शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सवाल पूछने का सवाल

// व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

कोई माने या न माने पढ़ाई-लिखाई का सीधा संबंध सवाल से है। आपने अगर ज़रा भी पढ़ने-लिखने की ज़हमत उठाई है तो फिर आपको सवालों से रूबरू होना ही पड़ेगा और उनके जवाब भी देना पड़ेगा। लेकिन आजकल कुछ लोग सवाल पूछने पर बुरी तरह बिदकने लगे हैं। सवाल-जवाब के सार्वजनिक मंच छोड़कर भागने लगे हैं। जैसे सवाल न हों बर्र या ततैया हों और अपने तीखे डंक में धार लगाकर मारने के लिए दौड़ी चली आ रहीं हों । उसपर सवाल पूछने वाले के साथ चारों तरफ जैसा शत्रुतापूर्ण माहौल बना दिया जाता है उससे ऐसा लगने लगा है कि जल्‍द ही इस देश में सवाल पूछने को दुर्दांत अपराध माना जाने लगेगा। सवाल पूछने वाले को देशद्रोही घोषित कर जेल भेज दिया जाने लगेगा।

परम्पराएँ प्रचलन में आती हैं तो फिर स्थापित होती चली जाती हैं। सोचिए कि कहीं स्कूल में बच्चे से सवाल पूछने के जुर्म में उनके अभिभावक मास्टरजी के ऊपर मानहानि का मुक़दमा ठोकने लगें तो? जैसे बच्‍चे को एक थप्‍पड़ भर पर कई माँ-बाप, जो ख़ुद मास्‍टरों से पिट-पिट कर ही बड़े हुए होते हैं, मास्टर जी पर कार्पोरल पनिशमेंट के आरोप में जुवेनाइल जस्टिस एक्‍ट के अन्‍तर्गत एफ.आई.आर दाखिल करवा देते हैं वैसे ही सवाल पूछने पर थाना-पुलिस होने लगे तो ? राजनीतिज्ञों की सवालों से भागने बिदकने की प्रवृत्ति बच्चों तक आने में कितनी देर लगेगी । कभी न कभी आ ही जाएगी। आखिर राज‍नीतिज्ञ ही तो हमारे मार्गदर्शक दिशादर्शक हैं । मास्टर जी सवाल करेंगे और बच्चे बिदक कर अपने माँ-बाप को बुला लाएँगे। या हो सकता है बच्‍चे मास्टर जी को क्‍लास में ही कूट कर सवाल पूछने के अपराध का दंड देना शुरू कर दें।

इसका उल्टा भी हो सकता हैं। कुछ बच्चे सवाल पूछ-पूछ कर मास्साब का जीना हराम किये रहते हैं। तो हो सकता है मास्टर जी बच्‍चों के सवाल पूछने पर भाग कर प्रिंसिपल के पास पहुँचने लगें और ऐसे सवालखोर बच्चों को स्कूल से निकालने की सिफारिश करने लगें ? बदले माहौल में स्कूलों की दीवारों पर शिक्षाप्रद कोटेशंस के स्थान पर स्कूल प्रबंधन की धमकियाँ लिखी जाने लगे तो कोई आश्‍चर्य नहीं ? जैसे- कक्षा में सवाल पूछने पर दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी’, या मास्टर जी से व्यर्थ सवाल न पूछकर अनुशासन बनाए रखे’, या नो सवाल नो बवाल’, या सवाल पूछकर अपना और मास्टरजी का समय नष्‍ट न करें’, या सवाल पूछने वाले छात्रों को मुर्गा बनने की सज़ा दी जाएगी’, या सवाल पूछने पर स्कूल निकाला दे दिया जाएगा’, वगैरह वगैरह। क्या हो अगर सवाल पूछना सम्‍मान को ठेस पहुँचाने वाला सवाल हो जाए। ऐसा हुआ तो कोई किसी से सवाल ही नहीं पूछ सकेगा और न किसी को कोई जवाब देने की ज़रूरत भी होगी। यह राष्‍ट्रीय पटल पर कितनी सुविधाजनक परिपाटी होगी। दुनिया भर का भ्रष्‍टाचार करो, चुनाव चुरा लो, लोकतंत्र को डकार जाओ न कोई सवाल पूछकर बवाल करेगा न किसी के प्रति जवाबदेही होगी।

हमारे सौभाग्‍य से विधानमंडलों, विधानसभाओं, राज्यसभा, लोकसभा में सवाल पूछे जाने की परंपरा अब तक जीवित है। संबंधित विभाग के अफसर मंत्री पूरी लगन से झूठा-सच्चा ही सही मगर बड़े तगड़े होमवर्क और सैकड़ों गोपालगाँठों के बाद आखिर जवाब दिया करते हैं। जवाब पर फिर सवाल, और फिर जवाब, फिर सवाल फिर जवाब का एक सिलसिला सा चलता रहता है जिससे लोकतंत्र के चलायमान होने का आभास होता रहता है । क्या पता किस दिन एक विधेयक अथवा अध्यादेश लाकर इस परंपरा का दाहसंस्कार कर दिया जाए और सवाल पूछने वालों को राजद्रोही घोषित करने का राजधर्म निभाना शुरू कर दिया जाए।

क्या हो अगर देश भर में किसी भी स्कूल कॉलेज के किसी भी स्टैण्डर्ड के किसी भी इम्तिहान में सवाल पूछ कर परीक्षा लेने की परिपाटी एकदम बंद कर दी जाए और पढ़ने-लिखने को भी निंदनीय कर्म माना जाकर वर्णव्यवस्था में शूद्रों से भी निम्न कोटि की एक नई जाति बनाकर सवाल पूछने को निकृष्‍ट कर्म घोषित कर दिया जाए, सवाल पूछने वाले को अछूत माना जाने लगे। कोई अचरज नहीं होगा कि किसी से सवाल पूछे जाने पर उसकी घोर मानहानि हो पड़े, बल्कि सवाल पूछते सुन भर लिए जाने से लोगों की भावनाएँ ही आहत हो जाएँ और वह लाठी डंडे की सहायता से सवाल पूछने वाले की सारी जिज्ञासाएँ शांत कर दे। सवाल से बिदकने वाले बेख़ौफ़ दबंगई से घूमें-फिरें और सवाल पूछने वाले की हमेशा घिग्घी बँधी रहे।

वो दिन दूर नहीं जब सवाल विरोधी लोग पुस्तकें और अखबारी आलेख लिखेंगे- सवालों से कैसे बचें’, ‘सवाल को टल्‍ला कैसे मारें’, या सवालों का प्रतिकार कैसे करें।  मोटिवेशनल स्पीकर स्पीच देंगे- सवालों से कैसे भगें’, ‘सवालों से कैसे चिड़ें’, ‘सवालों की परवाह छोड़ें आदि।  धर्म गुरुओं के प्रवचन का विषय होगा- सवाल मुक्ति और मानसिक शांति’, या सवालों से बचो या सवाल पूछने वाले का नाश हो आदि आदि। ट्रक वाले अपने ट्रकों के पीछे लिखवा कर चलेंगे- सवाल पूछने वाले तेरा मुँह काला’, ‘सवाल पूछने वाले बच्‍चे तेरे जीये, बड़े होकर तेरा खून पीये’, ‘चुप रहोगे तो बार बार मिलोगे, सवाल पूछोगे तो हरिद्वार में मिलोगेवगैरह ।

बहरहाल, सवाल पूछना एक बड़ा टेढ़ा सवाल हो गया है। सवाल पर इतने सवाल उठने लगे हैं कि ऐसा लगता है आने वाले कुछ समय बाद सवाल नाम की बला ही इस दुनिया से रुख़सत हो जाएगी। दुनिया की कोई भी गतिविधि, कारोबार, क्रियाकलाप, वाद-विवाद, ज्ञान-विज्ञान-अज्ञान, रहस्‍य सब कुछ सवालों के दायरे से वाहर हो जाएगा। सवाल का अस्तित्‍व ही दुनिया से समाप्‍त हो जाएगा। और जब सवाल ही नहीं रहेगा तो न जवाब रहेगा और न जवाबदेही ही रहेगी। इससे बढ़िया व्‍यवस्‍था और क्‍या हो सकती है।

-०-