Thursday, October 20, 2011

गली –गली में चोर है


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//            
हमारे शहर में एक फिलिमकी शूटिंग चल रही है, ‘‘गली-गली में चोर है’’डायरेक्टर’, स्क्रिप्ट रायटर शहर के ही है और शहर के गली कूचों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, इसलिए यकीन करने का जी चाहता है कि ज़रूर होंगे चोर गली-गली में, मगर देश में इतनी गलियाँ हैं, कौन गली वाला बर्दाश्त करेगा कि कोई उसे चोर कहे।
डाइरेक्टर साहब पान खाने के लालच में शहर की एक गली के मुँह पर पनवाड़ी के यहाँ आ खड़े हुए, कि मौका ताड़कर दो-चार शोहदों ने उन्हें धर दबोचा- कोखाँ, कौन सी गली में चोर है ?
डायरेक्टर साहब सकपकाए, बोले-वो तो फिलिम का नाम है गली-गली में चोर है।
शोहदे बोले-वोई तो पूछ रिये हैं, बताओ कौन सी गली में चोर है.....?
डायरेक्टर समझाने की कोशिश करते हुए बोले- मियाँ, चोर इधर-किधर गली में नहीं, वो तो.......
शोहदे हथ्थे से उखड़ते हुए बोले-वो तो तो तो तो क्या कर रिया है! दुनिया भर में चिल्लाता फिर रिया है, गली में चोर है, गली में चोर है, हम क्या तुझे चोर नज़र आ रिये हैं ? मुल्क में गलियों में रहने वाले लाखों लोग क्या चोर हैं?
डायरेक्टर बगले झाँकने लगे- भाई, मेरा वो मतलब नहीं था.....
शोहदे कमीज़ की बाहे चढ़ाते हुए बोले-वो मतलब नहीं था तो क्या मतलब है! तुझे पता है तो बता कौन-कौन सी गली में चोर है, और कौन-कौन चोर है। खामोखाँ चोर-चोर चिल्ला रिया है, पुलिस वाले गलियों की धूल उड़ाते फिरेंगे, हम जैसे शरीफों को परेशान करेंगे। तुम तो फिलिम बनाकर चलते बनोगे, हमारी मुसीबत हो जाएगी। तुम तो चलो कोतवाली और लिखकर दो कि कहीं किसी गली में चोर नहीं है मैं तो यूँ ही गप्प मार रिया था।
डायरेक्टर साहब कोतवाली के नाम से थोड़ा सहम गए, बोले-भाई मिया, मैं तो डायरेक्टर हूँ, मेरी कोई गलती नहीं है। वो तो राइटर है कम्बख्त, उसी ने रखा है यह ऊलजुलूल नाम, गली-गली में चोर है। आप परेशान न हो मैं राइटर को भेजता हूँ कोतवाली।    
शोहदे चिल्लाने लगे-भाड़ में गया रायटर! यह सरासर गलियों की तौहीन है, बेइज्जती है! आपको गलियों में चोर नज़र आ रिये हैं, बड़ी-बड़ी कालोनियों में नहीं नज़र आ रिये। बड़ी-बड़ी कोठियों, हवेलियों, ऊँची-ऊँची गगनचुंबी बिल्डिंगों में नहीं नज़र आ रिये चोर। उधर तिहाड़ में जो इतने बड़े-बड़े चोर बैठे हैं वो कौन सी गली में रहते हैं ज़रा बताना! यही तो बदमाशी है तुम लोगों की हवेलियों के चोरों को भूल जाओ और गलियों के चोरों के पीछे पड़े रहो। हम कुछ नहीं जानते, आप तो हमें उन गलियों और चोरों के नामों की लिस्ट दो या फिर अपनी फिलिम का नाम बदलकर ‘‘हवेलियों-हवेलियों में चोर है रखो’’
डायरेक्टर साहब को अपनी फिलिम की रीलें हमेशा के लिए डिब्बे में बंद होती नज़र आने लगी। अगर हवेलियों हवेलियों में चोर है फिल्म बनी तो फिल्म बनाने के लिए पैसा कौन देगा। उन्होंने मुँह में एक पान दबाया और पतली गली से खिसक लिए। 

2 comments:

  1. सत्य तो अधिक बिकता भी नहीं है।

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  2. " कोखाँ, कौन सी गली में चोर है ?"

    वाह! मजेदार और तेज़ धार

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