Wednesday, October 6, 2010

भारतीय संस्कृति का हैवी डोज़


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
नईदुनिया में प्रकाशित व्यंग्य
     हम समालोचक थे इसलिए बच गए, मगर दीगर आलोचकों पर बुरी बीती। कॉमनवैल्थ खेलों का भव्य उद्घाटन समारोह देखकर सभी तमाम कट्टर आलोचक पहले तो दाँतों तले अपनी ऊँगलियाँ चबा-चबाकर लोहू-लूहान करते रहे, फिर अपना सिला हुआ मुँह लेकर टी.वी. के सामने बैठ गए और भारतीय संस्कृति के भारी भरकम मुजाहिरे को विस्फारित नेत्रों से घूरते रहे। उनमें कुछ निश्चित ही ऐसे रहे होंगे जो टी.वी. में घुसे यह देखने का प्रयास कर रहे होंगे कि समारोह स्थल पर कहीं किसी दीवार का प्लास्टर झडे़, कोई टाइल्स टूटे, बालकनी या छत का धप्पड़ गिरे तो हम अपने सिले हुए मुँह के टाँके तोड़कर चिल्लाते हुए सड़क पर निकल आएँ - ओय ओय असफल हो गया, कॉमनवैल्थ असफल हो गया। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, उद्घाटन समारोह जिस स्टेडियम में हुआ उसका कुछ नहीं गिरा। नतीजतन अगले दिन सारे आलोचक अपने सिले हुए मुँह के टाँकों की ड्रेसिंग कराते हुए मिले, ताकि कहीं पक ना जाएँ। ये सब अगले ग्यारह दिनों तक ऐसे ही ड्रेसिंग कराते रहेंगे, बशर्ते सब कुछ सफलतापूर्वक ठीक-ठाक निबटता चला जाए। अगर कहीं ज़रा सा मीन-मेख उन्हें मिल गया तो फिर समझ लीजिए, ये फिर बीच खेल में अपने सिले हुए मुँह के टाँके तुड़ाकर चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देंगे- ओय ओय असफल हो गया, कॉमनवैल्थ असफल हो गया।
          कामनवैल्थ आयोजन के भारतीय योजनाकारों को भी मानना पडे़गा, बड़े दूरदर्शी हैं। एक तो छह सौ उन्नीस सदस्यों का भारी-भरकम दल बाकी देशों की छाती पर मूँग दलने के लिए रख छोड़ा, जीतो बेटा कैसे जीतते हो, ऊपर से पहले ही दिन भारतीय संस्कृति का ऐसा हैव्वी डोज़ दुनिया भर के खिलाड़ियों को पिला दिया कि वे अब चार-छः दिन होश में आने से रहे। होश में आ भी गए तो ढंग से खेल भी पाएंगे इसमें शक है। भारतीय संस्कृति की डोपिंग सी हो गई है दिमाग में। भारतीय खिलाड़ी तो कई सालों से अपनी संस्कृति को झेलते आ रहे हैं, सो उन्हें तो आदत है, नतीजतन अब खेल मुकाबलों में भारतीय संस्कृति के ओव्हर डोज़ से पस्त पड़े अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को जगह-जगह पछाड़कर ज़्यादा से ज़्यादा मेडल झोली में डालना आसान हो गया है। जहाँ कोई दूसरा जीतता हुआ दिखाई दे तो चीयर गर्ल्स की तरह भरत नाट्यम की दसेक नृत्यांगनाएँ स्टेडियम के कोने में नचाकर उसकी हिम्मत पस्त की जा सकती है।
          बचा-खुचा काम भारतीय खान-पान करने वाला है। जलेबियाँ, रसगुल्ले, बूँदी के लड़डू खिलाकर सबका वजन बढ़ा दिया जाए फिर ओव्हर वेट घोषित कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए, कैसा रहेगा। भकोसकर छोल-भटूरे, आलूबडे़-समोसे और बेसन के खाद्य पदार्थ अन्तराष्ट्रीय खिलाड़ियों को यदि खिला दो तो वे सुबह-सवेरे जल्दी स्टेडियम ही ना पहुँच पाएँगे। हमारे खिलाड़ियों को तो पता है कि इसप घोल की भूसी क्या होती है, वे सबसे पहले जाकर ट्रेक पर खड़े मिलेंगे और जीत आसान हो जाऐगी।
          तो इस तरह साबित हो रहा है कि भारतीय संस्कृति बड़े काम की चीज़ है। कम से कम हमारे देश में होने वाली अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अव्वल आने में तो मदद कर ही सकती है। पसीने की कमाई का सत्तर हज़ार करोड़ फूँककर हम अगर इतना भी नहीं कर पाए तो लानत है कामनवेल्थ आयोजन समिति पर।

4 comments:

  1. dear pramod da , praja kitni bhi chillati rahi par raja to raja hai. kanoon bhi uska sarkar bhi uski, usko puri chhot hai , vese bhi kanoon bhi andha hai, sarkar bhi,birodhi dal ka raja bhi , or janta bhi , mera bharat mahan , jai ho ,jai jawan and jai kisan , raja hai mast praja hai paresan.

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  2. ... समसामयिक व्यंग्य !

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  4. बिल्कुल सही पकड़ा अब नरेन्द्र मोदी जैसे मुँहफट देश के प्रधानमंत्री से झाड़ू लगवाने के बाद भी स्टेडियम तैय्यार न होने की बेबकूफी की बात तो नहीं कह सकेंगे।

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