मंगलवार, 14 सितंबर 2010

एक पखवाड़ा मुकर्रर है हिन्दी की मातमपुर्सी के लिए

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
हिन्दी भाषी होने के नाते आज के दिन हमें अपनी भाषा पर गर्व करना सिखाया गया है, मगर सच्चाई यह है कि स्वातंत्रोत्तर काल में जैसे-जैसे हिन्दी आन्दोलन फलता-फूलता पल्लवित होता गया है, वैसे-वैसे देश में हिन्दी की खटिया-खड़ी होती देखी गई है। कुछ तो देश के कर्ता-धर्ताओं ने उसे गर्व करने लायक नहीं छोड़ा, रही-सही कसर हम जैसे सैकड़ों लिख्खाड़ पूरी कर रहे हैं जिन्हें अपने शिक्षणकाल में हिन्दी के पर्चे में कभी तैतीस से ज़्यादा अंक नसीब नहीं हुए। दरअसल वस्तुस्थिति तो तैतीस अंक प्राप्त करने लायक भी नहीं थी परन्तु मास्टरनियों की रहमदिली और हिन्दी के प्रति ‘हिन्दी ही तो है, क्या फर्क पड़ता है’ के उदारता भाव के कारण हमारा भविष्य वर्ष-प्रतिवर्ष सुरक्षित होता चला गया, और अब हम हिन्दी के भविष्य का ‘बिस्तर गोल’ करने में सक्रिय सहयोग देकर ‘खटिया खड़ी बिस्तर गोल’ वाला चालू मुहावरा चरितार्थ करने में लगे हुए हैं।
    हिन्दी का बंटाधार करने वालों में प्रायमरी, मिडिल स्कूल के क्रीड़ा, संगीत व चित्रकला मास्टरों से लेकर बड़े-बडे़ सूरमा भाषा विशेषज्ञों का भी सश्रम योगदान रहा है। हिन्दी फिल्म-टी.वी. वाले विद्वजनों ने भी बहती गंगा में हाथ धोकर हिन्दी की ‘वाट’ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्म वालों ने इस श्रमसाध्य कार्य के लिए अवार्ड हासिल किए तो क्रीड़ा-संगीत-चित्रकला शिक्षकों ने, जो अक्सर हिन्दी शिक्षकों के टोटे में जबरदस्ती हिन्दी पढ़वाने के उपयोग में आते हैं, हिन्दी का क्रियाकर्म बाकायदा तनखा लेकर किया, साथ में इंक्रीमेंट भी लिए। वे बेचारे पढ़ाई के बोझ से घबराकर प्रदर्शनकारी कलाओं की शरण में पहुँचे होते हैं, उन्हें फिर घर में होमवर्क से मगजमारी के बाद बच्चों को हिन्दी पढ़ाने की बेगारी करना पड़ती है, नतीजतन हिन्दी का सत्यानाश करने वाली विदूषी पीढ़ी जन्म लेती है, कालान्तर में मौका पड़ने पर जिसे हिन्दी में अर्जी लिखना भी नहीं आता, जिसकी ज़रूरत हमारे देश में कदम-कदम पर पड़ती है।
    देश के भाषा विशेषज्ञों का तो दुनिया में कोई सानी ही नहीं है। उन्होंने हमेशा चौकस रहते हुए इस बात का ध्यान रखा कि कैसे हिन्दी को ना समझ में आने वाली क्लिष्टतम भाषा बनाए रखा जा सके ताकि लोग अपनी राष्ट्र भाषा को जन्म-जन्मान्तर तक समझ ही ना पाएँ और इससे बिदककर अंग्रेजी की शरण में जा खडे़ हों या गाली- गलौच की सुप्रचलित भाषा का आदान-प्रदान कर अभिव्यक्ति की अपनी समस्या खुद ही सुलझा लें, भूलकर भी हिन्दी के दरवाज़े पर आकर खड़े ना हों।
    फिल्म वालों ने तो गज़ब ही कर डाला। पब्लिक के मुँह में ऐसी छिछोरी भाषा परोस दी कि हिन्दी का भूत दशकों से जान बचाता भागता फिर रहा है। इन फिल्मचियों ने ‘अख्खे’ देश को अनोखी बम्बइया भाषा में पिरो कर रख दिया है। इस मामले में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक वास्तव में भारत एक है। गुजरात से लेकर बंगाल तक भारत के एक होने का मतलब भी यही है कि भले ही देश के हर कोने में स्थानीय भाषा का बोलबाला और हिन्दी का मुँह काला हो मगर – ‘सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे’ का रचनात्मक अर्थ गली-गली में लोग बखूबी जानते हैं। जन-गण-मन अधिनायक से ज्यादा आरेला ए, जारेला ए, खारेला ए, पीरेला ए, खाली-पीली बोम मारेला ए जैसी उच्चकोटि की शब्दावली देश के हर गली-कूचे में आसानी से समझ ली जाती है। हमारे मध्यप्रदेश में भी आरिया हे, जारिया हे किस्म की हिन्दी का प्रचलन है, इसमें माँ-बहनों से निकटतम गुप्त संबंधों की खुली चर्चा साथ में और नत्थी कर हिन्दी की प्रतिष्ठा में अरसे से चार चाँद ठोके जा रहे हैं।
    हिन्दी आन्दोलन चल रहा है, चल रहा है, चलता चला जा रहा है, मगर पान-ठेलों, चौक-चौराहों, टी.वी., सिनेमा, सांस्कृतिक केन्द्रों, सरकारी गैर सरकारी दफ्तरों से लेकर संसद तक रोजाना इस अबला की अस्मत तार-तार होती रहती है। साल का एक पखवाड़ा मुकर्रर है, बीच बाज़ार में इसे घायल पड़ा देखकर मातमपुर्सी करने के लिए। जिसे मर्ज़ी हो मातमपुर्सी करे या फिर चाहे तो नजरें बचा कर निकल जाए।

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

डंडे के डर से गेहूँ का बँटना

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
    पिताजी बचपन में डंडे से पिटाई किया करते थे। उस वक्त बड़ा बुरा लगता था, अब समझ में आ रहा है कि ज़रूर हम भी उन दिनों ‘शरद पंवार’ जैसी हरकतें करते रहे होंगे। बड़ा कोई कुछ कह रहा है, और तो और साफ साफ आदेशात्मक लहज़े में कह रहा है, और हम हैं कि मानने को तैयार नहीं है, तो फिर सामने वाले के पास ‘डंडा चालन’ के अलावा दूसरा चारा क्या है।
    माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाई अनाज फालतू सड़ रहा है, गरीबों में बाँट दो, लेकिन नहीं, मंत्री जी हिलने को तैयार नहीं, जैसे ‘बाबा’ का माल हो। इधर गरीब बेचारे हाथ में फटी बोरी लेकर गेहूँ बँटने का इंतज़ार कर रहे थे, उधर कोर्ट के आदेश को मुफ्त की सलाह मानकर एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालने की हमेशा की ट्रिक चलाई जा रही थी। ऐसा लगता है जैसे हमारे मंत्री महोदयों को आम जनता के हक में देश चलाने के लिए किसी की फालतू सलाहों की कोई ज़रूरत नहीं। वे खुद जो चाहेंगे करेंगे, देखते हैं कौन क्या बिगाड़ लेता है। अपने इस जन्मजात गुण की वजह से ही तो शराफत के किसी दूसरे काम में लगने की बजाय राजनीति के धंधे में लगे हैं। किसी की सुनने-सुनाने की सभ्यता से मुक्त अपनी वाली चलाने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। इसीलिए उन्होंने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की भी गुड़ीमुड़ी कर के एक कोने में डाल दिया और खड़े हो गए हमारी मुर्गी की एक टाँग के शाही अन्दाज़ में, और जब कोर्ट ने डंडा फटकारा तो चट से दूसरी टाँग बाहर निकाल ली और फौरन समझ गए कि कोर्ट का आदेश हवा में उड़ाने के लिए नहीं मानने के लिए होता है।
    हमारे देश में यह बीमारी आजकल बढ़ती जा रही है। कोई किसी की बात मानना नहीं चाहता, सब अपनी-अपनी चलाने में मशगूल हैं। जब तक कोई डंडा हाथ में उठाकर खोपड़ी तोड़ने की मुद्रा में नहीं आ जाता तब तक सामने वाले को लगता ही नहीं कि कभी कान और मस्तिष्क का आम जनता के प्रति सहानुभूति जगाने वाला हिस्सा भी इस्तेमाल करना है।
दरअसल हमारे देश में इन दिनों हुक्मरानों को हमेशा डर लगा रहता है कि बाज़ारवाद के इस दौर में कोई चीज़ अगर मुफ्त में बाँट दी तो फिर दुनिया का दरोगा अमेरिका नाराज़ हो जाएगा। आखिर हमने परोपकारी राज्य की अपनी पुरानी परम्परागत दकियानूसी छवि से बड़ी मुश्किल से छुटकारा पाया है। हम पानी को तो बोतलों में भर कर बेचने की अपनी प्रतिबद्धता को सफलता से निभा ही रहे हैं, हवा बेचने की दिशा में भी एक ना एक दिन आगे बढ़ेंगे, ऐसे में मुफ्त गेहूँ बाँटने की बात हज़म होना मुश्किल तो है। अब देखना है डंडे के डर से भी अब गेहूँ बँटता है या नहीं।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

हबीब तनवीर - जयन्ती, उन्होंने सिर्फ किया नहीं बल्कि बेहतरीन किया

हबीब साहब से हर मुलाकात की याद लम्बे समय से अब भी बिल्कुल तरोताज़ा है, हालाँकि उनसे रूबरू होने का मौका ज़्यादातर उनके नाटकों के ज़रिए ही हुआ, लेकिन एक ख़ास मुलाकात आज भी एक महत्वपूर्ण घटना के तौर पर जे़हन पर नक्श है। उन दिनों वे रंगमडल (भारत भवन) भोपाल के निर्देशक हुआ करते थे। सुप्रसिद्ध सिने निर्देशक सुधीर मिश्रा ख़ास हबीब साहब से मिलने के लिए भोपाल आए तो पहले से ही तय कार्यक्रम के मुताबिक मैं और पूर्व रंगकर्मी/समाजसेवी आलोक प्रतापसिंह उनके साथ भारत भवन पहुँचे। सच कह रहा हूँ, रंगमंडल के निर्देशक के उस चेम्बर में, जिसकी धज किसी ऊँचे प्रशासनिक अधिकारी के चेम्बर सी थी, हबीब साहब को बैठा देखकर मुझे बड़ा अजीब लगा। वे इस माहौल में एकदम डपेपिज लग रहे थे। दो-तीन घंटे की इस मुलाकात में काफी बातें हुई, सुधीर भाई और हबीब साहब ने अपनी फिल्म - ये वो मंज़िल तो नहीं की यादें ताज़ा की जिसका केन्द्रीय पात्र विश्वविद्यालयीन ज़माने के आलोक प्रताप सिंह पर आधारित था। आलोक प्रताप सिंह और मैं थे तो भोपाल गैसकांड आन्दोलन की बातों के साथ हमारे नुक्कड़ नाटक दास्तान-ए-गैसकांड की बातें भी चलीं, उन्होंने इस नुक्कड़ नाटक के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। इस मुलाकात के एक-दो दिन पहले ही मैंने के.जी. त्रिवेदी के एक नाटक राम की लड़ाई में अभिनय किया था जिसे हबीब साहब ने रवीन्द्र भवन की सबसे आगे की सीट पर बैठकर देखा था। उन्होंने तुरंत मुझे पहचान लिया और मेरे अभिनय की तारीफ की। इस दौरान हबीब साहब रंगमंडल के पुराने कलाकारों और प्रशासन के असहयोगात्मक रवैये के कारण भी काफी आहत महसूस हुए, जिसके नतीजे के तौर पर उन्हें बाद में रंगमडल छोड़ना पड़ा।
बहरहाल, जनपक्षीय सामाजिक राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना से लैस हबीब साहब ने जहाँ रंगकर्म के प्रति अपने समर्पण और अनोखे लोक प्रयोगों के ज़रिये जनसाधारण व रंगमंच की दूरी को पाटकर रख दिया था, वहीं दुनिया भर में भारतीय रंगमंच की धाक जमाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। भारत भर में और वैश्विक स्तर पर भी भारतीय रंगकर्म का परचम फहराने में देश की दूसरी कोई भी हस्थी सत्ता की निकटता के बावजूद सफल नहीं हुई जबकि लगातार विरोध और बाधाओं के बाद भी हबीब तनवीर ने सिर्फ अपनी रंग दृष्टि के दम पर यह संभव कर दिखाया। वे रंगकर्म का एक सम्पूर्ण संस्थान थे, एक समूचा अध्याय थे जिसके बिना भारतीय रंगमंच का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता। उन्होंने सिर्फ किया नहीं बल्कि बेहतरीन किया। उनकी अनुपस्थिति से भारतीय रंगमंच पर एक अजीब सा सन्नाटा खिच आया है, एक बड़ा निर्वात सा पैदा हो गया है जिसका भरना लगभग नामुमकिन सा लगता है।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

बहना मेरी राखी के बंधन को निभाना

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
         आज रक्षा बंधन है। धूम-धड़ाके के रिक्टर पैमाने पर अपेक्षाकृत सुस्त यह भावभीना त्योहार आजकल उतना उत्साहवर्धक नहीं रह गया है जितने दूसरे आयातित विदेशी त्योहार। बाज़ार की दृष्टि के इस त्योहार पर उतना मेहरबान ना होने से (जितनी वेलेंटाइन डे, फेंडशिप डे आदि-आदि पर होती है) यह एक ठंडे से त्योहार के रूप में आकर चला जाता है। आजकल यूँ भी परिवार नियोजन की वजह से पहले की तरह घर-घर में ढेर-ढेर बहनें नहीं होती हैं, फिर कन्या भूण हत्या की वजह से बहनों की संख्या और भी कम होती चली जा रही हैं। सबसे अखरने वाली बात ‘बहनापे’ की घोर कमी हो गई है।

         भारतीय फिल्मों के बारे में कलावादी समीक्षक चाहे जो भी कहें, मुझे तो लगता है माहौल खीचने में फिल्मों की बड़ी जबरदस्त भूमिका रही है। पारम्परिक वाद्यों की सुरीली सुर-लहरियों से पवित्र बहनापे का वह समा बंध जाता था कि हॉल में बैठा भाई, भले ही वह कितना भी कठोर क्यों ना हो, ज़ार-ज़ार रो पड़ता था और लौटते समय बहन के लिए कोई ना कोई तोहफा ज़रूर ले जाता था। पवित्रता की भावनात्मक लहरें उमड़कर ड्रेस सर्किल से होते हुईं गाँव-गाँव शहर-शहर फैल जाती थी। हीरोइन, ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ गाते-गाते भाइयों में बंधन निभाने का जज़्बा कूट-कूट कर भर देती थी, जिसकी परिणति रास्ते में किसी शोहदे की पिटाई हुआ करती थी। मगर जब से हिन्दी फिल्मों में बहन की भूमिका का लोप हुआ है हमारे इर्द-गिर्द भी बहन की व्यापक उपस्थिति लुप्तप्राय हो गई है।

         पुराने ज़माने में स्त्री को बहन कह कर पुकारना आम शिष्टता थी, मगर आजकल पुरूष इस शिष्टाचार से दूर भागने लगे हैं। जाने कौन स्त्री, खुद को बहन कहने पर कौन सा रूप अख्तियार कर ले, कुछ कहा नहीं जा सकता। पहले, ‘बहना ओ बहना तेरी डोली मैं सजाऊँगा’ गाते हुए भाई बेहद फक्र महसूस करता था, लेकिन जमाना बदल गया है। आजकल की बहनें तो ऐसी हैं कि भाइयों को ही डोली में बिठाकर विदा कर दें।

         इन बहनों ने भी गज़ब की चाल पकड़ी है। वे पश्चिम की बहनों से प्रेरणा लेकर कपड़ा व्यापार को चौपट कर रहीं हैं। साड़ी, सलवार-कमीज़ हमेशा के लिए घड़ी कर रख दी जाएगी तो कपड़े का धंधा तो चौपट होगा ही। बहनों के विकट जज़्बे से भाई लोग घबराए हुए हैं। बहने रैम्प पर  जलवे बिखेर रहीं हैं। विडियो, सिनेमा में देहदर्शन की पराकाष्ठा से भाइयों की जबरदस्ती अग्नि परीक्षा ले रहीं हैं। भाई की डोली को लात मारकर स्वयंवर रचा रहीं हैं। भाई बेचारा किंकर्तव्यविमूढ सा परदे के पीछे से तमाशा देख रहा है। बहन आधुनिकता की धुंआधार आंधी में काफी आगे निकलती चली जा रही है । भाई, बहन के चॉटे के डर से दुबके रहने को मजबूर है। इस मामले में अगर उसने ज़्यादा बहादुरी दिखाने की कोशिश की तो स्पासंर तो जूते मारेंगे ही, बहनें भी एकजुट होकर कुटम्मस कर सकती हैं।

    कुछ सीधी-साधी बहनों को रक्षा की दरकार है, लेकिन रक्षा का पारम्परिक भार भाई लोग उठा नहीं पा रहे हैं, क्योंकि गुंडे भाइयों से ज़्यादा ताकतवर और संगठित हैं। बहनें दब रही है, भाई रक्षा नहीं कर पा रहा है, दबाने वाला भाई से ज़्यादा पहुँच वाला है। बहनें दहेज के लिए जिन्दा जलाई जा रहीं हैं, भाई निरीह खड़ा भस्म होती चिता को देखता रहता है। पृष्ठभूमि में कहीं कोई गीत नहीं सुनाई देता, ‘भैया मेरे राखी के बन्धन को निभाना’।

    दिनांक 05.08.2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित ।

शनिवार, 14 अगस्त 2010

पन्द्रह अगस्त का पोरोग्राम और नेताजी का भासड़

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

जैसे ही नवोदित नेताजी को खबर मिली कि अबकी बार तहसील प्रांगण में उन्हें झंडावंदन करना है, तत्क्षण उन्होंने मन ही मन राष्ट्रीय गान रटना शुरू कर दिया। खास चमचे ने जब देखा कि नेताजी अपने ललाट की सलवटों का भार उठा नहीं पा रहें हैं, चिन्तामग्न से हुए पड़े हैं, वह भी चिन्ताविभोर होकर नेताजी को कुरेदने लगा।
- कोई परेशानी है दद्दू, टेंसन में काहे आ गए, बारूद मलें क्या ? यहाँ बारूद उस शक्तिचूर्ण को कहा जा रहा है जिससे आम हिन्दुस्तानी अपनी बत्तीसी से छुटकारा पाया करता है और यदा-कदा मुँह में कैंसर जैसे महान रोग का पालक-पोषण करता है। बहरहाल, बारूद खाने का नेताजी का फिलहाल कोई इरादा नहीं था। वे चमचे के सामने अपनी चिन्ता प्रकट करते हुए बोले,
- पोरोग्राम में गाना गाना पडे़गा ना, याद कर रहे है। तीसरी कच्छा के बाद कभी गाओई नी सुसरो।
- कौन सा गाना ? चमचे ने तुरंत अपनी गानों की दिमागी फेहरिस्त टटोलते हुए पूछा।
- अरे वही जनगनमन...., नेताजी बोले। इस पर चमचा उन्हें गम्भीरता से समझाता हुआ बोला,
- अरे ऊको जान दो, वो तो स्कूल की लड़कियन गा लेंगी। आप तो स्पैच की तैयारी करो, वह भी सुनाना पडे़गी।
- स्पैच ? ये क्या होती है ?
- अरे भासड़ भासड़....। चमचे ने समझाया। नेताजी तत्काल राष्ट्रगान का रटना छोड़ भाषण की प्रेक्टिस करने लगे। चमचा उन्हें एकांत उपलब्ध करा कर चल दिया। बीस पच्चीस मिनिट बाद चाय-पानी-बीड़ी-ज़र्दा इत्यादि से निवृत्त होकर चमचा कुछ ज़्यादा ही चमकता हुआ वापस आया और फिर नेताजी को फिर कुरेदने लगा,
- जमा कछु ?
नेताजी एक शुद्ध भारतीय गाली देते हुए बोले,
- भाई-भैनों से आगेई नहीं बढ़ रयो दारी को....!
- चमचे को नेता जी पर दया आने लगी। वह कुछ ज़्यादा ही वफादार बनता हुआ बोला,
- तुम तो रहन दो। हमी कछु करते हैं।
           नेताजी को एक अलग चिन्ता ने घेर लिया। इस साले ने ऐन टाइम पर अगर धोखा दे दिया तो ! नेतागिरी झाड़ने का एक सुनहरा मौका हाथ से निकल जाएगा, भद्द पिटेगी सो अलग। उन्होंने पूरी तौर पर आश्वस्त होने के लिए चमचे से पूछा,
- तुम का करोगे ?
- लिखवाते हैं........, चमचा बोला।
- किससे लिखवाओगे ?
- अब लिखवाते हैं......., चमचा फिर समझदार बनता हुआ बोला।
- अबे लिखवाते हैं लिखवाते हैं कर रिया है, बता काहे नहीं रहा कौनसे लिखवाएगा ? नेताजी भड़क गए।
- हमी टिराई करेंगे.......!
- तुम औरे हमरा बंटाधार करवाओगे। तुम्हीं लिख सकत होते तो हम ना लिख लेते ! तुम सोई तीसरी कच्छा के बाद कभु स्कूल नहीं गए मताई के.......।
- अरे दद्दू, बोल के लिखवांगे किसी से !
- और बाचेगा कौन ? तुमरा बाप ?
- हाँ....., ये तो सोचिई नहीं हमने। ऐसो करत हैं, आज संझा के हम एक रम की अद्धी चढ़ाकर फिर माइंड चलाते हैं। कल सबेरे आपे रटवा देंगे।
- साले हरामजादे, ठर्रा की औकात तुमरी, हम जब से नेता बने तुम रम से नीचे बात ही ना करत हो। सौ जूते दें हैं हम, अब जाओ फटाफट, स्पैच की तैयारी करो।
           चमचा नेताजी की जेब से ज़बरदस्ती सौ रुपया निकालकर ले गया। नेताजी ने एक प्रेम भरी माँ की गाली देकर चमचे की इस धृष्टता को स्वीकृति दे दी और वे भाषण की चिंता चमचे पर छोड़कर अपनी चार-चार रखैलों के बारे में सोचने लगे। जबसे उन्होंने देश की चिंता करने का ठेका लिया है, अपनी सभी चिंताएँ वे यूँ ही चमचों के ऊपर छोड़कर चिंता मुक्त जीवन जीते हैं।
            रात को टुन्न होकर, घोडे़ बेचकर सोने के बाद अगले दिन चमचा आध घंटा ज़्यादा शौचालय में बैठकर, टी.वी. पर और इधर-उधर सुने भाषणों, नेताओं के वक्तव्यों में अपने कुछ मौलिक विचारों के घालमेल से एक विस्तृत भाषण तैयार कर लाया और नेताजी के घर आकर उसने उन्हें अपना वह अनमोल भाषण रटाना चालू किया।
- भाईयों और बहनों........!
- भाईयों........., बोलकर नेताजी खामोश हो गए।
- भाईयों और बहनों........! चमचे ने फिर दोहराया। इस पर नेता जी उखड़ गए,
- बस भाईयों ही काफी है, आगे बोल ! चमचे ने आगे बोलना शुरू किया और नेताजी ने मन ही मन अपना पहला भाषण रटना शुरू किया।
- भाईयों...... आज पन्द्रह अगस्त के इस पावन अवसर पर.......
चमचा ठिठककर दद्दू से बोला,
- काहे, का है पन्द्रह अगस्त को, का कहत हैं गणतन दिवस के स्वतंत्रा दिवस ?
इस पर दद्दू भड़कते हुए बोले,
- जो कछु होए, पन्द्रह अगस्त बोलने में का तुमाई नानी मर्रई!
           चमचे ने फिर अपना प्रशिक्षण सत्र प्रारम्भ किया। चमचे का एकालाप सुनते-सुनते नेताजी धीरे-धीरे सपनों में खोते चले गए और उनकी आँखों के सामने अपार जनसमूह का सागर हिलोरे मारने लगा। अपने आप को एक ऊँचे मंच पर पाकर नेताजी में एक अनोखा उत्साह संचारित हो गया और वे माइक के सामने पूरे जोशोखरोश से अपना भाषण देने लगे।
- बड़ी खुशी की बात है कि पन्द्रह अगस्त के इस पावन अवसर पर आज हमें इस विशाल तहसील प्रांगण में तिरंगे की रस्सी खैंचने का मौका मिल रहा है। बहुत साल पहले आज ही का वो दिन था जब देश के बड़े-बडे़ नेताओं ने अँग्रेज को भगाकर पहली बार अपने हाथ से तिरंगे की रस्सी खैंची थी। अपन तो थे नहीं तब, सुना है, वे दिन भी बड़े लफड़े-झपड़े के दिन थे, नेतागिरी करना बहुत टेढ़ा काम था, पढ़ा-लिखा आदमी ही नेतागिरी कर सकत था। गांधीजी, नेहरूजी सब पढे-लिखे बारिस्टर थे। मगर आज हमारे देश ने इतनी तरक्की कर ली है कि तीसरी कच्छा तक पढे़-लिखे हम जैसे ढोर-गंवार भी पंचाती राज में नेता बनके झंडा की रस्सी खींचने के काबिल हो गए है। अँग्रेजों के टाइम में इतनी सहूलत नहीं थी, अँग्रेजी पुलिस डंडे मारा करती थी। हम होते तो घर से बाहर ही ना निकलते। बिलावजह डंडा खाने से क्या फायदा।
            उन दिनों राजनीति सूखा-सट्ट मैदान थी, कोई विधाक नहीं, कोई मंतरी नहीं, पंच-सरपंच कोई नहीं। हर आदमी अंग्रेजों का गुलाम होता था। कोई आज़ादी नहीं थी, ना खाने की ना कमाने की। कोई फंड नहीं, कोई एलाटमेंट नहीं। फंड होय, अलाटमेंट होय तो नेता विकास करे, अपना भी और देश का भी। फंड होए तो नाली बनवाए, लेटरिन बनवाए, हेंडपम्प लगवाए, सड़क पर मट्टी-सट्टी डलवाए, कुआ-सुआ खुदवाए....... इस्कूल, आंगनवाड़ी बनवाए ! फंड ना हो तो क्या भुट्टे भूने ? क्या अपना विकास करे क्या देश का विकास करे ! सारी नेतागिरी बेकार, कोई धेले को ना पूछे ! नेतागिरी तो वैसे भी आजकल बड़ी बेकार चीज़ है। लोगोन किसी को देश का काम करते हुए देख नहीं सकत हैं। काहे कि हर आदमी को नेता बनना है, हर आदमी कुर्सी चाहता है, हर आदमी विकास करना चाहता है, हर आदमी को कमीसन चइए....... ये चइए, वो चइए।
            उन दिनों के सबरे नेता बड़े सीधे-साधे थे, बस बापू के कहने पर चलत थे, ये नहीं कि कभी इसके कहने में चलन लगे, कभी उसके कहने में चलन लगे। बापू भी बहुत सीधे थे, देखने को ही डंडा रखत थे, कभी इस्तेमाल नहीं किया, वर्ना अँग्रेज दो सौ साल टिकता ? दो दिन में भाग जाता। अब इस जमाने में हमारे भाई बंधुओं को देखो, एक दूसरे के ऊपर कुर्सी-टेबल, माइक-साइक फेंककर देश चला रहे हैं, क्योंकि यह जूतमफैक बहुत ज़रूरी है, वर्ना कोई आपे राजनीति करन न देगा, हर कोई धोती खींचेगा। उन दिनों के नेता जूता सामने रखकर बात करते तो अँग्रेज कभी का देश छोड़कर भाग जाता। हमारी पाल्टियों को जल्दी देश की सेवा करने का मौका मिलता। वे जल्दी जाते तो हम हिन्दुस्तानी जल्दी अध्यक्ष-फध्यक्ष बनते, हमें जल्दी विधाक-एम्पी, मंत्री-मुखमंत्री बनने का मौका मिलता, हम जल्दी नेता बनते, चार पैसा कमाते, देश को जल्दी टाटे-बिड़ले मिलते, देश में जल्दी अंबानी पैदा होते, रुपये-पैसे की रेलमपेल आज से डेढ़ सौ साल पहले चालू हो जाती। अब तक देश में कितनी तरक्की हो जाती। तो कहने का मतलब ये कि ये जो चारों तरफ गाली-गुफ्तार चल रही है, ये जो कुर्सी-टेबल माइक-साइक फिक रहे हैं, ये उस वक्त गोल मेज कांफ्रेसन में फिकने चइये थे, देश जल्दी आज़ाद होता।
           सब कुछ लफड़ा उस वक्त के नेता लोगन की शराफत ने किया। वे सत्य अहिंसा, सादा जीवन-उच्च विचार, नैति-नैतिकता वगैरा-वगैरा फालतू चक्करन में पड़ गए। उस वक्त कोई मैया की गारी देने वाला नेता ही नहीं था तो वे हरामजादे अँग्रेज काहे गद्दी छोड़ते ! आज हमरा देश काहे इतनी तरक्की कर रहा है, इसलिए क्योंकि अब नेतागिरी की वो पुरानी फिलिम नहीं चलती। अब तो जिसकी लाठी उसी की भैंसिया। अब घुग्घू बनके देश नहीं चलता। बात-बात पर रार-तकरार, एक-दूसरे की धोती-पजामा खैंचने का दमखम जो हो तो राजनीति में नेतागिरी के कौनो मतलब हैं, वर्ना खली-भूसी की दुकान अच्छी। विदेशों में बड़ी-बड़ी मिटिंगन में टेबल पर जूता रखकर बात करना चइये, सारी समस्या दो मिनिट में सुलट जैहै। ये पाकिस्तान घड़ी-घड़ी कश्मीर-कश्मीर चीखन लगत है, काहे का कश्मीर ! दो रैपट दो खैंच के तो कश्मीर-वश्मीर सब भूल जैहै। नेपाल को देखियो, वो कभी कछु माँगत है का ? पड़ो है चुपचाप, मस्त खा पी रयो है। भूटान को देखो, तिब्बत को देखो, बांगलादेश को देखो, सुना है ये सब अपन पड़ोसी हैं, कैसे शराफत से टाइम काट रहे हैं, उन्हें तो नहीं चइये कश्मीर, इन्हीं को चुल है कश्मीर-कश्मीर.......!
              खैर, हम इधर तहसील में ना पड़े होते तो बताते। हम जो नेशनल लीडर होते तो बताते एक-एक को। ना जूते मार-मार कर टाट गंजी करते तो हमरो नाम बदलकर घसियारा रख दयो हम कछु ना कहते।
इसलिए भाइयों, ये पन्द्रह अगस्त तो ठीक है अपनी जगे पर, हमने रस्सी खैंच दी है, हवा चलेगी तो जो झंडो फर-फर फहराएगो ही, सब लोग लड्डू-वड्डू खालो, ज़्यादा बनवाएँ हैं, जितने चइये उतने खाओ, घर भी ले जाओ, मगर इतना याद रखियों, अबकी दफे हमें चाहे जिस पाल्टी से, चाहे जिस इलेक्शन का टिकट मिले, भौर की पहली किरण के साथ ज़्यादा से ज़्यादा तादात में बोट देकर इस दद्दू को विजई बनइयों, यही प्रार्थना है। बेफजूल हमें लाठी-गोली का इस्तेमाल करने की नौबत नहीं आना चइये। धन्यवाद। भारत माता की जय।

बुधवार, 11 अगस्त 2010

हरिभूमि में व्यंग्य - खेलोगे कूदोगे तो बनोगे नवाब


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          बचपन में माँ-बाप और मास्टरों से सैंकड़ों बार सुना करते थे- ‘‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब!’’ उन दिनों माँ-बाप और मास्टर इन दोनों ही केटेगरी के जन्तुओं से बहस मुबाहिसे की गुंजाइश ज़रा कम हुआ करती थी, लिहाज़ा उनकी बात मानकर जो लोग खेल के मैदान में कम और किताबों में ज़्यादा ध्यान देते रहे, उनकी किस्मत पर ताला लगा हुआ आज भी देखा सकता है। जिन्होंने खेलों के सर्टिफिकेट इकट्ठा किए वे महत्वपूर्ण विभागों में अच्छे-अच्छे पदों पर जम गए और देश-विदेश भी घूम आए और जिन्होंने किताबों में खोपड़ी दिए मार्कशीटें इकट्ठा कीं, हो सकता है उनमें से कई अब भी वे मार्कशीटें गले में लटका कर घूम रहे हों।
          पढ़ने लिखने वालों का हाल तो सभी जानते हैं कोई कौड़ी को नहीं पूछता, हम खुद प्रत्यक्ष गवाह हैं। बुद्धिजीवी, कवि, लेखक, साहित्यकारों के लिए इतना बड़ा आयोजन होते कभी किसी ने देखा-सुना है! कोई सपने में भी नहीं सोच सकता। इतने बड़े बडे संस्थान, सभागार, रंगमंच, नाचने- गाने के लिए जगह वगैरह वगैरह के बारे में देश में कोई सोचता है ! कभी नहीं ! आज़ादी के बाद बासठ सालों में बजट के पन्नों पर मजाल है इस मद का नाम कभी आया हो। मगर खेलने कूदने वालों के लिए अरबों रुपए लगाकर देश की राजधानी का पूरा नक्शा बदलने का काम अब अन्तिम से चरण में है। जो भी हो, खेल कूँद के लिए बड़े बड़े स्टेडियम, बड़े-बडे़ स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, स्वीमिंग पूल और कोर्ट, देश भर में सैकड़ों की तादात में हैं। अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन, पहले एशियाड और अब कामन वेल्थ ! क्या कहने। भ्रष्टाचार के प्रदर्शन के लिए कला-संस्कृति में ऐसे मौके कहाँ ?
          बड़े-बड़े पढ़ने लिखने वाले हुए आज़ादी के बाद, उन्होंने अपनी तरफ से ज़ोर भी लगाया कि देश की जनता भी पढ़-लिखकर नवाब बनने की दिशा में अग्रसर हो मगर हुआ उल्टा, पढ़ने लिखने वाले या तो किसी सरकारी दफ्तर में बाबू या चपरासी हो गए या ज़्यादा से ज़्यादा किसी स्कूल कॉलेज में मास्टर। मजे़ उनके हुए जो पढ़ाई के पीरियड में डंडी मारकर खेल मैदान में ‘खराब’ बनने की प्रेक्टिस करते रहे। उनके लिए आज देश में क्या कुछ नहीं है, राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम और दाम कमाने के अनेक मौके हैं। ऐसे आयोजनों, आयोजनों में भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार में भाई-भतीजावाद, भाई-भतीजावाद में मंत्रियों अफसरों और व्यापारी-ठेकदारों के साथ षड़यंत्र रचने की सुविधाएँ इत्यादि इत्यादि क्या कुछ नहीं है। इस सबको देख-देखकर जलने और बुराई करने के अलावा पढ़ने-लिखने वालों के पास और क्या है!
          बदले हुए माहौल में वह पुरानी कहावत बदलने की जरूरत है-‘‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे खराब खेलोगे कूदोगे तो बनोगे नवाब!’’

हरिभूमि में दिनांक 11.08.2010 को प्रकाशित

शनिवार, 17 जुलाई 2010

नुक्कड़ नाटक दास्तान-ए-गैसकांड का मन्त्री और वैज्ञानिक प्रसंग


जादूगर    -  मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान
                उल्टी खोपड़ी सीधा कान
                लड़के, लौट आ !   
जमूरा     -   लौट आया !
जादूगर   -   बैठ जा !
जमूरा     -   बैठ गया !
जादूगर   -   खड़ा हो जा !
जमूरा     -   खड़ा हो गया !
जादूगर   -   बता बाबू लोगों को कहाँ गया था......?   
जमूरा     -   उस्ताद !
                   भोपाल और भोपाल के आसपास के
                   जायज़-नाजायज़ श्मशानों-कब्रिस्तानों में
                   नदी-नालों, सुनसान मैदानों में
                   एक-एक मरने वाले की आत्मा से मिलकर आया हूँ
                   सही सही फिगर नोट कर लाया हूँ !
जादूगर    -  शाबास लड़के !
                   तो फैला दे खबर तमाशबीनों में
                   उठा दे दर्द सबके सीनों में
                   कितनों ने गैस सूँघी कितने मरे
                   कितने शरीरों में बीमारियों के पोटले धरे
                   कितने उजड़ गए बाग-बगीचे और खेत हरे!
जमूरा    -    उस्ताद !
                   चार लाख ने सूँघी, बेहिसाब मरे
                   हज़ारों आँखों में अंधेरे भरे
                   खेत सूख गए तमाम
                   हज़ारों पेड़ों से पत्ते झरे !
जादूगर  -    जमूरे! सच बोलता है या झूठ !
                   उस्ताद को जेल में बन्द करवाएगा,
                   अपने मन से फिगर बताएगा !
जमूरा   -    नहीं उस्ताद, अपना कम्प्यूटर सही हिसाब बताता है,
                 अरे क्या मन्त्री समझ रखा है जो झूठ खोद लाता है.....?
जादूगर-    ये सही है कि हिन्दुस्तान के मंत्रियों को झूठ बोलने की आदत पड़ चुकी है....! मगर लड़के, मैं भी जादूगर हूँ, एक नम्बर का जादूगर,
                   जिसको भी चाहा यहाँ बुलवा लिया
                   अच्छे अच्छों से सच उगलवा लिया
                   चाहे कहीं भी रखा हो लड़के
                   उस्ताद ने हर राज खुलवा लिया............
                   लड़के, चला जा!
जमूरा    -    चला गया !
जादूगर  -    लौट आ !
जमूरा    -    लौट आया !
जादूगर  -    बैठ जादूगर के मंतर पर
                   कस ले शिकंजा तंतर पर
                   घुस जा उस मन्त्री के बंगले में
                   झाँक कर देखना जरा जंगले में
                   ज़रा सी चमचागिरी कर पटा लेना
                   मौका देख कर बस उठा लेना
                   ख्वाब में दिखाना उसे पैसा और सीट
                   जनता की अदालत में लाना घसीट !
                   मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान
                   उल्टी खोपड़ी सीधा कान!
                   गिलि गिलि गिलि फूं
                 (जमूरा मजमें का चक्कर लगाता है। इस बीच मन्त्री बीच में आकर खड़ा हो जाता है।)
जमूरा  -    सर, लगता है आप बहुत परेशान हैं, मैं आपकी कुछ मदद करू सर ?
मन्त्री   -    ए-ए कौन है बे ? तुझे अन्दर किसने घुसने दिया ? जानता नहीं हमारे बंगले के चारों तरफ चौबीस घंटे पुलिस लगी रहती है, कोई मक्खी भी अन्दर नहीं घुस सकती.........
जमूरा  -    हम मक्खी नहीं हैं सर, प्रजा हैं प्रजा ! हममें और मक्खी में जमीन-आसमान का अन्तर है।
मन्त्री   -    वो कुछ भी हो, पर बता तुझे अन्दर किसने घुसने दिया, अभी टर्मिनेट करता हूँ हरामी को...........
जमूरा  -    सर ! हाईकमान का जिसके सिर पर हाथ होता है वो हर कहीं घुस जाता है।
मन्त्री   -    अच्छा तो हाईकमान के आदमी हो, पहले क्यों नहीं बताया! बैठो-बैठो !
जमूरा  -    हाँ ! हमारा उस्ताद अपना हाई कमान है।
मन्त्री  -    खामोश, उल्लू बनाते हो, बोलो काम क्या है ?
जमूरा -    सर, काम-वाम तो बाद में देखेंगे, लगता है आप बड़े दुखी हैं, कोई गाना-वाना सुनाऊँ आपको ? सारे जहाँ से अच्छा...........
मन्त्री  -    खामोश, शहर में इतनी मौतें हो गईं और ये कम्बख्त हमें गाना सुनाएगा, अरे बदतमीज़, जानता नहीं हम सरकारी शोक में हैं...........
जमूरा -    आप भी बिल्कुल गधे हैं सर, अरे अब फूट गया पम्पा, छूट गई गैस तो आप भला इसमें क्या कर सकते हैं ? यह तो बस्तियों की गलती है, शहर की गलती है, जो यूनियन कार्बाइड के पास जा बसा। अगर आपको पहले पता चल जाता तो आप आबादी को फैक्ट्री से 50-50 किलोमीटर दूर ट्रांसफर नहीं करा देते......और वो तो जनता हाथ धोकर पीछे पड़ गई कि पट्टा दो, पट्टा दो, आपने भी फैक्ट्री के पास पट्टे बाँट दिये कि ले पट्टा, ले पट्टा, वर्ना आप ऐसा गैर-जिम्मेदाराना काम कभी कर सकते थे ?
मन्त्री  -    करेक्ट माय बॉय, व्हाट इज योर नेम ? भई तुम्हें तो प्रेस में होना चाहिए, पब्लिसिटी में नौकरी करोगे, डायरेक्टर बना देते हैं.....। अच्छा किसी अखबार में रखवा देते हैं.........! अच्छा छोड़ो ! यह बताओ तुम्हें गैस-वैस तो नहीं लगी ? नहीं, लगी हो तो बता दो। दो हज़ार दिलवा देंगे, और सुनो, मर जाओ तो और भी अच्छा दस हज़ार दिलवा देंगे। अरे यार तुम तो कुछ बोलते ही नहीं..... अच्छा राशनकार्ड बन गया ? राशन-वाशन मिलता है ? नहीं बना हो तो बोलो........ जितने कहोगे बनवा देंगे.......... और वो क्या कहते है उसे क्लेम फार्म भरा कि नहीं! न भरा हो तो हमसे कहो चाहे जितने भरवा देंगे!
जमूरा -    मन्त्री जी ! ज़रा जनता को बताइए, ये क्लेम फार्म क्या बला है ?
मन्त्री  -    अरे यार अभी जनता को क्लेम फार्म की क्या ज़रूरत है, फिर कोई नई फैक्ट्री बनेगी, गैस उगलेगी, लोग मरेंगे तब ही तो क्लेम फार्म भरे जाएंगे! तुम कहो तुम्हें क्या चाहिए ?
जमूरा -    मुझे किसी चीज़ की जरूरत नहीं है............
मन्त्री  -    तो आया क्यों यहाँ झक मारने ?
जमूरा -    उस्ताद ने बुलाया है आपको, जनता की अदालत में हाज़िर होने के लिए !
मन्त्री  -    जनता की अदालत ? ये क्या होती है ? भई अदालतें तो बस हमारी होती आईं हैं........
जमूरा -    खामोश........
                छू काली कलकत्ते वाली
                पकड़ ले आ के सूरत काली
                (जमूरा-जादूगर ठमकते हुए मजमें का चक्कर लगाते हैं, गाना गाते हैं....)
                आओ लोगों तुम्हें दिखाएं मन्त्री हिन्दुस्तान का
                लाशों पर मंडराता जैसे गिद्ध कब्रिस्तान का
                मन्त्री आया रे, मन्त्री आया रे
                मन्त्री आया रे, मन्त्री आया रे
                देश बचाओ नारा देकर
                देश को खुद ही खा जाए,
                अमरीका हो या जापानी
                मल्टीनेशनल खुलवाए
                लोकतंत्र की आड़ में देखो तानाशाही करता है,
                इनके महलों में दबा हुआ है पंजर हिन्दुस्तान का,
                लाशों पर मंडराता जैसे गिद्ध कब्रिस्तान का।
                रिश्वत खाओ, नोट कमाओ
                इनका एक ही धन्धा है
                हर मन्त्री के हाथ में देखो
                प्रजातंत्र का डंडा है
                रूप धरे बैठे हैं देखो सेवक सब शैतान का,
                लाशों पे मंडराता जैसे गिद्ध कब्रिस्तान का।
                मन्त्री आया रे, मन्त्री आया रे
                मन्त्री आया रे मन्त्री आया रे
जमूरा -    उस्ताद ! मन्त्री को पकड़ लाया
                शिकंजे में जकड़ लाया
                कहो तो मुर्गा इसे बनाऊँ
                चुग्गा इसे खिलाऊँ!
जादूगर-    नहीं लड़के
                आ ज़रा सामने इससे दीदे लड़ा
                कर दे इसे अदालत के कटघरे में खड़ा
                बांध दे आँखों पर इसकी उगलवाऊ पट्टा
                सुनवा दे जनता को इसकी हरामखोरी का रट्टा!
जमूरा -     कर दिया उस्ताद !
जादूगर-    मन्त्री!
मन्त्री   -    कौन है बे ?
जादूगर-    तमीज़ से बोल तमीज़ से, जानता नहीं तू जनता की बीच जनता की अदालत में जनता के वकील के                  सामने खड़ा है!
                 मजमा बहुत बड़ा है,
                  ज़्यादा गड़बड़ करेगा तो जनता चीर कर फेंक देगी...........
मन्त्री   -    जनता.......... ओह यानी वोटर्स! माफ करना भाइयों, मैं समझा था कि मैं अपने दफ्तर में हूँ या विधानसभा में! पाँच-पाँच साल बाद मुलाकात होती है न, भूल हो जाती है। खैर! चलता है...........!
जादूगर-    मन्त्री, जनता सवाल पूछना चाहती है, जवाब देगा ?
मन्त्री   -    भई जवाब तो सचिवालय से दिये जाते है, खैर फिर भी देगा!
जादूगर-    झूठ तो नहीं बोलेगा ?
मन्त्री   -    खानदानी पेशा है उस्ताद छूट कैसे सकता है !
जादूगर-    उस्ताद का जादू जोर दिखाएगा
                तू तो क्या तेरे बाप से भी सच उगलवाएगा
                मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान
                उल्टी खोपड़ी सीधा कान
                मन्त्री.......?
मन्त्री   -    उस्ताद !
जादूगर-    मन्त्री लौट आ!
मन्त्री   -    लौट आया !
जादूगर-    2 दिसम्बर 84 की रात को कहाँ थे ?
मन्त्री   -    नहीं बताएंगे!
जादूगर-    मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान
                 उल्टी खोपड़ी सीधा कान,
                 मन्त्री 2 दिसम्बर की रात को भोपाल में जो कोहराम मचा उसके बारे में क्या जानता है ?
मन्त्री   -    कुछ नहीं !
जादूगर-    खामोश, सही सही बता क्या जानता है?
मन्त्री   -    यही कि फैक्ट्री के कर्मचारियों की लापरवाही की वजह से गैस शहर में टहलने निकल गई थी। गैस के शहर में टहलने की वजह से लगभग 2000 लोग जान से मारे गए जो खुद भी मेरा ख्याल है सड़कों पर टहल ही रहे होंगे !
जादूगर-    खामोश, तू ऐसे नहीं मानेगा!
                 मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान
                 उल्टी खोपड़ी सीधा कान,
                 सम्हाल जबान वर्ना दूँगा तान......
मन्त्री   -    उस्ताद धीरे-धीरे, अभी बताता हूँ........
                 हमने रिश्वतें खाईं थी
                 हमने चन्दे खाए थे
                 और इस बहुराष्ट्रीय कम्पनी को भोपाल लाए थे।
                 हमारे वैज्ञानिक मूर्ख हैं, उन्होंने हमें बताया ही नहीं कि इस फैक्ट्री में सिर्फ नोट ही नहीं ज़हर भी       बनता  है। ये एम.आई.सी, फास्ज़ीन, साइनाइड, फलाना, ढिकाना, आखिर क्या बला है हम जानते ही नहीं।
जादूगर-    सारी दुनिया जानती है कि इस गैस ने कितने शहरों को गैस चेम्बरों में बदल डाला, कितने इन्सानों की जानें ले ली, कितने जानवर मार डाले, पेड़ पौधे, खेत तहसनहस कर डाले। इन्सानों को कीड़ो की तरह मारा। आबादी के पास जिसे बनाने के लिए सारी दुनिया में पाबंदी है। रासायनिक युद्धों में जिसके प्रयोग की तैयारी है, उस गैस के बारे में तुम्हें कुछ मालूम ही नहीं ?
मन्त्री   -    मालूम है मालूम है! मगर हम किसी को क्या बताएँ ? जानते नहीं हम विधानसभा में गोपनीयता की शपथ खाते हैं। और फिर मरते हैं तो मरा करें! देश के लिए शहीद होना कोई बुरी बात है.......?
जादूगर-    खामोश, जो तुम्हें चुनकर सीट पर बैठाते हैं, अपनी रक्षा का पहरेदार बनाते हैं, उन्हीं की जान के दुश्मन बन जाते हो तुम लोग!
मन्त्री   -    हम कुछ भी करें तुम्हारे बाप का क्या जाता है ?
जादूगर-    खामोश, जब मालूम था कि फैक्ट्री किसी भी वक्त शहर को मुर्दाघर बना सकती है तो भी इसे आबादी से दूर हटाया क्यों नहीं गया ? जबकि जनता ने कई बार माँग की ?
मन्त्री   -    उस्ताद, जनता ने माँग ज़रूर की होगी, आंदोलन नहीं किया ! मांग तो हर कोई करता ही रहता है। किसी भी चीज़ के लिए जोरदार आन्दोलन-वान्दोलन होना चाहिए, तोड़-फोड़, आगज़नी होना चाहिए, तभी हमारी नींदें खुलती हैं। यूँ ही कैसे हम फैक्ट्री हटा देते ? और अगर उनकी ज़रा सी माँग पर हम फैक्ट्री हटा देते तो भई हमारी तिजोरियों कैसे भरतीं ? चुनावों, भाषणों, अधिवेशनों में पैसा खर्च होता है, वो कहाँ से आता ? हमारे लौंडे-लपाड़े अय्याशी कैसे करते ?
जादूगर-    मन्त्री, पिछले सालों में हुई तमाम दुर्घटनाओं पर तुमने ध्यान क्यों नहीं दिया ? जनता की सुरक्षा का इंतज़ाम क्यों नहीं किया ? किया तो क्यों किया सुरक्षा के हर नियम का उल्लंघन! जनता की जान से खेलकर जहर बनाने का परमीशन क्यों दिया ?
मन्त्री   -    नियमों का उल्लंघन हम नहीं तो क्या तुम करोगे ? जनता की जान से हम नहीं तो क्या तुम खेलोगे ? सुरक्षा के इन्तज़ाम में पैसा खर्च होता है उस्ताद, अगर फैक्ट्री सुरक्षा के इन्तज़ाम में पैसा खर्च करती तो उसके मुनाफे पर असर पड़ता, और मुनाफे पर असर पड़ता तो हमारी तिजोरियों पर असर पड़ता, है कि नहीं ?
जादूगर-    मन्त्री बता कितने मरे ?
मन्त्री   -    यही कोई डेढ़ हज़ार !
जादूगर-    लोग कहते है 10 हज़ार करीब मरे है !
मन्त्री   -    कहते होंगे, बिल्कुल कहते होंगे। 10 हज़ार, 20 हज़ार, 30 हज़ार, सब कहते होंगे.......! हम किसी की बात का खंडन नहीं करते.........
जादूगर-    राहत कार्य कैसा चल रहा है ?
मन्त्री   -    चुनाव तक तो ठीक ही चलेगा, उसके बाद अल्ला मालिक!
जादूगर-    अब स्थिति कैसी है ?
मन्त्री   -    सारे खतरे टल गए हैं!
जादूगर-    कैसे मान लें खतरे टल गए हैं ?
मन्त्री   -    जब हम कह रहें हैं तो टल ही गए होंगे !
जादूगर-    हवा-पानी, खाने-पीने का सामान ठीक-ठाक है ?
मन्त्री   -    भई ये हम नहीं बता सकते, क्योंकि अपने यहाँ तो तब भी बाहर से सब्ज़ी आई और अब भी आ रही है, और आती रहेगी।
जादूगर-    तुम नहीं बता सकते तो कौन बताएगा ?
मन्त्री   -    विज्ञान की बातें वैज्ञानिक बताएगा!
जादूगर-    कौन सा वैज्ञानिक !
मन्त्री   -    देश का चोटी का वैज्ञानिक!
जादूगर-    जमूरे! लौट आ!
मन्त्री   -    लौट आया !
जादूगर-    अबे तू नहीं......... लड़के!
जमूरा  -    उस्ताद लौट आया!
जादूगर-    हो जा सवार उड़न तश्तरी पर
                 लगा चक्कर दिल्ली नगरी पर
                 देख तो कहा छुपा बैठा है चोटी वाला.....
जमूरा  -    उस्ताद देख लिया!
जादूगर-    क्या देखा ?
जमूरा  -    बीमार है उस्ताद !
जादूगर-    अरे बेवकूफ बना रहा हॅ कोई बीमार-वीमार नहीं है!
जमूरा  -    उस्ताद उससे चलते नहीं बनता!
जादूगर-    क्यों ?
जमूरा  -    पद्मश्री मिली है उस्ताद, उठाते नहीं बनती!
जादूगर-    क्यों उठाते नहीं बनती ?
जमूरा  -    उस्ताद फोकट में मिली हो तो कहाँ से उठाते बनेगी!
जादूगर-    कुछ भी हो लड़के जा ज़बरदस्ती उठा ला.........
                 मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान
                 उल्टी खोपड़ी सीधा कान......
                 (जमूरा वैज्ञानिक को पकड़कर लाता है।)
जमूरा  -    उस्ताद पकड़ लाया........
जादूगर-    आइए आइए, तबियत कैसी है आपकी! दो सेकण्ड कार्बाइड में क्या खड़े रहे तबियत खराब ? अच्छा भई जनता सवाल पूछना चाहती है जवाब दोगे ?
                 (वैज्ञानिक मन्त्री की ओर देखता है, न में सर हिलाता है।)
वैज्ञानिक-  नो कमेन्ट !
                 (मंत्री हंसता है।)
जमूरा   -    उस्ताद! यह ठहरा सरकारी नौकर, इसके पास अपनी ज़बान कहाँ ! ज्रा मन्तर मारो तब बोलेगा................   
जादूगर-    मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान...........
वैज्ञानिक- पानी साफ है, परन्तु उबालकर पियो !
                सब्ज़ियाँ साफ हैं पर धोकर खाओ !
                हवा साफ है परन्तु सांस मत लो........   
जादूगर-   अबे ज़िन्दगी भर यही बकता रहेगा ?
मन्त्री-      उस्ताद! अपन जो बताता है वही कहता रहेगा..............
                मोटी-मोटी तनख्वाह पाता है, सरकारी वैज्ञानिक है,
                सरकारी बंगले में रहता है, सरकारी गाड़ी में घूमता है,
                सरकारी टेलीफोन का इस्तेमाल करता है,
                हम जो बताएँगे वही करेगा।
जमूरा -    उस्ताद! छोनों एक नम्बर के बदमाश हैं। इन पर कंठफोड़ महामंत्र फेंको !   
जादूगर-   चल काली कलकत्ते वाली
                तेरी फूँक ना जाए खाली
                जो भी तेरे सामने आए
                झूठ कभी ना बोलने पाए
                मुर्राट घुसड़मल मुर्दा मस्सान गिली-गिली-गिली फूँ......... 
                (मन्त्री और वैज्ञानिक समवेत स्वर में)
                हमें नहीं मालूम हवा कैसी है!
                हमें नहीं मालूम पानी कैसा है!
                हमें नहीं मालूम गैस पीड़ितों के फेफड़े कितने ज़ख्मी हैं!
                हमें नहीं मालूम गैस पीड़ितों का खून कैसा है!
                हमें नहीं मालूम गैस पीड़ित कब तक जिएँगे!
                हमें नहीं मालूम गैस पीड़ित कब मर जाएँगे!
                और अगर आप सब अब भी हमसे ये उम्मीद लगाए बैठे हैं,
                कि हम उनका मुकम्मल इलाज करवाएँगे,
                उन्हें दवा दिलवाएँगे,
                उन्हें भरपूर मुआवज़ा दिलवाएँगे,
                विधवाओं को पेंशन दिलवाएँगे,
                अनाथ बच्चों को परवरिश दिलवाएँगे       
                बेघरबारों का पुनर्वास करवाएँगे...........
                अगर आपको हमसे ऐसी उम्मीदें हैं
                तो माफ कीजिएगा जनाब,
                आप लोग घनघोर बेवकूफ हैं !
जादूगर-   खामोश, बहुत हो गई बकवास। भाइयों यही है इन लोगों का असली रूप। ये मन्त्री, जो हमें 2 दिसम्बर की रात मरता छोड़ भाग गए थे, और अब जो लोग किसी तरह जिन्दा हैं उन्हें भी बेवकूफ बनाया जा रहा है। और ये देश के चोटीदार सरकारी वैज्ञानिक ! विज्ञान के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनी देश में क्या कर रही है इसकी जानकारी रखना इनका काम है, इन्हें है जानकारी मगर राजनीति के हाथ का खिलौना बनकर इन्होंने भी अपने ज़मीर बेच खाए। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दलाली इनका धर्म है।
लड़के जा छोड़ आ इनको जहां से लाया था!
(लड़का दोनों को लात मारता है दोनों भीड़ में शामिल हो जाते हैं।)
( गैस त्रासदी पर लिखे गए नुक्कड़ नाटक ‘‘दास्तान-ए-गैसकांड का अंश, लेखक-राजीव लोचन व प्रमोद ताम्बट। इस नाटक के प्रथम संस्करण का प्रकाशन 26 दिसम्बर 1984 को हुआ था। एंडरसन के संबंध में उठ रहे सवाल इस नाटक में आज से 26 साल पहले कितने सशक्त रूप में उठाए गए थे वह नाटक के इस एंडरसन प्रसंग से स्पष्ट है। मुख्य पृष्ठ का डिजाइन स्वर्गीय किशोर उमरेकर का है।)
(समुचित ज्ञान ना होने के कारण नाटक की पोस्ट समुचित सिमिट्री में नहीं है। पाठकगण कृपया असुविधा के लिए क्षमा करेंगे।)