//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
अभी हाल ही
में भारत ने अमेरिका को फटकार दिया। फटकार समझते हैं ना जैसे गेहूँ को सूपड़े से
फटकारते हैं ना वैसा ही कुछ। भारत के आला फटकार अधिकारियों ने अमेरिका को ऐसा पटक-पटक
के फटकारा है कि उसकी बेचारे की तो घिग्घी सी बँध गई । सारे सैन्य अधिकारी पैंटागन के अफसर अमरीकी गृह मंत्रालय
के लोग,
मंत्री
इधर से उधर भागते फिर रहे हैं जिनकी गलती से भारत के तीन बेकसूर नागरिक सामरिक
हमले में मारे गए और कुछ घायल हो गए। अमेरिकी परमसत्ता में भारी हड़कंप मचा हुआ
है जैसे कोई तूफान आ गया हो। ऐसा जबरदस्त असर हुआ है हमारे आला अधिकारियों,
विदेश मंत्रालय की अमेरिका को लगाई गई फटकार का। ट्रम्प तो घर से बाहर ही नहीं
निकल रहा,
उसे
ईरानी हमले से ज़्यादा भारतीय फटकार से डर लग रहा है। डायपर पहन कर घूम रहा है
बेचारा,
यह
सोचकर कि कहीं वो गलती से व्हाइट हाउस के दालान में निकल आए और इधर-उधर कहीं से फिर
भारत की फटकार आ टपके तो कहीं पतलून ही न गीली हो जाए।
फटकार भी
बड़ी बढ़िया चीज़ है सच में। और कुछ न करते बन रहा हो तो फटकार लगा दो और प्रेस
कांफ्रेंस कर के सबको बता दो कि हमने फटकार लगा दी है। जनता संतुष्ट हो जाएगी। कुछ
ज़्यादा ही किरकिरी हो रही हो तो कड़ी फटकार लगा दो या लगाओ भले ही नरम मुलायम सी
फटकार मगर बताओ सबको कि हमने कड़ी फटकार लगा दी है, सामने
वाला डर के मारे काँप रहा है। सामने वाले के कानों पर भले जूँ न रेंगी हो लेकिन
कड़ी फटकार की बात में इतनी ताक़त है कि बड़े से बड़े असंतोष को दबा दे। मीडिया
सेल और व्हाट्सअप प्रोपोगंडा वीरों को भी आक्रमण का जवाब देने के लिए कुछ तो होना
चाहिए न,
तो फटकार से बढ़िया दूसरा कोई मास्टर स्ट्रोक हो ही नहीं सकता।
ये जो
फटकार हमारी सरकार के लोगों ने अमेरिका को लगायी है ना, इसका
ऐतिहासिक महत्व है। देश की आज़ादी के इतिहास में आज तक कभी किसी दल की सरकार ने,
किसी
राजनेता ने,
किसी
अच्छे खाँ ने अमेरिका को कभी कोई फटकार नहीं लगाई है, और
अगर लगाई भी है तो ऐसी फटकार तो बिल्कुल ही नहीं लगाई है कि अमेरिकी सत्ता सूखे
पत्ते की तरह थर-थर काँपने लगी हो। और कड़ी फटकार लगाने का दुस्साहस तो आज तक कोई
शासन-प्रशासन कर ही नहीं पाया। वो तो हमारी ही सरकार में हिम्मत थी जो उसने अमेरिका
को फटकार लगा दी। आने वाले सैंकड़ों बरसों तक ऐसी फटकार लगाने वाली कोई सरकार आने
ही नहीं वाली है। फटकार लगाने का यह रिकार्ड हमेशा-हमेशा हमारे ही नाम रहेगा।
इस फटकार
का ऐतिहासिक के साथ-साथ कूटनीतिक महत्व भी है। सारी दुनिया को पता चल गया है कि भारत
को भले ही अमेरीका साम्राज्यवाद से अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए दूसरा कोई धाँसू
एक्शन लेने में डर लगता है लेकिन उसे कड़ी फटकार लगाना खूब आता है। और अब जब भारत
ने अमेरिका को निर्णायक रूप से फटकार लगा दी है और वो भीगी बिल्ली बना बैठा है तो
दुनिया के दूसरे सारे मुल्क भारत का लोहा मान रहें हैं और अपने-अपने ईश्वर से प्रार्थना
कर रहें हैं कि कहीं कभी भारत उन्हें भी कड़ी फटकार न लगा दें। लेकिन भारत इतने
गिरा हुआ नहीं है जो चाहे जिसको फटकारता फिरें। हाँ कुछ मुल्क हैं जिनके दूध
माँगने पर हमारे लोग खीर देने और कश्मीर माँगने पर चीर देने की हिंसक मंशा बारम्बार
प्रकट करते रहते हैं, मगर अमेरिका का और भारत का रिश्ता
थोड़ा अलग है उसको चीरने-चारने की बात थोड़ी हास्यास्पद सी हो जाएगी,
कोई मानेगा भी नहीं कि भारत अमेरिका के साथ ऐसा कुछ कर सकता है,
इसलिए
यह चीरना-चारना आस-पड़ोस वालों तक ही सीमित रहे तो अच्छा है,
अमेरिका
को तो बस फटकार भर दो तो काम चल जाता है, और भारत ने
अभी-अभी अमेरिका को फटकार कर अपना राजधर्म निभा दिया है।
-०-
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