शनिवार, 18 सितंबर 2010

संतई के कारोबार की डांवाडोल नींव


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          आजकल साधु-संतों, महंतों-मठाधीशों का कार्यभार पृथ्वी पर पहले की अपेक्षा काफी बढ गया है। पहले उन्हें मात्र वैराग्य धारण कर कन्दराओं में जाना होता था और शेष जीवन ईश्वर की अनंत खोज में बिता देना होता था। ज़्यादा से ज़्यादा दो-चार साल में कभी-कभार बाहर आकर कान्ट्रेक्ट बेसिस पर धर्म की रेडीमेड ध्वजा ऊँची रखने के लिए प्रवचन, सत्संग कर लेना पड़ता था। परन्तु, आजकल बेचारों को सक्रिय राजनीति से लेकर सेक्स रैकेटों के संचालन, षड़यंत्र, हत्या, बलात्कार, ड्रग ट्रॉफिकिंग, ब्लेकमेलिंग जैसे शुद्ध सांसारिक (कु)कर्मों की जिम्मेदारी भी निभाना पड़ रही है। धर्म के प्रचार-प्रसार के ज़रिए विज्ञान की ऐसी-तैसी करने के ऐतिहासिक मनोरथ के साथ-साथ इन (कु)कर्मों की दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी से दबकर बेचारे हलकान हुए चले जा रहे हैं, प्रभु की प्राप्ति के प्रयासों के लिए समय ही नहीं मिल रहा है।
          जबसे ईश्वर से पृथ्वी के पाप सम्हलना मुश्किल हुए, और भारत की धर्म-परायण आम जनता को पक्का भरोसा हुआ कि पर्याप्त मात्रा में पाप-दुराचार बढ़ने के बावजूद भी पृथ्वी पर कोई भगवान-वगवान अवतार लेने के मूड़ में नहीं हैं, तभी से पब्लिक ने मामले को लोकतांत्रिक ढंग से स्व-कर-कमलों से सुलझाने की जगह इन साधु-संतों के हवाले कर दिया, और भारी-भरकम पढ़ाई के डर से अथवा ज़्यादा ही पढ-लिख जाने के कारण साधु बन गए इन ज्ञानियों-ध्यानियों ने विषय विशेषज्ञों को लात मारकर, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक उत्थान का यह काम स्वयं देखना चालू कर दिया, जो उनके खानदान तक में किसी ने कभी नहीं देखा। जगह-जगह मठ-आश्रम खुलना प्रारम्भ हो गए, जिनके वातानुकूलित चेम्बरों में पसरकर मोटे-ताजे गुरू-महात्मा अपनी अमृतवाणी से सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पापियों का उद्धार करने में लग गए। मगर, पृथ्वी को पतन के गर्त में ले जाने की इच्छुक कलियुगी शक्तियों ने धर्म की ध्वजा के इन वाहकों की मति की नृशंस हत्या कर उनसे ऐसे सांसारिक (कु)कर्म करवा लिए कि उनके सामने अब जेल की सलाखों के पीछे बैठकर सुस्ताने के अलावा कोई चारा नहीं है। अन्दर, सादे भजन तक सुनने के लिए श्रोता मिलने की कोई संभावना नहीं है। आत्मा तो थी ही कैद शरीर के पिंजरे में, शरीर भी लोहे के पिंजरे में बैठकर फड़फड़ाने को मजबूर है। लोग अलग चप्पलें लेकर बाहर खड़े हैं, जमानत कराकर बाहर निकलें तो टाट गंजी करें।
          इधर-उधर फटके खाते फिर रहे देश के बेरोज़गार नौजवानों के लिए इन ज्ञानियों-ध्यानियों द्वारा छोड़े गए पद चिन्हों पर अपने पाँव रख कर खड़े होने का बढ़िया रास्ता खुला है। बड़े-बडे वातानुकूलित मठ-आश्रम, महँगी गाड़ियाँ, सुख-समृद्धि-आनन्द! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों को बेरोकटोक, तन-मन से भोगने का रोमांटिक अवसर आखिर किस धंधे में मिलता है ! किसी बेरोज़गार को चोरी-चकारी, लूट-डकैती, नकबजनी, अपहरण, बलात्कार इत्यादि अंजाम देकर खामोखां इंडियन पीनल कोड का कोपभाजन बनने की अब कोई ज़रूरत नहीं है। बस संतई का चमत्कारी चोला धारण कर लिया जाए, बाकी सारे सुख आपो-आप पीछे-पीछे चले आएंगे। वी.आई.पी. भक्तजनों की लबालब श्रद्धा व केश और काइंड चढावों की ऐसी रेलमपेल इस फील्ड में रहती है कि दूसरे किसी धंधे से इसकी तुलना की ही नहीं जा सकती।
            स्त्री सुख से वंचित ब्रम्हचारी कुँवारों, विधुर, रंडुओं को भी एक उत्साहवर्धक मौका हाथ आया है, वे दूसरों की औरतों को देखकर जलने की बजाय स्वयंभू संत का चोला धारण कर दस-बीस सुन्दर स्त्रियों का एक भरापूरा हरम चलाकर, पोल खुलने तक तो मजे कर ही सकते है। अपनी निजी अय्याशी के अलावा हरम के माल की कमीशन आधारित आॅर्डर पर घर-पहुँच सप्लाई देकर बडे़-बडे़ ग्राहक भक्तों की कृपा प्राप्त की जा सकती है ताकि देह व्यापार के इस परम्परागत कारोबार पर धर्म की सीढ़ी लगाकर, अर्थ और राजनीति के स्वार्थ साधे जा सकें, जिनके सधे बिना प्रभु से मिलाने का सपना दिखाकर भक्तजनों को बेवकूफ बनाना भी संभव नहीं है।
            कर्म से कांड बन गए इस मार्मिक प्रकरण में कैमरा नामक यंत्र की दुष्टता से संत-महंत समाज को उठाना पड़ी परेशानी बेहद लज्जाजनक है। वास्तव में समय का तकाज़ा यह है कि कुकर्म करते समय भले ही भगवान से ना डरा जाए मगर विज्ञान के इस चमत्कारी यंत्र से थोड़ा डरकर ही चला जाए। इस यंत्र की खासियत होती है कि इसके पीछे एक दुष्ट आँख होती है जो वही सब कुछ देखने की आदी होती है जो इंसान देखकर भी अनदेखा करनां चाहता है। कुछ ऐसा-वैसा देखा हुआ यदि सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय सार्वजनिक हो गया तो खामोखां उस छोटी सी लंगोटी को भी छोड़ गली-गली चैराहे-चैराहे भागते फिरना पडे़गा जिसके दम पर संतई के तमाम कारोबार की नींव धरी है, और कहीं कोई ठौर-ठिकाना मिल जाएगा ऐसी संभावना आज की तारीख में तो बिल्कुल नहीं है। 
मासिक पत्रिका सबलोक के मार्च 2010 अंक में प्रकाशित।        

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

एक पखवाड़ा मुकर्रर है हिन्दी की मातमपुर्सी के लिए

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
हिन्दी भाषी होने के नाते आज के दिन हमें अपनी भाषा पर गर्व करना सिखाया गया है, मगर सच्चाई यह है कि स्वातंत्रोत्तर काल में जैसे-जैसे हिन्दी आन्दोलन फलता-फूलता पल्लवित होता गया है, वैसे-वैसे देश में हिन्दी की खटिया-खड़ी होती देखी गई है। कुछ तो देश के कर्ता-धर्ताओं ने उसे गर्व करने लायक नहीं छोड़ा, रही-सही कसर हम जैसे सैकड़ों लिख्खाड़ पूरी कर रहे हैं जिन्हें अपने शिक्षणकाल में हिन्दी के पर्चे में कभी तैतीस से ज़्यादा अंक नसीब नहीं हुए। दरअसल वस्तुस्थिति तो तैतीस अंक प्राप्त करने लायक भी नहीं थी परन्तु मास्टरनियों की रहमदिली और हिन्दी के प्रति ‘हिन्दी ही तो है, क्या फर्क पड़ता है’ के उदारता भाव के कारण हमारा भविष्य वर्ष-प्रतिवर्ष सुरक्षित होता चला गया, और अब हम हिन्दी के भविष्य का ‘बिस्तर गोल’ करने में सक्रिय सहयोग देकर ‘खटिया खड़ी बिस्तर गोल’ वाला चालू मुहावरा चरितार्थ करने में लगे हुए हैं।
    हिन्दी का बंटाधार करने वालों में प्रायमरी, मिडिल स्कूल के क्रीड़ा, संगीत व चित्रकला मास्टरों से लेकर बड़े-बडे़ सूरमा भाषा विशेषज्ञों का भी सश्रम योगदान रहा है। हिन्दी फिल्म-टी.वी. वाले विद्वजनों ने भी बहती गंगा में हाथ धोकर हिन्दी की ‘वाट’ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्म वालों ने इस श्रमसाध्य कार्य के लिए अवार्ड हासिल किए तो क्रीड़ा-संगीत-चित्रकला शिक्षकों ने, जो अक्सर हिन्दी शिक्षकों के टोटे में जबरदस्ती हिन्दी पढ़वाने के उपयोग में आते हैं, हिन्दी का क्रियाकर्म बाकायदा तनखा लेकर किया, साथ में इंक्रीमेंट भी लिए। वे बेचारे पढ़ाई के बोझ से घबराकर प्रदर्शनकारी कलाओं की शरण में पहुँचे होते हैं, उन्हें फिर घर में होमवर्क से मगजमारी के बाद बच्चों को हिन्दी पढ़ाने की बेगारी करना पड़ती है, नतीजतन हिन्दी का सत्यानाश करने वाली विदूषी पीढ़ी जन्म लेती है, कालान्तर में मौका पड़ने पर जिसे हिन्दी में अर्जी लिखना भी नहीं आता, जिसकी ज़रूरत हमारे देश में कदम-कदम पर पड़ती है।
    देश के भाषा विशेषज्ञों का तो दुनिया में कोई सानी ही नहीं है। उन्होंने हमेशा चौकस रहते हुए इस बात का ध्यान रखा कि कैसे हिन्दी को ना समझ में आने वाली क्लिष्टतम भाषा बनाए रखा जा सके ताकि लोग अपनी राष्ट्र भाषा को जन्म-जन्मान्तर तक समझ ही ना पाएँ और इससे बिदककर अंग्रेजी की शरण में जा खडे़ हों या गाली- गलौच की सुप्रचलित भाषा का आदान-प्रदान कर अभिव्यक्ति की अपनी समस्या खुद ही सुलझा लें, भूलकर भी हिन्दी के दरवाज़े पर आकर खड़े ना हों।
    फिल्म वालों ने तो गज़ब ही कर डाला। पब्लिक के मुँह में ऐसी छिछोरी भाषा परोस दी कि हिन्दी का भूत दशकों से जान बचाता भागता फिर रहा है। इन फिल्मचियों ने ‘अख्खे’ देश को अनोखी बम्बइया भाषा में पिरो कर रख दिया है। इस मामले में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक वास्तव में भारत एक है। गुजरात से लेकर बंगाल तक भारत के एक होने का मतलब भी यही है कि भले ही देश के हर कोने में स्थानीय भाषा का बोलबाला और हिन्दी का मुँह काला हो मगर – ‘सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे’ का रचनात्मक अर्थ गली-गली में लोग बखूबी जानते हैं। जन-गण-मन अधिनायक से ज्यादा आरेला ए, जारेला ए, खारेला ए, पीरेला ए, खाली-पीली बोम मारेला ए जैसी उच्चकोटि की शब्दावली देश के हर गली-कूचे में आसानी से समझ ली जाती है। हमारे मध्यप्रदेश में भी आरिया हे, जारिया हे किस्म की हिन्दी का प्रचलन है, इसमें माँ-बहनों से निकटतम गुप्त संबंधों की खुली चर्चा साथ में और नत्थी कर हिन्दी की प्रतिष्ठा में अरसे से चार चाँद ठोके जा रहे हैं।
    हिन्दी आन्दोलन चल रहा है, चल रहा है, चलता चला जा रहा है, मगर पान-ठेलों, चौक-चौराहों, टी.वी., सिनेमा, सांस्कृतिक केन्द्रों, सरकारी गैर सरकारी दफ्तरों से लेकर संसद तक रोजाना इस अबला की अस्मत तार-तार होती रहती है। साल का एक पखवाड़ा मुकर्रर है, बीच बाज़ार में इसे घायल पड़ा देखकर मातमपुर्सी करने के लिए। जिसे मर्ज़ी हो मातमपुर्सी करे या फिर चाहे तो नजरें बचा कर निकल जाए।

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

डंडे के डर से गेहूँ का बँटना

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
    पिताजी बचपन में डंडे से पिटाई किया करते थे। उस वक्त बड़ा बुरा लगता था, अब समझ में आ रहा है कि ज़रूर हम भी उन दिनों ‘शरद पंवार’ जैसी हरकतें करते रहे होंगे। बड़ा कोई कुछ कह रहा है, और तो और साफ साफ आदेशात्मक लहज़े में कह रहा है, और हम हैं कि मानने को तैयार नहीं है, तो फिर सामने वाले के पास ‘डंडा चालन’ के अलावा दूसरा चारा क्या है।
    माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाई अनाज फालतू सड़ रहा है, गरीबों में बाँट दो, लेकिन नहीं, मंत्री जी हिलने को तैयार नहीं, जैसे ‘बाबा’ का माल हो। इधर गरीब बेचारे हाथ में फटी बोरी लेकर गेहूँ बँटने का इंतज़ार कर रहे थे, उधर कोर्ट के आदेश को मुफ्त की सलाह मानकर एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालने की हमेशा की ट्रिक चलाई जा रही थी। ऐसा लगता है जैसे हमारे मंत्री महोदयों को आम जनता के हक में देश चलाने के लिए किसी की फालतू सलाहों की कोई ज़रूरत नहीं। वे खुद जो चाहेंगे करेंगे, देखते हैं कौन क्या बिगाड़ लेता है। अपने इस जन्मजात गुण की वजह से ही तो शराफत के किसी दूसरे काम में लगने की बजाय राजनीति के धंधे में लगे हैं। किसी की सुनने-सुनाने की सभ्यता से मुक्त अपनी वाली चलाने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। इसीलिए उन्होंने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की भी गुड़ीमुड़ी कर के एक कोने में डाल दिया और खड़े हो गए हमारी मुर्गी की एक टाँग के शाही अन्दाज़ में, और जब कोर्ट ने डंडा फटकारा तो चट से दूसरी टाँग बाहर निकाल ली और फौरन समझ गए कि कोर्ट का आदेश हवा में उड़ाने के लिए नहीं मानने के लिए होता है।
    हमारे देश में यह बीमारी आजकल बढ़ती जा रही है। कोई किसी की बात मानना नहीं चाहता, सब अपनी-अपनी चलाने में मशगूल हैं। जब तक कोई डंडा हाथ में उठाकर खोपड़ी तोड़ने की मुद्रा में नहीं आ जाता तब तक सामने वाले को लगता ही नहीं कि कभी कान और मस्तिष्क का आम जनता के प्रति सहानुभूति जगाने वाला हिस्सा भी इस्तेमाल करना है।
दरअसल हमारे देश में इन दिनों हुक्मरानों को हमेशा डर लगा रहता है कि बाज़ारवाद के इस दौर में कोई चीज़ अगर मुफ्त में बाँट दी तो फिर दुनिया का दरोगा अमेरिका नाराज़ हो जाएगा। आखिर हमने परोपकारी राज्य की अपनी पुरानी परम्परागत दकियानूसी छवि से बड़ी मुश्किल से छुटकारा पाया है। हम पानी को तो बोतलों में भर कर बेचने की अपनी प्रतिबद्धता को सफलता से निभा ही रहे हैं, हवा बेचने की दिशा में भी एक ना एक दिन आगे बढ़ेंगे, ऐसे में मुफ्त गेहूँ बाँटने की बात हज़म होना मुश्किल तो है। अब देखना है डंडे के डर से भी अब गेहूँ बँटता है या नहीं।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

हबीब तनवीर - जयन्ती, उन्होंने सिर्फ किया नहीं बल्कि बेहतरीन किया

हबीब साहब से हर मुलाकात की याद लम्बे समय से अब भी बिल्कुल तरोताज़ा है, हालाँकि उनसे रूबरू होने का मौका ज़्यादातर उनके नाटकों के ज़रिए ही हुआ, लेकिन एक ख़ास मुलाकात आज भी एक महत्वपूर्ण घटना के तौर पर जे़हन पर नक्श है। उन दिनों वे रंगमडल (भारत भवन) भोपाल के निर्देशक हुआ करते थे। सुप्रसिद्ध सिने निर्देशक सुधीर मिश्रा ख़ास हबीब साहब से मिलने के लिए भोपाल आए तो पहले से ही तय कार्यक्रम के मुताबिक मैं और पूर्व रंगकर्मी/समाजसेवी आलोक प्रतापसिंह उनके साथ भारत भवन पहुँचे। सच कह रहा हूँ, रंगमंडल के निर्देशक के उस चेम्बर में, जिसकी धज किसी ऊँचे प्रशासनिक अधिकारी के चेम्बर सी थी, हबीब साहब को बैठा देखकर मुझे बड़ा अजीब लगा। वे इस माहौल में एकदम डपेपिज लग रहे थे। दो-तीन घंटे की इस मुलाकात में काफी बातें हुई, सुधीर भाई और हबीब साहब ने अपनी फिल्म - ये वो मंज़िल तो नहीं की यादें ताज़ा की जिसका केन्द्रीय पात्र विश्वविद्यालयीन ज़माने के आलोक प्रताप सिंह पर आधारित था। आलोक प्रताप सिंह और मैं थे तो भोपाल गैसकांड आन्दोलन की बातों के साथ हमारे नुक्कड़ नाटक दास्तान-ए-गैसकांड की बातें भी चलीं, उन्होंने इस नुक्कड़ नाटक के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। इस मुलाकात के एक-दो दिन पहले ही मैंने के.जी. त्रिवेदी के एक नाटक राम की लड़ाई में अभिनय किया था जिसे हबीब साहब ने रवीन्द्र भवन की सबसे आगे की सीट पर बैठकर देखा था। उन्होंने तुरंत मुझे पहचान लिया और मेरे अभिनय की तारीफ की। इस दौरान हबीब साहब रंगमंडल के पुराने कलाकारों और प्रशासन के असहयोगात्मक रवैये के कारण भी काफी आहत महसूस हुए, जिसके नतीजे के तौर पर उन्हें बाद में रंगमडल छोड़ना पड़ा।
बहरहाल, जनपक्षीय सामाजिक राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना से लैस हबीब साहब ने जहाँ रंगकर्म के प्रति अपने समर्पण और अनोखे लोक प्रयोगों के ज़रिये जनसाधारण व रंगमंच की दूरी को पाटकर रख दिया था, वहीं दुनिया भर में भारतीय रंगमंच की धाक जमाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। भारत भर में और वैश्विक स्तर पर भी भारतीय रंगकर्म का परचम फहराने में देश की दूसरी कोई भी हस्थी सत्ता की निकटता के बावजूद सफल नहीं हुई जबकि लगातार विरोध और बाधाओं के बाद भी हबीब तनवीर ने सिर्फ अपनी रंग दृष्टि के दम पर यह संभव कर दिखाया। वे रंगकर्म का एक सम्पूर्ण संस्थान थे, एक समूचा अध्याय थे जिसके बिना भारतीय रंगमंच का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता। उन्होंने सिर्फ किया नहीं बल्कि बेहतरीन किया। उनकी अनुपस्थिति से भारतीय रंगमंच पर एक अजीब सा सन्नाटा खिच आया है, एक बड़ा निर्वात सा पैदा हो गया है जिसका भरना लगभग नामुमकिन सा लगता है।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

बहना मेरी राखी के बंधन को निभाना

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
         आज रक्षा बंधन है। धूम-धड़ाके के रिक्टर पैमाने पर अपेक्षाकृत सुस्त यह भावभीना त्योहार आजकल उतना उत्साहवर्धक नहीं रह गया है जितने दूसरे आयातित विदेशी त्योहार। बाज़ार की दृष्टि के इस त्योहार पर उतना मेहरबान ना होने से (जितनी वेलेंटाइन डे, फेंडशिप डे आदि-आदि पर होती है) यह एक ठंडे से त्योहार के रूप में आकर चला जाता है। आजकल यूँ भी परिवार नियोजन की वजह से पहले की तरह घर-घर में ढेर-ढेर बहनें नहीं होती हैं, फिर कन्या भूण हत्या की वजह से बहनों की संख्या और भी कम होती चली जा रही हैं। सबसे अखरने वाली बात ‘बहनापे’ की घोर कमी हो गई है।

         भारतीय फिल्मों के बारे में कलावादी समीक्षक चाहे जो भी कहें, मुझे तो लगता है माहौल खीचने में फिल्मों की बड़ी जबरदस्त भूमिका रही है। पारम्परिक वाद्यों की सुरीली सुर-लहरियों से पवित्र बहनापे का वह समा बंध जाता था कि हॉल में बैठा भाई, भले ही वह कितना भी कठोर क्यों ना हो, ज़ार-ज़ार रो पड़ता था और लौटते समय बहन के लिए कोई ना कोई तोहफा ज़रूर ले जाता था। पवित्रता की भावनात्मक लहरें उमड़कर ड्रेस सर्किल से होते हुईं गाँव-गाँव शहर-शहर फैल जाती थी। हीरोइन, ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ गाते-गाते भाइयों में बंधन निभाने का जज़्बा कूट-कूट कर भर देती थी, जिसकी परिणति रास्ते में किसी शोहदे की पिटाई हुआ करती थी। मगर जब से हिन्दी फिल्मों में बहन की भूमिका का लोप हुआ है हमारे इर्द-गिर्द भी बहन की व्यापक उपस्थिति लुप्तप्राय हो गई है।

         पुराने ज़माने में स्त्री को बहन कह कर पुकारना आम शिष्टता थी, मगर आजकल पुरूष इस शिष्टाचार से दूर भागने लगे हैं। जाने कौन स्त्री, खुद को बहन कहने पर कौन सा रूप अख्तियार कर ले, कुछ कहा नहीं जा सकता। पहले, ‘बहना ओ बहना तेरी डोली मैं सजाऊँगा’ गाते हुए भाई बेहद फक्र महसूस करता था, लेकिन जमाना बदल गया है। आजकल की बहनें तो ऐसी हैं कि भाइयों को ही डोली में बिठाकर विदा कर दें।

         इन बहनों ने भी गज़ब की चाल पकड़ी है। वे पश्चिम की बहनों से प्रेरणा लेकर कपड़ा व्यापार को चौपट कर रहीं हैं। साड़ी, सलवार-कमीज़ हमेशा के लिए घड़ी कर रख दी जाएगी तो कपड़े का धंधा तो चौपट होगा ही। बहनों के विकट जज़्बे से भाई लोग घबराए हुए हैं। बहने रैम्प पर  जलवे बिखेर रहीं हैं। विडियो, सिनेमा में देहदर्शन की पराकाष्ठा से भाइयों की जबरदस्ती अग्नि परीक्षा ले रहीं हैं। भाई की डोली को लात मारकर स्वयंवर रचा रहीं हैं। भाई बेचारा किंकर्तव्यविमूढ सा परदे के पीछे से तमाशा देख रहा है। बहन आधुनिकता की धुंआधार आंधी में काफी आगे निकलती चली जा रही है । भाई, बहन के चॉटे के डर से दुबके रहने को मजबूर है। इस मामले में अगर उसने ज़्यादा बहादुरी दिखाने की कोशिश की तो स्पासंर तो जूते मारेंगे ही, बहनें भी एकजुट होकर कुटम्मस कर सकती हैं।

    कुछ सीधी-साधी बहनों को रक्षा की दरकार है, लेकिन रक्षा का पारम्परिक भार भाई लोग उठा नहीं पा रहे हैं, क्योंकि गुंडे भाइयों से ज़्यादा ताकतवर और संगठित हैं। बहनें दब रही है, भाई रक्षा नहीं कर पा रहा है, दबाने वाला भाई से ज़्यादा पहुँच वाला है। बहनें दहेज के लिए जिन्दा जलाई जा रहीं हैं, भाई निरीह खड़ा भस्म होती चिता को देखता रहता है। पृष्ठभूमि में कहीं कोई गीत नहीं सुनाई देता, ‘भैया मेरे राखी के बन्धन को निभाना’।

    दिनांक 05.08.2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित ।

शनिवार, 14 अगस्त 2010

पन्द्रह अगस्त का पोरोग्राम और नेताजी का भासड़

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

जैसे ही नवोदित नेताजी को खबर मिली कि अबकी बार तहसील प्रांगण में उन्हें झंडावंदन करना है, तत्क्षण उन्होंने मन ही मन राष्ट्रीय गान रटना शुरू कर दिया। खास चमचे ने जब देखा कि नेताजी अपने ललाट की सलवटों का भार उठा नहीं पा रहें हैं, चिन्तामग्न से हुए पड़े हैं, वह भी चिन्ताविभोर होकर नेताजी को कुरेदने लगा।
- कोई परेशानी है दद्दू, टेंसन में काहे आ गए, बारूद मलें क्या ? यहाँ बारूद उस शक्तिचूर्ण को कहा जा रहा है जिससे आम हिन्दुस्तानी अपनी बत्तीसी से छुटकारा पाया करता है और यदा-कदा मुँह में कैंसर जैसे महान रोग का पालक-पोषण करता है। बहरहाल, बारूद खाने का नेताजी का फिलहाल कोई इरादा नहीं था। वे चमचे के सामने अपनी चिन्ता प्रकट करते हुए बोले,
- पोरोग्राम में गाना गाना पडे़गा ना, याद कर रहे है। तीसरी कच्छा के बाद कभी गाओई नी सुसरो।
- कौन सा गाना ? चमचे ने तुरंत अपनी गानों की दिमागी फेहरिस्त टटोलते हुए पूछा।
- अरे वही जनगनमन...., नेताजी बोले। इस पर चमचा उन्हें गम्भीरता से समझाता हुआ बोला,
- अरे ऊको जान दो, वो तो स्कूल की लड़कियन गा लेंगी। आप तो स्पैच की तैयारी करो, वह भी सुनाना पडे़गी।
- स्पैच ? ये क्या होती है ?
- अरे भासड़ भासड़....। चमचे ने समझाया। नेताजी तत्काल राष्ट्रगान का रटना छोड़ भाषण की प्रेक्टिस करने लगे। चमचा उन्हें एकांत उपलब्ध करा कर चल दिया। बीस पच्चीस मिनिट बाद चाय-पानी-बीड़ी-ज़र्दा इत्यादि से निवृत्त होकर चमचा कुछ ज़्यादा ही चमकता हुआ वापस आया और फिर नेताजी को फिर कुरेदने लगा,
- जमा कछु ?
नेताजी एक शुद्ध भारतीय गाली देते हुए बोले,
- भाई-भैनों से आगेई नहीं बढ़ रयो दारी को....!
- चमचे को नेता जी पर दया आने लगी। वह कुछ ज़्यादा ही वफादार बनता हुआ बोला,
- तुम तो रहन दो। हमी कछु करते हैं।
           नेताजी को एक अलग चिन्ता ने घेर लिया। इस साले ने ऐन टाइम पर अगर धोखा दे दिया तो ! नेतागिरी झाड़ने का एक सुनहरा मौका हाथ से निकल जाएगा, भद्द पिटेगी सो अलग। उन्होंने पूरी तौर पर आश्वस्त होने के लिए चमचे से पूछा,
- तुम का करोगे ?
- लिखवाते हैं........, चमचा बोला।
- किससे लिखवाओगे ?
- अब लिखवाते हैं......., चमचा फिर समझदार बनता हुआ बोला।
- अबे लिखवाते हैं लिखवाते हैं कर रिया है, बता काहे नहीं रहा कौनसे लिखवाएगा ? नेताजी भड़क गए।
- हमी टिराई करेंगे.......!
- तुम औरे हमरा बंटाधार करवाओगे। तुम्हीं लिख सकत होते तो हम ना लिख लेते ! तुम सोई तीसरी कच्छा के बाद कभु स्कूल नहीं गए मताई के.......।
- अरे दद्दू, बोल के लिखवांगे किसी से !
- और बाचेगा कौन ? तुमरा बाप ?
- हाँ....., ये तो सोचिई नहीं हमने। ऐसो करत हैं, आज संझा के हम एक रम की अद्धी चढ़ाकर फिर माइंड चलाते हैं। कल सबेरे आपे रटवा देंगे।
- साले हरामजादे, ठर्रा की औकात तुमरी, हम जब से नेता बने तुम रम से नीचे बात ही ना करत हो। सौ जूते दें हैं हम, अब जाओ फटाफट, स्पैच की तैयारी करो।
           चमचा नेताजी की जेब से ज़बरदस्ती सौ रुपया निकालकर ले गया। नेताजी ने एक प्रेम भरी माँ की गाली देकर चमचे की इस धृष्टता को स्वीकृति दे दी और वे भाषण की चिंता चमचे पर छोड़कर अपनी चार-चार रखैलों के बारे में सोचने लगे। जबसे उन्होंने देश की चिंता करने का ठेका लिया है, अपनी सभी चिंताएँ वे यूँ ही चमचों के ऊपर छोड़कर चिंता मुक्त जीवन जीते हैं।
            रात को टुन्न होकर, घोडे़ बेचकर सोने के बाद अगले दिन चमचा आध घंटा ज़्यादा शौचालय में बैठकर, टी.वी. पर और इधर-उधर सुने भाषणों, नेताओं के वक्तव्यों में अपने कुछ मौलिक विचारों के घालमेल से एक विस्तृत भाषण तैयार कर लाया और नेताजी के घर आकर उसने उन्हें अपना वह अनमोल भाषण रटाना चालू किया।
- भाईयों और बहनों........!
- भाईयों........., बोलकर नेताजी खामोश हो गए।
- भाईयों और बहनों........! चमचे ने फिर दोहराया। इस पर नेता जी उखड़ गए,
- बस भाईयों ही काफी है, आगे बोल ! चमचे ने आगे बोलना शुरू किया और नेताजी ने मन ही मन अपना पहला भाषण रटना शुरू किया।
- भाईयों...... आज पन्द्रह अगस्त के इस पावन अवसर पर.......
चमचा ठिठककर दद्दू से बोला,
- काहे, का है पन्द्रह अगस्त को, का कहत हैं गणतन दिवस के स्वतंत्रा दिवस ?
इस पर दद्दू भड़कते हुए बोले,
- जो कछु होए, पन्द्रह अगस्त बोलने में का तुमाई नानी मर्रई!
           चमचे ने फिर अपना प्रशिक्षण सत्र प्रारम्भ किया। चमचे का एकालाप सुनते-सुनते नेताजी धीरे-धीरे सपनों में खोते चले गए और उनकी आँखों के सामने अपार जनसमूह का सागर हिलोरे मारने लगा। अपने आप को एक ऊँचे मंच पर पाकर नेताजी में एक अनोखा उत्साह संचारित हो गया और वे माइक के सामने पूरे जोशोखरोश से अपना भाषण देने लगे।
- बड़ी खुशी की बात है कि पन्द्रह अगस्त के इस पावन अवसर पर आज हमें इस विशाल तहसील प्रांगण में तिरंगे की रस्सी खैंचने का मौका मिल रहा है। बहुत साल पहले आज ही का वो दिन था जब देश के बड़े-बडे़ नेताओं ने अँग्रेज को भगाकर पहली बार अपने हाथ से तिरंगे की रस्सी खैंची थी। अपन तो थे नहीं तब, सुना है, वे दिन भी बड़े लफड़े-झपड़े के दिन थे, नेतागिरी करना बहुत टेढ़ा काम था, पढ़ा-लिखा आदमी ही नेतागिरी कर सकत था। गांधीजी, नेहरूजी सब पढे-लिखे बारिस्टर थे। मगर आज हमारे देश ने इतनी तरक्की कर ली है कि तीसरी कच्छा तक पढे़-लिखे हम जैसे ढोर-गंवार भी पंचाती राज में नेता बनके झंडा की रस्सी खींचने के काबिल हो गए है। अँग्रेजों के टाइम में इतनी सहूलत नहीं थी, अँग्रेजी पुलिस डंडे मारा करती थी। हम होते तो घर से बाहर ही ना निकलते। बिलावजह डंडा खाने से क्या फायदा।
            उन दिनों राजनीति सूखा-सट्ट मैदान थी, कोई विधाक नहीं, कोई मंतरी नहीं, पंच-सरपंच कोई नहीं। हर आदमी अंग्रेजों का गुलाम होता था। कोई आज़ादी नहीं थी, ना खाने की ना कमाने की। कोई फंड नहीं, कोई एलाटमेंट नहीं। फंड होय, अलाटमेंट होय तो नेता विकास करे, अपना भी और देश का भी। फंड होए तो नाली बनवाए, लेटरिन बनवाए, हेंडपम्प लगवाए, सड़क पर मट्टी-सट्टी डलवाए, कुआ-सुआ खुदवाए....... इस्कूल, आंगनवाड़ी बनवाए ! फंड ना हो तो क्या भुट्टे भूने ? क्या अपना विकास करे क्या देश का विकास करे ! सारी नेतागिरी बेकार, कोई धेले को ना पूछे ! नेतागिरी तो वैसे भी आजकल बड़ी बेकार चीज़ है। लोगोन किसी को देश का काम करते हुए देख नहीं सकत हैं। काहे कि हर आदमी को नेता बनना है, हर आदमी कुर्सी चाहता है, हर आदमी विकास करना चाहता है, हर आदमी को कमीसन चइए....... ये चइए, वो चइए।
            उन दिनों के सबरे नेता बड़े सीधे-साधे थे, बस बापू के कहने पर चलत थे, ये नहीं कि कभी इसके कहने में चलन लगे, कभी उसके कहने में चलन लगे। बापू भी बहुत सीधे थे, देखने को ही डंडा रखत थे, कभी इस्तेमाल नहीं किया, वर्ना अँग्रेज दो सौ साल टिकता ? दो दिन में भाग जाता। अब इस जमाने में हमारे भाई बंधुओं को देखो, एक दूसरे के ऊपर कुर्सी-टेबल, माइक-साइक फेंककर देश चला रहे हैं, क्योंकि यह जूतमफैक बहुत ज़रूरी है, वर्ना कोई आपे राजनीति करन न देगा, हर कोई धोती खींचेगा। उन दिनों के नेता जूता सामने रखकर बात करते तो अँग्रेज कभी का देश छोड़कर भाग जाता। हमारी पाल्टियों को जल्दी देश की सेवा करने का मौका मिलता। वे जल्दी जाते तो हम हिन्दुस्तानी जल्दी अध्यक्ष-फध्यक्ष बनते, हमें जल्दी विधाक-एम्पी, मंत्री-मुखमंत्री बनने का मौका मिलता, हम जल्दी नेता बनते, चार पैसा कमाते, देश को जल्दी टाटे-बिड़ले मिलते, देश में जल्दी अंबानी पैदा होते, रुपये-पैसे की रेलमपेल आज से डेढ़ सौ साल पहले चालू हो जाती। अब तक देश में कितनी तरक्की हो जाती। तो कहने का मतलब ये कि ये जो चारों तरफ गाली-गुफ्तार चल रही है, ये जो कुर्सी-टेबल माइक-साइक फिक रहे हैं, ये उस वक्त गोल मेज कांफ्रेसन में फिकने चइये थे, देश जल्दी आज़ाद होता।
           सब कुछ लफड़ा उस वक्त के नेता लोगन की शराफत ने किया। वे सत्य अहिंसा, सादा जीवन-उच्च विचार, नैति-नैतिकता वगैरा-वगैरा फालतू चक्करन में पड़ गए। उस वक्त कोई मैया की गारी देने वाला नेता ही नहीं था तो वे हरामजादे अँग्रेज काहे गद्दी छोड़ते ! आज हमरा देश काहे इतनी तरक्की कर रहा है, इसलिए क्योंकि अब नेतागिरी की वो पुरानी फिलिम नहीं चलती। अब तो जिसकी लाठी उसी की भैंसिया। अब घुग्घू बनके देश नहीं चलता। बात-बात पर रार-तकरार, एक-दूसरे की धोती-पजामा खैंचने का दमखम जो हो तो राजनीति में नेतागिरी के कौनो मतलब हैं, वर्ना खली-भूसी की दुकान अच्छी। विदेशों में बड़ी-बड़ी मिटिंगन में टेबल पर जूता रखकर बात करना चइये, सारी समस्या दो मिनिट में सुलट जैहै। ये पाकिस्तान घड़ी-घड़ी कश्मीर-कश्मीर चीखन लगत है, काहे का कश्मीर ! दो रैपट दो खैंच के तो कश्मीर-वश्मीर सब भूल जैहै। नेपाल को देखियो, वो कभी कछु माँगत है का ? पड़ो है चुपचाप, मस्त खा पी रयो है। भूटान को देखो, तिब्बत को देखो, बांगलादेश को देखो, सुना है ये सब अपन पड़ोसी हैं, कैसे शराफत से टाइम काट रहे हैं, उन्हें तो नहीं चइये कश्मीर, इन्हीं को चुल है कश्मीर-कश्मीर.......!
              खैर, हम इधर तहसील में ना पड़े होते तो बताते। हम जो नेशनल लीडर होते तो बताते एक-एक को। ना जूते मार-मार कर टाट गंजी करते तो हमरो नाम बदलकर घसियारा रख दयो हम कछु ना कहते।
इसलिए भाइयों, ये पन्द्रह अगस्त तो ठीक है अपनी जगे पर, हमने रस्सी खैंच दी है, हवा चलेगी तो जो झंडो फर-फर फहराएगो ही, सब लोग लड्डू-वड्डू खालो, ज़्यादा बनवाएँ हैं, जितने चइये उतने खाओ, घर भी ले जाओ, मगर इतना याद रखियों, अबकी दफे हमें चाहे जिस पाल्टी से, चाहे जिस इलेक्शन का टिकट मिले, भौर की पहली किरण के साथ ज़्यादा से ज़्यादा तादात में बोट देकर इस दद्दू को विजई बनइयों, यही प्रार्थना है। बेफजूल हमें लाठी-गोली का इस्तेमाल करने की नौबत नहीं आना चइये। धन्यवाद। भारत माता की जय।

बुधवार, 11 अगस्त 2010

हरिभूमि में व्यंग्य - खेलोगे कूदोगे तो बनोगे नवाब


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          बचपन में माँ-बाप और मास्टरों से सैंकड़ों बार सुना करते थे- ‘‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब!’’ उन दिनों माँ-बाप और मास्टर इन दोनों ही केटेगरी के जन्तुओं से बहस मुबाहिसे की गुंजाइश ज़रा कम हुआ करती थी, लिहाज़ा उनकी बात मानकर जो लोग खेल के मैदान में कम और किताबों में ज़्यादा ध्यान देते रहे, उनकी किस्मत पर ताला लगा हुआ आज भी देखा सकता है। जिन्होंने खेलों के सर्टिफिकेट इकट्ठा किए वे महत्वपूर्ण विभागों में अच्छे-अच्छे पदों पर जम गए और देश-विदेश भी घूम आए और जिन्होंने किताबों में खोपड़ी दिए मार्कशीटें इकट्ठा कीं, हो सकता है उनमें से कई अब भी वे मार्कशीटें गले में लटका कर घूम रहे हों।
          पढ़ने लिखने वालों का हाल तो सभी जानते हैं कोई कौड़ी को नहीं पूछता, हम खुद प्रत्यक्ष गवाह हैं। बुद्धिजीवी, कवि, लेखक, साहित्यकारों के लिए इतना बड़ा आयोजन होते कभी किसी ने देखा-सुना है! कोई सपने में भी नहीं सोच सकता। इतने बड़े बडे संस्थान, सभागार, रंगमंच, नाचने- गाने के लिए जगह वगैरह वगैरह के बारे में देश में कोई सोचता है ! कभी नहीं ! आज़ादी के बाद बासठ सालों में बजट के पन्नों पर मजाल है इस मद का नाम कभी आया हो। मगर खेलने कूदने वालों के लिए अरबों रुपए लगाकर देश की राजधानी का पूरा नक्शा बदलने का काम अब अन्तिम से चरण में है। जो भी हो, खेल कूँद के लिए बड़े बड़े स्टेडियम, बड़े-बडे़ स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, स्वीमिंग पूल और कोर्ट, देश भर में सैकड़ों की तादात में हैं। अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन, पहले एशियाड और अब कामन वेल्थ ! क्या कहने। भ्रष्टाचार के प्रदर्शन के लिए कला-संस्कृति में ऐसे मौके कहाँ ?
          बड़े-बड़े पढ़ने लिखने वाले हुए आज़ादी के बाद, उन्होंने अपनी तरफ से ज़ोर भी लगाया कि देश की जनता भी पढ़-लिखकर नवाब बनने की दिशा में अग्रसर हो मगर हुआ उल्टा, पढ़ने लिखने वाले या तो किसी सरकारी दफ्तर में बाबू या चपरासी हो गए या ज़्यादा से ज़्यादा किसी स्कूल कॉलेज में मास्टर। मजे़ उनके हुए जो पढ़ाई के पीरियड में डंडी मारकर खेल मैदान में ‘खराब’ बनने की प्रेक्टिस करते रहे। उनके लिए आज देश में क्या कुछ नहीं है, राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम और दाम कमाने के अनेक मौके हैं। ऐसे आयोजनों, आयोजनों में भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार में भाई-भतीजावाद, भाई-भतीजावाद में मंत्रियों अफसरों और व्यापारी-ठेकदारों के साथ षड़यंत्र रचने की सुविधाएँ इत्यादि इत्यादि क्या कुछ नहीं है। इस सबको देख-देखकर जलने और बुराई करने के अलावा पढ़ने-लिखने वालों के पास और क्या है!
          बदले हुए माहौल में वह पुरानी कहावत बदलने की जरूरत है-‘‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे खराब खेलोगे कूदोगे तो बनोगे नवाब!’’

हरिभूमि में दिनांक 11.08.2010 को प्रकाशित