Friday, June 13, 2014

बीमारी पर होशियारी

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

मरीज़ों के वृहद संसार में कुछ विशिष्ट किस्म के मरीज़ होते हैं जिनकी विद्वता के सामने पुश्तैनी मरीज़ तो क्या अच्छे-अच्छे अनुभवी डॉक्टर तक पानी भरते नज़र आते हैं। बीमारी के क्षेत्र में इन विद्वान मरीजों का बड़ा आतंक होता है। ये यदि किसी डॉक्टर को दिखाने पहुँच जाएँ तो इन्हें देखते ही डॉक्टर की रूह कॉप जाती है। यहाँ तक कि किसी डाक्टर का पर्चा लेकर जब ये विद्वान मरीज़ मेडिकल स्टोर पर आ खड़े होते हैं तो मेडिकल स्टोर वाला सू-सू का बहाना बना कर खिसक लेता है। कारण, वे दवा भले ही 5 रुपये की लें मगर विद्वता पाँच हज़ार रुपये की झॉड़ते हैं। मसलन-यार फलाकम्पनी के फार्मूले में सोडियम कम है, इसलिए ढिकाकम्पनी की ही दवा देना या - सोडियम के रेट अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में कम हो गए हैं, इस कम्पनी ने दवा के दाम कम नहीं किये, लूट मचा रखी है आप लोगों ने!

किसी मरीज़ को देखने जाएँगे तो इतनी इन्क्वायरी करेंगे कि डॉक्टर भी क्या करता होगा। कब से है ये बीमारी ? पहले किसी को दिखाया ? इंडोस्कोपी करवाई थी ? खाने में क्या खाया था ? मसाले-वसाले ज्यादा खाते हो क्या ? जंक फूड तो नहीं खाया? तेल कौन सा इस्तेमाल करते हो? मिलावटी चीज़ें मत लाया करो बाज़ार से! नल का पानी टेस्ट करवाया? एक आर.ओ. खरीद लो! हाजमा कैसा है? रात को इसपघोल खाया करो! सुबह तांबे के लोटे का पानी पीया करो, हम तो रोज वही पीते हैं।  

शहर के सारे डाक्टरों का कच्चा चिट्ठा इनके पास होगा। पूछेंगे, किसको दिखाया है ? अरे उस गधे को क्यों दिखाया, उसे तो आला पकड़ना भी नहीं आता ? जरूर नकल करके डाक्टर बना होगा। क्या फालतू के टेस्ट लिखे हैं? अरे, ‘इस बीमारी में उस टेस्ट की क्या ज़रूरत है! लूटते हैं साले, कमीशन बंधा है बदमाशों का। डायबीटीज़ है? इन डाक्टरों के चक्कर में मत आना ! डाक्टर तो बेवकूफ होते हैं, हमें देखों, बीस साल से है, खूब मीठा खाते हैं, कुछ नहीं हुआ, टन्न रखे हैं। बी.पी. है? किसी को दिखाने की ज़रूरत नहीं है, हम खा रहे हैं बीस साल से, वही दवा तुम भी खा लो, कुछ नहीं होगा, गारंटी है।

कभी डॉक्टर को दिखाने जाएँगे तो चेंबर में दो सौ रुपट्टी फीस के बदले में डाक्टर के दो घंटे खा जाएंगे। बीमारी और सह बीमारियों के साथ-साथ उन पर चल रहे शोधों व प्रचलित दवाओं के बारे में एक छोटा-मोटा शोध प्रबंध सा दिमाग में लेकर डॉक्टर पास बैठेंगे और बेचारे डाक्टर के प्राण पी जाएंगे।

वैसे एक बात तो हैं, ऐसे विद्वान मरीज भले ही जी का जंजाल हों मगर इनकी संगत से नए-नए अस्तित्व में आए मरीजों को बहुत ही राहत महसूस होती है, लगता है जैसे दुनिया में यही एक शख्स उनका सगा है, बाकी तो सब लूटने के लिए उधार बैठे हैं।

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Thursday, June 12, 2014

जूता बनकर पॉव में डल जाएँ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

वे ज़ार-ज़ार रोये जा रहे थे। मैंने पूछा-‘‘क्या हुआ मित्र, इस तरह मातम क्यों मना रहे हो?’’ वे चटके-‘‘तो क्या करूँ? और कोई होता तो घर पर पथराव कर आता उसके, मगर जब अपने ही भावनाओं को आहत करने पर उतर आएँ तो बैठकर मातम न मनाऊँ तो क्या करूँ?’’

वे सिसकते हुए बोले-‘‘बताइये भला, पॉव छूने की संस्कृति बंद करने को कहा जा रहा है। भाईसाहब, कसम खाकर कह रहा हूँ, मैंने ज़िन्दगी भर कुछ नहीं किया सिवा पॉव छूने के। पॉव छू-छू कर ही मैं देखिए कहाँ से कहाँ पहुँच गया! लोग मेरी पॉव छुवाई के कायल है। बड़े-बड़े काम जो एक स़े एक प्रभावशाली और ताकतवर लोग नहीं करा पाते मैं पॉव छूने के अपने विशिष्ट कौशल से पलक झपकते ही करा लाता हूँ। मानते हैं लोग कि है कोई पॉव छूने वाला। मगर अब कहा जा रहा है कि हम पॉव छूना ही बंद कर दें! बताइये भला ये कहाँ का न्याय है?’’

वे बोलते रहे-‘‘और फिर पॉव ही तो छू रहे हैं, कोई तलवे तो चाट रहे नहीं हैं किसी के! न दुम हिला रहे हैं किसी के दरबार में जाकर! हमारे खानदान तक में किसी ने ये काम नहीं किया। अरे जब एक खास अदा से झुककर पॉव छू लेने भर से बड़े-बड़े काम हो जाते हैं तो फिर यह चाटा-चूटी, दुम हिलाई की ज़रूरत ही क्या है हमें?’’

‘‘कोई बता दे जो कभी किसी की चम्मचगिरी की हो या कभी किसी ने हमें किसी की जी हुजू़री करते हुए देखा हो। अरे लोग तो चौबीस घंटे आला कुर्सियों के सामने पूरे के पूरे दुम बने खड़े हिलते रहते हैं कि मौका लगे तो कोई छोटा-मोटा स्वार्थ ही साध लें जाएँ, मगर हम कभी इस टुच्चाई में नहीं पड़ते। ठसक के साथ पॉव छूते हैं और बड़ी से बड़ी डील करा लाते हैं। परन्तु अब तो रोजी-रोटी पर ही संकट आ खड़ा हो गया है भाईसाहब, पता नहीं किसने उन्हें यह सलाह दे दी।’’

चोरी-चकारी नकबजनी करने वालों से तो कुछ कहा नहीं जा रहा! हम से कहा जा रहा है जैसे हम किसी का हक छुड़ाकर खा रहे हों। पीढ़ियों से चले आ रहे, हमारी रग-रग में बसे इस पारम्परिक संस्कार को ज़मीदोज़ करने का आखिर क्या अर्थ है बताइये भला। अगर लोगों ने इसे सीरियसली ले लिया तो भारी समस्या हो जाएगी। न कोई पॉव छूएगा न आशीर्वाद देगा। कसम से भाईसाहब हमें अगर आशीर्वाद मिलना बंद हो गया तो हमारे तो बीवी-बच्चे तक भूखों मर जाएंगे।

सच बात तो यह है भाईसाहब, अब इस उम्र में पॉव छूने के अलावा कोई और काम-धंधा आता भी तो नहीं, आता होता तो कमर के स्पांडेलाइटिस के बावजूद काहे को दूसरों के पॉवों में झुकते फिरते? सोचते हैं, क्यों न जूता बनकर परमानेन्टली किसी के पॉव में डल जाएँ, न उन्हें आबजेक्शन होगा न हमारे काम रुकेंगे। पॉव छूने की संस्कृति भी लगे हाथ दफा हो जाएगी।                

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