Wednesday, November 25, 2009

डेंगू परिवार जाली के उस पार

व्यंग्य - प्रमोद ताम्बट

दूसरे प्रहर में अचानक मेरी नींद किसी के पुकारने की आवाज से खुली तो देखा कि खिड़की की मच्छर जाली पर एक मच्छर परिवार बदहवास सा मुझे पुकार रहा है-ताम्बट साहब, ओ ताम्बट साहब ! मैंने झल्लाते हुए पूछा - क्या है ! क्यों इतनी रात को नींद खराब कर रहे हो ! मच्छर परिवार का मुखिया कातर आवाज में बोला - थोड़ी जाली खोल दो भाई साहब ! मैंने कहा - बेवकूफ समझ कर रखा है क्या ! तुम्हारी धींगा-मुश्ती बंद करने के लिए ही तो मैंने मच्छर जाली लगवाई है, अब खोल दूँ ताकि तुम मेरा और मेरे परिवार का जीना हराम कर दो…….!

मच्छर बोला भाई साहब कसम खाकर कहता हूँ जो किसी का खून पीया तो, आप कहो तो अपनी इस सुई में गठान लगा लेंगे, बाहर ही निकालकर रख देंगे ! हमें तो बस थोड़ा सा पानी चाहिए रहने के लिए, किसी टंकी में पड़े रहेंगे !
मैंने कहा- क्यों, बाहर क्या पानी की कमी पड़ गई है, इतने तो गटर खुले पडे़ हैं, गंदा बदबूदार पानी सड़कों पर बह रहा है वहाँ जाकर क्यों नहीं डंड पेलते !
मच्छर बोला- क्या बताऊँ भाई साहब, एक डेंगू के मरीज के खून की दावत उड़ा ली थी हम लोगों ने गलती से, तबसे गंदा पानी देखकर उल्टी, मतली सी आती है। हमारे डॉक्टर ने बताया है कि साफ पानी में रहो जाकर। आपके यहाँ वाटर फिल्टर लगा है, कुछ दिनों के लिए शरण दे दो, फिर हम अपने आप चले जाऐंगे।
मैंने कहा- माफ करो भैया तुम लोगों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। तुम लोग कम्बख्त अपनी सुई तक कभी बदलते नहीं हो ! बदलना तो छोड़ों, कभी धो भी लो तो एक बार तुम पर भरोसा कर लें। मगर डेंगू के मरीज़ के खून से सनी तुम्हारी सुई हम झेलने के लिए तैयार नहीं है। भागों यहाँ से।
मच्छर बोला - कसम खाकर कह रहा हूँ, चाहे जो सज़ा दे देना जो हम में से किसी ने भी किसी को अपनी सुई चुभाई तो।
मैंने कहा - अरे रहने दो भैया घर के अन्दर के जो चार-आठ मच्छर हैं उन्हीं से परेशान हैं। दिन-रात उनकी चौकीदारी करना पड़ रहीं है कि कहीं बाहर न निकल जाएँ और तुम जैसे आवारा मच्छरों की संगत में आकर डेंगू न साथ ले आएँ। तुम्हें और अन्दर ले लें तो तुम तो हमें सीधे अस्पताल ही पहुँचा दोगे। कहाँ-कहाँ भैया प्लेटलेट्स ढूँढ़ते फिरेंगे हम लोग। प्रायवेट ब्लड बैंक वाले वैसे ही चीथे दे रहे हैं।
मच्छरनी मेरे असहयोग और रूखे व्यवहार से रुआँसी होती हुई बोली-बहन समझकर अन्दर आ जाने दो भैया, कसम खाकर कह रहीं हूँ बाहर तो हमारा जीना हराम हो गया है। मुन्सीपाल्टी वाले कभी-कभी फॉग मशीन लेकर निकल पड़ते हैं, दोयम दर्जे की उन मशीनों से खैर हमारा कुछ बिगड़ता नहीं लेकिन नकली केमिकलों के उस फॉग से हमारे बच्चों को अस्थमा हो जाता है, खॉसी होने लगती है। बताओ भैया जाएँ तो जाएँ कहाँ ?
मैंने कहा - जहन्नुम में जाओ तुम और तुम्हारा परिवार, मुझे कोई मतलब नहीं। अब भागों यहाँ से वर्ना मैं अभी एंटी मॉस्किटों स्प्रे मारता हूँ।
मेरी इस बात पर उस मच्छर को गुस्सा आ गया, वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा- खाली-पीली धौंस क्यों दे रहा हैं बे ! तू क्या समझता है जाली नहीं खोलेगा तो क्या हम अन्दर ही नहीं आ सकते ? एक मौका चाहिए बस ! कचरा फैकने के लिए तो खिड़की खोलेगा! जरा जगह मिली कि हम घुस जाऐंगे अपना जुलूस लेकर। शाम को जब दफ्तर से लौटकर घर में घुसेगा तो तेरी खोपड़ी पर बैठकर अन्दर घुस जाऐंगे तुझे पता तक नहीं चलेगा। अभी समझा रहे हैं तो समझ में नहीं आ रही तुझे !
मुझे भी गुस्सा आ गया, मैंने कहा- अच्छा ! रंगदारी करोगे तुम ? तुम्हारी ये औकात ?
मच्छर बोला- हाँ हाँ रंगदारी करेंगे ! डेंगू के मच्छर हैं, कोई ऐरा गैरा मत समझ लेना। ना एक-एक को अस्पताल पहुँचाया तो मेरा नाम मच्छर नहीं। तुम्हारे घर के अन्दर जो घरेलू किस्म के मच्छर हैं ना उनका भी यहीं जाली पर बैठे-बैठे ब्रेन वाश कर आतंकवादी बना देंगे, उखाड़लो तुम क्या उखाड़ते हो ! सबको डेंगूवाद की ट्रेनिंग देकर इतना खूँखार बना देंगे कि तुम्हारी पूरी फौज-पुलिस भी लग जाए तो उनका बाल भी बाँका नहीं कर पाएगी।
मैंने कहा - घर के आसपास भी मत दिख जाना तुम लोग, फॉग मशीन घर के अन्दर बुलवा लूँगा मैं। फिर देख तेरा क्या हाल करता हूँ।
मच्छर ठठाकर हँसता हुआ बोला - हौ ऐसे बीड़ी के धुएँ से हम डरने लगे तो हो गया काम। नकली है सारा धुआँ नकली। सारी मशीनें घटिया हैं। अरे हम से ज़्यादा तुम्हारे भाई बंदों को हमारी फिक्र है। हमी मर जाऐंगे इन थर्ड क्लास मशीनों और उनके धुएँ से तो दवा कंपनियाँ क्या भुट्टे भूनेंगी। तुम टुच्चे इंसानों को हमें खत्म करने से ज्यादा जिन्दा रखने में इन्ट्रेस्ट है, वर्ना सोचो, तुमने साले चाँद पर पानी ढूँढने में कामयाबी हासिल कर ली, तुम चंद मच्छरों को दुनिया से खत्म नहीं कर सकते, लानत है तुम पर। डूब मरो चूल्लू भर पानी में।
मेरी ट्यूबलाइट अचानक दिपदिपाकर जलने लगी। बात तो सही कह रहा है कम्बख्त। हमने इतने परमाणु परीक्षण कर लिए, इतनी मिसाइलें बना लीं। दुनिया को खत्म करने के लिए आज हमारे पास पर्याप्त परमाणु असला है, हम मच्छर जैसी क्षुद्र प्रजाति को समूल नष्ट नहीं कर पा रहे, कमाल है ! मच्छरों से फैलने वाली नई-नई बीमारियों के शोध और अनुसंधान पर जितना खर्च किया जाता है उतने से तो मच्छरों की जड़ की जड़ से खटियाखड़ी की जा सकती है। डेंगू, मलेरिया की दवाइयों से जितनी कमाई होती है, उसके एक छोटे से हिस्से से मच्छरों का सूपड़ा साफ किया जा सकता है। मगर !!! यही तो समस्या है! अगर यही काम हो गया तो जाने कितनों की कमाइयाँ बंद हो जाऐंगी…….। आखिर कई लोग दूसरों की जान की कीमत पर जीने के लिए ही तो दुनिया में आते हैं जैसे खिड़की की मच्छर जाली पर बैठा वह डेंगू का मच्छर का परिवार।

दिनाँक 25.11.2009 को हरिभूमि में प्रकाशित

5 comments:

  1. Bahut khoob... aapka blog padhkar khud vyang likhne ki icha jagrit ho gayi hai....

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  2. कमाल है ताँबट साहिब एक व्यंग के माध्यम से आपने पूरी व्यवस्था पर ही इतनी गहरी चोट कर दी । बहुत खूब-- शुभकामनायें

    निर्मला कपिला

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  3. हम समझ रहे थे की खटमल ख़त्म हो गए हैं परन्तु मुंबई में उनसे भी मुलाकात हो गयी.हर साल नयी नयी बीमारियाँ वास्तव में उपजाई जा रही हैं और फिर शोध किया जाता है. इन सब के पीछे व्यवसायिक स्वार्थ दिख रहा है. आभार हमें तीन बार प्रयास करना पड़ा. एंटी स्पेम शब्द को हटा दें तो बेहतर रहेगा.

    पी. एन. सुब्रमण्यम

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  4. प्रमोद जी क्या सही लिखा है आपने पढ़ कर मज़ा आ गया एक मच्छर की कहानी एक इन्सान की जुबानी और बिलकुल एक साधारण ग्रामीण और शहरी इन्सान की बातचीत के जैसे आपने क्या शब्दों को पिरोया है ...बहुत शानदार ,व्यंग्य की पैनी धार के लिए बधाई.

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  5. बहोत अच्छा व्यंग लिखते है आप ! फेस बुक पर आपका अकौंट है क्या ? मै मेरे मित्रोन्के साथ शेअर करना चाहता हूं !

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