Friday, October 29, 2010

गिफ्ट दें टेन्शन नहीं

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट// 
            दिवाली आ गई है, किसी की उँगलियों में तो किसी की हथेली में खुजली मचने लगी है, वजह, गिफ्ट। हथेली में खुजली उनके मच रही है जो हमेशा से हाथ पसारने के आदि हैं, कोई भी गिफ्ट हासिल करने का मौका आया, लगे हथेली खुजाने। उँगलियों में खाज लिये घूमने वालों में वे लोग शामिल हैं जो या तो किसी ना किसी मतलब को साधने के लिए गिफ्टबाँटने फिरते हैं या फिर-तुम एक पैसा दोगे, वो दस लाख देगावाले गीत पर भरोसा करके, अंटी का एक पैसा भी गवाँ आते हैं। बहरहाल देने का अपना सुख है, लेने का अपना। इस लेने-देने में अगर किसी को सुखद नींद आती है, तो हमें क्यों तकलीफ हो! हम तो सिर्फ देने वालों से एक गुजारिश करना चाहते हैं कि- भाई साहब, गिफ्टदें, टेन्शनहरगिज़ ना दें।
            सचमुच, कई बार लोग गिफ्ट देकर जाते हैं, मतलब उन्हें लगता है कि उन्होंने गिफ्टदिया है, मगर वह होता टेन्शनहै। जैसे, जो पधारेगा वह आधा-आधा किलो मावे की मिठाई दे जाएगा, अब खाए कौन ? अखबार वाले चीख-चीख कर बता रहे हैं, मावा नकली है, मावा नकली है.........., कुत्ते तक मावे की मिठाई सूँघ कर आगे बढ़ जाते हैं, तब किस इन्सान की हिम्मत है जो उसे खा ले। बेमौत मरने से सभी डरते हैं। फिर जिसे देखो वह मोटापा, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर का मरीज, सो मावे की मिठाई एक अलामत के रूप में घर भर को टेन्शन देती रहती है। दूसरा टेन्शन, आदमी सौहार्द पूर्वक मिठाई, ड्राईफ्रूट, चॉकलेट या कोई भी महँगा गिफ्ट दे गया, बस बन गए कर्ज़दार। लिया है तो कुछ ना कुछ लौटाना भी पड़ेगा, हो गया टेन्शन। दिवाली न हुई मुसीबत हो गई। जबरन घर बैठे खर्चा बढ़ गया। ना वह कम्बख्त कुछ देता ना अपने को फालतू का टेन्शन होता।
            शादी, सालगिरह, जन्मदिन, गृहप्रवेश यहाँ तक कि साधारण से व्रतों-उपवासों के उद्यापनों में भी, जो कि आजकल मॉर्डन पार्टियों के रूप में होने लगे हैं, आदमी हाथ हिलाते हुए पहुँचने में गुस्ताखी समझने लगा है। निमत्रंण पर पहुँचने से पहले कुछ ना कुछ रास्ते से खरीदकर मेज़बान के सिर पर दे मारता है कि-ले रे, यह मत समझना कि हम फोकट में जीमने आ गए है। तीन लोग हैं, डेढ़ सौ रुपये का गिफ्ट लेकर आएँ हैं, पचास रुपये परहेड पड़ा, इससे ज़्यादा का खाऐंगे भी नहीं........। मेहमान का सा समर्पण भाव आजकल किसी को पसन्द ही नहीं, इसमें याचक होने की कुंठा साथ में चिपकी रहती है। इसलिए खाया-पीया और न अगर कुछ कचरा काइंडके रूप में खरीद पाएँ हों तो जेब से मुड़ा-तुड़ा लिफाफा निकाला और दे मारा मेज़बान के मुँह पर।
            यहाँ तक तो ठीक है, सबसे बड़ी परेशानी हैं वे जो ऊलजुलूल गिफ्ट दे जाते हैं। वह गिफ्ट हराम की वस्तु हासिल करने का सुख तो देता नहीं, टेन्शन जरूर दे देता है। जैसे किसी हीरोइनी की फ्रेम जड़ी फूहड़ सी फोटो दे गए, या सड़क छाप पेंटर की बनाई निहायत बकवास किस्म की मढ़ी हुई सीनरी दे गए। घटिया से फ्लावर पॉट में भड़कीले रंगों के कागज़ी फूल दे गए जिन्हें देखकर सर और दुखने लगे। हम जैसे नास्तिक को कोई जबरन दो-फुटा दीपकदे जाए। अब करें क्या उसका! मूर्ति पूजक, फोटोफ्रेम पूजक हम हैं नहीं, किसके सामने जलाएँ! या, कोई प्लास्टर ऑफ पेरिस के गणेशजी, हनुमानजी अर्पित कर जाए, कि ले पापी भगवान तेरा भला करे। घिस चुके सॉचे में ढली सरस्वति की मूर्ति लाकर धर दे कि ले, माँ तुझ अज्ञानी को ज्ञान दे। अब रखें कहाँ उन्हें, घर भर में सारे नास्तिक भरे पड़े हैं। भगवान की छत्रछाया प्राप्त होने के तथाकथित सुख की जगह टेन्शन और हो गया कि प्रगतिशीलदोस्त लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे। बड़ी डींगे हॉका करते थे भौतिकवादी होने की, अब गणेशजी, हनुमानजी की शरण में पड़े हुए हैं।
            आजकल चीन से कुछ सस्ते किस्म के गिफ्ट खूब आ रहे हैं, इनमें एक बला फेंगशुई भी है। लोग आजकल वहीं फेंगशुई गिफ्ट के नाम पर पटक जाते हैं। हम अभागेभले ना हों पर वे हमारे भाग्योदय की कामना के साथ अपना अंधविश्वास हमारे घर पटक जाते हैं। उन्हें पूरा विश्वास होता है कि उन्हीं की तरह हम भी ज़रूर अंधविश्वासी होंगे। या, जैसे वे दुनिया भर के टोने-टोटकों में अपनी परेशनियों का हल ढूँढ़ते रहते हैं, हम भी दीवारों पर सर फोड़ते फिरते होंगे।
          हमारे एक मित्र महोदय ने गृह प्रवेश किया, जिन-जिन को आज तक गिफ्ट बाँटते आए थे उन सबको खाने पर विशेष तौर पर आमंत्रित किया, कि दिया हुआ गिफ्ट, रिटर्न गिफ्ट के रूप में वापस मिलेगा। मिला, मगर बीसेक गणेशजी, पन्द्रह राम-दरबार, दस साईबाबा, दस-बीस फोटोफ्रेम व दीवार घड़ियाँ और कम से कम दर्जन भर तुलसी के पौधे। अब वे टेन्शन में आ गए कि क्या करें इस सबका। मैने सलाह दी दुकान खोल लोमगर वे नाराज़ हो गये, लगे बड़बड़ाने, साले लिफाफे में रुपैया रखकर नहीं दे सकते थे, टेंट का किराया ही चुका देते!
            खाकसार, को सूट पहनने की तमी़ज कभी नहीं रही, मगर कोई दानवीर पिछली दिवाली पर महँगा सूट का कपड़ा गिफ्ट दे गया है। अब टेन्शन यह है कि तीन हज़ार रुपये से कम में सूट सिलवाने के लिए दर्जी, दुकान की देहरी तक चढ़ने नहीं देता। वे तो डाल गए महँगा सूट का कपड़ा हमारे सिर पर, अब हम उसको ना सिलवा पाने का टेन्शन माथे पर लिए ज़िन्दगी जी रहे हैं। हमारी तरह और भी ना जाने कितने होंगे जो गिफ्ट के साथ आए टेन्शन से परेशान होंगे। इसीलिए, सभी से करबद्ध निवेदन है, कि भाई साहब गिफ्टदेना हो तो खूब दें, मगर कृपा कर टेन्शनना दें। 
दिनाँक 29.10.2010 को हरिभूमि में प्रकाशित।
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Tuesday, October 26, 2010

दुष्ट पति और करवा चौथ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            वे अभी-अभी जीर्ण-शीर्ण, पीली काया लेकर अस्पताल से वापस लौटी हैं, हफ्ते भर एनीमिया का इलाज कराया है, दो-तीन दर्जन ग्लूकोज़ की बोतलें और चार छः पाउच खून गटककर बीस-पच्चीस हज़ार का चढ़ावा अस्पताल पर चढ़ाकर घर आकर बैठी ही हैं कि पंचांग पर नज़र पड़ गई-अरे, कल तो करवा चैथ है, भूखे रहने की तैयारी करना है। अच्छा हुआ देख लिया नहीं तो इस बीमारी के चक्कर में पापिन बन जाती।
          बाकी बारहों महीने घर पर हम्माली करते रहने के कारण धूल-धूसरित भूतनीबनी रहना एक बात है, मगर करवा चौथ के दिन सज-सँवरकर सुहागन दिखाई देना जरूरी है। फिर, चौबीस घंटे दूसरी औरतों के चक्कर में पडे़ रहने वाले अपने नशेड़ी, गंजेड़ी, भंगेड़ी और जुआरी पति की लंबी आयु के लिए भूखों रहकर स्त्री धर्म निभाना है। डॉक्टर का दिया दवा-टॉनिकों का ढेर एक कोने में फेंककर, दिनभर निर्जला व्रत रखना है और रात को पति का हड़प्पा कालीन सुन्दर मुखड़ा देखकर, लात का आशीर्वाद लेकर ही आहार-पानी ग्रहण करना है।
          चाहे रात दो बजे तक घर ना लौटने पर पड़ोसियों को साथ लेकर अपने पति परमेश्वर को ढूँढ़ने के लिए शहर भर की नालियाँ क्यों ना खंगालना पड़ें। पतिदेव जब नशे में धुत्त किसी गटर में पड़े मिल जाएँ तो फिर आदर सहित अपने प्रिय प्राणेश्वर को घर लाकर स्वच्छ जल से उसका कीचड़ सना मुखमंडल धोकर उसके मनोहारी दर्शन करना है, फिर जाकर अपने कमज़ोर बीमार शरीर को कैलोरी की पूर्ति के लिए अन्न-जल उपलब्ध कराना है, यदि सदियों के भूखे पति महोदय से बचा रह जाए तो।
          यह भारतीय परम्परा है जिसे उन जैसी कर्तव्यपरायणा-पतिव्रता स्त्रियों को सात जन्म तक निभाना है, चाहे पतिदेव अपना शराब का शौक पूरा करने के लिए घर के जेवर-बरतन बेचने से लेकर रोज़ाना उनके शरीर पर भारी बल प्रयोग तक करने से न चूकते हों। पारम्परिक गालियाँ और अपशब्दों से गुड मार्निंग किया करते हों और गुडनाइट तो उनकी कभी होती ही ना हो। अपने मासूम सगे बच्चों से ज़्यादा सड़क छाप कुत्तों को पहचानते हों। यह उन्हीं पति-परमेश्वर की दीर्घायु होने की कामना करने का अनोखा व्रत है जिसकी सनसनाती गालियाँ सुन-सुनकर दूसरे शब्द याद रखना मुश्किल हो जाता है। माँ-बाप, भाई-बहन और इतर रिश्तेदारों के असल नामों की जगह जब स्त्री को घड़ी-घड़ी वे गालियाँ ही याद आएँ, जिनसे पति-परमेश्वर अपने ससुराल पक्ष को अक्सर संबोधित करते हैं तब जानिए स्त्री का पतिव्रत सफल जा रहा है।
          इतना ही नहीं, घर की बच्चियों को भी इन समस्त परम्पराओं के साथ करवा चौथ का व्रत रखकर भूखा रहना सिखाना भी एक महत्वपूर्ण कर्त्तव्य है ताकि वह बड़ी होकर अपने भावी पति की सेवा में करवा चौथ पर भूखी रहकर पतिव्रता स्त्री का धर्म निभा सके, चाहे उसका पति भी अपने ससुर की तरह ही तमाम दुष्ट मर्दाना परम्पराओं का निर्वाह किया करता हो।
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Monday, October 25, 2010

क्या खाक मने दिवाली

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
     दिवाली आ गई है। लच्छूराम बेहद टेन्शन में आ गए हैं, अब बत्तीसी निपोरकर खुश होना पडे़गा। दिवाली चूँकि थोकबंद खुशियों का पारम्परिक त्योहार है, इन्हें अपनी हर वक्त तनी-तनी रहने वालीं चेहरे की मास-पेशियों को ढीला छोड़कर, जबरन पाँच सौ वाट के बल्ब सा जगमगाना पडे़गा। उनकी निजी प्रगतिशीलता की विरोधी यह असंगत बात उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। ‘‘काहे को खुश हों.......! क्यों निपोरें अपनी पीली दंतपक्ति ! क्या बारात निकल रही है हमारी!’’
    परम्परा है, पुरखों के कंधे पर सवार होकर सदियों से चली आ रही है। लाख दुःखों के बावजूद दिवाली खुशियों का त्योहार रहता चला आया है, बाप-दादे भी यही मानते चले आए  हैं........ चाहे जो हो परम्परा तो निभाना ही है........ हो लो थोड़ा सा खुश, तुम्हारे बाबा का क्या जाता है......! घरवाली लच्छूराम को समझाती हैं, मगर लच्छूराम की भी अपनी परम्पराएँ है, हमेशा धनुष की प्रत्यंचा सा तना रहना, कोई उँगली मार दे तो ‘टंकार’ और देते हैं-‘‘दें क्या रैपट खैंच के अभी!’’
    ‘कू’ कहें, ‘सू’ कहें, उनका तर्क है-‘‘राम का वनवास खत्म हुआ, राम ने लंका फतह की, राम को सीता मिली, राम अयोध्या लौटे, राम को गद्दी मिली......., तो हम क्यों खुश होवें ? क्यों घर की पुताई करवाएँ ? दफ्तर से चार दिन की छुट्टी लेकर पूरे घर का अटाला बाहर निकालें, फिर उसकी चौकीदारी करें, फिर पुताई वालों की चौकीदारी करें, अगले साल तक शर्तिया फिर गंदा होने के लिए पूरे घर में व्हाइटवाश-डिस्टेंपर, पेंट-सेंट करवाएँ, फिर फर्श साफ करते फिरें ! बैठेठाले, बिलावजह हज़ारों रुपए का चूना लगवा लें......, ऐई, पागल कुत्तों ने काटा है क्या ?’’
    ‘‘चलो पुताई मत करवाओ, खुश भी मत हो, दिवाली है, थोड़ा मुँह मीठा करने की व्यवस्था ही कर लो........!’’
    ‘‘क्यों करलें! शादी हो रहीं है क्या हमारी ? दिवाली है तो गाँठ की जमा पूँजी बनियों को दे आएँ ! जबरन सरकार पर घी, तेल, शक्कर का लोड़ बढ़ाएँ ! बेसन-मैंदे के फालतू आयटम खाएँ, पेट खराब करवाएँ। नकली मावा बनाने वालों को बढ़ावा दें, मरें। वैसे ही आजकल मोटापा, बी.पी.,शुगर, हायपरटेन्शन, गठिया, बवासीर सौ बीमारियाँ जी का जंजाल बनी हुई हैं, ये फालतू नमकीन-मिठाइयाँ खा-खिलाकर बिलावजह मुसीबत मोल ले लें। क्या डॉक्टर ने कहा है कि उल्टा-सीधा खाओ, और हमारी इन्कम बढ़ाओ, क्योंकि दिवाली है। यह भी कोई बात हुई, पाँच हज़ार साल पहले कोई बात हो गई, तो हम आज डालडा-घी का लड्डू खाएँ और बीमार पड़े। यह कहाँ की समझदारी है।’’
    ‘‘चलो, न मीठे बनो, ना मीठा खिलाओ, दो-एक जोड़ी पेंट-बुश्शर्ट ही न हो तो रेडीमेड खरीद लाओ बाज़ार से। नहा-धोकर नेक पहन लोगे तो अच्छे लगोगे।’’
    ‘‘क्यों पहने ? क्या घोड़ी पर चढ़ना है हमें ! अलमारी भरी पड़ी है कपड़ों से, मगर फिर भी नए कपड़ों का ढेर लगा लें ! अरे बाज़ार अगर कपड़ों से पटा पड़ा है तो क्या सबरा उठाकर घर ले आएँ ! दिवाली ना हुई कपड़ों का राष्ट्रीय एक्सपो हो गया। इसलिए तो कोई हाड़ तोड़ कमा नहीं रहे कि दिवाली के बहाने कपड़ा कंपनियाँ हमारे कपड़े उतार लें। दिवाली है तो क्या लूटने-ठगने, चौगूने दाम पर कपड़ा बेचकर हमारा दीवाला निकालने की छूट मिली हुई है व्यापरियों को ? क्यों जाएँ हम अपना गला कटवाने, क्या पुराना पजामा पहनकर दिवाली नहीं मनती ?’’
    ‘‘चलो कुछ मत पहनो, नंगे बैठे रहो। बच्चों के लिए सौ-पचास रुपए के फटाखे ही खरीद लाओ.........!’’
    ‘‘पटाखे ! क्या हमारी बारात में आतीशबाजी होने वाली है ! तुम्हारे इन राकेटों बम-पटाखों, सीटियों से सूराख हो गया है आसमान में, कुछ होश है ? ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया मरी जा रही है और हम, अकेले एक दिवाली के दिन इतने आतीशी हो जाएँगे कि पूरा ब्रम्हांड भट्टी हो जाए। इस कदर पटाखा चलाऐंगे कि दूसरे ग्रह पर बैठा ‘जंतु’ भी बहरा हो जाए। पर्यावरण पर्यावरण चिल्ला-चिल्लाकर लोग मरे जा रहे हैं, और हम पर्यावरण वालों की बरसों की मेहनत पर एक घंटे में ‘टेंकरों’ पानी फेर दें। क्या ज़रूरी है कि लंका ध्वंस के समय जितना पर्यावरण प्रदूषित हुआ होगा उतना ही अब भी किया जाए ! ऐसी खुशी किस काम की ? उससे तो अच्छा है दुःखी बने घर में बैठे रहो।’’
    ‘‘चलो, कुछ मत करों। झिलमिल झिलमिल बिजली की दो चाईनीज़ झालरें ही दरवज्जे पर लटका दो। लक्ष्मी जी को पता चले कि इस घर में भी कोई रहता है !’’
    ‘‘क्यों टाँग दें ? क्या बारात आ रही है किसी की इस घर में! बिजली क्या यूनिट मिल रही है पता है ? लूट रहे हैं बिजली विभाग वाले, जैसे इनके बाप का माल हो। और फिर सुना नही ‘सेव एनर्जी’। हम दिवाली की एक रात को ही अगर सारी एनर्जी खर्च कर देंगे तो फिर साल भर क्या भाड़ झोकेंगे ? वो टाँड पर पिछले के पिछले साल के चार दीये पड़े हुए हैं, उन्हें धो-पोछकर, सोयबीन का तेल डालकर दरवज्जे के दोनों ओर एक-एक रख देंगे, एक कीचन की खिड़की पर और एक सन्डास में। हो गई रोशनी। लक्ष्मी जी जहाँ से आना चाहे आवें, कृपा करना है, करें, ना मन हो तो टाटा-बिड़ला-अम्बानी के घर जावें, हमें मतलब नहीं।’’
    घरवाली लच्छूराम के रूखेपन से नाराज़ होकर अपने काम में लग गई, बड़बड़ाती जा रही  है-‘‘और क्या, हम तो जे बैठे अपना मुँह सुजाकर, न लेना एक ना देना दो। हमें तो कछु कहना ही नइये, ज्यादा कुछ कहेंगे तो कहोगे- ‘बंद करती हो या नहीं ये दिवाली दिवाली का तमाशा, या दें कान के नीचे खैंचकर.....!’ यही है तुमाई 'प्रगतशीलता', यही है तुमाई समझदारी.......आग लगे ऐसे समझदारी को। काहे को तो रसोई का तेल दीयों में खर्च करवा रहे हो, कोई लक्ष्मी जी तुमाए लाने तो बैठी नइये उते उल्लू पे ? बिलावजह भभक रहे हो। अपने दिमाग की आग से लगे हो दुनिया को भस्म करने। आग लगे तुमाई ऐसी पढ़ाई लिखाई को जो दो मिनट खुश भी होने न दे। अरे, बच्चों की खुशी के लिए थोड़ा खुश होकर, मीठा खाकर, दो पटाखा चलाकर दिवाली मनाने से क्या तुमाई ये थोथी 'प्रगतशीलता' पाताल में चली जाएगी ?’’
नईदुनिया में 25.10.2010 को प्रकाशित संशोधित अंश





Sunday, October 17, 2010

बुराई का शतशिख रावण उर्फ ‘शतानन’

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आज दशहरा है। राजतंत्रीय सत्ता व्यवस्था के दौरान अयोध्या के राजकुमार की लंका के राजा पर जीत का ऐतिहासिक दिन। उस युग के इतिहास को लेकर परम्परावादियों और वैज्ञानिक इतिहासकारों में हालाँकि भारी सिर फुटव्वल है, परन्तु ऐतिहासिक सत्यों से निरपेक्ष हम लोग एक क्षत्रिय योद्धा के हाथों एक प्रकाण्ड पंडित की मौत का जश्न जोर-शोर से मनाते हैं। किसी को जान से मारकर खुशियाँ मनाने की परम्परा शायद उसी दिन से प्रारम्भ हुई है। आज के ज़माने में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत ऐसी हत्याएँ कर खुशियाँ मनाने को अनैतिक माना जा सकता है। हत्या करके आप उसे वध घोषित करवा लें कानूनों में ऐसी भी कोई धारा नहीं है। किसी दूसरे के देश में घुसकर कोई किसी राजपुरुष को मार आए तो इंटरपोल भी उसको पकड़कर काल कोठरी में डाल देगी, डंडे मारेगी सो अलग।
बहरहाल, अपने चारों ओर हजारों बुराइयों से रोज साक्षात्कार करते हुए, साल में एक बार हम बुराई के प्रतीक रावण का पुतला फूँककर खुश होते हैं। एक दूसरे से गले मिलते हैं, बधाइयाँ देते हैं, खीर-पूरी खाते हैं। रावण की एक गलती के बहाने उसकी तमाम विद्वता को आग में झौंक आते हैं, और लंका से लूटे हुए स्वर्ण (शमी के पत्ते) टुकड़ों को आपस में बाँटकर दाँत निपोरतें हैं।
जीव वैज्ञानिक कौतुहल की अनोखी मिसाल जो अब तक शोध एवं अनुसंधान से बची हुई है, रावण की दस खोपड़ियाँ हमेशा हमें यह समझाने के लिए इस्तेमाल होती आईं हैं कि – देखो रे, बुराई ऐसी होती है। हर साल रावण के पुतले में बम-पटाखें भरकर, उसके आतिशबाजीपूर्ण भस्म-संस्कार के ज़रिए हमें याद दिलाया जाता है कि -देखों बच्चों, बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होती है। रावण हमेशा मरता है। हम आश्वस्त होते हैं कि हाँ, चूँकि रावण सचमुच में मरा था इसलिए समाज में व्याप्त बुराइयाँ भी एक ना एक दिन ज़रूर मरेंगी। भले ही हमसे चूहा भी ना मरता हो, मगर हम बुराइयों के दशानन को एक ना एक दिन ज़रूर मार गिराएँगे, बस एक अदद मर्यादा पुरुषोत्तम भर दोबारा पैदा हो जाए। हमें पता है, आखिर वह मर्यादा पुरुषोत्तम कितनी योनियों तक, कब तक यहाँ-वहाँ भटकता रहेगा, एक ना एक दिन तो हमारे देश के किसी कुलीन घर में जन्म लेगा ही, तब हम देखते हैं कि बुराइयों का यह रावण कैसे जिन्दा रहता है। हम हाथ पर हाथ धरे निश्चिंत बैठे इंतज़ार कर रहे हैं कि चोर-डाकुओं, टुच्चे-स्वार्थियों, ठगों-बेईमानों, माफिया सरगनाओं, राजनैतिक दलालों के बीच से कोई करिश्माई मर्यादा पुरुष आविर्भूत हो और हमें बुराई के इस दशानन से मुक्ति दिलाए।
दरअसल हमारे देश में बुराइयों का जो थोक जमावड़ा है, रावण के दस सिर उसके सामने बच्चे हैं। वह ‘शतानंन’ है, सौ सिर वाला, उसे दशानन का ‘बाप’ कहा जा सकता है। ऐसे किसी प्राणी की दुनिया भर के पौराणिक साहित्य (माफ कीजिए हमारे पुराण बाकी दुनिया को कवर नहीं करते फिर भी) में कोई मिसाल नहीं है। किसी धर्म के फैन्टेसीकारों ने ऐसे जन्तु की कल्पना नहीं की जिसके सौ सिर हों और हरेक की अपनी विशेषताएँ हों, मगर हमारे देश में बुराइयों का ‘शतानन’ अच्छा खासा विराट और अपने आप में फुलप्रूफ है । एक-एक सिर पर पूरी-पूरी एक ओरीजनल थिसिस लिखी जा सकती है।
रावण के दस सिर तो पता नहीं आपस में किस विधि से जुडे़ हुए थे। अस्थि, मज्जा और तंतुओं की जाने कौन सी संरचना उस वक्त अस्तित्व में थी जो पाँच-पाँच किलो के दस सिरों को मजबूती से गरदन पर टिकाए रखती थी और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध रावण उसे कैसे सम्हाले रखता था, यह सब जीव विज्ञान और भौतिकी के प्रश्न अपनी तो समझ से बाहर हैं, परन्तु ‘शतानन’, दशानन के ‘बाप’  को हमारे कर्णधारों ने पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के मजबूत, मोटे रस्से में पिरोकर नरमुंड माला की तरह राष्ट्र के गले में लटका रखा है और हज़ारों देशभक्त अपनी-अपनी तरह से, पूरी शिद्दत के साथ इसकी रक्षा कर रहे हैं। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है कि उक्ति का प्रमुदित भाव से सुख लेते हुए सब के सब ‘शतानन’ की सेवा में लगे हुए हैं। बुराइयों का सौ सिर वाला रावण लोगों का जीना हराम किये हुए है। महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जमाखोरी, कालाबाजारी, लूट-खसोट, गुंडागर्दी, शोषण, उत्पीड़न, दमन, अत्याचार, दुराचार आदि-आदि अठ्यासी और भी बुराइयाँ देश में अपने चरम पर हैं। रोज कई-कई ‘जानकियों’ को उठाकर ले जाया जा रहा है, बलात्कार हो रहे हैं, कत्ल हो रहे हैं, मगर कोई बुराई पर अच्छाई की जीत का आकांक्षी नहीं है। सब वानर सेना की भांति पेट की आग बुझाने की फिक्र में अपना ही चमन उजाड़ने में लगे है।
आलू-प्याज भले ही कभी ना काटे हो मगर दशहरे के बहाने कुछ वीर-शिरोमणि अपने अस्त्र-शस्त्रों को तेल-पानी देते हैं, उनपर लगी जंग की साफ-सफाई कर पूजा इत्यादि करते हैं। उनके ये अस्त्र-शस्त्र बस पूजा भर के काम के होते हैं, कभी इस्तेमाल का मौका आ जाए तो इन सूरमाओं की फूँक सरक जाए। जानते हुए भी कि शतशिख बुराइयों का यह रावण लातों का भूत है बातों का नहीं, अपन ने तो अस्त्र-शस्त्र के रूप में ‘कलम’ का चुनाव किया है। इसकी हम पूजा करें या ना करें यह बुराइयों के इस रावण पर चलती रही है और चलती रहेगी। आमीन।
28.09.2009 को जारी अपने अन्य ब्लॉग व्यंग्य से लेकर पुनर्प्रकाशित

Wednesday, October 13, 2010

हरिभूमि में व्यंग्य - शेष रह गई भारतीय संस्कृति


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            कॉमनवेल्थ खेलों का भव्य उद्घाटन समारोह को देखकर देश भर का वृहन्नला समाज आयोजन समिति से काफी खफा हो गया है क्योंकि उन्हें समारोह में भारतीय संस्कृति के धुँआधार मुज़ाहिरे में अपना अनोखा हुनर दिखाने का मौका नहीं मिला, जबकि खांटी देसीपने के प्रदर्शन में फुटपाथ छाप सभी प्रकार के लोग, अपनी ओव्हर एक्टिंग के जरिए विदेशी मेहमानों को मोहने में लगे थे। डिब्बा वाले, सायकल वाले, ऑटो वाले, चाय वाले, पान वाले, सिगरेट बीड़ी वाले शायद नाई, धोबी, मोची तक अपनी-अपनी पेशेवर खूबियों के साथ जमावड़े में मौजूद थे। वृहन्नला भाई-बहनों का कहना है कि जब तमाम नृत्यांगनाएँ, यहाँ तक कि कठपुतलियाँ तक नचाई जा सकती हैं तो फिर हम गरीब बान्दियों ने क्या गुनाह किया था जो सदियों से अपनी कला का प्रदर्शन कर लोगों का मनोरंजन करते आ रहे हैं।
            मैंने एक आयोजन समिति के एक सदस्य से यूँ ही पूछने के लिए पूछ लिया कि वृहन्नलाओं की इस नाराज़गी का उनके पास क्या जवाब है तो उन्होंने सिर खुजलाते हुए जवाब दिया - जवाब तो कुछ नहीं है, जब सभी नाच रहे थे तो वे भी नच लेते, किसी के बाप का क्या जाता मगर दिक्कत यह थी कि, वैसे ही हम पैसे माँगने के आरोपों से निजात नहीं पा पा रहे हैं, ये वृहन्नलाएँ अगर मेहमानों के सामने पैसे के लिए हाथ फैलाने लगतीं, तो देश की छवि का नाश हो जाता। क्या अच्छा लगता प्रिन्स चार्ल्स के सामने छक्के' खाड़-खाड़ ताली बजाकर नाचते और फिर पाँच सौ एक रुपये के लिए उनकी इज्ज़त का फालूदा बना देते।
            मैंने कहा, हमारे देश में भिखारियों के भीख माँगने का अन्दाज़ भी कितना निर-निराला है उन्हें भी तो भारत दर्शन में शामिल किया जाना चाहिए था, परन्तु उन्हें तो आपने दिल्ली की सीमा से खदेड़ बाहर किया। वे बोले, देश की छवि की कृतिमता को बनाए रखना हमारे लिए बहुत ज़रूरी था, वर्ना आइन्दा कोई अन्तर्राष्ट्रीय इवेन्ट हमें मिलता क्या ?
          मैंने पूछा अब समापन समारोह में क्या होने वाला है ? वे बोले, समापन होगा। मैंने कहा मतलब भारतीय संस्कृति के शेष रह गए आयटम पेश किये जाऐंगे या नहीं। वे बोले, यह तो गोपनीय है। मैंने कहा फिर भी कुछ अन्दाज़ तो दीजिए। वे बोले, हो सकता है राखी सावन्त का आयटम पेश किया जाए, या शाहिद कपूर को नचाया जाए, वे भी आखिर भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं। मैंने सलाह दी असली भारतीय संस्कृति को तो आपने बुरी तरह नज़रअन्दाज़ कर रखा है। नवरात्र चल रहे हैं, शेरों वाली माता का जगराता, भजन कीर्तन, भंडारा भी हो सकता है। दशहरा आने वाला है, देश में जाने कितनी रामलीला करने वाली मंडलियाँ है उनमें से किसी को भी आमंत्रित किया जा सकता है, साधु संत समाज के प्रवचन भी कराए जा सकते हैं, यह सब भी भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं। 
          वे कहने लगे, इस कॉमनवेल्थ के बाद हम ओलम्पिक के सबसे बड़े दावेदार बनकर उभरे हैं, उसके लिए भी तो कुछ आयटम बचा कर रखना जरूरी है, वृहन्नलाओं के आयटम समेत हम हर चीज़ ओलम्पिक के लिए बचाकर रखेंगे।

Sunday, October 10, 2010

नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            जलकुकड़े देखना हो तो कोई भारत आए। अब बताइये, दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र की सबसे ताकतवर संस्था के सदस्यगण, महँगाई के बोझ से दबकर टेढ़े होने से बचने के लिए अगर अपनी पगार खुद बढ़ा लेते हैं तो इसमें जलने की क्या बात है। यह हमारे देश देश की विशेषता है, किसी को कुछ ज़्यादा ही हासिल हो जाए, भले ही वह तनख्वाह हो, बख्शीस हो, लूट में हिस्सा हो, भीख हो........तो दूसरे लोग धूँ-धूँ कर जलने लगते हैं।
            देश के नेतृत्व की तनख्वाह बढ़ी देख जो ज्वलनशील लोग जल रहे हैं उनमें ज़्यादातर वे लोग हैं जो खुद भी तनखैये हैं और जिन्हें अपनी तनख्वाह खुद बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। इन तनखैयों की भी बढ़ जाती, भले ही उतनी ना बढ़ती जितनी जनसेवकों की बढ़ी है, तो जलने की यह क्रिया उतनी लपटदार नहीं होती जितनी होती देखी जा रही है।
          अरे जलकुकड़ों, ज़रा शर्म करो ! यह भी कोई बात होती है, आखिर वे देश के कर्णधार हैं, दाल उनके लिए भी सौ रुपए किलो हुई है, सब्ज़ियाँ उनकी सब्ज़ी मंडी में भी सत्तर-अस्सी चल रही है, पेट्रोल-डीज़ल उनकी भी बारह बजा रहा है। एक तुम्हीं नहीं हो जिसे महँगाई डायन खाए जा रही है। यह बात अलग है कि वे पूरे के पूरे घी की कड़ाही में तर हैं।
            बकवादी बकवास कर रहे हैं कि जब सन्तानवे फीसदी आम जनता औसत बीस रुपट्टी रोज़ पर गुज़र-बसर कर रही है तो ये जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कौन से लाट साहब हैं जो उनकी तनख्वाह हज़ारों-लाखों में हो.......! अरे, जनता को बीस ही रुपए रोज़ मिल रहे हैं तो इसमें बेचारे जनसेवकों का क्या दोष! बीस रुपए क्या अगर बीस पैसे भी मिलें तो इसमें उनका क्या कसूर ! अंबानी भाइयों को करोड़ों रुपया महीना मिलते हैं तो क्या उसमें भी उन बेचारों का दोष है! मूर्खों, क्या वे लोगों की तनख्वाहें, मजदूरी तय करने के लिए संसद में बैठे हैं! और कोई दूसरा काम नहीं है उनके पास। कितने महत्वपूर्ण काम उनके कंधों पर हैं, कार्पोरेट घरानों का खयाल रखना पड़ता है, उनके हितों के लिए ईंट से ईंट बजानी पड़ती है, खुद कभी स्कूल में सवालों के जवाब न लिखें हों मगर संसद में भाँति-भाँति के सवाल बनाकर उठाना पड़ते हैं, सवालों का हिसाब किताबरखना पड़ता है। देश की समस्याओं के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए कुर्सियाँ तोड़नी पड़ती हैं, माइक फेंकने पड़ते हैं, एक दूसरे का सिर तोड़ना पड़ता है, क्या कुछ नहीं करना पड़ता। यह सब क्या मुफ्त में हो जाएगा ? भुट्टे भूनने के लिए तो कोई जन प्रतिनिधि बनता नहीं है ? इन्कम तो कुछ होना ही मंगता है ना! 
            यह तो बहुत ही नाइन्साफी है, देश सेवा के बदले चार पैसे अगर वे गरीब किसी से ले लें तो आपको दिक्कत, संसद में सवाल उठाने के अगरचे वे पैसे चार्ज कर लें तो आपको दिक्कत, स्विस बैंक में खाता रखें तो आपको दिक्कत, तो अब क्या अपनी तनख्वाह भी छोड़ दें ? भूखों मर जाए ? क्या चाहते क्या हो आप लोग, क्या अब लोग देश सेवा भी करना बंद कर दें ? क्या देश की आम जनता का नेतृत्व करना भी बंद कर दें ? साधु बनकर पहाड़ों में चलें जाएँ ? जनता को यू ही सड़क पर छोड़ दें ?
            देखिए यह पैसा ये पगार हाथों का मैल है, किसी के हाथ कम मैले है किसी के ज़्यादा! इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है! फर्क सिर्फ इतना ही तो है कि हम खुद अपना हाथ मैला नहीं कर पा रहे हैं और वे दनादन किए जा रहे हैं! अगर वे अपनी मर्ज़ी से इतना भी ना कर सकें तो फिर लानत है दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र पर, नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे ! 
दिनांक 10.10.10 को नईदुनिया रविवारीय मैगज़िन में प्रकाशित।

Wednesday, October 6, 2010

भारतीय संस्कृति का हैवी डोज़


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
नईदुनिया में प्रकाशित व्यंग्य
     हम समालोचक थे इसलिए बच गए, मगर दीगर आलोचकों पर बुरी बीती। कॉमनवैल्थ खेलों का भव्य उद्घाटन समारोह देखकर सभी तमाम कट्टर आलोचक पहले तो दाँतों तले अपनी ऊँगलियाँ चबा-चबाकर लोहू-लूहान करते रहे, फिर अपना सिला हुआ मुँह लेकर टी.वी. के सामने बैठ गए और भारतीय संस्कृति के भारी भरकम मुजाहिरे को विस्फारित नेत्रों से घूरते रहे। उनमें कुछ निश्चित ही ऐसे रहे होंगे जो टी.वी. में घुसे यह देखने का प्रयास कर रहे होंगे कि समारोह स्थल पर कहीं किसी दीवार का प्लास्टर झडे़, कोई टाइल्स टूटे, बालकनी या छत का धप्पड़ गिरे तो हम अपने सिले हुए मुँह के टाँके तोड़कर चिल्लाते हुए सड़क पर निकल आएँ - ओय ओय असफल हो गया, कॉमनवैल्थ असफल हो गया। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, उद्घाटन समारोह जिस स्टेडियम में हुआ उसका कुछ नहीं गिरा। नतीजतन अगले दिन सारे आलोचक अपने सिले हुए मुँह के टाँकों की ड्रेसिंग कराते हुए मिले, ताकि कहीं पक ना जाएँ। ये सब अगले ग्यारह दिनों तक ऐसे ही ड्रेसिंग कराते रहेंगे, बशर्ते सब कुछ सफलतापूर्वक ठीक-ठाक निबटता चला जाए। अगर कहीं ज़रा सा मीन-मेख उन्हें मिल गया तो फिर समझ लीजिए, ये फिर बीच खेल में अपने सिले हुए मुँह के टाँके तुड़ाकर चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देंगे- ओय ओय असफल हो गया, कॉमनवैल्थ असफल हो गया।
          कामनवैल्थ आयोजन के भारतीय योजनाकारों को भी मानना पडे़गा, बड़े दूरदर्शी हैं। एक तो छह सौ उन्नीस सदस्यों का भारी-भरकम दल बाकी देशों की छाती पर मूँग दलने के लिए रख छोड़ा, जीतो बेटा कैसे जीतते हो, ऊपर से पहले ही दिन भारतीय संस्कृति का ऐसा हैव्वी डोज़ दुनिया भर के खिलाड़ियों को पिला दिया कि वे अब चार-छः दिन होश में आने से रहे। होश में आ भी गए तो ढंग से खेल भी पाएंगे इसमें शक है। भारतीय संस्कृति की डोपिंग सी हो गई है दिमाग में। भारतीय खिलाड़ी तो कई सालों से अपनी संस्कृति को झेलते आ रहे हैं, सो उन्हें तो आदत है, नतीजतन अब खेल मुकाबलों में भारतीय संस्कृति के ओव्हर डोज़ से पस्त पड़े अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को जगह-जगह पछाड़कर ज़्यादा से ज़्यादा मेडल झोली में डालना आसान हो गया है। जहाँ कोई दूसरा जीतता हुआ दिखाई दे तो चीयर गर्ल्स की तरह भरत नाट्यम की दसेक नृत्यांगनाएँ स्टेडियम के कोने में नचाकर उसकी हिम्मत पस्त की जा सकती है।
          बचा-खुचा काम भारतीय खान-पान करने वाला है। जलेबियाँ, रसगुल्ले, बूँदी के लड़डू खिलाकर सबका वजन बढ़ा दिया जाए फिर ओव्हर वेट घोषित कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए, कैसा रहेगा। भकोसकर छोल-भटूरे, आलूबडे़-समोसे और बेसन के खाद्य पदार्थ अन्तराष्ट्रीय खिलाड़ियों को यदि खिला दो तो वे सुबह-सवेरे जल्दी स्टेडियम ही ना पहुँच पाएँगे। हमारे खिलाड़ियों को तो पता है कि इसप घोल की भूसी क्या होती है, वे सबसे पहले जाकर ट्रेक पर खड़े मिलेंगे और जीत आसान हो जाऐगी।
          तो इस तरह साबित हो रहा है कि भारतीय संस्कृति बड़े काम की चीज़ है। कम से कम हमारे देश में होने वाली अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अव्वल आने में तो मदद कर ही सकती है। पसीने की कमाई का सत्तर हज़ार करोड़ फूँककर हम अगर इतना भी नहीं कर पाए तो लानत है कामनवेल्थ आयोजन समिति पर।

Saturday, October 2, 2010

हे महान भारतीय इंतज़ाम-अलियों, नही चाहिए हमें मैडल

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
भौचक शेरा
           कॉमन वेल्थ खेलों के प्रारम्भ होने से पहले ही हमने अपनी पताका फहरा ली है, लापरवाही, बदइंतज़ामी और भ्रष्टाचार की पताका! पिछले दो-तीन सालों से यह पताका शांतिपूर्वक मंद-मंद फरफरा रही थी, कहीं कोई समस्या नहीं थी, सब कुछ आराम से चल रहा था। मगर देश में शान्ति से कुछ हो दुष्ट विघ्नसंतोषियों को यह बिल्कुल पसंद नहीं। जहाँ कोई चार पैसे हराम के कमाता हुआ दिखाई दिया कि लोगों का पेट दुखने लगता है, चढ़ बैठते हैं दाना-पानी लेकर। चोर चोर चोर का समवेत स्वर चारों ओर उठने लगता है और दुनिया भर के साहुकार डंडे लेकर इधर उधर दौड़ने लगते हैं। मूर्खों को इतना भी नहीं पता कि जब हम अमीर देशों की देखा-देखी बड़े आयोजनों में अपनी नाक घुसाते हैं तो, चोरी-चकारी और भ्रष्टाचार के अन्तर्राष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के लिए हमें उम्दा प्रदर्शन करना ही होता है, ताकि आगामी अन्य आयोजनों की मेजबानी के रास्ते खुलें।  
            पहले यहाँ-वहाँ जहाँ-तहाँ भ्रष्टाचार का खेलखेलते देखा जाता था अब खेलोंमें भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है। खेल-खेल में करोड़ों रुपयों को ठिकाने लगाकर कॉमनवेल्थ में जहाँ एक ओर कुछ महत्वाकांक्षी राजनीतिकों, खेल प्रशासकों और बड़े-बड़े उद्यमियों ने अपना राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाया है, वहीं कुछ विध्नसंतोषियों ने इसकी धुँआधार आलोचना कर अपना अन्तर्राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाया है और निभाते चले जा रहे हैं।
          आगंतुक खिलाड़ियों, खेल प्रेमियों, पर्यटक समूहों, विदेशी पत्रकारों, मीडिया वालों को लूटने-ठगने का अपना कत्र्तव्य निभाने के लिए देश के अन्य छोटे-बड़े उद्यमी यथा आॅटो, रिक्शा वाले, होटलों-रेस्टोरेंटों ढाबे वाले, यहाँ तक कि पान-बिड़ी-सिगरेट वाले तक कमर कसकर बैठे हैं। मोटी कमाई की आस लगाए कई असली-नकली भिखारी भी सटीक मेकप, स्वर एवं वाणी के कठिन रियाज़ और अभिनय की तगड़ी रिहर्सल के साथ बिल्कुल तैयार हैं, कि बाहर की पब्लिक आना शुरू हो और वे आंगिक और वाचिक अभिनय की अपनी कला का प्रदर्शन कर उनसे भीख माँग सकें। चोर-गिरहकट, ठग-लुटेरे आतुरता से प्रतीक्षारत हैं कि ‘‘आओ कदम तो रखो भारत भूमि पर, हम तुम्हारी आरती उतारें।’’ बार बालाएँ और रेड लाइट सुन्दरियाँ थालियाँ सजाए, पलक पॉवड़े बिछाकर मेहमानों का स्वागत-वंदन कर माल बनाने की व्यूह रचना में व्यस्त हो गई हैं। जब देश के दिग्गजों ने कॉमनवेल्थ से वेल्थ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो फिर बाकी लोग क्यों पीछे रहेंगे। मगर ताज़ा परिस्थितियों ने सब के माथे पर चिंता की लकीरें खोद दी हैं, पता नहीं आयोजन होगा भी या नहीं! न हुआ तो बरसों बाद छप्पर फाड़ कमाई का यह मौका हाथ से निकल जाएगा। आगे फिर कभी इस तरह बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिले या ना मिले।
          कुछ लोगों का खयाल शायद ज़्यादा दूरदृष्टिपूर्ण हो। रिश्वतें देकर कॉमनवेल्थ की मेजबानी हासिल करने से लेकर कमाई का हर संभव रास्ता हम अब जान गए हैं। सार्वजनिक धन की लुटाई में विशेषज्ञता, कौशल, निपुणता आदि-आदि सब कुछ हमने हासिल कर लिया है। भ्रष्ट इन्जीनियरों, ठेकदारों, लापरवाह अफसरों, ब्यूरोक्रेटों का यह आत्मविश्वास हमें आने वाले समय में और भी बड़े बड़े आयोजनों को हाथ में लेने का बल देता है। अब हम ओलम्पिक खेलों के लिए भी अपने इस अनुभव का इस्तेमाल बखूबी कर सकते हैं, एक बार कोई उसकी मेजबानी देकर तो देखें, फोड़ डालेंगे। इतना फैलारा कर के दिखाएँगे कि हमारे बाप से न सिमटे, अपने-अपने लोगों में रेवड़ियाँ बाँटेंगे और बदले में अपने बैंक बैलेंसों को समृद्ध कर के दिखाएँगे। खेलों की दुनिया में देश का नाम उससे भी ज़्यादा ऊँचा कर के दिखाएँगे जितना कॉमनवेल्थ खेलों में अब तक हुआ है। हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन, पूरा है विश्वास।
          इधर खुलती पोलों, गिरती छतों, टूटते पलंगों, धँसती सड़कों के मद्देनज़र डर है कि हवाई अड्डे पर उतरते ही विदेशी खिलाड़ीगण पलट कर भाग ना खड़ें हों कि भाड़ में गया कॉमन वेल्थ, घर लौटकर अपने देशवासियों से पिट लेंगे भले, मगर भ्रष्टाचार की नींव पर खड़े कोर्टों मैदानों पर हाथ पॉव तुड़वाने के लिए हरगिज़ न उतरेंगे। भ्रष्टाचार की आबोहवा में कदम रखते ही कहीं वे गिड़गिड़ाने ना लगें कि हे महान भारतीय इंतज़ाम-अलियों, नही चाहिए हमें मैडल, हमें तो सही सलामत घर जाने दो, जान बख्श दो हमारी बस।