Wednesday, March 7, 2012

रंग में भंग डालने वाला होली चिन्तन


    

6 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति| होली की आपको हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  2. आपका चिंतन उचित है.
    होली मनानें के ढंग को समयानुसार
    बदलने में कोई बुराई नहीं है.
    परन्तु विचारणीय बाते और भी हैं.
    जैसे पैदल,साईकिल पर चलने के बजाय
    स्कूटर,कारों में यात्रा करना,जहाँ जरुरत भी न हो.
    ट्रेफिक जाम में लाखो टन ईंधन की बर्बादी,
    पर्यावरण को निरंतर दूषित करते रहना.आदि आदि.

    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.
    सीधे दिल से निकली, बिना जल और ईंधन का दुरपयोग के.
    होली के त्यौहार के बारे में आपने जिस तरह से वर्णन किया
    उससे मैं पूर्णतय सहमत नहीं.भावनाओं का सम्मान भी जरूरी है.

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  3. वर्ष में एक दिन चिन्तामुक्त बितायें, बाकी दिन के लिये ३६४ समस्यायें तो हैं ही।

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  4. बेकार का, सत्यानाशी, मगज़ खराब करने वाला, फालतू चिंतन।
    भंग घोटिये, रंग खेलिए, बाहर निकलिये और होली का मस्ती में डूब जाइये। इससे आपका स्वास्थ और मन दोनो शुद्ध हो जायेगा।
    ..बुरा न मानो होली है।...होली की ढेरों शुभकामनायें।

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  5. अब रंग में भंग क्यों ? होली की शुभकामनायें

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  6. आज 25/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर (सुनीता शानू जी की प्रस्तुति में) लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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