Thursday, April 18, 2013

आईपीएल चालू आहे



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आई. पी. एल. जिसके शताधिक फुलफार्म हैं, की झंपिंग झपांग झंपक-झंपक जोर-शोर से चल रही है। जैसा की एक भद्र फिल्मी महिला ने टी.वी के माध्यम से कई दिनों तक इस अद्भुत बोलों वाले गीत के साथ यह महत्वपूर्ण संदेश जन-जन तक पहुँचाया कि शर्माने का नई, जेंटलमैन से मेंटलमैन बनने का, बहुत सारे लोग मेंटलमेन बनने लगे हैं। जैसे-जैसे यह मेंटलपना परवान चढ़ेगा, लोग कामकाज, नौकरी-धंधा पढ़ाई-लिखाई यहाँ तक कि खाना-पीना और शरीर की दूसरी अति महत्वपूर्ण जैविक क्रियाओं पर भी जबरिया रोक लगा कर बस झंपिंग झपांग झंपक-झंपक, ढंपिंग ढपांग ढंपक-ढंपक में मशगूल हो जाएंगे। कोई मरे-जीए उनकी बला से।
जो लोग कभी जेंटलमन थे ही नहीं उनके लिए तो उस भद्र महिला की अपील बेमानी सी है, मगर इर्द-गिर्द मौजूद हज़ारों-लाखों मेंटलमेन आने वाले दो महीनों तक हम-आप जैसे सच्चे जेंटलमेनों का जीना हराम करने वाले हैं। सड़क चलते लोग आपको रोक-रोक कर पूछेंगे-क्या पोजीशन है ? आप पूछोगे-काहे की ? तो वे आपको ऐसी अजीब नज़रों से घूरेंगे जैसे आप अभी-अभी पागलखाने से छूट कर आ रहे हों। फिर आपको इस मामले में घोर अज्ञानी होने के जुर्म में एक झिड़की सी देते हुए कहा जाएगा-हद हो गई, उधर जंग छिड़ी हुई है और आपको खबर ही नहीं है! आप एक सेकंड के लिए हतप्रभ से हो जाओगे और सोचोगे कि अभी फिलहाल तो जंग जैसी कोई स्थिति है नहीं, पाकिस्तानियों ने ताज़ा कोई हरकत की ही नहीं है, ये कम्बख्त कौन सी जंग की पोजीशन पूछ रहा है! फिर खोजबीन करने पर आपको पता चलेगा कि किन्‍ही वारियरों और डेविलों नामक दो कट्टर दुश्मनों के बीच भिड़ंत है। आपको लगेगा शायद यह डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. वाली मारामारी की बात हो रही है, मगर फिर वही व्यक्ति आपके ज्ञान में बढ़ोत्तरी करेगा कि भैया मैं झंपिंग झपांग झंपक-झंपकअर्थात आई.पी.एल के मैच की बात कर रहा हूँ। और तब आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप बोर्ड की परीक्षा में फेल हो गए हों। 
एक ज़माना था क्रिकेट जेंटलमेन गेम हुआ करता था, मैदान में सिर्फ हाउज़दैट की आवाज भर सुनाई देतीं थी और दर्शक चिन्तनकारों की तरह गैलरियों में बैठकर चैके-छक्के पड़ने पर इस तरह होले-होले तालियाँ बजा दिया करते थे जैसे खिलाड़ियों पर एहसान कर रहे हों। खिलाड़ी घूमते-फिरते, खाते-पीते, टहलते हुए पाँच दिन का टेस्ट मैच निबटा लिया करते थे। मगर अब झंपिंग झपांग ढंपिंग ढपांग का ज़माना है। सीख दी जा रही है कि शराफत छोड़ो, कपड़े फाड़ पागलपन पर उतर आओ। घर-बार, नौकरी-चाकरी, स्कूल-कॉलेज, पढ़ाई-लिखाई छोड़कर मेंटलमैन बन जाओ। लिहाजा मैच में आठ-दस पागल किस्म की चीयरगर्ल्‍स का झुंड बिना थके नाच-नाचकर खिलाड़ियों व दर्शकों का मनोबल बढ़ाएगा, और उधर घर में बैठकर टी.वी. में घुसे पड़े तमाम लोग अपनी झंपक-झंपक से अड़ौसियों-पड़ौसियों का मनोबल ध्वस्त करते रहेंगे। क्‍यों? अरे भई, आईपीएल जो चालू आहे।
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Thursday, April 11, 2013

गरीब सब कुछ खा गए है


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

               
        एक नए रहस्य का पर्दाफाश हुआ है। गरीबोंकी पोल खुल गई है। एक तरह से कहा जाए रंगे हाथोंकी तर्ज पर वे रंगे पेटपकड़े गये हैं। पैसठ सालों से हम हैरान-परेशान थे कि आखिर कम्बख्त यह महँगाई बढ़ती क्यों है? राजनीतिज्ञों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए, अर्थशास्त्रियों ने एक से एक भारी-भरकम सिद्धांत पेले, मगर असली चोर अब पकड़ में आया है। ये साले गरीब देश का सारा अन्न भकोस-भकोस कर महँगाई को हवा दे रहे हैं।

            कुछ दिन पहले मैंने बाज़ार जाने की हिम्मत की थी। आलू-प्याज और दूसरी तमाम सब्जियों के दाम आसमान पर थे। माजरा अब समझ में आया है। गरीब आसमान में बैठकर दना-दन सब्जियाँ, आलू-प्याज खा रहे थे। कुछ समय बाद दाम कुछ कम हुए, जरूर गरीबों को अमीरों पर रहम आ गया होगा और उन्होंने अपने खाने की तादात और गति पर लगाम लगा ली होगी। अंडा, मटन-मच्छी की दुकान पर जाने में तो मेरी आज भी रूह काँपती है, गरीब-गुरबे इस कदर नानवेज खा रहे हैं कि उसकी कीमत हमेशा सातवे आसमान पर ही रहती है। ये गरीब जरूर लोगों को पूरी तौर पर वेजीटेरियन बनाकर छोड़ेंगे।

  एक दिन मैं रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर गया, पैंट-कमीज़ खरीदने, लेकिन कमीज़ के भाव सुनकर मुझे गश आते-आते रह गया इसलिए मैंने पैंट की कीमत तो पूछी ही नहीं। पूछता तो शायद हार्ट अटैक का सामना करना पड़ता। अब तक मेरी खोपड़ी में यह सवाल घूम रहा है कि आखिर एक अदद कमीज़ की कीमत उस दुकान के सेल्समेन की तनख्वाह से दो-गुनी कैसे हो सकती है। सेल्समेन की तनख्वाह देढ़ हज़ार और कमीज़ की कीमत तीन हज़ार थी। अब पता चला देश के गरीब ब्रांडेड पैंट-कमीजे़ं पहन-पहनकर उनके दाम बढ़ा रहे हैं।

                इन गरीबों ने देश में महँगाई ही नहीं बहुत कुछ बढ़ाया है। जैसे गुरबकों ने गरीबी ही बढ़ा मारी। वे देश वासियों की क्रय शक्ति ही खाकर बैठ गए हैं, गरीबी तो बढ़ना ही है। उन्होंने बेरोज़गारी बढ़ाई है, क्योंकि वे रोजगार की संभावनाएँ खाए बैठे हैं। उन्होंने जमाखोरी-कालाबाज़ारी बढ़ाई है, क्योंकि वे कायदा-कानून पचा कर बैठे हैं। और तो और उन्होंने भ्रष्टाचार बढ़ाया है क्योंकि वे रात-दिन देशवासियों की ईमानदारी की कमाई खाते रहते हैं। भूखे मरने की नौबत न आ जाए इसलिए लोग रिश्वत और कमीशन खाकर अपनी जान बचाते हैं। किसी को यह बात मालूम नहीं है, मैं बता दूँ कि ये गरीब देश के पूँजीपतियों, नेता मंत्रियों, अधिकारियों-कर्मचारियों और ईमानदारी से मेहनत करके, खून-पसीना बहाकर कमाई गई धन-दौलत को अत्यंत चाव से खाने के शौकीन न होते, तो कसम से देश में इतना भ्रष्टाचार कभी नहीं होता।
                जब से महँगाई बढ़ने के अत्यंत गोपनीय राज का पर्दाफाश हुआ है, मेरी बेचैनी बढ़ गई है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि जितनी जल्दी हो सके मुझे उस कमीशन का चेयरमैन बना दिया जाए, जो इस मामले में कम से कम दस बोरी कागज़ खर्च करने की ज़रूरत से गठित किया जाएगा। मैं अपनी रिपोर्ट मैं इन गरीबों का सूपड़ा साफ करने के प्रभावी तौर-तरीकों पर अपने अमूल्य सुझाव दे दूँगा। मगर मुझे मालूम है ऐसा नहीं होने वाला, क्योंकि ये गरीब शिखर पर बैठे नीति-नियंताओं का सारा ज़मीर तक खाकर हज़म कर चुके हैं, इसलिए देश में भाई-भतीजावाद और बहन-भाँजावाद बहुत बढ़ गया है। गरीब सब कुछ खा गए हैं इसलिए देश में हर कुछ अब चरम पर पहुँच गया है।