Saturday, January 8, 2011

इस कड़ाके की ठंड में

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
      बर्फ की सिल्लियों पर अपराधी को लिटाकर कोड़े फटकारते हुए पुरानी भारतीय फिल्मों में कई बार देखा है, वास्तव में ऐसा होता है या नहीं पता नहीं, मगर मठ्ठर अपराधियों ने कभी मुँह खोला हो याद नहीं पड़ता। इन दिनों ठंड ने जो कहर बरपाया है, अपराधियों को बर्फ पर लिटाने की जरूरत ही नहीं है। एक बाल्टी ठंडे पानी से खुले मैदान में नहाने की सजा दे दी जाए, अच्छे-अच्छे अपराधी अपराध कबूल लेंगे। पुलिस के लिए इससे बढ़िया थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। ट्रायल में भी किसी अपराधी को फुसलाना हो तो दो कम्बल एक्स्ट्रा दिलवाने का लालच दे दिया जाए या डराना हो तो दिया हुआ कम्बल छुड़ा लेने की धमकी दी जाए, मामला सुलझ जाएगा।
      इन दिनों आप घर के दरवाजे़ खुले रखकर बिंदास सो सकते हैं, घर में तिजोरी हो तो उसे भी खुली रख सकते हैं। कोई पेशेवर चोर ऐसी कड़ाके की ठंड में घर से बाहर निकलने से रहा। वह घर में रजाई में दुबक कर उष्मा सुख लेगा या हाड़-तोड़ सर्दी में ताले चटकाता फिरेगा। हाँलाकि चोर के लिए तो इन दिनों बड़ा फेवरेबल सीज़न है, रेल की पटरियाँ चटक रही हैं, तो खोजने पर ताले-कुंदे भी चटके हुए मिल सकते हैं। चोरी करने में आसानी हो सकती है। घर के अन्दर भी बड़ी सहूलियत से माल समेटा जा सकता है। पूरा परिवार रज़ाई में दुबका हुआ चोर को बस निहार भर सकता है, कौन रजाई के बाहर निकलकर उसे पकड़ने की ज़हमत उठाएगा। सर्दी के मारे कंठ से पकड़ों-पकड़ों का स्वर तक नहीं निकलने वाला। लेकिन फिर भी मेरा दावा है इतनी सुविधाओं और सहूलियतों के बावजूद चोर इस ठंड में बाहर निकलने की गलती कभी नहीं करेगा।
      भ्रष्टाचार इन दिनों ठंड के बाद दूसरा बड़ा मुद्दा है जिसपर चारों ओर तूमार मचा हुआ है। कुछ दिनों पहले वह प्राथमिकता में पहला था। ठंड ने उसका स्थान ले लिया है। भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह ठंड बड़ी कारगार है। भ्रष्टाचार का एकमात्र प्रकटीकरण है नोटों की गड्डियाँ। ऐसी ठंड में कौन नोट गिनेगा। ना देने वाला बिना गिने देना चाहेगा ना लेने वाला बिना गिने लेगा। कौन कोट की जेब से बाहर हाथ निकालकर अपना खून जमवाएगा। माना जा सकता है, कि इन दिनों लेन-देन में सुस्ती चल रही होगी और भ्रष्टाचार पर प्राकृतिक अंकुश लगा होगा। सरकार की इच्छा शक्ति अगर ज़ोर मारे तो भ्रष्टाचार के सभी अड्डों पर ‘प्रशीतक’ लगवाकर इससे बारहों महीने चौबीस घंटे मायनस टेम्प्रेचर मेंटन कर नोटों का लेन-देन रोका जा सकता है। भ्रष्टाचार पर अपने आप अंकुश लग जाएगा।
       ठंड के मारे चारों ओर अमन चैन है, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं है। दिमाग की सारी खुराफाती ऊर्जा शरीर को ठंड से बचाने में खर्च हो रही है। महँगाई के मारे हालाँकि कंडे-लकड़ी खरीदकर गरीब का आग तापना भी मुश्किल है परन्तु इस कड़ाके की ठंड में लोग महँगाई तक को भूल गये हैं।

16 comments:

  1. प्रोमोद बेटा
    अशोर्वाद
    व्यंग तो ठंडा नहीं
    पहले नेताओं ने घोटाले किया अभी प्याज लहसून के घोटालो की देखा देखी ठण्ड ने भी अपनी तुरुप की चाल चल दी चोरों का धंधा मंदा कर
    दिया भगवान रक्षा करना कनाडा और चिकागो में शून्य से २० नीची है तापमान

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  2. Wah Pramod Ji......Mazaa aa gaya Thand ki mahima padh kar......

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  3. इस ठंड ने बहुतेरे मामले ठंडे कर दिये!!

    सटीक व्यंग्य!

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  4. नहीं सर महंगाई को नहीं भूले हैं.एक बार बस प्याज लाने की सिर्फ सोच कर देखिये भरी ठण्ड में पसीना न आ जाये तो कहियेगा.:)

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  5. सबको निढाल कर गयी है यह ठंड। गतिहीनता की स्थिति हो गयी है।

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  6. बेशक ठंड का सीजन है और चोरों का फेवरेट है, पर इसे पढ़कर तो गर्मी आ गई है। वाह जनाब।

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  7. व्यंग्य पढ़कर कुछ तो गरमी आई.
    बढ़िया व्यंग्य.

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  8. Pramod Bhai, aaj kal chor log bhi 'Pyaj' ke godamon ki chori mein vyast ho gaye hain!

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  9. खुरापाती ठण्ड से कहाँ डरने वाले हैं.. ... ठण्ड का प्रकोप तो आम जनता झेलती हैं
    प्रमोद जी! बहुत अच्छा व्यंग!
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामना

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  10. "utanee thand nahee hai, iss thand men 'uday'
    jitanee huaa kartee hai garmee, surkh noton men !"

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  11. शीत -ऋतू का वर्णन अनुपम है

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  12. बहुत खूब प्रमोद जी .....ठंड को अच्छा लपेटा है बढ़िया व्यंग्य

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  13. बहुत ठण्ड है.. वाकई. सब ठण्डा हो रहा है.

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  14. मैंने नई दुनिया में भी आपका लेख पढा , पढ कर बहुत अच्छा लगा , पता है प्रमोद जी मैंने कई साल पहले एक लेख पढा था ' कारीगर मंहगा ग्रेजुएट सस्ता ' मेरे पास उसकी कटिंग अभी भी रखी है ,कहीं दिल को बहुत कचोटती है यह गलत बात जो मनोरंजन देने वाले खेल को या सिनेमा के कलाकारों को चाट जैसा पॉपुलर बना देते हैं और उस चक्कर में दाल—भात जैसे स्वादिष्ट खाने को लोग हेय दृष्टि से देखने लगते हैं ...आपने अच्छा लिखा है ।

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  15. dada, mujhe garva hai ki hame aapki rachnayen padhne ka suavsar milta hai.
    vyanglok ke sipahasalar ko mera naman hai.

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  16. dada,mujhe aapki rachna padhne ka suavsar milta rahe ye mera saubhagya hai.vyanglok ke guru ko mera pranam.

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