Wednesday, January 26, 2011

सब भाई लोग को रिपब्लिक डे का बधाई

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            26 जनवरी। गणतंत्र दिवस। ‘गण’ बोले तो पब्लिक, अख्खा पब्लिक, गरीब-अमीर, दानी-भिकारी, चोर-साहूकार, गुंडा-पुलिस, नेता-वोटर, व्यापारी-ग्राहक, किसान-ऋणदाता, पार्टी-दलाल, कार्पोरेट जगत और आम पब्लिक, आम पब्लिक और माफिया, सब भीड़ूलोग का रिपब्लिक बोले तो गणतंत्र।
          अभी क्या है कि अँग्रेज लोग अपन को छोड़के किधर तो भी भाग गिया, तो अपुन अलग-अलग जात का लोग, अलग-अलग भाषा का लोग, अलग-अलग फिरका का लोग, अलग-अलग कल्चर वाला सब एकट्ठा होकर अपना रिपब्लिक बनाया। आपस में लड़ने का, भिड़ने का, गाली-गुफ्तार करने का, एक-दूसरे का घर में आग लगाने का, पर एक रिपब्लिक का जैसा रहने का। अपना पब्लिक लोग का किछु भी हाल होवे, होने देने का पर बिल्कुल एक शाणा-समझदार पब्लिक के जैसा बिहेव्ह करने का।
          इधर रिपब्लिक डे को सब सरकार लोग फंक्शन करता। सेन्ट्रल गवर्नमेंट वाला उधर दिल्ली में और स्टेट गवर्नमेंट वाला अपना स्टेट में एक बड़ा सा मैदान में लेफ्ट-राइट परेड करता है। सब डिपार्टमेंट वाला पैसा खर्च करके अपना-अपना झाँकी बनाता है और अख्खा दुनिया को दिखलाता है। रंग-बिरंगा झाँकी में सब पुतला लोग डाँस करता है। पिच्छु बासठ साल में अपुन क्या-क्या किया सब झाँकी दिखाता है। अभी हम बोलता है कि वो सब तरक्की का बात पुराना हो गिया, अभी कुछ नया करने को माँगता है।
          हम आइडिया देता है। मेंगाई का पुतला बिठाने का, पीछु ट्रालर पर कांदा-लस्सुन, सब भाजी-पाला, दाल-तेल वगैरा-वगैरा का बड़ा-बड़ा मॉडल बनाकर दुनिया दिखाने को माँगता है, कि भई अभी देख लो पीछु देखने को नई मिलेंगा। करप्शन का पुतला बिठाने को माँगता है कि देखो रे हम दुनिया का दूसरा किसी भी करप्ट मुलुक लोग से पीछु नई है। पुतला का एक टाँग बड़ा-बड़ा ‘खोखा’ ‘पेटी’ पर जोर से जमेला होएँगा जिसमें से हज़ार-हज़ार का नोट इधर-उधर निकल कर पड़ा रहेंगा। एक झाँकी आदर्श बिल्डिंग का होएँगा, एक झाँकी बड़ा अंबानी भाई का मल्टी स्टोरीड हाउस का रहेंगा, एक झाँकी स्विस बैंक में जमा हमारा रुपी को माउँट एवरेस्ट जैसा पहाड़ का माफिक जमाकर दिखाने का और साथ में हमारा गवर्नमेंट दिखाने का जिसका मोह में मेडीकल टेप चिपकेला है।
          हम लोग का गरीबी, भुकमरी, बेरोज़गारी, बीमारी, कुपोषण, पढ़ाई-वढ़ाई किसान भाई लोग का सब प्रोबलेम अभी साल्व हो गएला है, इसलिए हम लोग अभी पेट भर के करप्शन करने में लग गएला है। सब टाइप का करप्शन इधर मँगता है तो देखने को मिलेंगा। अभी क्या करने का ! अँग्रेज लोग अपन को छोड़ के किधर तोभी  भाग गिया, तो अब इतना बड़ा रिपब्लिक का कामकाज तो चलानाइच माँगता है ना। इकनामिक प्राबलम सब कार्पोरेट वाला लोग सम्हालता है, करप्शन का काम गवर्नमेंट सेक्टर देखता है, चोर-डाकू-पुलिस लोग सब अपना-अपना काम करता है, गरीब लोग सब भूखा मरने का काम करता है। ऐसा मिलजुलकर हम अपना रिपब्लिक चला रहेला है। सब भाई लोग को रिपब्लिक डे का बधाई, शुभकामना बोलता है।

Sunday, January 16, 2011

भगवान सचिन तेंदुलकर की जय हो


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          बाईस गज की दूरी से, धीमी, मध्यम अथवा तेज गति से फेंकी जा रही किसी गोल वस्तु को, मोगरी सदृष्य किसी काष्ठ पट्टिका से पीट-पीटकर, परस्पर आमने-सामने स्थित तीन गिल्लीधारी काष्ठ स्तंभों के मध्य त्वरित दौड़ लगाकर अथवा काष्ठ पट्टिका के शक्तिशाली प्रहार से उस गोल वस्तु को निरन्तर मैदान की सीमा के पार पहुँचाकर अपने नाम के आगे संख्यांकों का अम्बार लगा लेना मानव जाति के लिए कितनी महान और महत्वपूर्ण गतिविधि है, यह हमें हाल ही में पता चला है, जब एक गबरु नौजवान, जिसके सामने पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनने की बाध्यता कभी नहीं रही, चमड़े के एक ठोस गोले को पीट-पीटकर एक महान विभूति, इतिहास पुरुष यहाँ तक की भगवानकी श्रेणी में पहुँच गया। आम भारतीयों की तरह ही लघु कद के इस नौजवान ने भाग-भागम के पाँच सौ शतकों का लम्बाचैड़ा कीर्तिमान रचकर देश और दुनिया में महानताहासिल करने के लिए किये जा रहे दूसरे तमाम भगीरथ प्रयासों को ठेंगा दिखा दिया है।
          देखा जाए तो बरसों-बरस से लोग भाँति-भाँति की चीज़ों को पीट रहे हैं और पचासों स्तंभों के मध्य दौड़ लगा रहे हैं परन्तु पूछताछ की जाए तो उनके अपने घर वाले तक उन्हें महानमानने से साफ इन्कार कर दें, इतिहास पुरुष और भगवान मानना तो बहुत ही दूर की बात हैं। मसलन साहित्य के क्षेत्र में ही ले लें, हम सब जाने ऐसे कितने कवियों को जानते होंगे जिन्होंने कविताओं के जाने कितने सैकड़े जड़े होंगे, और दिन-प्रतिदिन जड़ते ही जा रहे होंगे परन्तु उनका पड़ोसी तक उन्हें ठीक से पहचानता होगा, मुझे शक है। ना जाने कितने कहानीकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार कागज़ काले कर-करके काल-कवलित हो गये, हो रहे हैं और आगे भी होंगे। उनमें से कुछ लोगों को महानभी कहा जाएगा, परन्तु उनकी आदमकद फोटो कभी भी अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर फुल साइज में न तो छपी होगी न छपेगी । और तो और गणना करके देखा जाए तो किसी महान से महान साहित्यकार की तमाम कविताएँ, कहानियाँ, तमाम प्रकाशित-अप्रकाशित किताबों, ग्रंथावलियों की कुल कीमत भी भारतीय रुपयों में भगवान सचिन तेंदुलकर के एक रनकी कीमत से कदापि ज्यादा नहीं हो सकती, यह बात पूरे दावे के साथ कही जा सकती है।
          साहित्यकार क्या! किसी भी क्षेत्र का कितना भी बड़ा रथी-महारथी हो, डाक्टर हो, इंजीनियर हो, मास्टर हो, लेक्चरर हो, प्रोफेसर हो, वैज्ञानिक हो, दुनिया के दूसरे किसी खेल का कितना भी बड़ा खिलाड़ी हो, नेता हो, अभिनेता हो, अपने-अपने क्षेत्र में इन्होंने कितनी भी तीरंदाजी की हो, मगर मजाल है जो कोई भी माई का लाल भगवानसचिन तेंदुलकर से ज़्यादा टी.आर.पी. बटोर पाया हो।
          मजदूरों ने लाख भवन सड़क तामीर कर दिये हों, कल-कारखानों से इफरात उत्पादन बाहर कर दिया हो, किसानों ने मनों-टनों अनाज देश को खिला दिया हो, अफसरों, बाबुओं, चपरासियों ने करोड़ों फाइलें इधर से उधर कर दी हों, फौजियों ने लाख देश सेवा की हो, देशप्रेमियों ने देशप्रेम के तमाम रिकार्ड ध्वस्त कर दिये हों, मगर बंधुओं, भगवान सचिन तेंदुलकर से ज़्यादा बड़ा काम न तो दुनिया में किसी ने कभी किया है न भविष्य में कोई कर पाएगा। इसलिए आइये, सब मिलकर बोलें, भगवान सचिन तेंदुलकर की जय हो। 
नईदुनिया की रविवारीय पत्रिका में दिनाँक 16.01.2010 को प्रकाशित।

Tuesday, January 11, 2011

ठंड के मारे सब सुन्न

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             ठंडको जाड़ाभी कहा जाता है। क्यों, यह अब समझ में आ रहा  है । यह अंग-प्रत्यंग, हर प्रकार के शारीरिक द्रव्य, यहाँ तक कि बुद्धि, तर्क संवेदना, विचार तक को जड़कर देती है, इसलिए। इन दिनों यही हाल है। सुबह-सुबह एक चेला-‘‘सर आजकल कुछ लिख नहीं रहे हैं’’, कहता हुआ चरण छूने की नीयत से शरीर पर शिद्दत से पड़ी रज़ाई हटाकर हमारे चरण ढूँढने के लिए आगे बढ़ा ही था कि मैंने लगभग चीखकर उसे चेतावनी दी-‘‘खबरदार जो पाँव छूने की कोशिश की, मैं आशीर्वाद देने के लिए हाथ रज़ाई से बाहर निकालने वाला नहीं हूँ!’’ चेला परिस्थितियों को समझते हुए खुद ही बोल पड़ा-‘‘समझ गया, समझ गया, आजकल लिख क्यों नहीं पा रहे आप। हाथों में गठान लगाकर रज़ाई में घुसे पडे़ रहोगे तो लिखोगे कहाँ से!’’ मैंने कहा-‘‘ऐसी बात नहीं है! लिख तो फिर भी हम लें, कम्बख्त कलमों में स्याही तक ठंड के मारे जमी पड़ी है।’’
          क्या नज़ारे हैं इन दिनों। बाज़ार जाइये, यूँ तो ग्राहकी कम ही चल रही है, मगर दुकानदार, जो मिले सो ओढ़कर सेन्टाक्लॉज बना बैठा हुआ है या दुकान के बाहर बैठकर आग ताप रहा है। कुछ माँगो तो कहेगा-‘‘नहीं है! अगली दुकान देख लो।’’ आप वांछित वस्तु की ओर उँगली दिखाकर कहोगे-‘‘वह तो रखी है, देते क्यों नहीं!’’ वह कहेगा-‘‘क्वालिटी खराब है, और कहीं देख लो। वाह, क्या बात है! यह तो सरासर रामराज्य सा आ गया। जो काम गाँधी जी से लेकर मौजूदा रामभक्त नहीं कर पाए वह ठंड ने चुटकियों में कर दिया, हालाँकि चुटकियाँ बजने की वस्तुस्थिति है नहीं।
          चोरी-चकारी, नकबजनी, डकैती, लूटमार, पाकेटमारी, चेन स्नेचिंग जैसे गृह उद्योगों की सूचनाएँ आजकल अखबारों से लगभग गायब हैं। आप कह सकते हैं कि ठंड के मारे संवाददाता खबरें नहीं लिख रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे सारे कर्मठ चोर-गिरहकट धंधा-पानी छोड़कर, ठंड के मारे अपने-अपने घरों में दुबके पड़े हैं। कौन निकले घर के बाहर, फालतू अकड़-अकड़ा गए तो! हालाँकि चोरों के सामने सुनहरा मौका है, किसी के सामने उसकी अटैची लेकर भाग जाओ, ठंड के मारे उसके मुँह से आवाज तक न निकलेगी, और यदि आवाज़ निकल भी गई तो पुलिसवाले थाने में ज़ब्त लकड़ी के सामान से जलाए जा रहे अलाव का सुख छोड़कर चोर के पीछे दौड़ने की ज़हमत नहीं उठाने वाले।
          इस कदर महँगाई हो रही है, त्राहि-त्राहि मच जाना चाहिए, मगर मचे कैसे, ठंड ने इंसानी जज़्बातों को काबू में कर रखा है। मंदिरों से घंटे-घड़ियालों की आवाजे़ नहीं आ रही, मज़्जिदों से अज़ानें स्थगित चल रही हैं। जगह-जगह चलने वाले धर्मगुरुओं के प्रवचन बंद हैं। नेताओं के लम्बे-लम्बे भाषण मुल्तवी हैं। जबकि इन दिनों कोई भी चाहे तो भाषणों-प्रवचनों से जनता जनार्दन को आराम से लोहूलुहान कर सकता है, क्योंकि चाहकर भी ठंड के मारे कान बंद करने के लिए उँगली तक नहीं उठाई जा सकती, मगर भाषण-प्रवचन देने के लिए इस कड़ाके के जाड़े में मुँह खोले तो कौन खोले। स्वर नलिका, कंठ इत्यादि सब ठंड के मारे सुन्न पड़े हैं।  
नईदुनिया में दिनाँक 01.01.2011 को प्रकाशित।

Sunday, January 9, 2011

नीलाम-बोली क्रिकेटरों की

    //व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
    भारत में निजीकरण की पराकाष्ठा तो खैर अभी देखना बाक़ी है, फिलहाल तो क्रिकेटरों की खरीदी-बिक्री देखने में सब्जी मंडी का सा आनंद आ रहा है। क्रिकेट से ज्यादा रोमांचकारी खेल आजकल यही लग रहा है। देश के लिये खेलने का दम भरने वाले चोटी के देश-प्रेमी क्रिकेटरों के भावलग रहे हैं, बोलियाँ बोली जा रहीं हैं नीलामी चल रहीं है -ढाई करोड़  एक, ढाई करोड़  दो - तीन करोड़  एक, तीन करोड़  दो………। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में खुले आम नीलाम होते नामचीन खिलाड़ी, मंडी के बैंगनों की तरह खामोश, निर्विकार से अपनी नीलाम-बोली का तमाशा देख रहे हैं। क्या खूब नज़ारा है।
      करोड़पति लोग, पैसा कमा-कमा कर अतरा चुके अरबपति- खरबपति, शेयर बाजार से लेकर केसिनों, मटके, जुए-सट्टे तक अपनी बोरियत दूर करने की नाकाम कोशिश कर थक चुके धन-कुबेरों ने अपने मनोरंजन के लिये नया तरीका ढूँढा है। ये उकताए लोग अब चल-अचल संपत्ति की तरह क्रिकेटरों की बोलियाँ लगा रहे है, मोल भाव कर रहे है, उन्हें खरीद रहे हैं, और बडे-बडे क्रिकेटर दास होने का गर्व महसूस करते हुए नतमस्तक हुए जा रहे है। गले में पट्टा और चेन बँधवाकर किसी धन कुबेर के दरवाजे पर मुस्तैदी से खडे होने का बेकरारी से इंतजार कर रहे है।
      जो पहले लाट में सफलता पूर्वक बिक चुके वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे, वाह क्या खूब बिके ! देश भर से बिकने की बधाईयाँ ले रहे थे। जो वाजिब दाम में नहीं बिके वे अफसोस में पडे़ हैं, काश दो-चार चौके और मारे होते, एखाद-दो विज्ञापन और कबाडे़ होते, कुछ तो वेल्यू बढ़ती। जो बिक ही नहीं पाए उन्हें मलाल हो रहा है कि हाय इस मंडी में अपनी तो कोई औकात ही नहीं लगी, बेकार समय बरबाद किया क्रिकेट खेलकर। वे आशा भरी नजरों से मालिकों की ओर देख रहे हैं, मन में दुआएँ कर रहे है कि  -हे ऊपर वाले मालिक इस नीचे वाले किसी मालिक की मति फिरा, मेरा भी तो दाम लगवा, भले ही मरे के मोल ही बिकवा, मगर बिकवा तो। चिंता की कोई बात नहीं, नीलामी का यह बाजार अब बारबार भरने वाला है। अगर पहले नम्बर नहीं लगा तो आगे जरूर लग जाऐगा। 
      मानव इतिहास में पढ़ा है, किसी समय दुनिया भर में दास प्रथा चला करती थी। धनाड्य सामंतगण अपनी-अपनी औकात के हिसाब से दासों की मंडी से दास खरीदते थे। अच्छे-अच्छे हट्टे-कट्टे, हर काम में माहिर दास ऊँची से ऊँची कीमत चुकाकर खरीदे जाते और दड़बों में ले जाकर बंद कर दिये जाते। कोड़ो की फटकार के बीच दास अपने मालिकों का सारा घरेलू कामकाज, खेती-बाड़ी, व्यापार-व्यवसाय उनकी तेल-मालिश के अलावा दीगर मेहनत-मजूरी भी करते थे, उनको पहलवानी दिखाते, उनके लिये कुश्तियाँ लडते, खूना-खून तक हो जाते। इस तरह नाना प्रकार के मनोरंजन से अपने मालिकों को खुश रखते। वे कद्दावर दास हर काम में माहिर होते थे इसीलिये उनको हासिल कर उनपर गुलामी का जुआ लादने के लिये ऊँची से ऊँची बोली लगाई जाती थी। वे गुलाम तो दुनिया के सारे काम करना जानते थे, मगर ये हमारे महान क्रिकेटर अब क्या करेंगे ? वे बेचारे तो क्रिकेट खेलने के अलावा दूसरा कोई काम जानते ही नहीं ? बचपन से ही माँ-बाप ने हर चीज से दूर रखकर बल्ला जो पकड़ा रखा है। अपने देश की तो खासियत ही यही है, अगर आपके हाथ में पैसा कमाने का सूत्र लग जाए तो न पढाई-लिखाई की जरूरत है ना नीति-नैतिकता सीखने की। पैसा आऐगा तो इस सब बकवास को कोई नहीं पूछेगा। अब, जब नीलाम-बोली में बिककर मालिक की अर्दलाई करना पड़ेगी तो आटे-दाल का भाव पता चलेगा।
      एक और मुसीबत उनपर पड़ेगी जिन्होंने बल्ला चलाने के अलावा कुछ नहीं सीखा। मान लीजिए शाहरुख, प्रिटी जिंटा का मन कभी करे कि चलो अब ठुमके लगाओं तो कच्चे-पक्के ठुमके तो वे लगा लेंगे, क्योंकि आजकल सारे क्रिकेटरों को यहाँ-वहाँ ठुमके लगाते काफी देखा जा रहा है, लेकिन खुदा ना खास्ता खरीदारों का कभी मन करे कि -बहुत हुआ क्रिकेट अब जरा बाज़ार से सब्जी-भाजी ले आओ, तो फिर वे बेचारे क्या करेंगे। सब्जी तो उनके बाप ने कभी नहीं खरीदी ! या मान लो कभी मालिक का मन करे कि आज पाँच सितारा होटल का खाना नहीं खाना है, और वह गुलाम से कहे, चल रे आज मक्के दी रोटी सरसो का साग बना ला, तो हमारा महान क्रिकेटर बेचारा क्या करेगा ? भई मालिक तो मालिक है कोई भी हुक्म छोड  सकता है, गुलाम मना कैसे करेगा ? हो सकता है मालिक गाड़ी की चाबी हाथ में थमाता हुआ कहे, चलो गाडी ड्राइव करो, मुझे स्टेडियम तक ले चलो, जहाँ तुम्हारा मैच होने वाला है……. और खेलना कैसा भी, गाड़ी जरा ढंग से चलाना, एक स्क्रैच भी नहीं आना चाहिये, वर्ना किसी दूसरे को मैदान में उतार दूँगा, तुम दरबानी करना फिर मेरे बंगले की।
      रोम में ग्लेडिएटर हुआ करते थे, वे उच्च कोटी के दास लड़ाके हुआ करते थे। उन्हें पाने के लिये सामंतों को तगड़ी बोली लगाना पड़ती थी, ज्यादा से ज्यादा कीमत देकर उन्हें खरीदना पड़ता था। वे गजब के लडाके होते थे। प्राण तजने तक एक दूसरे के खिलाफ खूनी जंग लड़ कर सामंती प्रभुओं का मनोरंजन करते थे, उन्हें खुश रखते थे। मालिक उन्हें चिल्ला-चिल्ला कर लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे, जैसे पाड़ों को किया जाता है। अब अनकरीब यही नज़ारा क्रिकेट में भी देखने को मिलेगा। सारे मालिक जिनके करोड़ों रुपये क्रिकेटरों पर खर्च हुए हैं, पवेलियन में बैठकर चिल्ला-चिल्ली करेंगे -मारो धोनी मारो, बॉल ढूँढे नहीं मिलना चाहिये……… अरे पठान बाउंसर फेंक, मुँह तोड़ , नहीं बन रहा तो बालिंग-वालिंग छोड़ , मुक्का मार साले को, नाक तोड़ ……..। साले पैसे वसूल ना हुए तो कपड़े धुलवाऊँगा तुझसे।
        दासों की उस जमाने में बडी दुर्दशा होती थी। रहने के लिए मिलने वाले बाड़ों में मुर्गी का रहना तक मुश्किल था। क्रिकेटरों को भी वो दिन देखना पड़  जाए तो क्या होगा ? मैच के लिए मैदान में, फिर पॉव में चेन डालकर बाड़े  में बंद। जीते तो खाना मिलेगा, हारे तो कोड़े पडेंगे। जितने रन बनाओगे, चौके-छक्के लगाओगे, उतना खाना मिलेगा। जीरो पर आऊट हुए तो सूखी रोटी प्याज  भी नहीं मिलेगी। विकेट लोगे तो खीर-पूरी मिलेगी, नहीं तो मुँह तकना उनका जो मुर्गा शेम्पेन का आनन्द लेंगे।
      वाह उदारीकरण वाह ! निजीकरण की यह नाजायज़ संतान उदारीकरण का ऐसा बेमिसाल इस्तेमाल इतनी जल्दी होगा, सोचा नहीं था। देश के बहुत सारे लोगों को तो धनकुबेरों ने पहले ही से अपने घर के दरवाज़े पर बाँध रखा है, खिलाड़ियों को भी नीलामी में खड़ा होना पड़ेगा, सोचा नहीं था।
व्यंग्य ब्लॉग में दिनाँक 19 मई 2009 को लिखी गई।

Saturday, January 8, 2011

इस कड़ाके की ठंड में

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
      बर्फ की सिल्लियों पर अपराधी को लिटाकर कोड़े फटकारते हुए पुरानी भारतीय फिल्मों में कई बार देखा है, वास्तव में ऐसा होता है या नहीं पता नहीं, मगर मठ्ठर अपराधियों ने कभी मुँह खोला हो याद नहीं पड़ता। इन दिनों ठंड ने जो कहर बरपाया है, अपराधियों को बर्फ पर लिटाने की जरूरत ही नहीं है। एक बाल्टी ठंडे पानी से खुले मैदान में नहाने की सजा दे दी जाए, अच्छे-अच्छे अपराधी अपराध कबूल लेंगे। पुलिस के लिए इससे बढ़िया थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। ट्रायल में भी किसी अपराधी को फुसलाना हो तो दो कम्बल एक्स्ट्रा दिलवाने का लालच दे दिया जाए या डराना हो तो दिया हुआ कम्बल छुड़ा लेने की धमकी दी जाए, मामला सुलझ जाएगा।
      इन दिनों आप घर के दरवाजे़ खुले रखकर बिंदास सो सकते हैं, घर में तिजोरी हो तो उसे भी खुली रख सकते हैं। कोई पेशेवर चोर ऐसी कड़ाके की ठंड में घर से बाहर निकलने से रहा। वह घर में रजाई में दुबक कर उष्मा सुख लेगा या हाड़-तोड़ सर्दी में ताले चटकाता फिरेगा। हाँलाकि चोर के लिए तो इन दिनों बड़ा फेवरेबल सीज़न है, रेल की पटरियाँ चटक रही हैं, तो खोजने पर ताले-कुंदे भी चटके हुए मिल सकते हैं। चोरी करने में आसानी हो सकती है। घर के अन्दर भी बड़ी सहूलियत से माल समेटा जा सकता है। पूरा परिवार रज़ाई में दुबका हुआ चोर को बस निहार भर सकता है, कौन रजाई के बाहर निकलकर उसे पकड़ने की ज़हमत उठाएगा। सर्दी के मारे कंठ से पकड़ों-पकड़ों का स्वर तक नहीं निकलने वाला। लेकिन फिर भी मेरा दावा है इतनी सुविधाओं और सहूलियतों के बावजूद चोर इस ठंड में बाहर निकलने की गलती कभी नहीं करेगा।
      भ्रष्टाचार इन दिनों ठंड के बाद दूसरा बड़ा मुद्दा है जिसपर चारों ओर तूमार मचा हुआ है। कुछ दिनों पहले वह प्राथमिकता में पहला था। ठंड ने उसका स्थान ले लिया है। भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह ठंड बड़ी कारगार है। भ्रष्टाचार का एकमात्र प्रकटीकरण है नोटों की गड्डियाँ। ऐसी ठंड में कौन नोट गिनेगा। ना देने वाला बिना गिने देना चाहेगा ना लेने वाला बिना गिने लेगा। कौन कोट की जेब से बाहर हाथ निकालकर अपना खून जमवाएगा। माना जा सकता है, कि इन दिनों लेन-देन में सुस्ती चल रही होगी और भ्रष्टाचार पर प्राकृतिक अंकुश लगा होगा। सरकार की इच्छा शक्ति अगर ज़ोर मारे तो भ्रष्टाचार के सभी अड्डों पर ‘प्रशीतक’ लगवाकर इससे बारहों महीने चौबीस घंटे मायनस टेम्प्रेचर मेंटन कर नोटों का लेन-देन रोका जा सकता है। भ्रष्टाचार पर अपने आप अंकुश लग जाएगा।
       ठंड के मारे चारों ओर अमन चैन है, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं है। दिमाग की सारी खुराफाती ऊर्जा शरीर को ठंड से बचाने में खर्च हो रही है। महँगाई के मारे हालाँकि कंडे-लकड़ी खरीदकर गरीब का आग तापना भी मुश्किल है परन्तु इस कड़ाके की ठंड में लोग महँगाई तक को भूल गये हैं।

Tuesday, January 4, 2011

भ्रष्टाचार में भ्रष्टाचार

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//      
          नेताजी छुटभैयों को समझा रहे है- ऐसी कोई खराब स्थिति नहीं है, बिल्कुल निराश होने की जरूरत नहीं है, एक मछली तालाब को गंदा कर रही थी, हमने उसे बाहर निकाल फेंका। अब सब ठीक हो जाएगा। सभी लोकतांत्रिक प्रणालियाँ बिल्कुल ठीक तरह से काम कर रहीं हैं, आप लोगों को लोकतंत्र पर भरोसा रखना चाहिये।
          एक छुटभैया गर्मी खाता हुआ बोला-क्या खाक भरोसा रखना चाहिये। थोड़े दिन पहले भी आपने कहा था कि एक मछली तालाब को गंदा कर रही है, हमने उसे निकाल फेंका है, फिर यह दूसरी मछली फिर कहाँ से आ गई? यहाँ तो हर थोड़े-थोड़े दिनों में एक-एक नई मछली बाहर निकल रही है। लगता है पूरे तालाब में ही गंदगी मचाने वाली मछलियाँ भरी पड़ी हैं। आखिर हम कब तक बर्दाश्त करें!
          नेताजी बोले-चिन्ता मत करों हमने भी यहाँ-वहाँ बहुत से मछुआरे बिठा रखें है जो लगातार देख रहें हैं कि कौन-कौन सी मछली तालाब गंदा कर रही है।
          छुटभैया बोला- इससे क्या फर्क पड़ने वाला है, हमें तो नुकसान हो रहा है! यह अच्छी बात नहीं है। आप को जल्दी कुछ करना चाहिये, वर्ना ठीक नहीं होगा।
          नेताजी फिर समझाते हुए बोले- नाराज़ होने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। इतने बुरे हालात नहीं है।
          छुटभैया बोला- कैसे बुरे हालात नही हैं, कोई सौ-पचास रुपये का हेर-फेर कर रहा हो तो चुप भी बैठें, मगर यह क्या है! करोड़ों रुपए लोग खा ले रहे हैं, और डकार भी नहीं ले रहे। और आप लोग चुप बैठे हुए हो। कैसे नाराज़ ना हों!
          नेता जी बोले- कोई चुप बैठे हुए नहीं हैं, हमारे पास बराबर पहुँच रहा है, मेरा मतलब है हर समाचार हमारे पास पहुँच रहा है।
          छुटभैया दाँत भींचता हुआ बोला-साहब, भ्रष्टाचार की इन्तहा हो गई है अब। जनता को तो हम सम्हाल लेंगे लेकिन खुद हमसे अब रहा नहीं जाता, हाथ कसमसा रहे हैं। अब कोई अगर हमारे हाथ से पिट गया तो फिर मत कहना।
          नेताजी को गुस्सा आ गया, वे चिल्लाए-क्या समस्या क्या है रे तेरी, बार-बार धमका रहा है।
          छुटभैया बोला- समस्या क्या है! हम क्या बेवकूफ हैं जो मेहनत करके आप लोगों के लिए वोट लेकर आते हैं। आप लोग करोड़ों रुपए अकेले खा जाते हो तो हमें तो ठगा सा महसूस होता है ना! कसम से आत्मा तिलमिलाकर रह जाती है। लोकतंत्र है तो उसका मान करना चाहिये, ऐसा थोड़े ही चलेगा कि खुद ही पूरा खा जाओ। यह तो भ्रष्टाचार में भी भ्रष्टाचार वाला मामला हो गया। जबकि हमारे देश में भ्रष्टाचार में शिष्टाचार की परम्पराएँ हैं।
          नेताजी छुटभैये का मुँह देखने लगे। बाकि सारे छुटभैये भी मौजूदा परिस्थितियों पर आक्रोश जाहिर करते हुए हो-हल्ला मचाने लगे।