मंगलवार, 11 जनवरी 2011

ठंड के मारे सब सुन्न

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             ठंडको जाड़ाभी कहा जाता है। क्यों, यह अब समझ में आ रहा  है । यह अंग-प्रत्यंग, हर प्रकार के शारीरिक द्रव्य, यहाँ तक कि बुद्धि, तर्क संवेदना, विचार तक को जड़कर देती है, इसलिए। इन दिनों यही हाल है। सुबह-सुबह एक चेला-‘‘सर आजकल कुछ लिख नहीं रहे हैं’’, कहता हुआ चरण छूने की नीयत से शरीर पर शिद्दत से पड़ी रज़ाई हटाकर हमारे चरण ढूँढने के लिए आगे बढ़ा ही था कि मैंने लगभग चीखकर उसे चेतावनी दी-‘‘खबरदार जो पाँव छूने की कोशिश की, मैं आशीर्वाद देने के लिए हाथ रज़ाई से बाहर निकालने वाला नहीं हूँ!’’ चेला परिस्थितियों को समझते हुए खुद ही बोल पड़ा-‘‘समझ गया, समझ गया, आजकल लिख क्यों नहीं पा रहे आप। हाथों में गठान लगाकर रज़ाई में घुसे पडे़ रहोगे तो लिखोगे कहाँ से!’’ मैंने कहा-‘‘ऐसी बात नहीं है! लिख तो फिर भी हम लें, कम्बख्त कलमों में स्याही तक ठंड के मारे जमी पड़ी है।’’
          क्या नज़ारे हैं इन दिनों। बाज़ार जाइये, यूँ तो ग्राहकी कम ही चल रही है, मगर दुकानदार, जो मिले सो ओढ़कर सेन्टाक्लॉज बना बैठा हुआ है या दुकान के बाहर बैठकर आग ताप रहा है। कुछ माँगो तो कहेगा-‘‘नहीं है! अगली दुकान देख लो।’’ आप वांछित वस्तु की ओर उँगली दिखाकर कहोगे-‘‘वह तो रखी है, देते क्यों नहीं!’’ वह कहेगा-‘‘क्वालिटी खराब है, और कहीं देख लो। वाह, क्या बात है! यह तो सरासर रामराज्य सा आ गया। जो काम गाँधी जी से लेकर मौजूदा रामभक्त नहीं कर पाए वह ठंड ने चुटकियों में कर दिया, हालाँकि चुटकियाँ बजने की वस्तुस्थिति है नहीं।
          चोरी-चकारी, नकबजनी, डकैती, लूटमार, पाकेटमारी, चेन स्नेचिंग जैसे गृह उद्योगों की सूचनाएँ आजकल अखबारों से लगभग गायब हैं। आप कह सकते हैं कि ठंड के मारे संवाददाता खबरें नहीं लिख रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे सारे कर्मठ चोर-गिरहकट धंधा-पानी छोड़कर, ठंड के मारे अपने-अपने घरों में दुबके पड़े हैं। कौन निकले घर के बाहर, फालतू अकड़-अकड़ा गए तो! हालाँकि चोरों के सामने सुनहरा मौका है, किसी के सामने उसकी अटैची लेकर भाग जाओ, ठंड के मारे उसके मुँह से आवाज तक न निकलेगी, और यदि आवाज़ निकल भी गई तो पुलिसवाले थाने में ज़ब्त लकड़ी के सामान से जलाए जा रहे अलाव का सुख छोड़कर चोर के पीछे दौड़ने की ज़हमत नहीं उठाने वाले।
          इस कदर महँगाई हो रही है, त्राहि-त्राहि मच जाना चाहिए, मगर मचे कैसे, ठंड ने इंसानी जज़्बातों को काबू में कर रखा है। मंदिरों से घंटे-घड़ियालों की आवाजे़ नहीं आ रही, मज़्जिदों से अज़ानें स्थगित चल रही हैं। जगह-जगह चलने वाले धर्मगुरुओं के प्रवचन बंद हैं। नेताओं के लम्बे-लम्बे भाषण मुल्तवी हैं। जबकि इन दिनों कोई भी चाहे तो भाषणों-प्रवचनों से जनता जनार्दन को आराम से लोहूलुहान कर सकता है, क्योंकि चाहकर भी ठंड के मारे कान बंद करने के लिए उँगली तक नहीं उठाई जा सकती, मगर भाषण-प्रवचन देने के लिए इस कड़ाके के जाड़े में मुँह खोले तो कौन खोले। स्वर नलिका, कंठ इत्यादि सब ठंड के मारे सुन्न पड़े हैं।  
नईदुनिया में दिनाँक 01.01.2011 को प्रकाशित।

रविवार, 9 जनवरी 2011

नीलाम-बोली क्रिकेटरों की

    //व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
    भारत में निजीकरण की पराकाष्ठा तो खैर अभी देखना बाक़ी है, फिलहाल तो क्रिकेटरों की खरीदी-बिक्री देखने में सब्जी मंडी का सा आनंद आ रहा है। क्रिकेट से ज्यादा रोमांचकारी खेल आजकल यही लग रहा है। देश के लिये खेलने का दम भरने वाले चोटी के देश-प्रेमी क्रिकेटरों के भावलग रहे हैं, बोलियाँ बोली जा रहीं हैं नीलामी चल रहीं है -ढाई करोड़  एक, ढाई करोड़  दो - तीन करोड़  एक, तीन करोड़  दो………। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में खुले आम नीलाम होते नामचीन खिलाड़ी, मंडी के बैंगनों की तरह खामोश, निर्विकार से अपनी नीलाम-बोली का तमाशा देख रहे हैं। क्या खूब नज़ारा है।
      करोड़पति लोग, पैसा कमा-कमा कर अतरा चुके अरबपति- खरबपति, शेयर बाजार से लेकर केसिनों, मटके, जुए-सट्टे तक अपनी बोरियत दूर करने की नाकाम कोशिश कर थक चुके धन-कुबेरों ने अपने मनोरंजन के लिये नया तरीका ढूँढा है। ये उकताए लोग अब चल-अचल संपत्ति की तरह क्रिकेटरों की बोलियाँ लगा रहे है, मोल भाव कर रहे है, उन्हें खरीद रहे हैं, और बडे-बडे क्रिकेटर दास होने का गर्व महसूस करते हुए नतमस्तक हुए जा रहे है। गले में पट्टा और चेन बँधवाकर किसी धन कुबेर के दरवाजे पर मुस्तैदी से खडे होने का बेकरारी से इंतजार कर रहे है।
      जो पहले लाट में सफलता पूर्वक बिक चुके वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे, वाह क्या खूब बिके ! देश भर से बिकने की बधाईयाँ ले रहे थे। जो वाजिब दाम में नहीं बिके वे अफसोस में पडे़ हैं, काश दो-चार चौके और मारे होते, एखाद-दो विज्ञापन और कबाडे़ होते, कुछ तो वेल्यू बढ़ती। जो बिक ही नहीं पाए उन्हें मलाल हो रहा है कि हाय इस मंडी में अपनी तो कोई औकात ही नहीं लगी, बेकार समय बरबाद किया क्रिकेट खेलकर। वे आशा भरी नजरों से मालिकों की ओर देख रहे हैं, मन में दुआएँ कर रहे है कि  -हे ऊपर वाले मालिक इस नीचे वाले किसी मालिक की मति फिरा, मेरा भी तो दाम लगवा, भले ही मरे के मोल ही बिकवा, मगर बिकवा तो। चिंता की कोई बात नहीं, नीलामी का यह बाजार अब बारबार भरने वाला है। अगर पहले नम्बर नहीं लगा तो आगे जरूर लग जाऐगा। 
      मानव इतिहास में पढ़ा है, किसी समय दुनिया भर में दास प्रथा चला करती थी। धनाड्य सामंतगण अपनी-अपनी औकात के हिसाब से दासों की मंडी से दास खरीदते थे। अच्छे-अच्छे हट्टे-कट्टे, हर काम में माहिर दास ऊँची से ऊँची कीमत चुकाकर खरीदे जाते और दड़बों में ले जाकर बंद कर दिये जाते। कोड़ो की फटकार के बीच दास अपने मालिकों का सारा घरेलू कामकाज, खेती-बाड़ी, व्यापार-व्यवसाय उनकी तेल-मालिश के अलावा दीगर मेहनत-मजूरी भी करते थे, उनको पहलवानी दिखाते, उनके लिये कुश्तियाँ लडते, खूना-खून तक हो जाते। इस तरह नाना प्रकार के मनोरंजन से अपने मालिकों को खुश रखते। वे कद्दावर दास हर काम में माहिर होते थे इसीलिये उनको हासिल कर उनपर गुलामी का जुआ लादने के लिये ऊँची से ऊँची बोली लगाई जाती थी। वे गुलाम तो दुनिया के सारे काम करना जानते थे, मगर ये हमारे महान क्रिकेटर अब क्या करेंगे ? वे बेचारे तो क्रिकेट खेलने के अलावा दूसरा कोई काम जानते ही नहीं ? बचपन से ही माँ-बाप ने हर चीज से दूर रखकर बल्ला जो पकड़ा रखा है। अपने देश की तो खासियत ही यही है, अगर आपके हाथ में पैसा कमाने का सूत्र लग जाए तो न पढाई-लिखाई की जरूरत है ना नीति-नैतिकता सीखने की। पैसा आऐगा तो इस सब बकवास को कोई नहीं पूछेगा। अब, जब नीलाम-बोली में बिककर मालिक की अर्दलाई करना पड़ेगी तो आटे-दाल का भाव पता चलेगा।
      एक और मुसीबत उनपर पड़ेगी जिन्होंने बल्ला चलाने के अलावा कुछ नहीं सीखा। मान लीजिए शाहरुख, प्रिटी जिंटा का मन कभी करे कि चलो अब ठुमके लगाओं तो कच्चे-पक्के ठुमके तो वे लगा लेंगे, क्योंकि आजकल सारे क्रिकेटरों को यहाँ-वहाँ ठुमके लगाते काफी देखा जा रहा है, लेकिन खुदा ना खास्ता खरीदारों का कभी मन करे कि -बहुत हुआ क्रिकेट अब जरा बाज़ार से सब्जी-भाजी ले आओ, तो फिर वे बेचारे क्या करेंगे। सब्जी तो उनके बाप ने कभी नहीं खरीदी ! या मान लो कभी मालिक का मन करे कि आज पाँच सितारा होटल का खाना नहीं खाना है, और वह गुलाम से कहे, चल रे आज मक्के दी रोटी सरसो का साग बना ला, तो हमारा महान क्रिकेटर बेचारा क्या करेगा ? भई मालिक तो मालिक है कोई भी हुक्म छोड  सकता है, गुलाम मना कैसे करेगा ? हो सकता है मालिक गाड़ी की चाबी हाथ में थमाता हुआ कहे, चलो गाडी ड्राइव करो, मुझे स्टेडियम तक ले चलो, जहाँ तुम्हारा मैच होने वाला है……. और खेलना कैसा भी, गाड़ी जरा ढंग से चलाना, एक स्क्रैच भी नहीं आना चाहिये, वर्ना किसी दूसरे को मैदान में उतार दूँगा, तुम दरबानी करना फिर मेरे बंगले की।
      रोम में ग्लेडिएटर हुआ करते थे, वे उच्च कोटी के दास लड़ाके हुआ करते थे। उन्हें पाने के लिये सामंतों को तगड़ी बोली लगाना पड़ती थी, ज्यादा से ज्यादा कीमत देकर उन्हें खरीदना पड़ता था। वे गजब के लडाके होते थे। प्राण तजने तक एक दूसरे के खिलाफ खूनी जंग लड़ कर सामंती प्रभुओं का मनोरंजन करते थे, उन्हें खुश रखते थे। मालिक उन्हें चिल्ला-चिल्ला कर लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे, जैसे पाड़ों को किया जाता है। अब अनकरीब यही नज़ारा क्रिकेट में भी देखने को मिलेगा। सारे मालिक जिनके करोड़ों रुपये क्रिकेटरों पर खर्च हुए हैं, पवेलियन में बैठकर चिल्ला-चिल्ली करेंगे -मारो धोनी मारो, बॉल ढूँढे नहीं मिलना चाहिये……… अरे पठान बाउंसर फेंक, मुँह तोड़ , नहीं बन रहा तो बालिंग-वालिंग छोड़ , मुक्का मार साले को, नाक तोड़ ……..। साले पैसे वसूल ना हुए तो कपड़े धुलवाऊँगा तुझसे।
        दासों की उस जमाने में बडी दुर्दशा होती थी। रहने के लिए मिलने वाले बाड़ों में मुर्गी का रहना तक मुश्किल था। क्रिकेटरों को भी वो दिन देखना पड़  जाए तो क्या होगा ? मैच के लिए मैदान में, फिर पॉव में चेन डालकर बाड़े  में बंद। जीते तो खाना मिलेगा, हारे तो कोड़े पडेंगे। जितने रन बनाओगे, चौके-छक्के लगाओगे, उतना खाना मिलेगा। जीरो पर आऊट हुए तो सूखी रोटी प्याज  भी नहीं मिलेगी। विकेट लोगे तो खीर-पूरी मिलेगी, नहीं तो मुँह तकना उनका जो मुर्गा शेम्पेन का आनन्द लेंगे।
      वाह उदारीकरण वाह ! निजीकरण की यह नाजायज़ संतान उदारीकरण का ऐसा बेमिसाल इस्तेमाल इतनी जल्दी होगा, सोचा नहीं था। देश के बहुत सारे लोगों को तो धनकुबेरों ने पहले ही से अपने घर के दरवाज़े पर बाँध रखा है, खिलाड़ियों को भी नीलामी में खड़ा होना पड़ेगा, सोचा नहीं था।
व्यंग्य ब्लॉग में दिनाँक 19 मई 2009 को लिखी गई।

शनिवार, 8 जनवरी 2011

इस कड़ाके की ठंड में

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
      बर्फ की सिल्लियों पर अपराधी को लिटाकर कोड़े फटकारते हुए पुरानी भारतीय फिल्मों में कई बार देखा है, वास्तव में ऐसा होता है या नहीं पता नहीं, मगर मठ्ठर अपराधियों ने कभी मुँह खोला हो याद नहीं पड़ता। इन दिनों ठंड ने जो कहर बरपाया है, अपराधियों को बर्फ पर लिटाने की जरूरत ही नहीं है। एक बाल्टी ठंडे पानी से खुले मैदान में नहाने की सजा दे दी जाए, अच्छे-अच्छे अपराधी अपराध कबूल लेंगे। पुलिस के लिए इससे बढ़िया थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। ट्रायल में भी किसी अपराधी को फुसलाना हो तो दो कम्बल एक्स्ट्रा दिलवाने का लालच दे दिया जाए या डराना हो तो दिया हुआ कम्बल छुड़ा लेने की धमकी दी जाए, मामला सुलझ जाएगा।
      इन दिनों आप घर के दरवाजे़ खुले रखकर बिंदास सो सकते हैं, घर में तिजोरी हो तो उसे भी खुली रख सकते हैं। कोई पेशेवर चोर ऐसी कड़ाके की ठंड में घर से बाहर निकलने से रहा। वह घर में रजाई में दुबक कर उष्मा सुख लेगा या हाड़-तोड़ सर्दी में ताले चटकाता फिरेगा। हाँलाकि चोर के लिए तो इन दिनों बड़ा फेवरेबल सीज़न है, रेल की पटरियाँ चटक रही हैं, तो खोजने पर ताले-कुंदे भी चटके हुए मिल सकते हैं। चोरी करने में आसानी हो सकती है। घर के अन्दर भी बड़ी सहूलियत से माल समेटा जा सकता है। पूरा परिवार रज़ाई में दुबका हुआ चोर को बस निहार भर सकता है, कौन रजाई के बाहर निकलकर उसे पकड़ने की ज़हमत उठाएगा। सर्दी के मारे कंठ से पकड़ों-पकड़ों का स्वर तक नहीं निकलने वाला। लेकिन फिर भी मेरा दावा है इतनी सुविधाओं और सहूलियतों के बावजूद चोर इस ठंड में बाहर निकलने की गलती कभी नहीं करेगा।
      भ्रष्टाचार इन दिनों ठंड के बाद दूसरा बड़ा मुद्दा है जिसपर चारों ओर तूमार मचा हुआ है। कुछ दिनों पहले वह प्राथमिकता में पहला था। ठंड ने उसका स्थान ले लिया है। भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह ठंड बड़ी कारगार है। भ्रष्टाचार का एकमात्र प्रकटीकरण है नोटों की गड्डियाँ। ऐसी ठंड में कौन नोट गिनेगा। ना देने वाला बिना गिने देना चाहेगा ना लेने वाला बिना गिने लेगा। कौन कोट की जेब से बाहर हाथ निकालकर अपना खून जमवाएगा। माना जा सकता है, कि इन दिनों लेन-देन में सुस्ती चल रही होगी और भ्रष्टाचार पर प्राकृतिक अंकुश लगा होगा। सरकार की इच्छा शक्ति अगर ज़ोर मारे तो भ्रष्टाचार के सभी अड्डों पर ‘प्रशीतक’ लगवाकर इससे बारहों महीने चौबीस घंटे मायनस टेम्प्रेचर मेंटन कर नोटों का लेन-देन रोका जा सकता है। भ्रष्टाचार पर अपने आप अंकुश लग जाएगा।
       ठंड के मारे चारों ओर अमन चैन है, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं है। दिमाग की सारी खुराफाती ऊर्जा शरीर को ठंड से बचाने में खर्च हो रही है। महँगाई के मारे हालाँकि कंडे-लकड़ी खरीदकर गरीब का आग तापना भी मुश्किल है परन्तु इस कड़ाके की ठंड में लोग महँगाई तक को भूल गये हैं।

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

भ्रष्टाचार में भ्रष्टाचार

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//      
          नेताजी छुटभैयों को समझा रहे है- ऐसी कोई खराब स्थिति नहीं है, बिल्कुल निराश होने की जरूरत नहीं है, एक मछली तालाब को गंदा कर रही थी, हमने उसे बाहर निकाल फेंका। अब सब ठीक हो जाएगा। सभी लोकतांत्रिक प्रणालियाँ बिल्कुल ठीक तरह से काम कर रहीं हैं, आप लोगों को लोकतंत्र पर भरोसा रखना चाहिये।
          एक छुटभैया गर्मी खाता हुआ बोला-क्या खाक भरोसा रखना चाहिये। थोड़े दिन पहले भी आपने कहा था कि एक मछली तालाब को गंदा कर रही है, हमने उसे निकाल फेंका है, फिर यह दूसरी मछली फिर कहाँ से आ गई? यहाँ तो हर थोड़े-थोड़े दिनों में एक-एक नई मछली बाहर निकल रही है। लगता है पूरे तालाब में ही गंदगी मचाने वाली मछलियाँ भरी पड़ी हैं। आखिर हम कब तक बर्दाश्त करें!
          नेताजी बोले-चिन्ता मत करों हमने भी यहाँ-वहाँ बहुत से मछुआरे बिठा रखें है जो लगातार देख रहें हैं कि कौन-कौन सी मछली तालाब गंदा कर रही है।
          छुटभैया बोला- इससे क्या फर्क पड़ने वाला है, हमें तो नुकसान हो रहा है! यह अच्छी बात नहीं है। आप को जल्दी कुछ करना चाहिये, वर्ना ठीक नहीं होगा।
          नेताजी फिर समझाते हुए बोले- नाराज़ होने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। इतने बुरे हालात नहीं है।
          छुटभैया बोला- कैसे बुरे हालात नही हैं, कोई सौ-पचास रुपये का हेर-फेर कर रहा हो तो चुप भी बैठें, मगर यह क्या है! करोड़ों रुपए लोग खा ले रहे हैं, और डकार भी नहीं ले रहे। और आप लोग चुप बैठे हुए हो। कैसे नाराज़ ना हों!
          नेता जी बोले- कोई चुप बैठे हुए नहीं हैं, हमारे पास बराबर पहुँच रहा है, मेरा मतलब है हर समाचार हमारे पास पहुँच रहा है।
          छुटभैया दाँत भींचता हुआ बोला-साहब, भ्रष्टाचार की इन्तहा हो गई है अब। जनता को तो हम सम्हाल लेंगे लेकिन खुद हमसे अब रहा नहीं जाता, हाथ कसमसा रहे हैं। अब कोई अगर हमारे हाथ से पिट गया तो फिर मत कहना।
          नेताजी को गुस्सा आ गया, वे चिल्लाए-क्या समस्या क्या है रे तेरी, बार-बार धमका रहा है।
          छुटभैया बोला- समस्या क्या है! हम क्या बेवकूफ हैं जो मेहनत करके आप लोगों के लिए वोट लेकर आते हैं। आप लोग करोड़ों रुपए अकेले खा जाते हो तो हमें तो ठगा सा महसूस होता है ना! कसम से आत्मा तिलमिलाकर रह जाती है। लोकतंत्र है तो उसका मान करना चाहिये, ऐसा थोड़े ही चलेगा कि खुद ही पूरा खा जाओ। यह तो भ्रष्टाचार में भी भ्रष्टाचार वाला मामला हो गया। जबकि हमारे देश में भ्रष्टाचार में शिष्टाचार की परम्पराएँ हैं।
          नेताजी छुटभैये का मुँह देखने लगे। बाकि सारे छुटभैये भी मौजूदा परिस्थितियों पर आक्रोश जाहिर करते हुए हो-हल्ला मचाने लगे।

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

भ्रष्टाचार चिन्तन

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          कुछ प्रबुद्ध नागरिक गम्भीर चिन्तन करने के लिए एकत्र हुए। एक नेताजी ने चिन्तन शुरू करते हुए कहा-कितनी चिन्ता की बात है कि देश में भ्रष्टाचार एक बहुत ही चिन्ताजनक दशा में पहुँच गया है। हम किसी मन्त्री के पास कोई काम करवाने जाते हैं तो उसे काम करने से ज़्यादा इस बात की चिन्ता रहती है कि हमंने उस काम के लिए कितना माल लिया है।
          तत्काल मन्त्रीजी बोल पड़े- नेताजी बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। बेइमान लोग काम हाथ में लेते वक्त हमारे नाम से रिश्वत लेते हैं, मगर इधर देते-दवाते कुछ हैं नहीं, पूरा माल खुद ही हड़प कर जाते हैं। भ्रष्टाचार का यह तरीका बेहद चिन्ताजनक है। जिसके नाम से जो लिया है वह उसे दिया जाना चाहिए।
          एक आला अफसर बोले- हम जब लाखों रुपया खर्च कर अपनी पोस्टिंग करवाते हैं तो हमारी यह अपेक्षा रहती है कि हमारे मातहत अफसर जल्दी से जल्दी हमारी रकम की भरपाई करें। मगर वह कम्बख्त उगाही तो कर लेता है, पर हम तक पहुँचाने में मक्कारी करता है। हम अगर तबादला कर दें तो हमारा ही हिस्सा ऊपर वालों को खिलाकर अपना तबादला रुकवा लेता है। बहुत ही खराब समय आ गया है।
          एक पुलिस महकमें के अफसर बोले- सभी जगह यही हाल है श्रीमान। अब बताइये आजकल इतना अपराध हो रहा है, इतना अपराध हो रहा है कि पूछिये मत, पैसे की रेलमपेल है। मगर नीचे वाले हफ्ता वसूली तक में चुंगी कर लेते हैं, ऊपर वाले सोचते हैं कि हमने कर ली। डिपार्टमेंट में बेइमानों की संख्या बहुत बढ़ गई है।
          एक प्रकान्ड कानूनविद उठकर बोले-देखिए सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार कानून के धंधे में है। आदमी को सबसे पहले पुलिस वाले थाने में ही चूस लेते हैं, फिर अदालत में दलाल, मुशी, वकील उसके कपड़े उतार लेते हैं और एक नंगे चुसे हुए आदमी को हमारे पास भेज दिया जाता है। यह कोई बात हुई। आखिर हमने इतनी मोटी-मोटी कानून की किताबें इसलिए पढ़ी हैं कि हमारे हाथ कुछ लगे ही नहीं ? यह अच्छी बात नहीं है। करप्शन एक दिन देश को खा जाएगा।
          एक व्यापारी अपनी व्यथा सुनाता हुआ बोला-आजकल व्यापार करना बड़ा मुश्किल हो गया है साहेबान। नकली माल की कीमत इतनी बढ़ गई है कि हमें कुछ बचता ही नहीं रहा है। असली माल बेचो तो इस्पेक्टर केस बना देता है। इस कदर भ्रष्टाचार हो गया है कि बच्चों के भूखों मरने की नौबत आ गई है। यह स्थिति सुधरनी चाहिए।
          कार्पोरेट घराने का एक प्रतिनिधि बोला- आजकल देश चलाना कितना मुश्किल हो गया है। हर मंत्री, नेता, अफसर, पुलिस-प्रशासन की नज़र हमारी तिजोरी पर ही रहती है। हर आदमी जनता को लूटकर कमाए धन में से हिस्सा चाहता है। यह कोई अच्छी बात है क्या ? देश में जल्दी से जल्दी एक नई क्रांन्ति आना चाहिए।
          तमाम प्रबुद्धजन भ्रष्टाचार के सम्बंध में अपने कटु अनुभवों से भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने के बारे में चिंतन करते रहे, देश अपनी रफ्तार से चलता रहा।

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

चोरों का डाटा चोरी करने की तकनीक

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//  
    हाल ही में एक धुरन्धर भारतीय गुप्तचर ने भारत के आन्तरिक सुरक्षा विभाग को एक अत्यंत गुप्त रिपोर्ट भेजी है। गुप्त इतनी है कि भेजने वाले तक को पता नहीं है। रिपोर्ट में यह महत्वपूर्ण खुलासा किया गया है कि अमरीका में कुछ ही दिनों पहले एक बहुत ही जबरदस्त आतंकवादी हमला किया गया है जिसका जिम्मेदार कोई ‘असाजे’ नामक खूँखार आतंकवादी संगठन है और इस संगठन का सरगना कोई ‘विक्की’ नाम का आतंकवादी है। विक्की इन दिनों ब्रिटेन में फरारी काटता हुआ पकड़ा गया है।
    यह आतंकवादी जिसके बाप का नाम ‘लीक्स’ बताया जाता है, एक नई तरह का आतंकवादी है जो कम्प्यूटर में से गोपनीय सरकारी जानकारियों को चुराने में माहिर है। अमरीका की बहुत सारी गुप्त जानकारियाँ चुराकर उसने अमरीकी गोपनीयता प्रणाली की खटिया खड़ी कर दी है। इसमें सबसे अहम खुलासा जो हुआ है वह अमरीकियों द्वारा दुनिया भर के नेताओं को दी जाने वाली गालियों के संबंध में है। इसके अलावे उसने ऐसी-ऐसी जानकारियाँ चुराने में सफलता हासिल की है जिन्हें चुरा सकने की क्षमता और कुशलता केवल अमरीका के पास ही मौजूद है। अमरीका वाले ‘विक्की लीक्स’  के प्रत्यर्पण की कोशिश में हैं, हो सकता है इस रिपोर्ट के श्रीमान तक पहुँचने के पहले ही उसे अमरीका को सौंप दिया जाए।
    समझा जाता है कि इस जानकारियाँ चुराने वाले शख्स की अमरीका को इसलिए ज़रूरत है ताकि उसे पकड़कर दूसरे मुल्कों की गोपनीय जानकारियाँ चुराने के काम में लगाया जा सके। चुराए जाने की दृष्टि से हमारे देश में कई सारी अहम जानकारियाँ है जिन्हें इस आतंकवादी के चुंगल से बचाया जाना बेहद ज़रूरी है। जैसे हमारे देश के नेता लोग यदि दूसरे मुल्कों के शासनाध्यक्षों को गालियाँ देते होंगे तो वे अवश्य ही बहुत गंदी-गंदी होती होंगी और उनका दुनिया के सामने आना हमारे लिए बहुत ही नुकसानदेह होगा। हमारी गालियाँ सारी दुनिया में फैल जाएँगी और यह बौद्धिक सम्पदा अधिकार के हनन का मामला बन जाएगा। फिर, भ्रष्टाचार, दलाली, कमीशनखोरी, यत्र-तत्र-सर्वत्र सांठगांठ, कालेधन संबंधी सूचनाओं का जो भंडार हमारे देश के कम्प्यूटरों में भरा होगा वह तो दुनिया के तमाम सूचनाओं के भंडार से कई गुना ज़्यादा हो सकता है। वैसे तो अपने महारथी अपनी गोपनीय सूचनाएँ ज़्यादातर अपने दिमागों में ही सुरक्षित रखते हैं जहाँ ‘विक्की’ के पहुँचने की संभावना शून्य है, फिर भी एहतियात बरतने की आवश्यकता है।
    एक और महत्वपूर्ण बात मैं विभाग के माध्यम से सरकार के ध्यान में लाना चाहता हूँ वह यह कि इस आतंकवादी द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली चोरों का डाटा चोरी करने की यह एक नई तकनीक है इसे हमारे देश के स्कूल-कालेजों में सिखाने के लिए विशेष प्रयास किये जाने चाहिये ताकि हमारे देश के लाखों-करोड़ों नौजवान अपनी बेरोज़गारी दूर करने के लिए सरकार के भरोसे ना बैठकर स्वरोजगार के ज़रिए अपना भविष्य सँवार सकें।
नईदुनिया में दिनांक 13.12.2010 को प्रकाशित ।   

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

सुने न सुने

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//       
            एल्लो, यह भी कोई बात हुई! पूछा जा रहा है कि हमने पी.एम.की क्यों नहीं सुनी ! एक बात साफ-साफ कहे दे रहे हैं कि एक यही आदत हममें कभी नहीं रही। बड़ों की बात सुनना अच्छी बात है, मगर हममें यह गुण ही होता तो क्या हम राजनीति में आते ? बचपन से इसी बात पर पिटते आ रहे हैं कि हम किसी की सुनते नहीं। पहले माँ-बाप से पिटे, फिर मास्टरों से पिटे, फिर गली-मोहल्लों में पटक-पटक कर पीटे गए। पिटते-पिटते कब राजनीति में आ गए पता ही नहीं चला। राजनीति में भी पहले अपोज़िट पार्टी वालों से पिटे फिर अपनी ही पार्टी के अपोज़िट गुट वालों से पिटे, मगर मजाल है जो हमने कभी किसी की सुनी हो। अरे, अगर सुनना ही होती तो पुलिस में जाते, फौज में जाते, दिन-रात सुनते रहते दाएँ मुड़, बाएँ मुड़। मगर जब सुनने-वुनने के संस्कार हमने विरसे में पाए ही नहीं तो फिर यह गिरी हुई हरकत हम करते ही क्यों ?
            अव्वल तो हमें यह बताया जाए कि मंत्री बनाते समय हमसे कब कहा गया कि हमें पी.एम.की सुनना ही पड़ेगी! दूसरे यदि हमसे सुनने का ही काम कराना था तो फिर क्यों हमें मंत्री बनाया गया! चलो बना दिया तो बना दिया, फिर क्यों नहीं पार्लियामेंट में हमसे शपथ खवाई गई कि हम ऐसे पी.एम.की बात भी सुनेंगे जो कुछ बोलता ही नहीं। चार लोगों के सामने अगर हमसे माइक पर यह कसम खवा ली जाती तो हम सुनते, बिल्कुल सुनते। बल्कि, उन्हीं की सुनते, और किसी की सुनते ही नहीं। जनता की तो बिल्कुल ही नहीं सुनते।
            चलो छोड़ो, आप तो यह बताओ कि संविधान के, किस पन्ने के, किस अध्याय की, किस धारा की, किस उपधारा के, किस संशोधन में यह लिखा हुआ है कि हमें पी.एम.की सुननी ही सुननी है। अगर लिखा हो तो बताओ, हम सुनने को तैयार हैं। हमें फिर मंत्री बनाओं, पी.एम.कहेगा कि सर के बल खड़े हो जाओ, तो हम सर के बल खडे़ हो जाएँगे। मगर संविधान में जब ऐसा कुछ लिखा ही नहीं है तो फिर हमसे ऐसे असंवैधानिक सवाल-जवाब क्यों किये जा रहे हैं, समझ में नहीं आ रहा।
            ठीक है कि हमें किसी की सुनने की आदत नहीं, परन्तु ऐसे कोई कान के हम बहरे नहीं है कि कोई कुछ कहे और हम सुने ही ना! मगर यदि कोई बहुत ही धीमें-धीमें कुछ कहे तो हम भला कैसे उसकी बात सुन लें। अच्छा हो कि सभी को सरकारी खर्चे पर कान की मशीन दिलवा दी जाए ताकि यह समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाए।
          आइन्दा के लिए यह भी सुनिश्चित कर लिया जाए कि पी.एम.ऐसा बनाया जाए जो बोलता हो और ज़ोर से बोलता हो। तभी हम उसकी बात कान खोल कर सुन पाएँगे। अगर ऐसा ही शांत, धीर-गम्भीर, विद्वान, बुद्धिजीवी किस्म का पी.एम.बनाया गया तो हम बताए दे रहें हैं कि हम सुने ना सुने कोई गारन्टी नहीं।   
दिनाँक 10.12.2010 को पत्रिका में प्रकाशित।