Tuesday, August 5, 2014

कच्चे-चिट्ठों की किताब



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
सोचता हूँ जल्दी से जल्दी एक आधुनिक छापाखाना और प्रकाशन संस्थान खोल लूँ, इस धंधे का भविष्य उज्वल होता दिखाई दे रहा है। लोग मोटी-मोटी किताबों की शक्ल में आरोपलगाने लगे हैं। और तो और इन आरोपों की किताब के प्रत्युत्तर में प्रत्यारोपों की किताब भी लिखने की तैयारियाँ चल रही हैं। इसी मौके को कहते हैं हींग लगे न फिटकरी फिर भी रंग चोखा। अपन को कुछ करना नहीं है, बस बैठकर किताब पर किताब छापते जाना है। खरीदने वाले मूर्खों की तो कोई कमी है ही नहीं अपने देश में! लिखने वालों के चमचे और राजनैतिक गासिप प्रेमी ही इतनी किताबें खरीद लेंगे कि अपने तो वारे-न्यारे हो पडेंगे।
देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी के ठोस परिणाम सामने आने लगे हैं। लोग किताब भर-भर के आरोपों की अभिव्यक्ति करने लगे हैं और उतनी ही मोटाई में रेडीमेड प्रत्यारोप या उत्तर का मैटर उपलब्ध कराने लगे हैं। पहले की तरह नहीं कि किसी ने चोरकह दिया तो चुप लगा कर कोप भवन में जा बैठे। या, प्रत्युत्तर में ज़्यादा से ज़्यादा ज़्यादा से ज़्यादा बीवी-बच्चों की कसम खा ली, मामला खत्म। आजकल तू चोरके आरोप का-तेरा बाप चोर’, ‘तेरा दादा चोर’, ‘तेरा काका-मामा-नाना चोरआदि-आदि की व्यापक रेंज में जवाब देने का प्रचलन प्रारम्भ हो गया है। इस नवाचार में जेट गति की कल्पनाशीलता, अभिव्यक्ति की भीषण आज़ादी और लेखन क्षमताओं के क्रांतिकारी विकास के प्रताप से पुस्तक व्यवसाय की चाँदी होने की संभावनाएँ बन पड़ी हैं। जब लिखने और छपने के धंधे में सौ-सौ हाथों वाले आ रहे हैं तो समझदारी इसी में है कि अपन दो हाथों वाले शराफत से छापने और बेचने के धंधे में लग जाएँ, इसी में सार है।
इधर कोर्टों में अपराधियों पर पन्द्रह-पन्द्रह हज़ार पेजों के आरोप पत्र प्रस्तुत करने का चलन देखने में आ रहा है। अपराधियों की ओर से उनका उत्तर कम से कम चालीस-पचास हज़ार पृष्ठों में तो दिया ही जाता होगा! लेखन की ऐसी प्रचंड परम्परा टाइपिंग के कागज़ों में सड़-गल जाए इससे अच्छा तो इन्हें बढियाँ ग्लेज़्ड पेपर पर हार्ड बाउन्ड किताब की शक्ल में प्रस्तुत करने की बाध्यता माननीय कोर्ट लागू कर दे, तो यह कचरा सदियों तक सुरक्षित भी रहे और हम नवमुद्रक-प्रकाशकों की पाँचों उंगलियाँ घी और सर कढ़ाई में तर जाए। हम इस मौलिक बौद्धिक संपदा को हज़ारों की तादात में किताबों की शक्ल देकर देश की कोने-कोने में पहुँचा देंगे, जिससे कई लोग प्रेरणा ले सकेंगे और शोधार्थियों का भी लाभ होगा।
इस नवीन परम्परा से उन लिख्खाड़ों का भी काफी फायदा होगा जो मौलिक चिन्तन-मनन के अभाव में हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं। कुछ नहीं तो वे ऐसे महानुभावों-महानुभाव्याओं के कान्ट्रेक्ट लेखक बनकर उनकी भावनाओं की कालिख से कागज़ काले कर अपनी रोजी-रोटी सम्हाले लेंगे।
कुछ भी कहिए, जो होता है अच्छे के लिए ही होता है। लोग दनादन एक दूसरे के कच्चे-चिट्ठों पर किताब लिखें, आरोप लगाएँ, जवाब दें, हमारा छापाखाना और प्रकाशन संस्थान दिन दूनी रात चौगूनी तरक्की करें।      
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10 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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    1. हमें तो नहीं दिखाई दी जी।

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  2. छपने से पहले हिट होने का प्रचलन जोरो पर हैं। क्या लिखा है यह मायने नहीं रहा। । खैर जब माकूल काम नहीं होता है तो ऐसा ही सूझता है लिखने बैठ गए किताब। …
    बहुत सटीक व्यंग प्रस्तुति

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  3. बहुत खूब--सच्चा झूठ.
    कुछ ना कुछ तो चाहिये ही---आदत से मजबूरी है---कतर-ब्योंत करने की.
    जब दो कदम पीछे-पीछे चलते हैं हाथ बांधे---जब धकिया दिये जाते हैं---बेचारे.

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  4. Bahut khoob bahut dini baad padha apko achha laga

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    1. बहुत-बहुत शुक्रिया निर्मला जी।

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  5. वैसे विचार बुरा नहीं है… :)

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    1. आप भी विचार कर सकती हैं।

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  6. वाह...क्या कहने।
    बहुत बढ़िया।

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    1. बहुत-बहुत शुक्रिया शास्ञी जी।

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