शनिवार, 9 अप्रैल 2011

मॉडल और विश्वकप

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
              हम विश्वकप क्यों जीत गए ! इसलिए क्योकि एक खूबसूरत मॉडल ने एक बहुत ही शौर्य, पराक्रम और साहसपूर्ण घोषणा कर दी थी कि वह भारतीय क्रिकेट टीम के सामने निर्वस्त्र होकर केटवॉक करेगी, अगर टीम विश्वकप जीत पाई। इसी लालच में टीम इन्डिया ने वानखेड़े स्टेडियम में अपने सारे अस्त्रों-शस्त्रों को धो-माँजकर, ऑइलिंग-ग्रीसिंग करके श्रीलंका के खूँखार चीतों को धूल चटा दी। उन्हें शायद यह डर भी रहा होगा कि यदि वे हारे तो कहीं यह सुनहरा अवसर श्रीलंकाई टीम को न मिल जाए।
            आप लोग मेरी बात को यदि गंभीरता से लें तो आपको एहसास होगा कि उस नादान मॉडल को निर्वस्त्र होने से बचाने के लिए भारतीय संस्कृति का तकाज़ा क्या था! किसी भी संस्कृति रक्षक से पूछ लीजिए, वह यही कहेगा कि भाड़ में गया विश्वकप स्त्री की लाज की रक्षा करने के लिए भारतीय क्रिकेट टीम को फायनल मैच हार जाना चाहिए था, ताकि वह मॉडल कपडे़ पहनी रहे, दुनिया के सामने स्त्रीत्व की मर्यादा कायम रहे। लेकिन, चूँकि भारतीय क्रिकेट टीम ने फालतू के आदर्शवाद में पड़कर मैच को हाथ से नहीं जाने दिया, इसका मतलब यही है कि पूरी टीम अपनी आँखें सेंकना चाहती थी।
           अंततः हुआ क्या पता नहीं चला, परन्तु धोनी का सिर संदिग्धता के दायरे में है, पता नहीं उन्होंने मुँडन कराया है या उनकी नई नवेली पत्नी ने इस प्रकरण की पृष्ठभूमि में उनके बाल नोचे हैं। बहरहाल, पब्लिक भी किस कदर खुश हो होकर तालियाँ पीट रही थी, शायद इसीलिए कि मॉडलों को कम कपड़े पहने हुए देख-देखकर बोर हो गए, अब कुछ नया देखने को मिलेगा।
           वाहियादी की भी हद है। एक लड़की, एक अश्लील प्रस्ताव रखती है और उसे एक तमाचा जड़कर बाप की भूमिका निभाने वाला देश में कोई नहीं। कानून के पास भी वह आँखें नहीं जो चौड़ी करके दिखाई जाने पर बिगड़ी हुई बच्चियाँ रास्ते पर आ जाएँ। कितनी बड़ी बिडंबना है कि इस युग में द्रोपदियों के तन से कपड़े खींचने के लिए किसी दुर्योधन की ज़रूरत नहीं है, द्रोपदियाँ खुद ही कपड़े उतार-उतार कर फेंकने को बेताब हैं। कोई कृष्ण भी नहीं जो पीछे से कपड़ों की बेरोकटोक आपूर्ति करता रहे।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

पायलेटी का फर्ज़ी लायसेंस


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             जब से पायलेटों के साहस, शौर्य और पराक्रम की गाथा सुनी है, हवाई जहाज़ों की उड़ानें किसी हॉरर फिल्म की तरह रोज़ रात को बारबार सपने में आती हैं। हमारी खुशकिस्मती है कि हवाई ज़हाजों से फेरे लगाने की हमारी औकात नहीं, वर्ना फर्ज़ी प्रमाणपत्रों के आधार पर हासिल किया गया पायलेटी का लायसेंस हमें कौन से समुद्र में मछलियों का चारा बनवा देता, कुछ कहा नहीं जा सकता।
          क्या पता कब ये फर्जी पायलेट बंधु हवाई नक्शा ना समझ पाने की मजबूरी में जहाज़ को कहीं रेगिस्तान में ही उतार देते और कहते कि यहाँ से पैदल घर जाओ। इससे भी खतरनाक यह हो सकता था कि वे गफलत में हवाई जहाज दिल्ली की जगह इस्लामाबाद में उतार मारते, खामोखां पोलिटिकल इश्यू खड़ा हो जाता। आई.एस.आई. वाले जेल में डालकर कोड़े लगाते और वर्ड कम्यूनिटी के सामने इल्ज़ाम जड़ते कि हिन्दुस्तान के व्यंग्यकार आजकल पाकिस्तान की जासूसी करके पेट पाल रहे हैं। यह भी अच्छा हुआ जो आज तक हमें किसी ने हवाई जहाज़ का मुफ्त का टिकट पकड़ाकर उन कम्बख्तों के हवाले नहीं किया जो फर्जी लायसेंस जेब में रखकर बेकसूरों को मौत के मुँह में लेंडिंग-टेकआँफ कराते आ रहे थे।
          फर्जीवाडे़ का यह किस्सा हमारे बब्बन खाँ ने जब से सुना तभी से वे अफसोस के मारे मुँह लटकाकर बैठे हैं कि भटसुअर’ (टेम्पों) का लायसेंस बनवाते समय दो-चार फर्जी कागज़ात और बनवा लेते तो हवाई जहाज़ का भी लायसेंस बन जाता। देड़ सौ की जगह दो सौ खर्च होते और दलाल लायसेंस घर पर देकर जाता सो अलग। फिर, है क्या हवाई जहाज़ चलाने में, जैसे गेर’, ‘किलच’, ‘एक्सीलेटर’, भटसुअर में होता है वैसा ही तो हवाई जहाज़ में भी होता होगा, और क्या।
          पायलेट की सीट पर सफेद ड्रेस में कसम से क्या दिखलौट लगते! सुना है उसमें खूबसूरत मोहतरमाएँ ईत्र-फुलेल लगाए बार-बार पायलेट कने चक्कर लगाती रहती है। यहाँ भटसुअर में दिन रात धूल-धुआ और डीज़ल की बदबू के साथ-साथ, आठ-आठाने के लिए सवारियों से झिक-झिक करते रहो और पुलिस वालों को हफ्ता खिला-खिलाकर खुद कंगले हो जाओ। हवाई जहाज़ चलाते तो आसमान में कैसे हफ्ता वसूली करती पुलिस ! एयर कंडीशन काकपिट में बैठकर बड़े-बड़े लोगों को दिल्ली से बम्बई, बम्बई से कलकत्ता, कलकत्ता से चेन्नई, लिये घूमते। थोड़े और पैसों की जुगाड़ करके इन्टरनेशनल पायलेटी का लायसेंस बनवा लेते, फिर न्यूयार्क से लन्दन, लन्दन से पेरिस, पेरिस से होनोलूल गोरी सवारियाँ लिये घूमते, कितना मज़ा आता।
          इन दिनों पर्यावरणविदों की कारस्तानी से भटसुअर बंद हो गए हैं और बब्बन खाँ शान्तिवाहनमें मुर्दे ढो रहे हैं। बनियान तोंद के ऊपर चढ़ाए ड्रायवर की सीट पर बैठे-बैठे वे बस एक ही बात सोचते रहते हैं कि शांतिवाहनही चलाना था तो उससे अच्छा हवाई जहाज़ ही चला लेते, क्या फर्क पड़ता, एक ही तो बात है। नकली कागज़ातों पर पायलेट बना शख्स हवाई जहाज़ उड़ाए तो वह शांतिवाहनसे कम कतई नहीं हो सकता, न जाने कब, कहाँ हवाई यात्रियों को स्थाई शांति दिलवा दें।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

एव्री डे फूल्स डे

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            1 अप्रैल का दिन हो तो सारे बेवकूफोंका मन करता है कि कोई मूर्खतापूर्ण हरकत कर उन्हें बेवकूफ बनाए और कोई न कोई उन्हें मिल भी जाता है जो सुबह-सबेरे ही उन्हें बेवकूफ बनाकर ठहाके लगाता हुआ चलता बनता है। समझदारआदमी को मूर्ख बनाने के लिये किसी एक दिन की आवश्यकता नहीं है, अपने देश में तो हर एक दिन फूल्स डेहोता है और हर समझदारआदमी दूसरे को बेवकूफ समझकर एक-दूसरे को फूलबनाने में लगा रहता है। बेटा बाप को फूलबनाता है, बाप माँ को, माँ-बाप सास-ससुर को फूल बनाते हैं।
          सुबह होते ही दूध वाला ठाठ से पानी मिला दूध घर-घर बाँटकर सबको मूर्ख-बना जाता है, और उधर तमाम बाबा-बाबियाँ टी.व्ही. के भिन्न-भिन्न चैनलों पर साक्षात प्रकट होकर नाना विधियों से समझदारों को बेवकूफ बनाकर खुद नोट बनाते हैं। फिर दुनिया भर की कम्पनियाँ अपने घटिया उत्पादों को फिल्मी हीरो-हीरोइनों के ज़रिये बेचना प्रारंभ करती हैं। सिलसिला शुरू होता है चमड़ी का रंग गोरा करने के दावों और कपड़ों पर दूध सी सफेदी देने के झूठे विज्ञापनों से। देश भर को फूहड़ गीत-संगीत, कामेडी-सर्कसों और हमेशा बनी-ठनी, लड़ती रहने वाली औरतों के मूर्खतापूर्ण षड़यंत्रों वाले सिरियलों से एपीसोड दर एपीसोड मूर्ख बनाया जाता है।
          मूर्ख बनाने के कारोबार में सबसे आगे हैं राजनैतिक पार्टियाँ इनके पास एक से एक शातिर नेताओं की पलटन होती है जो हर परिस्थिति में अच्छे से अच्छे समझदारको पलक झपकते ही मूर्ख बना देती है। इन्हें कभी किसी फूल्स डेकी ज़रुरत नहीं पड़ती।         देश की हालत कितनी भी खराब हो, भूमंडलीकरण के मजे़ लूटने के लिये हमें दुनिया को मूर्ख बनाते रहना पड़ता है। बड़े-बड़े मॉलों, एयरपोर्टो, मेट्रो-सेट्रो और कॉमनवेल्थ, विश्वकप जैसे  आयोजनों के झंके-मंके से विश्व कम्यूनिटी को बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा करना पड़ता है। हमारे शीर्ष बिजनेस प्रबंधक यह काम बखूबी करते हैं, दुनिया को पता ही नहीं पड़ता कि आलीशान गगनचुंबी इमारतों के पीछे हमारी जनता की हालत क्या है।
          इस तरह देखा जाए तो एव्री डे फूल्स डेवाली बात है। पूरे साल हम किसी न किसी को मूर्ख बना रहे होते हैं या कोई हमें मूर्ख बना रहा होता है।

सोमवार, 28 मार्च 2011

महँगाई में पेट भरने का सस्ता तरीका

नईदुनिया में प्रकाशित
//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
        पैदाइश से लेकर अब तक एक बात जो शिद्दत से महसूस होती आई है वह यह कि ‘महँगाई’ से बड़ा मुद्दा इस देश में दूसरा कोई कभी नहीं रहा। बाप-दादों के ज़माने में ‘शुद्ध घी’ जब ‘पावली-सेर’ आता था तब भी ‘महँगाई’ एक विराट समस्या होती थी और आज जब चार सौ रुपए किलो पाया जाता है तब भी ‘महँगाई’ उसी साइज़ की समस्या है।
    दुनिया में चाहे दूसरी जितनी भी झँझटें दरपेश हों लेकिन कोई सच्चा भारतीय अगर किसी विषय पर हर वक्त चिंतनशील पाया जाता है तो वह सिर्फ और सिर्फ ‘महँगाई’ ही है। इस ज्वलंत विषय पर वह चौबीसों घंटे और सातों दिन बहस-मुबाहिसे में मुब्तिला रह सकता है, नतीजा चाहे कुछ निकले या ना निकले। दीन-दुनिया से विरक्ति उपजाने वाले चिर-शांतिस्थल ‘मरघट’ में भी यदि उसे मौका मिले तो वह ‘ठठरी’ को एक तरफ छोड़कर ‘महँगाई’ के मुद्दे पर ही वैचारिक संघर्ष चालू कर देगा।
    ऐसा शायद उसी दिन से होता आ रहा होगा जिस दिन से ‘बाज़ार’ नामक खतरनाक संघटना अस्तित्व में आई और धरती पर मुफ्त में उपलब्ध सब्ज़ी-भाजी पहले-पहल मोलभाव में बिकना शुरू हुई। बार्बर सिस्टम में जब अनाज के बदले में कभी थोड़ी कम प्याज़ हासिल हुई होगी तो तत्कालीन आदिमानवों ने एकत्र होकर ज़रूर चिन्ता ज़ाहिर की होगी कि - देखो कमबख्त प्याज़ कितनी महँगी हो गई है! हो सकता है भीषण महँगाई के मुद्दे पर उन्होंने किसी को ज्ञापन भी दिया हो, जिस पर कोई कार्यवाही ना हुई हो।
    मुद्दा महँगाई का हो तो हमारे देश में जनचेतना बहुत ही जबरदस्त किस्म की हो जाती है जो आमतौर पर ‘गालियों’ की शक्ल में अभिव्यक्त होती है, और चूँकि गालियाँ खाने के लिए देश में ‘सरकार’ नामक एक जड़ संघटना हर वक्त हर कहीं उपलब्ध रहती है इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ज़्यादातर इस्तेमाल ‘सरकार’ के खिलाफ ही होता है। आलू-प्याज़ उपजाता कोई है, खेत से उठाता कोई है, मंडी तक लाता, रिटेल में बेचता, खरीदता कोई है और खाता कोई है। इस बीच में कानून के ‘होल’ का इस्तेमाल करके जमाखोरी, कालाबाज़ारी और मुनाफाखोरी का धंधा कोई और ही करता है। परन्तु, जब महँगाई डायन जेब में पड़े रोकड़े को ठेंगा दिखाने लगती हैं तो गालियाँ गरीब ‘सरकार’ को पड़ने लगतीं हैं। सरकारें भी बला की बेशरम होती हैं, महँगाई के मुद्दे पर कुछ ना कर पाने की मुद्रा बनाकर पूरी सहिष्णुता और संयम से गालियाँ खाती रहती है।
    इन दिनों लोग सरकार के हर उस डिपार्र्टमेंट को गालियाँ दे रहे हैं जो गंभीरता से मूक बनकर महँगाई को बढ़ते हुए देखने का काम कर रहा है। जिन्हें उन डिपार्टमेंटों के नाम नहीं मालूम वे सीधे-सीधे सरकार के मुखिया को गरिया रहे हैं। यह बात भी बड़ी अजीब है, कि लोग बाज़ार से सब्ज़ी-भाजी तो छंटाकभर खरीदेंगे, जिससे शायद ही किसी का पेट भरता हो, मगर बीच चौराहे पर खड़े होकर, महँगाई के बहाने बेचारी सरकार को ‘गालियाँ’ भर पेट देंगे। इस भीषण महँगाई में जब और कुछ किया जाना संभव नहीं, पेट भरने का यह तरीका जायज़ हो या नाजायज़, सस्ता तो है।

शनिवार, 26 मार्च 2011

जापान में सुनामी

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          जापान में आए भूकम्प और सुनामी में हुए जान ओ माल के नुकसान को देखकर अपना तो क्या अच्छे-अच्छे पापियों का भी मुँह बंद है। आदत के विपरीत लोग सोचने लग पड़े हैं कि अगर अपने भी देश में इस तरह की विपदा आन पड़ी तो क्या होगा। ऐसे मामलों में लोग सरकार पर, चाहे वह कितनी भी ‘काबिल’ क्यों न हो, जाने क्यों अविश्वास करते है! विश्वास करें भी कैसे! जापान में फुकुशिमा परमाणु संयंत्र की भट्टियाँ परमाणु बम की तरह उड़ जाने से उपजी परिस्थितियों से सबक लेने की नीयत से कुछ दिन पहले मुम्बई में सम्पन्न हुई एक हाईप्रोफाइल कान्फ्रेंस में जिस तरह मंत्री और विधायक खुर्राटे लेते नज़र आए, उससे भले ही यह गलतफहमी हो कि हमारे नेतागण कितने ग़ज़ब के सेवाभावी हैं, सोते हुए भी जनता की चिन्ता करते हैं, लेकिन आम आदमी के पास दूसरी ढेरों ऐसी वजहें हैं जिनके कारण ऐसी आपदाओं के समय वह सरकार पर ना चाहते हुए भी अविश्वास करने पर मजबूर है। मोहल्ले में एक छोटी सी आग लग जाने पर हमारे देश में जिस तरह सैकड़ों नखरों के बाद तीन घंटे की न्यूनतम देरी से फायर बिग्रेड की एक अदद गाड़ी राख के ढेर से चिन्गारियाँ बुझाने आया करती है, अगर भूकम्प या सुनामी आ जाए, परमाणु हादसा हो जाए तो इस अनुभव से तो हम दावे के साथ कह सकते हैं कि भले ही उत्तरी अमेरिका से रेस्क्यू टीम भारत आ जाए परन्तु हमारी फायर बिग्रेड कभी आएगी ही नहीं।
            जापान की प्राकृतिक त्रासदी से (अभी हम इंतज़ार कर रहे हैं कि कोई राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय एन.जी.ओ. इसे मानव निर्मित त्रासदी साबित करे) कुछ दिन स्तब्ध रहने के बाद पैसा उगाने वाले दुनिया भर में अब तक जाग चुके होंगे। कुछ तो स्तब्ध हुए ही नहीं होंगे बल्कि पहले ही दिन से टी.वी. पर त्रासदी की तस्वीरें देख-देखकर कमाई की संभावनाएँ टटोलने में लग गए होंगे। जैसे ‘कबाड़ी’। विकासशील देशों में कबाड़ी होते हैं या नहीं पता नहीं लेकिन हमारे जैसे देश में तो कौन कबाड़ी ऐसा होगा जिसकी, इतनी बड़ी मात्रा में ‘कबाड़’ देखकर बाँछे न खिल गईं हों। कबाड़ भी मामूली लकड़ी, लोहा-लंगड़ भर का नहीं, टी.वी. फ्रिज, इलेक्ट्रॉनिक आयटम, कम्प्यूटर, इंपोर्टेड लक्झरी गाड़ियों यहाँ तक कि हवाई जहाज़ों और पानी के जहाज़ों तक का कबाड़। ऐसा बेशकीमती कबाड़ दुनिया के किसी देश में मिलने वाला नहीं है चाहे कितनी बड़ी उथल-पुथल हो जाए। मेरा खयाल है कि अब तक तो बहुत सारे कबाड़ी पासपोर्ट, वीज़ा दफ्तरों की ओर दौड़ लगा चुके होंगे। हसन अली जैसे बडे़ कबाड़ी तो हो सकता है टोकियों पहुँच भी गए हों।
         जापान में बरबादी का दौर अभी थमा नहीं है, मगर दुनियाभर की कन्स्ट्रक्शन कम्पनियाँ और अन्तर्राष्ट्रीय ठेकेदार जापान को फिर से खड़ा कर देने के लिए उतावले होने लग पड़े होंगे। विभिन्न देशों की सरकारें जापान के साथ अपने मधुर संबंधों की टोह लेने लगी होंगी ताकि वक्त ज़रूरत अपने देश की ठेकेदार फर्मों की मदद कर सकें। एस्टीमेट बनने लग गए होंगे, टेंडरों की चिन्ता दुनिया की सबसे बड़ी चिन्ता के रूप में आकार लेने लगी होगी। भिन्न-भिन्न दलाल सक्रिय होकर मालामाल होने की जुगाड़ें लगाने लगे होंगे। कुछ एजेंसियाँ तो जापानी मंत्रियों-अफसरों की खरीद फरोख्त का ठेका लेने के लिए आतुर हो रही होंगी ताकि टेंडर मनचाही फर्मों के पक्ष में खुल सकें। जापानियों के दुख में कुछ दिन सहभागी बने रहने का धैर्य इन लक्ष्मी उपासकों के पास कहाँ, वे आँखों में अथाह कमाई का लालच लिए जापान के पुनर्निर्माण की बाट जोहने लगे होंगे जबकि जापान अभी ढंग से मातम भी नहीं मना पाया है।

रविवार, 20 मार्च 2011

होली का संकट और बचाव का फुल-प्रूफ प्लान


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट// 
नईदुनिया के होली विशेषांक में प्रकाशित
          होली आने वाली है। श्रीवास्तव साहब के परिवार ने जोर-शोर से तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। जैसे-जैसे होली का दिन पास आता जाएगा, श्रीवास्तव साहब और उनका लम्बा चौड़ा परिवार पूरे उत्साह के साथ मोहल्ले की तमाम होलियों के हो-हल्ले, चंदा माँगने वाली टोलियों के आक्रमण, हुरियारों के हुड़दंग, होली-बाज़ यार दोस्तों के हाथों रंगने से बचने के उच्च स्तरीय प्रयासों में लग जाएगा। रोज़ाना शिखरवार्ताओं के कई-कई दौर चलेंगे, जिनमें किसी भी सूरत में होली से अप्रभावित रहने के योजनात्मक षड़यंत्र रचे जाएँगे।
          सर्वप्रथम, होली के ठीक पहले सपरिवार कहीं ऐसी जगह निकल भागने की प्लानिंग की जाएगी जहाँ उनके परिवार को होली के त्योहार का उनका अपना निजी, परम्परागत संत्रास न झेलना पड़े। न चंदा देना पड़े, न टीन-टपारों का कर्णफोडू संगीत बर्दाश्त करना पड़े, ना रंग-रोगन से मुखारबिन्द और कपड़े खराब होने की संभावना हो। घर-आँगन की दीवारों, गाड़ी-घोड़ों, सोफा-दीवान और दूसरे लक्ज़री आयटमों को खराब होने से बचाने के लिए, साथ लादकर ले जाना फिलहाल अपने देश में काफी कष्टकारक और मँहगा है, इसलिए उन्हें मजबूरन छोड़ना पड़ेगा, फिर भी सफर में इन्हें भी साथ ले जाने के बारे में अवश्य सोचा जाएगा। परन्तु, किराए-भाड़े का महँगा होना, रिज़र्वेशनों का टोटा, बच्चों की परिक्षाओं और सबसे महत्वपूर्ण विधानसभा सत्र के दौरान सरकार को श्रीवास्तव साहब की आपातकालीन सेवाओं की पड़ने वाली आवश्यकता के मद्देनज़र शहर छोड़कर भागने का कार्यक्रम हमेशा की तरह रद्द किया जाकर, घर को ही किसी मजबूत किले में तब्दील करने की योजना पर काम किया जाएगा।
          पहला काम-बच्चों को झूठ बोलना सिखाया जाएगा। कोई भी टोली चंदा माँगने आए तो पहले उन्हें-‘‘दूसरी टोली को चंदा दे दिया गया है’’ कहकर चलता करने की कोशिश की जाएगी, फिर भी यदि वे टलने को तैयार न हों तो-‘‘पापा घर में नहीं हैं’’, कहकर उन्हें फुटाया जाएगा। जब वे मम्मी को बुलाने की ज़िद करेंगे तो मम्मी आटा सने हाथ लेकर उपस्थित होंगी और देश में महिलाओं की आर्थिक परतंत्रता पर रटा-रटाया निबंध सुनाकर अंत में, ‘‘उन्हें कोई आर्थिक अधिकार नहीं हैं’’, कहकर मुसीबत से छुटकार पाएँगी। मौके पर जब मम्मी चंदा गिरोह से बहस कर रही होंगी तब वे -‘‘कितनी महँगाई हो रही है! कहाँ से दें चंदा! घर में कोई हराम की कमाई तो आती नहीं!’’ या, ‘‘तुम लोग यह फालतू का काम आखिर करते क्यों हो, पढ़ाई-लिखाई में मन क्यों नहीं लगाते’’, आदि-आदि फिजूल की प्रगतिशीलता झाड़ने वाले जुमले बोलकर पैसा बचाने की कोशिश करेगी। बच्चे पीछे से-‘‘मम्मी दे दो न, मम्मी दे दो न’’ की पूर्व नियोजित ज़िद करेंगे, और मम्मी उन्हें दो-दो चाँटे लगाकर किवाड़ बंद कर लेगी। फिर दरवाजे़ की संध से चंदा माँगने वाली टोली को अपना सा मुँह लेकर वापस जाता देखकर ठहाके लगाए जाएँगे।
          होलिका दहन के दिन, घर के बाहर कोई पलंग-वलंग, लकड़ी का सामान रखा न रह जाए यह सुनिश्चित किया जाएगा, फिर घर के खिड़की-दरवाज़ों, रोशनदानों से लाउड-स्पीकरों, ढोल-ढमाकों और हल्ले-गुल्ले का स्वर किसी भी कीमत पर प्रवेश न कर सके इसकी व्यवस्था चाक-चौबंद की जाएगी। बाज़ार से रुई का बंडल लाकर रखा जाएगा जिसके छोटे-छोटे गोले बनाकर पहले से ही तैयार रखें जाएँगे ताकि होली की रात उन्हें कान में घुसेड़कर मातमी मुद्रा बनाकर बैठा जा सके। मोहल्ले के शैतान बच्चे चंदा ना देने की क्या सज़ा देंगे इस बारे में सोच विचार किया जाएगा। घर में गोबर की हाँडी फेंकी जाने की स्थिति में कौन गोबर साफ करेगा, और पत्थर मारकर शीशा तोड़े जाने पर कौन झाड़ू लगाएगा यह पूर्व निर्धारित रहेगा। दोबारा काँच लगवाने का खर्चा चंदे से ज्यादा तो नहीं होगा यह भी चिन्तन का विषय होगा।
          सारी व्यवस्थाएँ फुल-प्रूफ होने के बाद भी जैसे घुसपैठिये देश में घुसकर उत्पात मचा ही लेते हैं वैसे ही बावजूद तमाम चाक-चौबंदी के कुछ हुरियारे घर में धुसकर रंग-रोगन चुपड़ ही जाते हैं। इस खतरे से निबटने के लिए परिवार के सभी सदस्यों के लिए अप-अपनी पंसद के फटे-पुराने कपड़े पहले ही झाड़-झूड़कर धूप दिखाकर रखे जाएँगें ताकि होली के दिन उन्हें पहनकर खतरे का सामना बहादुरी से किया जा सके। रंगों को बदन पर स्थाई बसेरा बना लेने से बचने के लिये बाज़ार में उपलब्ध सबसे सस्ता तेल, भले ही वह जले मोबिल ऑइल की श्रेणी का हो, घर में स्टॉक करके रखा जाएगा ताकि अल्ल-सुबह होली के दिन उसे अंग-प्रत्यंग पर लगाकर घटिया केमिकल युक्त सस्ते रंगों, पेंट-वार्निश, आदि की परम्परा से जल्दी-छुटकारा पाया जा सके।
          सिर पर कोई रंग की पुड़िया न उढे़ल दे, जो आठ दिन तक नहाते समय चीख-चीखकर अपनी उपस्थिति की गवाही देता रहे, इसलिए सबको बच्चा-टोपी नुमा अस्त्र उपलब्ध कराया जाएगा और खुद श्रीवास्तव साहब स्कूटर की सवारी के दौरान कभी न लगाये जाने वाले हेलमेट का साल में एक बार उपयोग करेंगे।
          अंत में जब शहर भर के हुरियारे थक कर चूर अपने-अपने घरों में सुस्ता रहे होंगे, श्रीवास्तव साहब और उनका पूरा परिवार हर्षोल्लास और खुशियों के इस त्योहार होली के संकट से सफलतापूर्वक बच जाने की खुशी में पड़ोसियों की भिजवाई गुजिया और मिठाइयाँ खाकर जश्न मनाएगा और फिर हफ्तों-महिनों लोगों को अपनी बहादुरी के किस्से सुनाएगा।

शनिवार, 19 मार्च 2011

बुरा न मानो होली है

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
   होली के मौके पर बरसों से सुनते आ रहे हैं-‘‘बुरा न मानो होली है, बुरा न मानो होली है।’’ सवाल है, इसमें बुरा मानने वाली कौन सी बात है! होली है, अच्छी बात है, खेलो होली, पोतो   गोबर-कीचड़, पानी बरबाद करो, चढ़ाओं भांग-ठर्रा, नालियों में लोट लगाओं, किसी के कपड़े फाड़ो, सिर तोड़ो, होली के नाम पर जो करना है करो। जिसे मानना होगा बुरा लाख मना करने के बाद भी मानेगा और जिसे न मानना होगा नहीं मानेगा।
    वैसे, बेशर्मो की इस दुनिया में आजकल बुरा मानता कौन है। आखिर कोई बुरा मानेगा ही क्यों, क्या उसे पागल कुत्ते ने काट खाया है। बुरा मानना ही है तो उसके लिए वह होली का ही इंतज़ार क्यों करेगा, बैठेठाले कभी भी बुरा मान लेगा, कौन उसका क्या उखाड़ लेगा। चलिए, चोर को चोर कहने की आपकी छिछोरी हरकत पर खुदा न खास्ता कोई बुरा मान ही ले तो आपको क्या लगता है वह चुल्लू भर पानी में डूब मरने के लिए दौड़ पडेगा ? हरगिज़ नहीं।
    शर्म-लिहाज़ के युग में लोगों के बुरा मानकर चुल्लू भर पानी में डूब मरने का डर हुआ करता था, इसलिए चोर को ‘चोर’ कहने के लिए होली का सुअवसर चुना जाता था और पहले उसे भली-भाँति आगाह करके कि- होली है, बुरा न मानो, हँसी मज़ाक में उसे ‘चोर’ कह लिया जाता था। चोर को ‘डाकू’ कहने की योजना हो तो होली की छूट का लाभ लेकर यह भी कर लिया जाता था। समझदार इंसान इशारा समझकर थोड़ा बहुत बुरा मानकर अपने-आपको सुधार भी लेता था।
    अब ज़माना बदल गया है, साल के किसी भी महीने में किसी भी दिन, किसी भी बहाने से आप चोर को ‘चोर’ कहिये, ठग, जालसाज, घोटालेबाज कहिये वह बुरा मानने से रहा। मजाल है जो उसके कानों पर जूँ भी रेंग जाए। अलबत्ता मुझे लगता है कि आज के इस युग में किसी को यदि आप ‘ईमानदार’ कहने की गलती कर बैठे तो वह बीच बाज़ार में हाथ में चप्पल लेकर आपको मारने दौड पड़े।
    सच तो यह है कि आजकल कोई किसी पर कीचड़ उड़ाए या खून की होली ही क्यों न खेले कोई बुरा नहीं मानता।