Sunday, May 2, 2010

व्यंग्य-संतई का संभावनापूर्ण रास्ता


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

     इन दिनों झूर के संत बनने का मन कर रहा है। क्या मजे है संतों के! बड़े-बड़े वातानुकूलित आश्रम, बड़ी-बड़ी लक्झरी गाड़ियाँ, धन-दौलत, सुख-समृद्धि, आनंद-मंगल सभी कुछ! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों का प्रेम-भक्तिभाव, ऐसा स्वर्णिम अवसर भला और किस धंधे में मिलता है! वैसे तो हर कहीं औरतों को निहार भर लेने से महिला उत्पीड़न का आरोप और बेभाव जूते पड़ने की सीधी संभावना प्रबल बनी रहती है। एक यही संतई का धंधा ऐसा है जिसमें विशेष आशीषाभिलाषिनों को किसी भी कोण से, किसी भी प्रकार का आशीर्वाद दे दो लाभदायक होता है।
    जवानी से लेकर इस अधेड़ावस्था तक क्या-क्या लंपटयाई नहीं की! लम्बी-लम्बी ज़ुल्फें रखीं, रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर छैला बने घूमे, दर्जनों बालाओं के इर्द-गिर्द भँवरों की तरह मंडराए, फेरे मारे, चप्पलें घिसीं, मगर परिणाम अनुकूल  नहीं आए। फिर फिल्मी कवियों-शायरों के अनुयाई बनकर पथभ्रष्ट हुए, कविताई की, शायरी लिखी, मगर मछुआरे सी तपस्या के अभाव में एक मछली तक जाल में नहीं फाँस पाए। उस वक्त यह अक्ल नहीं आई कि लफूटियाई छोड़कर कहीं छोटा-मोटा  आश्रम डाल लेते, सन्यास धारण कर लेते, आशीर्वाद देने का धंधा करते, तो काम आसानी से बन जाता, और आज एक-दो नहीं दर्जनों दुःखी आत्माएँ अपना तन-मन-धन अर्पण कर स्वेच्छा से आश्रम में पड़ी रहतीं, जब जिसको जी चाहे आशीर्वाद दे लेते, सम्पन्न भक्तों से भी दिला देते।
    ज़िन्दगी भर सर पटकते रहे कि कहीं कोई छोटा-मोटा धंधा कर लेंते जो आगे जाकर विशाल नेटवर्क का रूप ले सके, मगर फालतू पूँजी और नसों-नाड़ियों में धंधे के उस कला-कौशल का उद्याम प्रवाह ना होने के कारण यह संभव नहीं हुआ। संत हुए होते तो ना पूँजी की ज़रूरत होती ना किसी पुश्तैनी कला-कौशल की- स्वयंस्फूर्त आयोजना से दुनिया के सबसे पुराने धंधे के एक विशाल रैकेट का निर्माण निश्चित रूप से हो सकता था जिसके सफल प्रबंधन के माध्यम से हम किसी छोटे-मोटे साम्राज्य का सुख तो भोग ही सकते थे, मगर जीवन में कभी कोई प्लास्टिक का रैकेट तक हाथ में पकड़ा हो तब ना दूसरा कोई रैकेट पकड़ पाते।
    सुनहरे भविष्य के सपनों की दुनिया में ऐसे मदहोश रहे कि धन के मुक्त प्रवाह का उद्गम और दिशा ही देख ना पाए, छोटी-मोटी, घटिया सी चाकरी को ही ऐशो-आराम और जीवन का सार समझते रहे, ताड़ ही नहीं पाए कि असली ऐश तो वहाँ हैं जहाँ छूछा पुण्य भर बाँटने के बदले में अकूत धन मिलता है, वास्तव में जो जीवन का सार है। अन्दाज़ा ही नहीं लगा पाए कि बड़े-बडे़ ओहदेदारों का लाइन लगाकर आश्रम के दरवाजे पर खडे़ रहने का सुख क्या होता है, जिनके खुद के दरवाज़े पर आम जनता लाइन लगाए खड़ी रहती है। ये ओहदेदार अपनी-अपनी ओहदादारी के हिसाब से सेवाएँ भी देते रहते हैं और आश्रम में सम्पन्न हो रहे गोरखधंधों पर पर्दा डालने के साथ ही साथ केश और काइंड में मोटे-मोटे चढ़ावे भी पेश करते हैं। आश्रम के किसी कोने में हत्या, आत्महत्या, बलात्कार, ड्रग कारोबार जैसा, भारतीय दंड संहिता में वर्णित मामूली सा अपराध घटित  हो जाए तो प्राण-प्रण से जान बचाने के लिए दौड़ भी पड़ते हैं।
    कभी-कभी मति मारी जाती है तो आदमी संभावनापूर्ण रास्तों को छोड़कर आलतू-फालतू रास्तों पर चला जाता है। संतई का रास्ता ऐसा विकट संभावनापूर्ण रास्ता है जिसमें सन्यास का अद्भुत आनंद भी है और क्षूद्र सांसारिकता का सुख भी। अब भी समय है, बीती ताहि बिसार कर आगे की सुध लें, तो जिन्दगी का कुछ मज़ा आए।          

7 comments:

  1. इस देश और समाज में नैतिक पतन और गिरता सामाजिक सोच पर व्यंग करती उम्दा रचना के लिए आपका धन्यवाद /

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  2. कभी-कभी मति मारी जाती है तो आदमी संभावनापूर्ण रास्तों को छोड़कर आलतू-फालतू रास्तों पर चला जाता है।
    सत्य वचन!

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  3. बहुत सटीक कटाक्ष!

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  4. This person, a yogi teaching meditation and life saving 'kriyas' had to take shelter in the guise of Chest pain to get admitted in a Hospital to hoodwink the police. What a fall in the name of God and Sadhutva.

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  5. उचित निर्णय। आओ मिल जाएं और बन जाएं संत। बीवियां भी करेंगी पूजा। सच कहा है इससे बड़ा नहीं है धंधा। आंख वाला भी आंख खोलकर बन जाता है अंधा। जब जागे तभी सवेरा।

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  6. बहुत खूब...मुंह में राम बगल में छुरी वालों को अच्छा लपेटा है आपने . ऐसे ही लोग धर्म को बदनाम करते हैं... धर्म के प्रति लोगों का विश्वास हटाते हैं...

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  7. निहायत ही उच्चस्तरीय प्रेरणादायी रचना है। जीवन दर्शन से भरपूर। आगे आने वाली पीढ़ी इससे आत्मसात करते अपने जीवन में उतारें तभी लेखकीय कर्तव्य सार्थक होगा। अभी युवा जोशीले एवं पिछली पीढ़ी की गलती से सबक लेने वाले हैं। निश्चय ही आपकी समझाइश पर ध्यान देंगे। आपका लेखन सफल करेंगे।
    रचना बेहद प्रासंगिक है। भाषा सधी हुई है। व्यंग्य तत्व भरपूर है। हास्य तत्व की और गुंजाइश बनती है। कुछ और लंबी होती तो और भी मजा आ जाता। उम्दा रचना के लिए बधाई।

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