Friday, July 15, 2011

काला धन, सफेद धन, निर्धन


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
काले धन की बात करो तो डंडे पड़ते हैं, जानते हुए भी देश में बहुत सारे लोग काले धन की चिन्ता करने से बाज नहीं आ रहे हैं। कई सामाजिक चिन्ताखोर काले धन को बाहर निकलवाकर हवा-धूप दिखलाना चाहते हैं क्योंकि आम धारणा है कि काला धन रजाई-गद्दों, बाथरूम के फर्शों, टॉयलेट सीटों के नीचे पड़ा सीड़ रहा है। कुछ लोग विदेशी बैंकों के तगड़े कमरों (स्ट्राँग रूम) में पड़े काले धन की चिन्ता में दुबले हुए जा रहें हैं।
उन लोगों की कल्पनाशीलता की दाद देनी पड़ेगी, जिन्होंने भरसक खयाली पुलाव पका रखे हैं कि- विदेशी बैंकों में पड़ा यह काला धन यदि घर वापसी करे तो कितने लोग खा-पी लेंगे, कितने लोग नंगे न रहेंगे, कितने निरोग हो जाएँगे, कितने पढ़-लिख जाएँगे वगैरा-वगैरा। हालाँकि सबको पता है कि हम कितना भी ज़ोर लगा लें एक बार विदेश गया धन कभी वापस नहीं आता। कुछ लोग फालतू पलक-पावड़े बिछाकर बैठे हैं कि यह तमाम काला धन बाहर आकर राष्ट्रीय सम्पत्ति बने तो फिर उसको विधि-विधान से जीमकर सफेद धन में तब्दील कर लेने का राष्ट्रीय कर्म सम्पन्न किया जाए। इस काम में तमाम सारे राष्ट्रप्रेमी उद्यमियों को महारथ हासिल है।
तुलना के लिए समय खराब किया जाए तब भी यह ज्ञान मिलना मुश्किल है कि सफेद धन का अंबार बड़ा है या काले धन का, हालाँकि दोनों में फर्क यह है कि काला धन काली करतूतों के एवज में हासिल होता है और सफेद धन सफेद करतूतों के एवज में। सफेद-काली दोनों ही करतूतों के एवज में निर्धननाम का एक राष्ट्रीय प्राणी पैदा होता है।
काले धन का सफेद धन में और सफेद का काले धन में तब्दील होने का मायावी कारोबार तो चलता ही रहता है, मगर यह जो निर्धन नाम का प्राणी दिन-रात बढ़ता ही चला जा रहा है उसकी किसी रंग के धन को कोई चिन्ता नहीं है। लोग काले को सफेद में सफेद को काले में, और इन दोनों ही रंगों के धनों को पीलेया हरेधन में तब्दील करने की करतूतों में लगे हुए हैं और उधर बेचारा निर्धन नामक प्राणी दूर खड़ा इन करतूतों को विस्फारित नेत्रों से देख रहा है।

5 comments:

  1. ज़बरदस्त व्यंग्य है सर.


    सादर

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  2. सच है अब स्लेटी धन खोजना पड़ेगा, दोनों को खपाने के लिये।

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  3. प्रमोद भाई निर्धन नामक प्राणी कब तक टुकुर-टुकुर देखता है देखिये...वह दिन भी दूर नही जब वह छीना-झपटी पर उतारू हो जायेगा...धन का मामला है कुछ भी हो सकता है। काला हो या सफ़ेद धन के बिना नैय्या डूबी जी। सदियों से एक ही कहावत चल रही है बाप बड़ा न भैय्या सबसे बड़ा रूपया...:) बहुत बढ़िया और सार्थक व्यंग्य लिखते हैं आप...थोड़ा आशीर्वाद हमे भी देते रहा कीजिये...कुछ तो सीख ही लेंगे आपसे।

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  4. सीधे सरल सपाट शब्दों का प्रवाह प्रभावकारी नहीं रहा ,शायद कबीर जी की शैली कुछ काम कर जाये , तरस आ जाये प्यारे सज्जन देश पर ...... / यथेष्ट प्रहार आज के दसा
    पर /शुक्रिया जी /

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  5. vah sahab ! kitna maza aata hai khayali pulav pakane me ..isme bhi itaraz hai apko.... bahut chuteela vyang!!!!

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