Tuesday, February 2, 2010

क्रिकेट की मण्डी में कौन आएगा बिकने।

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट 
अब जाकर मेरे सामने सब्ज़ियों-भाजियों का दयनीय पहलू उद्घाटित हुआ है। सब्ज़ी मण्डी की खुली नीलामबोली में दलाल आढ़तियों द्वारा जब कभी भटे-टमाटरों की बोली नहीं लगाई जाती तो उनके नाज़ुक दिलों पर क्या गुजरती होगी, मुझे अब समझ में आया है, जब पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आई.पी.एल. क्रिकेट मण्डी से बिना नीलाम हुए वापस लौटना पड़ा।
आई.पी.एल. की क्रिकेट मंडी में पाकिस्तानी खिलाड़ियों की दशा सड़े टमाटरों से भी ज्यादा गई-गुज़री हो गई, क्योंकि सड़े टमाटरों को तो फिर भी कोई न कोई सॉस-चटनी बनाने वाला खरीद ही लेता है इन्हें तो किसी ने कौड़ी का भाव नहीं दिया। हद होती है बेदर्दी की! मुझे तो उनके प्रति घनघोर सहानुभूति हो रही है क्योंकि बेचारों को बिक ना पाने के कारण अपने देश में ना जाने कितने जूते खाना पड़ रहे होंगे, जबकि इसमें उन बेचारों की रत्ती भर भी गलती नहीं रही! भटे-टमाटर नहीं बिक पाते तो क्या इसमें उनकी गलती होती है! वे धुरंधर तो अपनी तरफ से बढ़िया नव्हे-धुले, क्रीम-पाउडर लगाकर शिद्दत के साथ बिकने के लिए तैयार खड़े थे। अच्छे हट्टे-कट्टे मजबूत और खूब मेहनती तो है ही, बिकने का जज़्बा भी कूट-कूटकर भरा हुआ था। कहीं कोई दिक्कत थी नहीं। जो कोई भी मालिक नीलामी में हाथ मार लेता, वे सिर नीचा कर दुम हिलाते हुए उसी के पीछे जाकर जा खडे़ हो जाते। मगर अफसोस कि बेचारों को हिन्दुस्तानी रोकड़े पर ऐश करने का सौभाग्य नहीं मिल पाया। क्रिकेट घरानों के मालिकों ने उन्हें पिच पर झाड़ू लगाने के काबिल तक नहीं समझा। सब के सब उन्हें छोड़कर ऐसे उठ गए जैसे उन्हें छूत का कोई गम्भीर रोग हो गया हो।
मैंने सुना है कि पाकिस्तान की जनता खास तौर पर क्रिकेटरों के मामले में काफी संजीदा है। बढ़िया भारी-भरकम जूते-चप्पल और पर्याप्त साइज़ के बोल्डर-पत्थरों के साथ हर वक्त आक्रामक मुद्रा में तैयार रहती है और बात-बात में इस प्राणघातक सामग्री का उदारतापूर्वक इस्तेमाल भी कर लेती है। क्रिकेटरों के चाहे जितने घर हों और पाकिस्तान की चाहे जिस भी गली में हों, उन सबमें आग लगाने के लिए पर्याप्त ईंधन और दियासलाई की व्यवस्था भी हमेशा चाक-चौबंद रखी जाती है। भले ही घर में चूल्हा जलाने के लिए मट्टी का तेल ना हो मगर हारने पर क्रिकेटरों के घर फूँकने के लिए तमाम ज्वलनशील पदार्थों की जुगाड़ यहाँ-वहाँ से कर ही ली जाती है। चूँकि उनके लाड़ले क्रिकेटर अपने-आपको आई.पी.एल. की मंडी में बेच नहीं पाए हैं तो पाकिस्तानी अवाम उनकी इस शर्मनाक असफलता पर अपने आप को लुटा-पिटा, ठगा हुआ महसूस कर रही है और अब वह काफी दिनों से जमा आग्नेयास्त्रों का जखीरा उन पर किस तरह से इस्तेमाल करेगी कुछ कहा नहीं जा सकता।   
बचपन से सुनते आएँ हैं कि हारने पर, और खासतौर से हम पड़ोसी काफिरों से हारने पर पाकिस्तानी सरकार द्वारा क्रिकेटरों को लाइन में खड़ाकर कोड़ों का प्रसाद दिया जाता है। अब चूँकि पाकिस्तान में सैनिकों की तानाशाही की जगह जरदारी का लोकतंत्र हैं, इसलिए बाज़ार से कन्साइन्मेंट रिजेक्ट होकर वापस आ जाने पर  कोड़े तो शायद ना पड़ें, लेकिन घर में क्रिकेटरों  को बीवियों की ओर से जूते-चप्पल शर्तिया घलने वाले हैं, और सड़क चलते शोहदे पत्थर भी मारेंगे सो अलग।
गली-गली में फिकरे कसे जाएँगे, क्रिकेटरों की बीवियाँ हाथ नचा-नचाकर मोहल्लेभर के सामने चिल्लाएँगी-अरे नासपीटे, चवन्नी भर की कीमत नहीं थी तो खड़ा क्यों हुआ नीलामी में जाकर! वह भी दुश्मनों के मुल्क में, कम्बख्त-मारे ने नाक कटवा दी मुल्क की! कोई बीवी चिल्ला-चिल्लाकर कहेगी-अरे निगोड़े कोई खरीद नहीं रहा था तो पटकनी क्यों नहीं दी एखाद को! लड़-मरके अपना हक लेना नहीं आता तुझे ! कैसा पाकिस्तानी है तू ? माँ-भेन की गालियाँ नहीं आतीं तुझे, देता मो भर-भरके कम्बख्तों को! कोई शरीफ बीवी कहती-अजी इतना तो कह ही सकते थे, ले लो-ले लो, हम फ्री में ही खेल लेंगे! न खरीदता कोई, ना देता पैसा, खाने खेलने पर तो ले सकता था टीम में! दौड़ दौड़कर बॉल ही उठा दिया करते फोर बाउन्ड्री से! कोल ड्रिंक, पानी ही पिला देते खिलाड़ियों को! मगर तुमने कोई कोशिश ही नहीं की! बस, न बिके तो मुँह उठाकर वापस चले आए। थोड़ा तकादा तो लगाना था।
पूरा पाकिस्तान ग़मज़दा है कि देखो हमारे बिकाऊ माल को न खरीदकर भारतीयों ने हमारे क्रिकेटरों की कैसी छीछालेदर की है ! कैसा अन्याय-अत्याचार किया है। इससे बड़ी बेइज्ज़ती तो कोई हो ही नहीं सकती कि हमारे खिलाड़ी बिकने के लिए उतावले हैं मगर कोई खरीददार ही नहीं है। पाकिस्तानी सरकार भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कह रही है कि हमारे माल की ऐसी उपेक्षा अच्छी नहीं-शान्ति स्थापित करने की कोशिशों में बाधा हो सकती है। भविष्य में यदि वह विश्व समुदाय के सामने दहाड़ें मार-मार कर रोए और शिकायतें करे कि देखो भारत ने हमारे खिलाड़ियों को ना खरीदकर हमारे मानव अधिकारों का हनन किया है तो कोई बड़ी बात नहीं। पाकिस्तानी सेना और आतंकवादियों के लिए भी एक नए मुद्दे ने जन्म लिया है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यदि किसी मण्डी में ना खरीदा जाए तो क्या एक्शन लिया जाए ! भारत में आतंकवादी हमले तेज किये जाएँ या सीमा पर गोलीबारी चालू की जाए।
जो भी हो क्रिकेट घरानों की इस अहमकाना हरकत से हमारी ईमानदार छवि को गहरा धक्का लगा है। दुनिया जान गई है कि हम बिकाऊ माल की खरीददारी में भी किस कदर पार्शलिटी करते हैं। यही हरकतें रहीं तो आई. पी. एल. की क्रिकेट मण्डी में कौन हमारे पास आएगा बिकने के लिए ?   

7 comments:

  1. .... बिलकुल सही "छक्का" मारा है !!!

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  2. बहुत तीखा व्यंग. एकदम सही औकात दिखा दी पाकिस्तान क्रिकेट टीम को. बधाई

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  3. बहुत ही अच्छी रचना...बेहतरीन व्यंग्य...बधाई...

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  4. Hi Tambatji,
    I have read this byang " cricket ki mandi me kaun ayega bikane" it's fine. I hope U will again write one more best byang.
    Er AKSingh

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  5. आपको जूता ही मारना हे तो गीला कर के मारिये कम से कम आवाज़ तो कम होगी, आपने तो सूखा जूता ही मार दिया. वैसे बहुत मज़ा आया ...........

    http://rajdarbaar.blogspot.com/

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