Tuesday, November 23, 2010

ट्रेन और खाना

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
           देश में जितना भी अखाद्य उत्पादन होता है उसका दस प्रतिशत् कहाँ जाता है मुझे नहीं पता परन्तु नव्वे प्रतिशत् शर्तिया भारतीय रेल में खप जाता है। भारतीय रेलें चाहे कश्मीर से कन्याकुमारी की ओर दौड़ें अथवा गुजरात के किसी शहर से पश्चिम बंगाल के किसी शहर की ओर, अपने साथ-साथ भाँति-भाँति का अखाद्य रेल यात्रियों में खपाती चलती हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि अखाद्य खान-पान सेवा उपलब्ध कराने की विश्वस्तरीय प्रतियोगिता आयोजित की जाए तो भारतीय रेलउसमें पहले स्थान पर बाजी मार ले जाए।
            पहले यह व्यवस्था रेलवे के खुद के जिम्मे होने के साथ-साथ कुछ प्रायवेट वेंडरों के हाथ में हुआ करती थी, ये दोनों एक दूसरे के साथ स्वस्थ प्रतियोगिता के ज़रिए रेल यात्रियों को अखाद्य खाना खिलाकर, बीमार करने का काम किया करते थे। आजकल यह पुण्य कर्म एक कार्पोरेशन के जिम्में है जिसके कुशल प्रबंधन में कई केटरिंग ठेकेदार, डाक्टरों का भला कर रहे हैं।
            अखाद्य के साथ-साथ, बला सी टालने की यह व्यवस्था विशेषकर शताब्दी गाड़ियों में खूब देखी जा सकती है। गाड़ी चलते ही केटरिंग वाले, साफा बाँधे धमा-धम एक के बाद एक, टिकट के साथ वसूले गए पैसों के एवज में उनकी मनमर्जी का खान-पान आपकी खोपड़ी पर पटकते चले जाऐंगे। सबसे पहले एक पैक्ड ठंडा पेय थमाया जाएगा जिसका आपने ना कभी नाम सुना होगा ना ही वैसा स्वाद चखा होगा। दो घूँट मारने में सफल होने के पहले ही वे ब्रेकफास्ट नामक बला ला पटकेंगे जिसमें समोसे से मिलता-जुलता एक बेस्वाद समोसा, सेंडविच से मिलता-जुलता एक खौफनाक सेंडविच होगा। ठंडा और नाश्ता अभी आपके हलक में ही होंगा कि एक साफे वाला चाय का पॉट धरता चला जाएगा और दूसरा फौरन उसे उठाने के लिए आ खड़ा हो जाएगा।
            आपकी किस्मत में जिस दिन बुरा खाना, खाना लिखा होगा आप शताब्दी में सफर करेंगे। सबसे पहले आपको सूप दिया जाएगा जिससे भूख खुलने की जगह बंद हो जाएगी। जीवन में आप कितनी कठिनाइयों से जूझें हो, खाने में रोटियों से जूझने में आपको नानी याद आ जाएगी। इतनी मेहनत कर जनसेवा करने वाले इन बेचारों की नीयत पर मुझे बिल्कुल शक नहीं परंतु पता नहीं क्यों सब्जियों को देख-देखकर ऐसा लगता रहता है कि कहीं पिछली फेरी में पैसेन्जरों ने झूठी छोड़ दी सब्जियाँ ही तो इकट्ठा कर दोबारा से पैक नहीं कर दी गईं। दही, दुनिया के किसी पदार्थ से बना हो दूध से बना तो बिल्कुल नहीं लगता। दो चकत्ती गाजर-मूली का सलाद किस दीन का होता है पता नहीं। चावल दे के किस कोने की सप्लाई होते हैं पता करना नामुमकिन होता है। इतनी सेवा करने के बाद वे साफे वाले ट्रे में सौंफ लेकर टिप पाने की आशा में जब आ खड़े होते हैं तो कसम से ऐसा लगता है कि खिड़की से कूद पड़ों, मगर कम्बख्त एयर कूल्ड कोचों में खिड़कियाँ सील्ड इसीलिए होती हैं कि कहीं इतना बुरा खाना-खाकर लोग खिड़कियों से कूद-कूद कर आत्महत्या ना कर लें।
पत्रिका में दिनाँक 23.11.2010 को प्रकाशित
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8 comments:

  1. रेल की खाद्य व्यवस्था पर करारा व्यंग

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  2. हुजूर मुझे भी ऐसे कई अनुभव हैं, जिसमें एक तो अभी जल्दी ही "राजधानी से दिल्ली यात्रा" चार दिन पहले ही लिखा है.. आपने सही लिखा है... एकदम..

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  3. गुड्डोदादीNovember 24, 2010 at 2:14 PM

    प्रमोद जी
    व्यंग बहुत अच्छा लगा ट्रेन की बात तो सिर्फ भारत में ही
    इंटरनेशनल वायू यान का खाना देखते ही --- और सेवा कर्मचारी अपने
    लोगों को बहुत ----हाँ प्रथम श्रेणी के यात्रीयोंकी सेवा एकदम स्टीक
    जब की दूसरी एयरलाइन्स का खाना और सेवायें बहुत अच्छी

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  4. आपके इस लेख को अपनी सेवायें सुधारने के रूप में ले रहा हूँ मैं।

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  5. गुड्डोदादीNovember 24, 2010 at 6:48 PM

    प्रवीण जी
    मक्का की रोटी और सरसों का साग अवश्य रखिये
    दादी के लिए बरसों हो गए खाए हुए विदेश में नहीं मिलता अपने भारत भू जैसा खाना

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  6. Is dhansu vyangya ko padh kar jaroor Shatabdi mein jana bund ho jayega.

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