//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आजकल साधु-संतों, महंतों-मठाधीशों का कार्यभार पृथ्वी पर पहले की अपेक्षा काफी बढ गया है। पहले उन्हें मात्र वैराग्य धारण कर कन्दराओं में जाना होता था और शेष जीवन ईश्वर की अनंत खोज में बिता देना होता था। ज़्यादा से ज़्यादा दो-चार साल में कभी-कभार बाहर आकर कान्ट्रेक्ट बेसिस पर धर्म की रेडीमेड ध्वजा ऊँची रखने के लिए प्रवचन, सत्संग कर लेना पड़ता था। परन्तु, आजकल बेचारों को सक्रिय राजनीति से लेकर सेक्स रैकेटों के संचालन, षड़यंत्र, हत्या, बलात्कार, ड्रग ट्रॉफिकिंग, ब्लेकमेलिंग जैसे शुद्ध सांसारिक (कु)कर्मों की जिम्मेदारी भी निभाना पड़ रही है। धर्म के प्रचार-प्रसार के ज़रिए विज्ञान की ऐसी-तैसी करने के ऐतिहासिक मनोरथ के साथ-साथ इन (कु)कर्मों की दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी से दबकर बेचारे हलकान हुए चले जा रहे हैं, प्रभु की प्राप्ति के प्रयासों के लिए समय ही नहीं मिल रहा है।
जबसे ईश्वर से पृथ्वी के पाप सम्हलना मुश्किल हुए, और भारत की धर्म-परायण आम जनता को पक्का भरोसा हुआ कि पर्याप्त मात्रा में पाप-दुराचार बढ़ने के बावजूद भी पृथ्वी पर कोई भगवान-वगवान अवतार लेने के मूड़ में नहीं हैं, तभी से पब्लिक ने मामले को लोकतांत्रिक ढंग से स्व-कर-कमलों से सुलझाने की जगह इन साधु-संतों के हवाले कर दिया, और भारी-भरकम पढ़ाई के डर से अथवा ज़्यादा ही पढ-लिख जाने के कारण साधु बन गए इन ज्ञानियों-ध्यानियों ने विषय विशेषज्ञों को लात मारकर, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक उत्थान का यह काम स्वयं देखना चालू कर दिया, जो उनके खानदान तक में किसी ने कभी नहीं देखा। जगह-जगह मठ-आश्रम खुलना प्रारम्भ हो गए, जिनके वातानुकूलित चेम्बरों में पसरकर मोटे-ताजे गुरू-महात्मा अपनी अमृतवाणी से सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पापियों का उद्धार करने में लग गए। मगर, पृथ्वी को पतन के गर्त में ले जाने की इच्छुक कलियुगी शक्तियों ने धर्म की ध्वजा के इन वाहकों की मति की नृशंस हत्या कर उनसे ऐसे सांसारिक (कु)कर्म करवा लिए कि उनके सामने अब जेल की सलाखों के पीछे बैठकर सुस्ताने के अलावा कोई चारा नहीं है। अन्दर, सादे भजन तक सुनने के लिए श्रोता मिलने की कोई संभावना नहीं है। आत्मा तो थी ही कैद शरीर के पिंजरे में, शरीर भी लोहे के पिंजरे में बैठकर फड़फड़ाने को मजबूर है। लोग अलग चप्पलें लेकर बाहर खड़े हैं, जमानत कराकर बाहर निकलें तो टाट गंजी करें।
इधर-उधर फटके खाते फिर रहे देश के बेरोज़गार नौजवानों के लिए इन ज्ञानियों-ध्यानियों द्वारा छोड़े गए पद चिन्हों पर अपने पाँव रख कर खड़े होने का बढ़िया रास्ता खुला है। बड़े-बडे वातानुकूलित मठ-आश्रम, महँगी गाड़ियाँ, सुख-समृद्धि-आनन्द! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों को बेरोकटोक, तन-मन से भोगने का रोमांटिक अवसर आखिर किस धंधे में मिलता है ! किसी बेरोज़गार को चोरी-चकारी, लूट-डकैती, नकबजनी, अपहरण, बलात्कार इत्यादि अंजाम देकर खामोखां इंडियन पीनल कोड का कोपभाजन बनने की अब कोई ज़रूरत नहीं है। बस संतई का चमत्कारी चोला धारण कर लिया जाए, बाकी सारे सुख आपो-आप पीछे-पीछे चले आएंगे। वी.आई.पी. भक्तजनों की लबालब श्रद्धा व केश और काइंड चढावों की ऐसी रेलमपेल इस फील्ड में रहती है कि दूसरे किसी धंधे से इसकी तुलना की ही नहीं जा सकती।
स्त्री सुख से वंचित ब्रम्हचारी कुँवारों, विधुर, रंडुओं को भी एक उत्साहवर्धक मौका हाथ आया है, वे दूसरों की औरतों को देखकर जलने की बजाय स्वयंभू संत का चोला धारण कर दस-बीस सुन्दर स्त्रियों का एक भरापूरा हरम चलाकर, पोल खुलने तक तो मजे कर ही सकते है। अपनी निजी अय्याशी के अलावा हरम के माल की कमीशन आधारित आॅर्डर पर घर-पहुँच सप्लाई देकर बडे़-बडे़ ग्राहक भक्तों की कृपा प्राप्त की जा सकती है ताकि देह व्यापार के इस परम्परागत कारोबार पर धर्म की सीढ़ी लगाकर, अर्थ और राजनीति के स्वार्थ साधे जा सकें, जिनके सधे बिना प्रभु से मिलाने का सपना दिखाकर भक्तजनों को बेवकूफ बनाना भी संभव नहीं है।
कर्म से कांड बन गए इस मार्मिक प्रकरण में कैमरा नामक यंत्र की दुष्टता से संत-महंत समाज को उठाना पड़ी परेशानी बेहद लज्जाजनक है। वास्तव में समय का तकाज़ा यह है कि कुकर्म करते समय भले ही भगवान से ना डरा जाए मगर विज्ञान के इस चमत्कारी यंत्र से थोड़ा डरकर ही चला जाए। इस यंत्र की खासियत होती है कि इसके पीछे एक दुष्ट आँख होती है जो वही सब कुछ देखने की आदी होती है जो इंसान देखकर भी अनदेखा करनां चाहता है। कुछ ऐसा-वैसा देखा हुआ यदि सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय सार्वजनिक हो गया तो खामोखां उस छोटी सी लंगोटी को भी छोड़ गली-गली चैराहे-चैराहे भागते फिरना पडे़गा जिसके दम पर संतई के तमाम कारोबार की नींव धरी है, और कहीं कोई ठौर-ठिकाना मिल जाएगा ऐसी संभावना आज की तारीख में तो बिल्कुल नहीं है।
मासिक पत्रिका सबलोक के मार्च 2010 अंक में प्रकाशित।



