बुधवार, 10 जून 2026

मूर्ख वैश्विक सांड

पृथ्‍वी पर एक विशाल जंगल में एक भीषण शक्तिशाली साँड़ रहता था। कहने को तो वह शक्तिशाली साँड़ था परन्‍तु देखने-सुनने में वह मूलत: बड़ा भौंदू मूर्ख और बेअकल था। उसकी हरकतें ही ऐसी थी कि दुनिया में कोई उसे गंभीरता से लेता ही नहीं था, उसके अंध भक्‍त तक नहीं। आप यह मत समझिये कि सूरत और सीरत से वह हमारे भारतीय बाजारों में हुड़दंग मचाता, दुकानों में घुसकर तोडफ़ोड़ करता, लोगों के पीछे दौड़ता-खदेड़ता पाया जाने वाला छुट्टा आवारा साँड़ जैसा कोई साँड़ होगा। नहीं, बल्कि उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक, ख़ूँख़ार, रक्तपिपासु, आततायी, मानवताख़ोर साँड़ था जो दुनिया भर में घूम-घूमकर लोगों को सींग और गधे की तरह लात मारता फिरता था। यही नहीं बल्कि वह दादागिरी धौसदपट से अपनी शर्तों पर दुनिया को हाँकना चाहता था। यहाँ तक कि वह दूसरे जंगलों के सीधे-साधे गऊ बैलों को जबरिया उठा भी लेता था जो बेचारे शांतिपूर्वक अपनी अपनी चरनोई में घास चर रहे होते थे। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने वेनेजुएला नामक जंगल के एक सीधे-साधे बैल को एक कोवर्ट आपरेशन करवा कर उठवा लिया था जैसे वह बैल उसका कुछ खाकर बैठा हो या उसने इस गुंडे साँड के जंगल की ज़मीन-अमीन दबा ली हो।

दुनिया के दूसरे जंगलों के ज़्यादातर बैल वे चाहे ताकतवर हों या कमज़ोर इस वैश्विक साँड़ से ख़ौफ़ खाते थे और उसकी चमचेगिरी, लल्लो-चप्पों जी-हुज़ूरी करते दिखायी देते थे। कुछ कुछ जंगलों के बैल तो उसके सामने पूरा लेट ही जाते थे जैसे याचना कर रहे हों कि आइए सर हमें रोंदते हुए हमारे ऊपर से निकल जाइए, हमारी संप्रभुता को कुचलिए, हमारी स्वतंत्रता को मसलिए, हमारी आवाम को टैरिफ की चक्की में पीस दीजिए, हम आपके जन्‍म जन्‍म तक आभारी रहेंगे । और कुछ तो उस वैश्विक साँड़ के चारों खुरों को चाट-चाटकर चाँदी की तरह चमकाए रखने के लिए हर वक्‍त अपनी जीभ तैयार रखते थे।

उस शक्तिशाली साँड़ को बिना बात दुनिया भर के जंगलों और उनकी सरकारों से पंगा लेने की बुरी आदत थी। वह सारी दुनिया को अपने बाप की जागीर समझता था। उसे लगता था कि वह सारी दुनिया का इंस्पेक्टर जनरल है जिसका हक है सारी दुनिया से उठक-बैठक लगवाना और लूटपाट की हद तक हफ्ता वसूली करके अपने जंगल और वहाँ के जानवरों को को खुश रखना। दुनिया भर में ज्‍़यादातर लोगों को यह लगता था कि वह वैश्विक साँड़ ज़रूर  गाँजा-भाँग या कोई दूसरा सस्‍ता नशा किये रहता है लेकिन उसका नशा दरअसल साम्राज्‍यवाद का नशा था, एकाधिकार पूँजी का नशा था जिसकी प्‍यास पृथ्‍वी पर मौजूद कोई भी पदार्थ पी लो कभी बुझती ही नहीं थी। अपने इस नशे में चूर यह वैश्विक साँड़ पूरी पृत्‍वी पर चारों ओर दनदनाता फिरता था।

इस साँड़ के पूर्वज हालाँकि कई बार कई जंगलों में मुँह की खा चुके थे और पिट-पिटा कर लहूलुहान से घर आकर कई साल तक अपनी मरहम पट्टी करवाते रहे थे लेकिन फिर भी इस जंगल का कोई भी साँड़ अपनी पुश्‍तैनी हरकतों से बिल्कुल बाज नहीं आता था। इस साँड़ की भी वही आदत है कि वह लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर अलोकतांत्रिक तरीके से स्वतंत्र संप्रभु जंगलों के अंदर घुसकर उन पर अलोकतांत्रिक होने का आरोप लगाता है और वहाँ की सरकार को अस्त-व्यस्त करके अलोकतांत्रिक तरीकों से धराशायी कर देता था और वहाँ के चुने हुए बैलों को पदच्‍यूत करके अपने चमचों, खरीदे हुए गुलाम गीदड़-लूमड़ो को वहाँ की सत्ता में बिठाकर उस जंगल की हरियाली खुशहाली और धन-संपदा को धीरे-धीरे पूरा चर जाता था। दुनिया में किसी की हिम्मत नहीं होती है कि उस साँड़ को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय नियमों-कानूनों का हवाला देकर रोके या लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देकर उसकी साँड़त्व पूर्ण हरकतों पर अंकुश लगाए। बहुत से जंगलों के बैल तो उस वैश्विक साँड़ के साँड़त्व में ही अपना अहोभाग्‍य समझते थे और दिन-रात उस साँड़ की पूजा-अर्चना में लगे रहते।

इस साँड़ का पूर्वज एक बार वियतनाम नामक एक छोटे से जंगल में पहुँच गया लेकिन वहाँ उसने तेरह साल तक वियतनामी पशुओं के जूते खाए । मजे की बात यह है कि इन तेरह सालों में उस वैश्विक साँड़ के जंगल में पाँच साँड़ सत्‍ता में आए और सभी मुँह की खाकर चले गए परंतु न वियतनामी बैलों ने हार मानी न वहाँ के छोटे-बड़े पशुओं ने। वैश्विक साँड़ की पूरी पलटन को खदेड़कर ही दम लिया। दुनिया भर के जंगलों के पशुओं को लगा कि तेरह साल पिटने के बाद तो साँड़ की पूँछ सीधी हो गईं होगी लेकिन वह तो कुत्ते की दुम की तरह टेढ़ी ही थी बल्कि और भी ज़्यादा टेढ़ी हो गई थी । इसके बाद भी वह ईरान, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया आदि जंगलों में मुँह की खाता फिरा। एक बार वह अपने एक पड़ोसी छोटे से सीधे-साधे लाल जंगल क्‍यूबा पर आँखें तरेरने लगा तो क्‍यूबा के शुभचिंतक एक दूसरे बड़े वैश्विक लाल साँड़ ने अपने नथूने फड़फड़ाए और पिछली टाँगों पर दो कुदक्‍कड़े लगाए तो यह शक्तिशाली साँड़ शक्तिवि‍हीन बन के अपनी माँद में घुस गया। अभी हाल ही में वह अपने एक दुष्ट छोटे भाई के साथ मिलकर ए‍क बार फिर ईरान नामक एक छोटे से जंगल में आ कूँदा लेकिन ईरान ने दोनों साँड़ भाइयों का वो हाल किया कि ये दोनों साँड़ इतिहास में मुँह दिखाने के लायक तक नहीं रह गए हैं। दरअसल लम्‍बे समय से उस आततायी साँड़ की नज़र ईरान के काले सोने पर थी और उसे लूटने के इरादे से ही वह उस पर दादागिरी झाड़ रहा था और जिस तरह उसने साम दाम दंड भेद अपनाकर पूरे अरेबियन जंगल के काले सोने पर कब्‍ज़ा कर रखा था उसी तरह वह ईरान के काले सोने को भी अपने बाप का माल समझकर हड़पना चाहता था लेकिन ईरानी जंगल के पशु और बैल्‍ दिखने में ही सीधे-साधे थे लेकिन उनके इरादे अपने से भी कई गुणा बड़े और भारी-भरकम इस वैश्विक साँड़ से भी कई गुणा ज्‍़यादा बुलंद थे।

अभी इन दिनों ईरान नामक जंगल के साथ उस वैश्विक साँड़ की जद्दोजहद चल ही रही है, बल्कि ईरान ने उसे कई जगह पटकनी दे दी है लेकिन फिर भी उसकी हिमाक़त तो देखो, उसने इस घायल और लोहूलुहान हालत में भी अपने अगले शिकारों की घोषणा कर दी है कि अब वह क्यूबा और ग्रीनलैंड पर सींग चलाएगा। किसी ने सच ही कहा है, मूर्ख का अति आत्‍मविश्‍वास गज़बनाक होता है। लेकिन यही गज़बनाक अति आत्‍मविश्‍वास एक दिन इस मूर्ख वैश्विक साँड़ को अवश्‍य ही धूल चटा देगा, दुनिया भर के बड़े-बड़े जंगलों के बैलों का भले न हो लेकिन छोटे-छोटे जंगलों के बैलों और अमन पसंद जंगली पशुओं का तो यही आत्‍मविश्‍वास है।

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