Tuesday, September 13, 2011

हिन्दी पखौड़े की एक महत्वपूर्ण बैठक

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
भारतमाता हाउसिंग सोसायटी के अध्यक्ष ने अपना उद्बोधन प्रारंभ कर देर से चल रही चकर-चकर को विराम दिया-‘‘ब्राडर, हिन्डी का वास्ते किछु करने का नक्की किया तो भिड़ू लोग बोला हिन्डी पखौड़ा आरेला ए, उसी को ढूमढाम से बना डालने का, येइच वास्ते ये मीटिंग अरेंज कियेला ए। वैसा भी हिन्डी हमारा नेशनल लैंगुएज होने का वास्ते कुछ चैरिटी करने को मँगता, कुछ अइसा फंक्सन करने को मँगता कि अख्खा पाब्लिक को लगे कि अपून हिन्डी का वास्ते किछु किया। अभी तुम लोग बोलो क्या करने का।’’
अध्यक्ष का भाषण खत्म होते ना होते किराना व्यापारी भग्गूमल लाभचन्दानी बोल पडे़ - ‘‘वड़ी तुम हड़वखत फालतू का फकड़-फकड़ कड़के धंधे का टेम खोटी कड़ता। पखवाड़ा का पूड़ा काड़ीकड़म तैयाड़ कड़के हमको बोलो कित्ता चन्दा मँगता, हम लोग देगा, फिर कड़ो काड़ीकड़म।’’
भग्गूमल की बात चट्टो बाबू को एकदम नागवार गुजरी तो वे तीर की तरह सनसनाते हुए बोल पड़े- ‘‘अइसा कइसा चोलेगा ? भोग्गू तुम हार वोखत धंधा का बात कोरके सोसायटी का जिम्मेवारी से भोग जाता है। ये हिन्दी पोखवाड़ा नेशनल लैंगुएज का ममला है, तुम अइसा भोगने नहीं सकता।’’
एक तरफ केरल के कुट्टी बाबू बोल पडे़- ‘‘हमको समज नई आता पेखवाड़ा बनाने का बनाओ, एवरी टाइम चेन्दा का बात कायकू करता!’’
-‘‘ए कुंडू तू चुप कर, पिरोग्राम का खर्चा कि्या तेरा अब्बा झेलेगा। चलो खाँ फटाफट तै कड्डालो क्या कर रिये हो, नई तो अपन ये चले, हिन्दी-विन्दी गई तेल लेने।’’ बन्ने खाँ भोपाली थोडे़ तैश में बोल पडे़ थे जो कि एक पंडित जी को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ। वे भी कड़क कर बोले- ‘‘खामोश, हिन्दी का ऐसा अपमान सहन नहीं किया जाएगा, यह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है, हर हर........!’’ उनके महादेवबोलने के पहले ही बन्ने खाँ बोल पड़े -अरे खाँ भाई मिया मे तो के रिया था हिन्दी तो हमारी मादरी ज़बान हे, जो भी करना हो करो, अपन सबमें राज़ी हैं, बस ज़रा जल्दी कल्लो।’’
अध्यक्ष महोदय ने समझाया- ‘‘लड़ने का नई, अपना-अपना राय बोलो, पखौडे़ में क्या-क्या पोरोग्राम रखने का है, फिर पिछु चान्डा डिसाइड करेगा।’’
केरल वाला फिर बोल पड़ा-देखो इन्दी पैप्पर लो, उसको पड़ो, छुट्टकुल्ला, स्ट्टोरी, प्पोयम कुछ भी पड़ो, सब अपना-अपना इन्दी सुधारों, अम एइसाइच अमारा इन्दी सुधारा। सब लोग अइसा करेगा तो नेशनल लैंग्वेज का बला हो जाए। ’’
एक मराठी मानूस तुरंत बोला-‘‘एक मलाबारी, भंकस करने का नई। इस्कूल में हिन्दी पढ़-पढ़कर अख्खा मगज पिक गयेला ए, अभी बस इन्टरटेनमेंट मँगता है। शिनेमा वाली बाई को बुलाकर नचबलिए करवाने का, झक्कास मज्जा मँगता है।’’
सरदारजी ने भी अपनी सलाह दी- ‘‘ओ बाश्शाओ, गिल्ली-डंडा का मैच रख लो जी। कलोनी का सब बच्चा-जनाना लोग को शामल करके चेयररेस, खो-खो, रस्सीकूद का परोग्राम रख लेंदे है। कबड्डी मैच भी रख सकदे है नौजवाणों के वास्ते।’’ इस राय पर कई दूसरे लोगों ने भी हाँ में हाँ मिलाई पर वह ढंग से मिल नहीं पाई।
एक गुजराती भाई बात काटता हुआ चिल्लाया- ‘‘होस में बात करो ने सरदारजी! हिन्दी पखवाड़ा और कुदा-कुदी का क्या मेल भला! ऐसाइच करना था तो हमकू किस वास्ते बुलाया इधर।’’
भग्गूमल फिर बोले- ‘‘याड़ देवी जागड़न कड़वा लो, सबसे बेहतडीन ड़हेगा।’’
फिर तो देखते ही देखते हिन्दी पखवाड़े का सत्यानाश करने की ऐसी ढेरों तरकीबें चारों ओर से सुनाई देने लगी। कोई बोला पतंगबाजी करवालो। कोई रंगोली प्रतियोगिता की सलाह दे रहा था। किसी एक की मंशा थी कि कहानी, कविता, गीत, निबन्ध, वाद-विवाद प्रतियोगिता रखी जाए, परंतु खेलकूद प्रेमियों की ओर से उन्हें निरन्तर विरोध सहना पड़ रहा था। इस मामले में खेल प्रेमी उन्हें पीटने की तैयारी में भी दीख रहे थे जो बार-बार नीरस किस्म के प्रस्ताव देकर माहौल खराब कर रहे थे।
अचानक एक नौजवान उत्साह से उछलता हुआ बोला-‘‘ऐसा करेंे, लाफ्टर चेलेंज का आयोजन किया जाए, भारतमाता सोसायटी के सब लोग उसमें अपने-अपने आयटम पेश करें। आयटम हिन्दी में होंगे तो हिन्दी डे मन ही जाएगा! एक पंथ दो काज!’’ यह आइडिया फौरन से पेश्तर सबको पसंद आ गया। औपचारिक रूप से सबकी हामी लेने के बाद सभा बरखास्त की ही जा रही थी कि कोई बोल पड़ा-अरे भई यह तो एक ही दिन का प्रोग्राम हुआ, पखवाडे़ के बाकी चौदह दिन क्या भुट्टे भूनोगे ?’’
सबके सिर पर गाज सी गिर पड़ी। कुछ तो चकरघिन्नी हो गए कि हिन्दी पखवाड़ा और भुट्टों का क्या ताल्लुक हो सकता है, तो कई को यह जानकर जोरदार सदमा लगा कि पखवाड़े में पन्द्रह दिन होते हैं, और बाकी चौदह दिन भी टाइम खोटी करना पड़ेगा। चकल्लस फिर शुरू हो गई-‘‘ऐसा कैसा चलेगा!’’, ‘‘हमको दूसरा कोई काम नही है क्या!’’, ‘‘पखवाड़ा ही मनाते रहेंगे क्या!’’, ‘‘काम पे भी जाना पड़ता है, घर का काम भी देखना पड़ता है!’’, अन्तिम निर्णायक बिन्दु जो उभरकर आया वह था, ‘‘भाड़ में गई तुम्हारी हिन्दी, हिन्दी दिवस और हिन्दी पखवाड़ा!’’
जनता का मूड़ भाँपकर आखिरकार बंगाली बाबू खड़े हुए और उन्होंने बिना कोई भूमिका बाँधे मीटिंग का समापन भाषण प्रारंभ कर दिया-‘‘भाइयों, आज का मीटिंग जिस आजेन्डा के वास्ते बुलाया गिया था, सोबने बिचार कोर के देखा कि ये हिन्दी पोखवाड़ा, हिन्दी डे भारतमाता सोसायटी का बोस का बात नहीं हाय, इसके पीछे फालतू टाइम खोटी कोरके कुछ फैदा नहीं। इसलिए सब लोग को मीटिंग में आना  का वास्ते होम धोन्यबाद देता है। अब होम ओध्यक्ष का परमीशन से आजेंडा चेंज करता हाय। दुर्गा पूजा सीर पर हाय, सोब लोग खाली एग्यारासो-एग्यारासो रूपिया चान्दा देगा, बाकी सोब काम होम, होमारा घोरवाली और होमारा खोका-खोकी कोर लेगा। किसी को कोई तकलीफ उठाने का जरूरत नहीं, सोब लोग आपना आपना घोर में आराम से रेहने का, खाली आरती का टाइम में ताली बजाने का वास्ते आने का।’’
सभी लोगों को बंगाली बाबू का प्रस्ताव बेहद पसंद आया उन्होंने जबरदस्त उत्साहवर्धन करते हुए जोरदार तालियाँ बजाईं और सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित कर दिया। इस तरह हिन्दी पखवाडे़ की एक महत्वपूर्ण बैठक समाप्त हो गई।
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हास्‍य-व्‍यंग्‍य पञिका अट्टहास के सितम्‍बर 2011 के अंक में प्रकाशित

17 comments:

  1. हा हा हा बहुत उम्दा व्यंग्य है, आभार
    हिन्दी दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनायें एवं बधाई

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  2. bahut tikha vyang hai us pr aapne alag alag prant ke logon ki hindi ka jo dhrishya khicha hai kamal hai aapne sunder tarike se likha hai
    saader
    rachana

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  3. hahhahaaaaaa... waah...
    jabardas... jabarjast...
    kya kataksh kiya hai Uncle...
    sahi hai...

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  4. सबकी अपनी अपनी हिन्दी।

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  5. चलो जैसी भी सही... बात तो हिंदी में ही की इन सबने:)

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  6. हा हा!! सन्न्नाट के भी ऊपर....सन्न्नाटम!!...जिओ...व्यंग्याधिश!!!

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  7. बेचारी मात् भाषा
    हिंदी ने लागाई भारत की सभी भाषाओं पर व्यंगात्मक बिंदी

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  8. उड़न तश्तरीजी ने आपको व्यंगाधीश की उपाधि दे दी। सचमुच आप उसके अधिकारी हैं। बहुत बढ़िया लिखा, बधाई हो।

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  9. Pramod ji,
    hindi pakhwada sach mein ek aupchaarika hai. din ba din hindi ka samman ghat hin raha hai. ab to hindi bolne wale ko heen drishti se dekha jaane laga hai. kisi bhi praant ke log hon hindi zaroor aani chaahiye, jab english seekh sakte to hindi kyo nahin? lekh ke ant mein jis tarah se bengali babu kee baat par logon kee sahmati hoti hai, is lekh ka sabse mahatwapurn paksh hai. dhaarmik aayojan ke liye log saharsh raaji bhi hai aur chandaa bhi dene ko taiyaar hain, lekin hindi pakhwada ke liye ek din ki baithak bhi logon ko bhaari lagta hai.
    bahut achchha kataaksh likha hai aapne, bahut badhai.

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  10. समीर जी (उड़न तश्‍तरी) एवं सुरेश ताम्रकार जी, वैसे तो मैं व्‍यंग्‍याधीश की उप‍ाधि के काबिल नहीं हूँ, फ‍िर भी आप लोगों ने इस लायक समझा इसके लिए पार्टी तहे दिल से आपका शुक्रिया अदा करती है।

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