Wednesday, February 17, 2010

उल्लू के पट्ठों बी.टी. बैगन खाते हो या नहीं ?

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
मास्टर जी बेहद गुस्से में थे। देश भर में घूम-घूमकर सबको डाँटते फिर रहे थे- तुम्हारे बाप ने कभी खाया है बैगन! खाया हो तो जानो कि बी.टी. बैगन का स्वाद क्या होता है। पागल हो तुम सब के सब, दिमाग का इलाज कराओ अपने। मेरी! मेरी नीयत पर शक कर रहे हो! मैं दूध का धुला जनता का सच्चा हितैशी, मुझे मोनसांटो का ऐजेंट समझते हो! समझते हो मैंने मल्टी नेशनल कम्पनी से पैसे खा लिए। समझते हो तो समझो, क्या उखाड़ लोगे! बिना बात एक अच्छी पौष्टिक गुणकारी सब्ज़ी का विरोध कर रहे हो, लगे हुए हो पटर-पटर करने में। दो कौड़ी के पब्लिक फोरम को संसद समझ रहे हो, सिर पर ही चढ़ते जा रहे हो। मगर मैं किसी के दबाव में आने वाला नहीं हूँ ? तुम दर्जन भर बुद्धिजीवी-साइन्टिस्ट तो क्या पूरा देश भी एकजुट होकर ऐलान करे कि बी.टी. बैगन नहीं खाएंगे, तब भी हमने तो कसम खा रखी है कि चाहे कुछ भी हो जाए देश के खेतों में उसे पहुँचा कर रहेंगे, एक-एक को बी.टी. खिलाकर ही मानेंगे।
कैसे अनपढ़ हो तुम लोग! गुरबक, जाहिल गँवार हो! कुछ समझते ही नहीं। तुमसे तो कुछ शोध-अनुसंधान होता नहीं, इतनी मेहनत करके किसी दूसरे ने कुछ बनाया है तो उसका तो खयाल करो। उसके पेट पर क्यों लात मार रहे हो! थोड़ा देख लो आजमाकर! ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, पारम्परिक फसलें खत्म होंगी, खेतों का सत्यानाश होगा, कर्जे में डूब जाओगे, मरोगे पाँच-दस हज़ार, तो क्या हुआ, चलता है। अपन हिन्दुस्तानी है, मोटी चमड़ी वाले। अपना तो काम ही है मरना। अपन नहीं मरेंगे तो क्या अमरीकी मरेंगे! अपन ने अगर बी.टी. बैगन नहीं चखा तो उन्हें पता कैसे चलेगा कि उनका अनुसंधान सफल हुआ कि नहीं। बैगन-भाजा, बैगन-भरवॉ, बैगन का भुरता, ये तो तुम्हारी प्रिय डिशें हैं, इनके आगे बस बी.टी. लगाना है, इतनी सी बात है। मगर तुम्हीं यदि रायता फैलाओगे तो देश की छवि कितनी खराब होगी। हमारी छवि कितनी खराब होगी। हमारी सरकार की छवि की तो दुनिया भर में मट्टीपलीत होकर रह जाएगी। सारी दुनिया थूकेगी हमारी सरकार पर, कहेगी-जो सरकार अपनी जनता को बैगन जैसी सड़ी सी चीज़ जबरदस्ती नहीं खिला सकती, उसको विकास करने का कोई हक नहीं, कर्ज़े बाटने की क्या ज़रूरत है! हम तो बेमौत मारे जाएंगे। देखते हैं कि कैसे तुम लोग नहीं खाते हो बी.टी. बैगन! ना एक-एक के हलक में इसे ठूसा तो हमारा नाम भी माट्साब नहीं।
फिलहाल थक-हारकर माट्साब ने डाँट-डपट कर देश-वासियों को बी.टी. बैगन खिलाने की अपनी मुहीम कुछ दिनों के लिए मुल्तवी की है, बमुश्किल वे मिनिस्ट्री के दूसरे गैर ज़रूरी कामों के लिए समय निकालकर अपने दफ्तर को लौटे हैं। इधर बैगन से पहले ही से परेशान जनता हैरान होकर सोच रही है कि आखिर यह आदमी इस बुरी तरह हाथ धोकर बी.टी. बैगन खिलाने के पीछे क्यों पड़ा हुआ है। वैसे ही इस बेगुण-बेस्वाद तरकारी के मारे जीना हराम है। पतियों से परेशान पत्नियाँ बदला लेने के लिए जब चाहे तब इस मनहूस को बघारकर धर देती है थाली में। कम्बख्त इस कदर बादी करता है कि गैस-अफारे से पूरा देश परेशान है, और ये माट्साब बी.टी. बैगन का उत्पादन बढ़ाकर किसानों को मालामाल करने की झक लिए बैठे हैं, जबरदस्ती इसे देशवासियों के हलक में उतारने पर उतारू हैं।
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि माट्साब साल-छः महीने बाद फिर कुछ और ब्रम्हास्त्र और मिसाइलें लेकर मैदान में उतरेंगे, एक-एक को ठीक करने के लिए। हो सकता है पुलिस-मिलिट्री भी साथ में लेकर आएँ और दादागिरी से पब्लिक मंचों को हथियाकर कहें- अब बोलों उल्लू के पट्ठों बी.टी. बैगन खाते हो या नहीं ?

4 comments:

  1. आपका लेख पढ़ा. आपकी लेखन शैली से लगा कि अगर आप व्यंग-लेखन करें तो ठीक रहेगा.

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  2. अभी तो बवाल थोडा ठंडा हो गया है....पर ना जाने कब ते सबकी थाली में सज जायेगा आ कर ...बढ़िया व्यंग

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  3. मास्साहब केवल ई बात बताएं, कि ई बी टी बैगन सस्ता तो होगा न...माने कि डेढ़ दू रुपैया किलो ???????
    का कहे..."हाँ".....
    जय हो जय हो....सरकार राज की जय हो....
    अब हम जरूरे खायेंगे मास्स्साब....वैसे भी ई मंहगाई काल में भूखों मरने से बैगन खाकर मरना जादे बेहतर होगा...


    लाजवाब व्यंग्य....लाजवाब !!!

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  4. आपके व्‍यंग्‍य पर एक बेवकूफ़ाना सवाल। क्‍या यह सामान्‍य बैंगन से अलग दिखता है? अगर नहीं तो सामान्‍य आदमी कैसे भेद करेगा सामान्‍य और बीटी में? वो तो बेचारा भले-बुरे का भेद नहीं समझता। हो सकता है पिछले कुछ सालों से बीटी से लेकर ज़ेडटी तक सभी किस्‍में खा चुका हो।

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