Sunday, March 13, 2011

अनाड़ी खिलाड़ी


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//       
पत्रिका में
          हमने ज़िन्दगी में कभी क्रिकेट का बल्ला नहीं पकड़ा, मगर समुद्र की उद्दाम लहरों पर हाथ-पाँव मार रहे अनाड़ी तैराकों की तरह विश्वकप में, उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हमारे महारथियों की टीम इन्डिया को देखकर लगता है कि हमारे भी हाथ-पैरों में गद्दे बाँधकर, खोपड़ी पर शिरस्त्राण चढ़ाकर मैदान में छोड़ दिया जाए तो हम भी एक गैर पेशेवर अनाड़ी की सभी खूबियों के साथ कुछ न कुछ कमा ही लाएँगे। यह बात हम इतने भरोसे से इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जब खेल क्रिकेट का हो तब हर खिलाड़ी के साथ भगवान का आशीर्वाद ज़रूर रहता है, इसलिए नास्तिक होने के बावजूद जैसे ही हम टीम इन्डिया के सदस्य बनकर मैदान में उतरेंगे, भगवानहमारे साथ आ खड़ा होगा, और बाकी जो कुछ भी करना है वही करेगा।
          विश्वकप की भारतीय टीम के साथ ऐसा ही है। हमारे खिलाड़ी भगवान के शहस्त्रों आशीर्वादों के साथ टीम में है। जिसे रन बनाने के लिए रखा गया है भले ही वह रन न बनाए मगर वह टीम में अवश्य रहेगा, जिसे विकिट लेने के लिए रखा गया है वह विकिट नहीं लेगा परन्तु टीम में रहेगा। क्या पता जो रन बनाने के लिए रखा गया है वह धड़ाधड़ विकिट लेने लगे या जिसे विकिट लेना है वह रन बनाने की मशीन साबित हो जाए! कुछ भी हो सकता है, क्योंकि भगवान उनके साथ है।
जागरण में
          बल्लेबाज़ों से जब उम्मीद की जाती है कि वे ज्यादा से ज्यादा क्रीज़ पर बने रहें तो वे धड़ाधड़ आउट होकर पवेलियन में बने रहते हैं। गेंदबाज़ों से जब उम्मीद रहती है कि वे विकिट भले ही न लें परन्तु रन रोककर रखें, तो वे आपकी आधी बात मानते हुए विकिट तो नहीं लेते पर रनों का ढेर लगवा देते हैं। जब ज़रूरत होती है कि एक-एक दो-दो रनों में विरोधी टीम को बाँधे रखा जाए तो हमारे धुरंधर चौकों-छक्कों की बौछार करवा लेते हैं। कड़ी मेहनत से फील्डरों को चुनकर इसलिए लाया जाता है कि वे बॉलिंग-बैटिंग भले न करें परन्तु उस जगह पर मुस्तैद रहें जहाँ से रन निकलते हैं, परन्तु वह उस जगह के अलावा हर जगह मौजूद मिलता है। जब कैच छोड़ने की अय्याशी के लिए कोई स्थान नहीं होता तब हर फील्डर बड़ी उदारता से कैच छोड़ता है, जैसे उसे इस काम के लिए मैन ऑफ द मैच दिया जाने वाला हो।
          तो बंधु, जब इस तरह भगवान भरोसे ही विश्वकप खेला जाना है तो हम क्या बुरे हैं जो कभी क्रिकेट मैदान में नहीं उतरे। हम भी ज़ीरों पर आउट होने या न्यूनतम रन बनाने की बहादुरी दिखा सकते हैं। हम भी चारों दिशाओं में चौकों-छक्कों की बौछार का नज़ारा दिखवा सकते है, हम भी मैदान में दौड़ती गेंद को बिना छुए मैच समाप्त कर वापस पवेलियन में लौट सकते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, लोग अनाड़ी कहेंगे! तो जब दिग्गज खिलाड़ियों को अनाड़ी कहा जा रहा है तो ऐसा प्रदर्शन तो हम भी बखूबी कर सकते हैं।

6 comments:

  1. बहुत ही सामयिक और सटीक व्यंग्य!

    सादर

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  2. क्रिकेट अमीरों का 'कूड़ा-करकट'खेल है.हम आम जनता को इससे कोई फायदा नहीं होगा.

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  3. जब ऊँचे पहाड़ पर पहुँच जाते हैं तो गढ्ठा देखकर कूदने लगते हैं।

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  4. प्रमोद सुपुत्र
    आशीर्वाद
    स्टीक व्यंग कौन से शब्दकोश में से ढूंढते हैं आप
    दादी को हिंदी भी नहीं बोलनी लिखनी आती

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  5. बहुत सुंदर व्यंग। मजा आ गया।

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  6. खेलना तो हम भी चाहते हैं..हम ही कौन बुरे हैं.

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