Tuesday, May 15, 2012

अगले आम चुनाव का मुद़दा - बोरियॉं

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 
देश में आए दिन किसी न किसी चीज़ का अभाव हो जाता है, आजकल बोरियों का अभाव चल रहा है। किसानों को बोरियाँ नहीं मिल पा रही है नतीजतन गेहूँ का बफर स्टॉक अपनी जन्मभूमि पर पड़ा पानी से सड़ने की कगार में है। बोरी इस समय किसान के मौलिक अधिकार के रूप में उभर कर सामने आई है जिसे पाने के लिए किसान जान हथेली पर लेकर संघर्षरत है सोच रहा है, शायद इस रास्ते से उसे सचमुच बोरी मिल ही जाएगी! हम देख रहे है कि उसे बोरियों की जगह गोलियाँमिल रही हैं।
बोरियों का यह अभाव फिलहाल सिर्फ मध्यप्रदेश में ही देखा जा रहा है सम्भव है कुछ दिनों में यह पसर कर देश व्यापी हो जाए। केन्द्रहमारी बोरियों की तरह देश भर की बोरियों पर कुंडली मारकर बैठ जाए। एक बात समझ में नहीं आ रही है कि डनलप के मोटे-मोटे गद्दे उपलब्ध होने के बावजूद केन्द्रआखिर राज्यों की बोरियों पर कुंडली मारे क्यों बैठा है! देश को पहली बार पता चला कि राज्यों को खाली बोरियों की सप्लाई केन्द्र करता है। ताज्जुब की बात है, देश में कितनी सारी महत्वपूर्ण चीज़ों का उत्पादन और सप्लाई केन्द्र ने प्रायवेट सेक्टर को दे दी है, मगर बोरी जैसी टुच्ची चीज़ की सप्लाई की जिम्मेदारी वह अपने मथ्थे धारण किये हुए है।
प्रश्न है कि आखिर केन्द्र हमें बोरियाँ दे क्यों नहीं देता। इतनी सारी बोरियों का क्या वह अचार डालेगा। केन्द्र ने कभी सोचा है कि इतनी सारी बोरियों का अचार डालने के लिए कितनी बरनियों की ज़रुरत पड़ेगी। इतनी बरनियों की व्यवस्था आखिर केन्द्र कहाँ से करेगा। यदि बरनियों की व्यवस्था न हुई तो डला-डलाया अचार बरबाद हो जाएगा। केन्द्र को यह नहीं भूलना चाहिये कि बारिश तो आखिर दिल्ली में भी आएगी। अगर उसने बोरियाँ नहीं दी तो जिस तरह हमारा गेहूँ सड़ेगा उसी तरह उनका बोरियों का अचार भी सड़ेगा। भीगा गेहूँ खरीदने की घोषणा तो हमारे यहाँ हो ही चुकी है, ईश्वर ने चाहा तो सड़ा गेहूँ खरीदने की घोषणा भी शीघ्रातिशीघ्र हो जाएगी। हमारा माल तो इस तरह ठिकाने लग ही जाएगा मगर तुम्हारा भीगी बोरियों के अचार का क्या  होगा सोचा है कभी! शराफत इसी में है कि केन्द्र हमें बोरियाँ दे दे, हम भी नहीं चाहते कि हमारा गेहूँ खुले आसमान के नीचे सड़े, बोरियों में सड़ेगा तो सुविधाजनक रहेगा।
            देखा जाए तो यह तो दलालों के किस्म की हरकतें हैं। दलालगण किसी चीज़ को दबाकर फिर दनादन मुनाफा कूटते हैं। बोरिया अगर खुले बाज़ार में मिल रही होती तो संभव था दलाल बोरियों का कृतिम अभाव पैदा कर, गेहूँ के भीगने-सड़ने का डर पैदाकर औने-पौने दामों में माल खरीद लेते। यही हरकतें केन्द्रकर रहा है। ऐसी ओछी हरकते किसी भी देश के केन्द्र का शोभा नहीं देती। जल्दी से जल्दी हमें बोरियाँ पहुँचा दो, वर्ना अगले आम चुनाव का मुद्दा और कुछ नहीं बोरियाँ होंगी। 

4 comments:

  1. खून-पसीने से उगाया थे , गेंहू के सुनहरे दाने
    अब सरकार कहती सड़ने , क्योंकि नही है बारदाने
    नही है बारदाने , अब कहाँ लगाये इन्हें ठिकाने
    लगता है फंसी लगा ले , कैसे पिए अपमान के पैमाने
    -मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

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  2. सर आप तो कमाल लिखते हैं। शायद मुझे कहने की जरूरत नहीं। मगर हाजिरी तो लगानी पड़ेगी न।

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    1. शुक्रिया हैप्‍पी जी।

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  3. यहाँ तो अधिक पैदावार भी समस्या है।

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