Thursday, November 25, 2010

हाई स्कूल का छात्र

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             यह तो सरासर धोकेबाज़ी है, देश की पढ़ी-लिखी आम जनता के साथ विश्वासघात है! वोट देने के बाद हम पीछे पलटकर नहीं देखते तो इसका क्या यह मतलब है कि आप लोग हम जैसे शिक्षित-दीक्षित, सुसंस्कृत, विद्वान, महान बुद्धिजीवी आम जनसाधारण के साथ इस तरह द़गाबाज़ी करें! देश में इतने ऊँचे दर्जें के, हाईली क्वालिफाईड लोग पड़े हैं, उन्हें छोड़कर एक हाईस्कूल के छात्र को देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर किसने बिठाया ? किसकी हरकत है यह ? किसने किया है यह मज़ाक। यह क्या गुड्डे-गुड़ियों का खेल है कि किसी हाईस्कूल के बच्चे को, जिसे ठीक से नाड़ा बाँधना भी नहीं आता, जिसके भोले चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ के रोएँ तक नहीं फूट पाते उन्हें पकड़कर हर कहीं बिछा दिया जाए। वह तो भला हो उस भोले-भाले सीधे-साधे बच्चे का जिसने भंडाफोड़ दिया कि वह हाईस्कूल का छात्र है, वर्ना और कोई शैतान छात्र होता तो ना जाने उधर पी.एम.ओ में बैठकर क्या-क्या गुल खिलाता।
            प्रधानमंत्री की कुर्सी आखिर एक महत्वपूर्ण कुर्सी है, उस पर बैठकर कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार करना पड़ता है, विदेशी मेहमानों के साथ लंच-डिनर लेना पड़ता है, अँग्रेजी में बात करना पड़ती है, 26 जनवरी को लाल किले की प्राचीर पर चढ़कर झण्डा फहराना पड़ता है, भाषण देना पड़ता है। कितनी जिम्मेदारी का काम है यह सब। कोई हाईस्कूल का बच्चा यह सब कर सकता है क्या? विचार करने बैठेगा तो पता नहीं किस फालतू बिन्दु पर विचार कर डालेगा। विदेशी मेहमान के साथ लंच-डिनर लेने में अगर छुरी-काँटा ठीक से नहीं पकड़ पाया तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कितनी भद पिटेगी! अँग्रेजी में बात करते समय अगर वह ऐन टाइम पर रटा हुआ ‘ऐस्से’ भूल गया तो क्या होगा! लाल किले की प्राचीर पर तो वह चढ़ जाएगा, दूसरों की छतों पर चढ़कर अमरूद तोड़ने का उसे काफी अभ्यास होता है, मगर यदि वह प्राचीर पर से गिर पड़ा तो? भाषण देना क्या आसान काम है, दुनिया भर के झूठ बोलना पड़ते हैं? बोल पाऐगा कोई हाईस्कूल का बच्चा ? बोलेगा भी तो चट पकड़ा जाएगा। राजनीति में यूँ रोज़ पकड़ा जाने वाले झूठ चलते नहीं हैं।
            यह कोई मज़ाक की बात नहीं है। हम दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र हैं, एक अरब से ज्यादा पापुलेशन है हमारी, माना कि अधिकांश पब्लिक अनपढ़ गंवार हैं, फिर भी हज़ारों लोग बी.ए. एम.ए. हैं, बेरोजगार भी धूम रहे हैं। उन्हीं में से किसी को पकड़कर प्रधानमंत्री बना देते, तो कोई परेशानी थी क्या? हाईस्कूल का लड़का ही मिला तुम्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए।
            अब आइन्दा के लिए समझाए दे रहे हैं, किसी अच्छे पढ़े-लिखे आदमी को प्रधानमंत्री बनाओगे तो हम वोट डालने जाएँगे वर्ना किसी हाईस्कूल के छात्र के लिए हम अपना वोट खराब करने वाले नहीं हैं।
दिनाँक 25.11.2010 को नईदुनिया में प्रकाशित

10 comments:

  1. bahut badhiya vyangya...aabhaar.

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  2. पढ़े लिखे को ही प्रधानमन्त्री बनाना है।

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  3. बहुत अच्छे... बेहतरीन व्यंग...

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  4. उमदा व्यंग। धन्यवाद।

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  5. आपकी इस पोस्ट का लिंक कल शुक्रवार को (२६--११-- २०१० ) चर्चा मंच पर भी है ...

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  6. वाह बहुत बढ़िया। बिल्कुल सटीक व्यंग्य है यह।

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  7. गुड्डोदादीDecember 1, 2010 at 5:59 AM

    व्यंग स्टीक बढ़िया आज के नेता भी तो पढे लिखें है रोम माता कितनी पढ़ी लिखी है

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