंगे। मेरे देश के लोग मेरे प्रेम में पाँच हज़ार रुपये लीटर तक तेल खरीदने को तैयार हैं। बस इन एआई से फर्जी वीडियों बना-बनाकर डालने वालों को पकड़कर मेरा सुख चैन लौटा दो।

ट्रम्प फिर अपने असली रूप में आकर कहता है- सुनो तेल तो तुम्हें झक मार कर ख़रीदना ही पड़ेगा, और जो-जो हम चाहें सब खरीदना पड़ेगा। जहाँ तक फर्जी वीडियों बनाने वालों की बात है तो वो तो आगे भी आते रहेंगे, मैं कुछ नहीं कर सकता।

मोदी जी कहते है- कैसी बातें करते हो डोलांड? चलो टैरिफ़ ही कम कर दो। इस शिखर सम्‍मेलन से मुझे कुछ तो ले जाने दो। मेरे देशवासियों को जवाब देना पड़ता है मुझे।

ट्रम्प कहता है - और कितना कम कर दूँ 50 का 18 कर दिया। तुम तो पहले तुम्हारे लोगों को फटकार-वटकार की नौटंकी बंद करने को कहो नहीं तो अबकी बार मैं 100 % टैरिफ ठोक दूँगा।

मोदी जी अचरज से कहते हैं- अरे? किसने फटकारा तुम्‍हें? मैं देखता हूँ वापस जाकर उसे। लेकिन तुम मेरे फ्रेंड हो कि नहीं ? तो ये सब टैरिफ-वैरिफ़ का नाटक क्यों? हमारा देश तुम्हारा ही तो है, चाहे जो डील साइन करवा लो। घर की ही तो बात है। मगर दिखाने के लिए ही सही थोड़ा रहम करो, लोग हमारी फ्रेंडशिप पर शक करने लगे हैं।

ट्रम्प कहता है- देखो मोदी माय फ्रेंड, फ्रेंडशिप अपनी जगह बिज़नेस अपनी जगह। तुम्हारे कॉर्पोरेट हमारे यहाँ से कमा कर ले जाएँगे तो थोड़ा बहुत हक तो हमारा भी बनता है डियर।

मोदी जी बोले- माय डियर डोलांड, तुम्हारे कॉर्पोरेट भी तो हमारे यहाँ से कमाते हैं, हम तो टैरिफ माँगते नहीं, तुम भी मत माँगो।

ट्रम्प बोला- माय फ़्रेंड मोडी, हम तुम्हारे यहाँ से सारा धंधा समेट लें तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला, तुम में दम हो तो तुम भी हमारे यहाँ से सारा बिज़नेस समेट लो।

मोदी जी हँसने लगते हैं और कार्पोरेट प्रतिनिधिमंडल की ओर देखते हुए कहते हैं - कैसी बातें करते हो डोलांड, जिनकी वजह से मैं प्रधानमंत्री बना और आगे भी बना रहने वाला हूँ उनके साथ धोखा करूँ, ये हो नहीं सकता। उनके लिए तो मेरी जान भी हाजि़र है।  

ट्रम्प बोला- तो फिर फ़ालतू की डिमांड मत करो । याद रखना हमारे किसी भी भारत विरोधी कदम पर अपना मुँह खोला तो मेरे पास तुम्‍हारे बारे में काफी कुछ विस्‍फोटक है।  

मोदी जी बोले- तो ठीक है तो फिर मैं भी मुँह में दही जमाकर बैठूँगा, तुम भी कुछ मत बोलो।

ट्रम्प बोला- मुझे न बोलने को कहने वाले तुम कौन होते हो मोडी?

मोदी जी ने फिर गुस्से में ट्रम्प को देखा और जैसे गुस्से में तमतमाते हुए गए थे वैसे ही वापस आ गए।

शिखर सम्‍मेलन का मोदी-ट्रम्‍प मुठभेड़ का सेशन समाप्‍त हो गया। भारतीय मीडिया ने ब्रेकिंग न्‍यूज चलाना शुरु किया- प्रधानमंत्री का मास्‍टर स्‍ट्रोक, ट्रम्‍प के सामने सीना तानकर खड़े हुए। इतिहास में किसी प्रधानमंत्री ने अमेरिका के सामने इतना सीना नहीं फुलाया।  ट्रम्‍प-मोदी की ऐतिहासिक मुलाकात को दुनिया आँखें फाड़ती देखती रही। पूरी दुनिया में भारत का डंका बजा। पाकिस्‍तान के सीने पर साँप लोटा, आदि आदि।

देश में चारों तरफ हर्षोल्‍लास का वातावरण हो गया।

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सोमवार, 15 जून 2026

फटकार लगाने का रिकार्ड

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

अभी हाल ही में भारत ने अमेरिका को फटकार दिया। फटकार समझते हैं ना जैसे गेहूँ को सूपड़े से फटकारते हैं ना वैसा ही कुछ। भारत के आला फटकार अधिकारियों ने अमेरिका को ऐसा पटक-पटक के फटकारा है कि उसकी बेचारे की तो घिग्घी सी बँध गई । सारे सैन्‍य  अधिकारी पैंटागन के अफसर अमरीकी गृह मंत्रालय के लोग, मंत्री इधर से उधर भागते फिर रहे हैं जिनकी गलती से भारत के तीन बेकसूर नागरिक सामरिक हमले में मारे गए और कुछ घायल हो गए। अमेरिकी परमसत्‍ता में भारी हड़कंप मचा हुआ है जैसे कोई तूफान आ गया हो। ऐसा जबरदस्‍त असर हुआ है हमारे आला अधिकारियों, विदेश मंत्रालय की अमेरिका को लगाई गई फटकार का। ट्रम्प तो घर से बाहर ही नहीं निकल रहा, उसे ईरानी हमले से ज़्यादा भारतीय फटकार से डर लग रहा है। डायपर पहन कर घूम रहा है बेचारा, यह सोचकर कि कहीं वो गलती से व्हाइट हाउस के दालान में निकल आए और इधर-उधर कहीं से फिर भारत की फटकार आ टपके तो कहीं पतलून ही न गीली हो जाए।

फटकार भी बड़ी बढ़िया चीज़ है सच में। और कुछ न करते बन रहा हो तो फटकार लगा दो और प्रेस कांफ्रेंस कर के सबको बता दो कि हमने फटकार लगा दी है। जनता संतुष्ट हो जाएगी। कुछ ज़्यादा ही किरकिरी हो रही हो तो कड़ी फटकार लगा दो या लगाओ भले ही नरम मुलायम सी फटकार मगर बताओ सबको कि हमने कड़ी फटकार लगा दी है, सामने वाला डर के मारे काँप रहा है। सामने वाले के कानों पर भले जूँ न रेंगी हो लेकिन कड़ी फटकार की बात में इतनी ताक़त है कि बड़े से बड़े असंतोष को दबा दे। मीडिया सेल और व्‍हाट्सअप प्रोपोगंडा वीरों को भी आक्रमण का जवाब देने के लिए कुछ तो होना चाहिए न, तो फटकार से बढ़िया दूसरा कोई मास्‍टर स्‍ट्रोक हो ही नहीं सकता।  

ये जो फटकार हमारी सरकार के लोगों ने अमेरिका को लगायी है ना, इसका ऐतिहासिक महत्व है। देश की आज़ादी के इतिहास में आज तक कभी किसी दल की सरकार ने, किसी राजनेता ने, किसी अच्छे खाँ ने अमेरिका को कभी कोई फटकार नहीं लगाई है, और अगर लगाई भी है तो ऐसी फटकार तो बिल्कुल ही नहीं लगाई है कि अमेरिकी सत्ता सूखे पत्ते की तरह थर-थर काँपने लगी हो। और कड़ी फटकार लगाने का दुस्साहस तो आज तक कोई शासन-प्रशासन कर ही नहीं पाया। वो तो हमारी ही सरकार में हिम्‍मत थी जो उसने अमेरिका को फटकार लगा दी। आने वाले सैंकड़ों बरसों तक ऐसी फटकार लगाने वाली कोई सरकार आने ही नहीं वाली है। फटकार लगाने का यह रिकार्ड हमेशा-हमेशा हमारे ही नाम रहेगा।

इस फटकार का ऐतिहासिक के साथ-साथ कूटनीतिक महत्व भी है। सारी दुनिया को पता चल गया है कि भारत को भले ही अमेरीका साम्राज्‍यवाद से अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए दूसरा कोई धाँसू एक्शन लेने में डर लगता है लेकिन उसे कड़ी फटकार लगाना खूब आता है। और अब जब भारत ने अमेरिका को निर्णायक रूप से फटकार लगा दी है और वो भीगी बिल्ली बना बैठा है तो दुनिया के दूसरे सारे मुल्क भारत का लोहा मान रहें हैं और अपने-अपने ईश्‍वर से प्रार्थना कर रहें हैं कि कहीं कभी भारत उन्हें भी कड़ी फटकार न लगा दें। लेकिन भारत इतने गिरा हुआ नहीं है जो चाहे जिसको फटकारता फिरें। हाँ कुछ मुल्क हैं जिनके दूध माँगने पर हमारे लोग खीर देने और कश्मीर माँगने पर चीर देने की हिंसक मंशा बारम्‍बार प्रकट करते रहते हैं, मगर अमेरिका का और भारत का रिश्ता थोड़ा अलग है उसको चीरने-चारने की बात थोड़ी हास्यास्पद सी हो जाएगी, कोई मानेगा भी नहीं कि भारत अमेरिका के साथ ऐसा कुछ कर सकता है, इसलिए यह चीरना-चारना आस-पड़ोस वालों तक ही सीमित रहे तो अच्‍छा है, अमेरिका को तो बस फटकार भर दो तो काम चल जाता है, और भारत ने अभी-अभी अमेरिका को फटकार कर अपना राजधर्म निभा दिया है।  

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बुधवार, 10 जून 2026

मूर्ख वैश्विक सांड

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

पृथ्‍वी पर एक विशाल जंगल में एक भीषण शक्तिशाली साँड़ रहता था। कहने को तो वह शक्तिशाली साँड़ था परन्‍तु देखने-सुनने में वह मूलत: बड़ा भौंदू मूर्ख और बेअकल था। उसकी हरकतें ही ऐसी थी कि दुनिया में कोई उसे गंभीरता से लेता ही नहीं था, उसके अंध भक्‍त तक नहीं। आप यह मत समझिये कि सूरत और सीरत से वह हमारे भारतीय बाजारों में हुड़दंग मचाता, दुकानों में घुसकर तोडफ़ोड़ करता, लोगों के पीछे दौड़ता-खदेड़ता पाया जाने वाला छुट्टा आवारा साँड़ जैसा कोई साँड़ होगा। नहीं, बल्कि उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक, ख़ूँख़ार, रक्तपिपासु, आततायी, मानवताख़ोर साँड़ था जो दुनिया भर में घूम-घूमकर लोगों को सींग और गधे की तरह लात मारता फिरता था। यही नहीं बल्कि वह दादागिरी धौसदपट से अपनी शर्तों पर दुनिया को हाँकना चाहता था। यहाँ तक कि वह दूसरे जंगलों के सीधे-साधे गऊ बैलों को जबरिया उठा भी लेता था जो बेचारे शांतिपूर्वक अपनी अपनी चरनोई में घास चर रहे होते थे। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने वेनेजुएला नामक जंगल के एक सीधे-साधे बैल को एक कोवर्ट आपरेशन करवा कर उठवा लिया था जैसे वह बैल उसका कुछ खाकर बैठा हो या उसने इस गुंडे साँड के जंगल की ज़मीन-अमीन दबा ली हो।

दुनिया के दूसरे जंगलों के ज़्यादातर बैल वे चाहे ताकतवर हों या कमज़ोर इस वैश्विक साँड़ से ख़ौफ़ खाते थे और उसकी चमचेगिरी, लल्लो-चप्पों जी-हुज़ूरी करते दिखायी देते थे। कुछ कुछ जंगलों के बैल तो उसके सामने पूरा लेट ही जाते थे जैसे याचना कर रहे हों कि आइए सर हमें रोंदते हुए हमारे ऊपर से निकल जाइए, हमारी संप्रभुता को कुचलिए, हमारी स्वतंत्रता को मसलिए, हमारी आवाम को टैरिफ की चक्की में पीस दीजिए, हम आपके जन्‍म जन्‍म तक आभारी रहेंगे । और कुछ तो उस वैश्विक साँड़ के चारों खुरों को चाट-चाटकर चाँदी की तरह चमकाए रखने के लिए हर वक्‍त अपनी जीभ तैयार रखते थे।

उस शक्तिशाली साँड़ को बिना बात दुनिया भर के जंगलों और उनकी सरकारों से पंगा लेने की बुरी आदत थी। वह सारी दुनिया को अपने बाप की जागीर समझता था। उसे लगता था कि वह सारी दुनिया का इंस्पेक्टर जनरल है जिसका हक है सारी दुनिया से उठक-बैठक लगवाना और लूटपाट की हद तक हफ्ता वसूली करके अपने जंगल और वहाँ के जानवरों को को खुश रखना। दुनिया भर में ज्‍़यादातर लोगों को यह लगता था कि वह वैश्विक साँड़ ज़रूर  गाँजा-भाँग या कोई दूसरा सस्‍ता नशा किये रहता है लेकिन उसका नशा दरअसल साम्राज्‍यवाद का नशा था, एकाधिकार पूँजी का नशा था जिसकी प्‍यास पृथ्‍वी पर मौजूद कोई भी पदार्थ पी लो कभी बुझती ही नहीं थी। अपने इस नशे में चूर यह वैश्विक साँड़ पूरी पृत्‍वी पर चारों ओर दनदनाता फिरता था।

इस साँड़ के पूर्वज हालाँकि कई बार कई जंगलों में मुँह की खा चुके थे और पिट-पिटा कर लहूलुहान से घर आकर कई साल तक अपनी मरहम पट्टी करवाते रहे थे लेकिन फिर भी इस जंगल का कोई भी साँड़ अपनी पुश्‍तैनी हरकतों से बिल्कुल बाज नहीं आता था। इस साँड़ की भी वही आदत है कि वह लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर अलोकतांत्रिक तरीके से स्वतंत्र संप्रभु जंगलों के अंदर घुसकर उन पर अलोकतांत्रिक होने का आरोप लगाता है और वहाँ की सरकार को अस्त-व्यस्त करके अलोकतांत्रिक तरीकों से धराशायी कर देता था और वहाँ के चुने हुए बैलों को पदच्‍यूत करके अपने चमचों, खरीदे हुए गुलाम गीदड़-लूमड़ो को वहाँ की सत्ता में बिठाकर उस जंगल की हरियाली खुशहाली और धन-संपदा को धीरे-धीरे पूरा चर जाता था। दुनिया में किसी की हिम्मत नहीं होती है कि उस साँड़ को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय नियमों-कानूनों का हवाला देकर रोके या लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देकर उसकी साँड़त्व पूर्ण हरकतों पर अंकुश लगाए। बहुत से जंगलों के बैल तो उस वैश्विक साँड़ के साँड़त्व में ही अपना अहोभाग्‍य समझते थे और दिन-रात उस साँड़ की पूजा-अर्चना में लगे रहते।

इस साँड़ का पूर्वज एक बार वियतनाम नामक एक छोटे से जंगल में पहुँच गया लेकिन वहाँ उसने तेरह साल तक वियतनामी पशुओं के जूते खाए । मजे की बात यह है कि इन तेरह सालों में उस वैश्विक साँड़ के जंगल में पाँच साँड़ सत्‍ता में आए और सभी मुँह की खाकर चले गए परंतु न वियतनामी बैलों ने हार मानी न वहाँ के छोटे-बड़े पशुओं ने। वैश्विक साँड़ की पूरी पलटन को खदेड़कर ही दम लिया। दुनिया भर के जंगलों के पशुओं को लगा कि तेरह साल पिटने के बाद तो साँड़ की पूँछ सीधी हो गईं होगी लेकिन वह तो कुत्ते की दुम की तरह टेढ़ी ही थी बल्कि और भी ज़्यादा टेढ़ी हो गई थी । इसके बाद भी वह ईरान, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया आदि जंगलों में मुँह की खाता फिरा। एक बार वह अपने एक पड़ोसी छोटे से सीधे-साधे लाल जंगल क्‍यूबा पर आँखें तरेरने लगा तो क्‍यूबा के शुभचिंतक एक दूसरे बड़े वैश्विक लाल साँड़ ने अपने नथूने फड़फड़ाए और पिछली टाँगों पर दो कुदक्‍कड़े लगाए तो यह शक्तिशाली साँड़ शक्तिवि‍हीन बन के अपनी माँद में घुस गया। अभी हाल ही में वह अपने एक दुष्ट छोटे भाई के साथ मिलकर ए‍क बार फिर ईरान नामक एक छोटे से जंगल में आ कूँदा लेकिन ईरान ने दोनों साँड़ भाइयों का वो हाल किया कि ये दोनों साँड़ इतिहास में मुँह दिखाने के लायक तक नहीं रह गए हैं। दरअसल लम्‍बे समय से उस आततायी साँड़ की नज़र ईरान के काले सोने पर थी और उसे लूटने के इरादे से ही वह उस पर दादागिरी झाड़ रहा था और जिस तरह उसने साम दाम दंड भेद अपनाकर पूरे अरेबियन जंगल के काले सोने पर कब्‍ज़ा कर रखा था उसी तरह वह ईरान के काले सोने को भी अपने बाप का माल समझकर हड़पना चाहता था लेकिन ईरानी जंगल के पशु और बैल्‍ दिखने में ही सीधे-साधे थे लेकिन उनके इरादे अपने से भी कई गुणा बड़े और भारी-भरकम इस वैश्विक साँड़ से भी कई गुणा ज्‍़यादा बुलंद थे।

अभी इन दिनों ईरान नामक जंगल के साथ उस वैश्विक साँड़ की जद्दोजहद चल ही रही है, बल्कि ईरान ने उसे कई जगह पटकनी दे दी है लेकिन फिर भी उसकी हिमाक़त तो देखो, उसने इस घायल और लोहूलुहान हालत में भी अपने अगले शिकारों की घोषणा कर दी है कि अब वह क्यूबा और ग्रीनलैंड पर सींग चलाएगा। किसी ने सच ही कहा है, मूर्ख का अति आत्‍मविश्‍वास गज़बनाक होता है। लेकिन यही गज़बनाक अति आत्‍मविश्‍वास एक दिन इस मूर्ख वैश्विक साँड़ को अवश्‍य ही धूल चटा देगा, दुनिया भर के बड़े-बड़े जंगलों के बैलों का भले न हो लेकिन छोटे-छोटे जंगलों के बैलों और अमन पसंद जंगली पशुओं का तो यही आत्‍मविश्‍वास है।

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गुरुवार, 20 मार्च 2025

ट्रम्प की लात

//व्‍यंग्‍य - प्रमोद ताम्बट //

ट्रम्प की घास न डालने वाली ट्रेजडी का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि उसने हमारे पृष्ठ भाग पर कस के लात मार दी। लात भी ऐसी मारी कि हाथ में हथकड़ी और पैर में बेड़ी होने के कारण हम अपने पृष्ठ भाग का बचाव भी नहीं कर पाए न ही सहला पाए । जबकि नेपाल, पाकिस्तान जैसे देशों को और तो और चीन को भी ट्रम्प ने सहलाने की सुविधा दे दी क्योंकि उन्हें हथकडि़यों बेडि़यों में नहीं जकड़ा गया। हमारे साथ हमारे उस प्रिय दोस्त ने ऐसा कट्टर दुश्मनों जैसा सुलूक क्यों किया हमारा कोई राष्ट्रवादी कूटनीतिज्ञ बता ही नहीं रहा है। इधर अमेरिका के प्रति खानदानी अनुराग के कारण ‘आह’ तो हमारे मुँह से निकल ही नहीं रही है। ट्रम्प जी कहीं बुरा न मान जाए। बिना बुरा माने उन्होंने हमारा बहुत सारा आर्थिक नुकसान कर दिया है, खुदा न खास्ता अगर ट्रम्प जी बुरा मान जाते तो न जाने क्या गज़ब ढा देते। यह नुकसान विगत ग्यारह सालों की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।
पिछले सतहत्तर सालों में देश में भले ही कुछ न हुआ हो लेकिन ऐसी लात भी कभी नहीं घली कि शर्म के मारे पानी-पानी भी न हुआ जा रहा हो। छप्पन इंच की छाती भले ही नहीं थी किसी नेता की लेकिन दुनिया के बड़े से बड़े गुंडे तक ऐसी ज़लील हरकत करने की हिम्मत पहले कभी नहीं जुटा पाए कि गुलामों की तरह भारतीयों को देश निकाला दे दिया गया हो। लात मारना तो दूर मारने के लिए लात उठाने का उपक्रम तक नहीं कर पाया कोई। लेकिन देखिए इज़्जत का पंचनामा करने वाली ऐसी हरकत की गुस्तााखी ट्रम्प ने तब कर के दिखा दी जब दुनिया में हमारी ओर आँख उठाकर देखने की हिम्मत किसी में नहीं है। चारों दिशाओं में हमारा डंका बज रहा है। यह बात अलग है कि वह डंका बजता हुआ दुनिया में और किसी को सुनाई नहीं देता।
एक सो इकत्तीस साल पहले तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्यवादी गुंडों ने हमारे देश के एक दुबले-पतले से इंसान को धक्का मार कर ट्रेन से उतार दिया था, तो उसने हिन्दुरस्तान वापस आकर वो तूफ़ान खड़ा किया कि उस तूफ़ान में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की गुंडागर्दी तिनकों की तरह हवा में उड़ गई, जबकि उस वक्त हमारे पास न कोई ताक़त थी न ही हौसला। मगर आज हम दुनिया के तथाकथित पाँचवे ताकतवर मुल्क हैं, 5 ट्रिलियन की इकानॉमी के मुहाने पर खड़े हैं। हौसले की बात तो न ही की जाए तो बेहतर है, विश्वगुरु होने के नाते वह हम में ठूस-ठूस कर भरा हुआ है। फिर भी अमेरिकन साम्राज्यवादी गुंडों के सामने हम पंगु और लाचार से खड़े हुए हैं। न केवल लाचार खड़े हैं बल्कि अपने पृष्ठ भाग को लात खाने के लिए स्व्तंत्र भी छोड़ रखा है कि आओ और लतिया लो जितना लतियाना है, हम उफ तक नहीं करेंगे। हमने मुँह सिल रखा है अपना।
देखने की बात यह है कि लगातार लातें खाने के बाद अब हम क्या करेंगे। लात से पड़ गए नील को सहलाकर, मलहम वगैरा लगाकर फिर अमेरिका की लात खाने पहुँच जाएँगे या ट्रम्प की उस लात को ही मरोड़ डालेंगे जो हमारी तशरीफ पर जमकर बरसी है और दुनिया के सामने बैंड बाजे के साथ हमारा जुलूस भी निकाला गया है । गनीमत है कि अमेरिका में बैंड-बाजे के आगे-आगे डांस करने का रिवाज़ नहीं है वर्ना वे बेड़ी-हथकड़ी डालकर लाए गए भारतीय दूल्हों के सामने नागिन डाँस पर नाचते हुए उन्हें भारत लाते, और हम तमाशबीनों की तरह तमाशा देखते रहते जैसे कि अब भी देख ही रहे हैं।
हमने लाल आँखें दिखाने वालों को कुर्सी पर बिठाया था ताकि दुनिया के सारे मुल्क डर के मारे हमें नज़रें नीची रखकर ही देखें, लेकिन हो उल्टा रहा है। लाल आँखों वाले नज़रें झुकाकर हममें लातें घलते हुए देख रहे हैं, उन्होंने ट्रम्प की लात को कनखियाँ भी दिखाने की कोशिश नहीं की।
ताज्जुब की बात तो यह है कि मीडिया ने ट्रम्प की लात के पवित्र होने के कसीदे नहीं कसे। वाट्सअप यूनिवर्सिटी ने ट्रंप की लात का गुणगान नहीं किया, उसकी आरती नहीं उतारी । यह बिल्कुल भी अच्छीे बात नहीं है। जब तक ट्रम्प की लात का महिमामण्डन नहीं होगा तब तक ट्रम्प और ट्रम्प के परम भारतीय मित्र खुश कैसे होंगे, शाबासी कैसे देंगे। हमारे प्यांरे घुसपैठिये दोबारा, तिबारा, चौबारा चोर रास्ते से अमेरिका में घुसकर पकड़ाएँगे कैसे और ट्रम्प की लात बार-बार हमारे पृष्ठ भाग पर पडे़गी कैसे। आखिर ट्रंप की लात भी हमारे लिए किसी ईनाम से कम थोड़ी न है।
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मंगलवार, 18 मार्च 2025

हज़ार मर्ज़ों की दवा खरीददारी की बीमारी

//व्‍यंग्‍य- प्रमोद ताम्‍बट//

सपनों में आप खुद को झोला उठाए बाज़ार में घूमते दिखायी दें, बड़े-बड़े शो रूम मॉल्स की चकाचौध आँखों के सामने पिक्‍चर सी घूमती रहें, फ़ूड जोन, खस्ता चाट-पकौड़ी की खुशबुओं से नथूने फड़कते रहें, कदम बार-बार बिस्‍तर पर ही आपो-आप बाज़ार की ओर चल पड़ने को आतुर हों और साथ-साथ हाथ में प्रचंड खुजली सी भी मचती रहे तो समझ लीजिए आपको खरीददारी की बीमारी ने जकड़ लिया है। इस स्थिति में आप जब तक बाज़ार जाकर चार-छः घंटों का क़त्ल कर के आठ दस झोले-झाँगड़े हाथों में लटकाएँ ओला-उबर से थके-हारे घर नहीं लौटोगे तब तक इन रोज़ परेशान करने वाले सपनों की वजह से आपको रात-रात भर नींद नहीं आएगी । यदि आप घोड़े बेचकर चैन से सोना चाहते हैं तो आपको समय-समय पर बाज़ार की तरफ दौड़ लगाना ही पड़ेगी चाहे आपकी जेब में पैसे हों या न हों।

यकीन मानिए इस चरम पूँजीवादी मारामारी के दौर में खरीददारी की यह संक्रामक बीमारी आम आदमी के लिए अपने-आप में ख़ुद एक बहुत बड़ी प्राणदायी दवा बन गई है। दुनिया में कुछ भी उठापटक चलती रहे, बाज़ार उन्‍वान पर हों या ध्‍वस्‍त होते रहें, अर्थव्‍यवस्‍था रेंग रही हो या उड़ रही हो, आपकी माली हालत खस्‍ता हो तब भी खरीददारी की यह बीमारी स्‍थाई भाव से अपनी जगह बनी रहती है और बाकायदा स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक टॉनिक का सा काम भी करती रहती है। इस दवा के सामने कोई ताकतवर से ताकतवर लाइफ़ सेविंग ड्रग भी टिक नहीं सकती। कभी तबियत नासाज़ रहे रात भर नींद न आए या उचटी-उचटी सी आती-जाती रहे, सुबह उठते से ही आँखों के आगे अंधियारा सा छाया रहता हो। रह रह कर घुमेरी आती हो। चाय-नाश्ते की भी इच्छा ना हो। नहाने धोने सजने संवरने, तैयार होकर मटकने का भी मन न हो, प्राण निकले पड़ रहें हों तो आप फौरन अपना क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड उठाकर बाज़ार की तरफ़ निकल जाइये, बस फिर देखिए कैसे आपके प्राण वापस लौट आते हैं। कहीं जम के मुँह की खानी पड़ी हो, कहीं पिट-पिटा कर आएँ हों, परीक्षा में फेल हो गए हों, प्रेमी-प्रेमिका से ब्रेकअप हो गया हो, इंडिया क्रिकेट मैच हार गई हो, मूढ बेहद खराब हो, बस उठकर चल दीजिए बाज़ार की ओर।  बाज़ार में अगर आपने डॉक्टर की फ़ीस, पैथालॉजिकल टेस्‍टों और दवाओं की कुल कीमत से एक चौथाई कम रकम भी यदि खर्च कर ली तो समझ लीजिए आपकी बीमारी चंद लम्‍हों में छूमंतर  हो जाएगी। यकीन न हो तो आज़मा कर देख लीजिए।

बात दरअसल यह है कि वैश्विक व्यापार व्यवसाय लॉबी ने खरीददारी की इस बीमारी को एक महत्वपूर्ण अल्टरनेटिव थेरेपी के रूप में ईजाद किया है और उसे गीता-रामायण से भी ज्‍़यादा प्रचारित प्रसारित किया है क्योंकि उनका मानना है कि उपलब्ध दवाओं से हमेशा की तरह बस मर्ज़ ही बढ़ते रहें और मरीज़ दम तोड़ते रहें तो उनके व्यापार-धंधों का क्या होगा। एक दिन दुनिया का सम्‍पूर्ण बाज़ार ख़रीददार विहीन हो जाएगा। दुकानों शोरूमों पर ताले लग जाएँगे। कॉर्पोरेट दफ्तर और बिज़नेस हब सूने हो जाएँगे। तिजोरियाँ भूखे पेट पड़ी रहने का मजबूर हो जाएँगी। सरकारों के पास भी करने के लिए कोई काम नहीं रहेगा। इसलिए उन्होंने बहुत शोध-अनुसंधानों के पश्चात यह थेरेपी ईजाद की है और अब इसका उपयोग घर-घर में किया जाकर स्‍वास्‍थ्‍य लाभ लिया जाने लगा है।

मगर इधर चिकित्सा विज्ञान की दवा-गोली इंजेक्शन ब्राँच ने इस बात पर गंभीर आपत्ति ली है और हड़ताल इत्‍यादि करने की धमकी देकर विरोध दर्ज करा रखा है क्योंकि उनके मुताबिक अगर ख़रीददारी से ही मरीज़ ठीक होते रहे तो उनके दवा-गोली निर्माण के धंधे पर संकट आ सकता है। अस्पतालों, दवा-दारू की फैक्ट्रियों दुकानों, पैथोलॉजी सेंटरों, आधुनिक टेस्ट प्रणालियों के भट्टे बैठ सकते हैं।

आम पब्लिक को भी यदि अपनी बीमारियों को ठीक करने के लिए दवा-दारू और खरीददारी में से कोई एक सुविधा चुनने के लिए कहा जाए तो वह भी शर्तिया खरीददारी को ही चुनेगी, क्योंकि पैसे तो आख़िर दोनों प्रकार की बीमारियों में खर्च होते हैं चाहे वह खरीददारी की बीमारी हो अथवा शा‍रीरिक बीमारी। जिस बीमारी से बांछे खिल-खिल उठती हों वह बीमारी है असल बीमारी। खरीददारी की बीमारी दुनिया की एक मात्र ऐसी बीमारी है जो खुद तो खतरनाक बीमारी है मगर हज़ार मर्ज़ों दवा भी है।

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