रविवार, 13 मार्च 2011

अनाड़ी खिलाड़ी


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//       
पत्रिका में
          हमने ज़िन्दगी में कभी क्रिकेट का बल्ला नहीं पकड़ा, मगर समुद्र की उद्दाम लहरों पर हाथ-पाँव मार रहे अनाड़ी तैराकों की तरह विश्वकप में, उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हमारे महारथियों की टीम इन्डिया को देखकर लगता है कि हमारे भी हाथ-पैरों में गद्दे बाँधकर, खोपड़ी पर शिरस्त्राण चढ़ाकर मैदान में छोड़ दिया जाए तो हम भी एक गैर पेशेवर अनाड़ी की सभी खूबियों के साथ कुछ न कुछ कमा ही लाएँगे। यह बात हम इतने भरोसे से इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जब खेल क्रिकेट का हो तब हर खिलाड़ी के साथ भगवान का आशीर्वाद ज़रूर रहता है, इसलिए नास्तिक होने के बावजूद जैसे ही हम टीम इन्डिया के सदस्य बनकर मैदान में उतरेंगे, भगवानहमारे साथ आ खड़ा होगा, और बाकी जो कुछ भी करना है वही करेगा।
          विश्वकप की भारतीय टीम के साथ ऐसा ही है। हमारे खिलाड़ी भगवान के शहस्त्रों आशीर्वादों के साथ टीम में है। जिसे रन बनाने के लिए रखा गया है भले ही वह रन न बनाए मगर वह टीम में अवश्य रहेगा, जिसे विकिट लेने के लिए रखा गया है वह विकिट नहीं लेगा परन्तु टीम में रहेगा। क्या पता जो रन बनाने के लिए रखा गया है वह धड़ाधड़ विकिट लेने लगे या जिसे विकिट लेना है वह रन बनाने की मशीन साबित हो जाए! कुछ भी हो सकता है, क्योंकि भगवान उनके साथ है।
जागरण में
          बल्लेबाज़ों से जब उम्मीद की जाती है कि वे ज्यादा से ज्यादा क्रीज़ पर बने रहें तो वे धड़ाधड़ आउट होकर पवेलियन में बने रहते हैं। गेंदबाज़ों से जब उम्मीद रहती है कि वे विकिट भले ही न लें परन्तु रन रोककर रखें, तो वे आपकी आधी बात मानते हुए विकिट तो नहीं लेते पर रनों का ढेर लगवा देते हैं। जब ज़रूरत होती है कि एक-एक दो-दो रनों में विरोधी टीम को बाँधे रखा जाए तो हमारे धुरंधर चौकों-छक्कों की बौछार करवा लेते हैं। कड़ी मेहनत से फील्डरों को चुनकर इसलिए लाया जाता है कि वे बॉलिंग-बैटिंग भले न करें परन्तु उस जगह पर मुस्तैद रहें जहाँ से रन निकलते हैं, परन्तु वह उस जगह के अलावा हर जगह मौजूद मिलता है। जब कैच छोड़ने की अय्याशी के लिए कोई स्थान नहीं होता तब हर फील्डर बड़ी उदारता से कैच छोड़ता है, जैसे उसे इस काम के लिए मैन ऑफ द मैच दिया जाने वाला हो।
          तो बंधु, जब इस तरह भगवान भरोसे ही विश्वकप खेला जाना है तो हम क्या बुरे हैं जो कभी क्रिकेट मैदान में नहीं उतरे। हम भी ज़ीरों पर आउट होने या न्यूनतम रन बनाने की बहादुरी दिखा सकते हैं। हम भी चारों दिशाओं में चौकों-छक्कों की बौछार का नज़ारा दिखवा सकते है, हम भी मैदान में दौड़ती गेंद को बिना छुए मैच समाप्त कर वापस पवेलियन में लौट सकते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, लोग अनाड़ी कहेंगे! तो जब दिग्गज खिलाड़ियों को अनाड़ी कहा जा रहा है तो ऐसा प्रदर्शन तो हम भी बखूबी कर सकते हैं।

शनिवार, 12 मार्च 2011

बाबा रामदेव और भावी आसन


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
       बाबा रामदेव की पार्टी बड़े जोर-शोर से राजनीति के मंच पर आसनस्थहोने की तैयारियाँ कर रही है। उनका और उनके अनुयाइयों का यह दिवास्वप्न पूरा हुआ तो वे इस जीर्ण-शीर्ण जर्जर राजनैतिक मंच पर किस मुद्रा में आसनस्थ होंगे और किस योग का अभ्यास करेंगे यह कौतुहल का विषय है। अब तक इस मंच पर आसनस्थ सभी राजभोगी जिस मुद्रा में नज़र आते रहे हैं, वह मुद्रा भक्षणमुद्रा कही जाती है और इसके अभ्यास से सार्वजनिक धन का भक्षणसरल-सुलभ होता है, भ्रष्टाचारकी कुन्डलिनी जागृत होती है। और भी कई लोक लुभावन मुद्राएँ वर्तमान राजनीति के मंच पर प्रचलित हैं जिनके अभ्यास से एक कार्पोरेट उद्योग की तरह निजी स्वार्थ-संधान का कार्य किया जाता है। बाबा इस कुकर्म-भूमि पर किस करवट बिराजेंगे देखना है।
       बाबा, राजनीति के भोगियोंके खिलाफ अपने योगियोंको उतारने की तैयारी में जुटे हुए  हैं, खुदा न खास्ता सफल हो गये तो उनके योगियों की लंगोट अपनी जगह पर कितनी मजबूती से कसी रह पाएगी, या भ्रष्टभूमि पर आते ही खुलकर बिखर जाएगी, यह आने वाला समय बतायेगा। लंगोट अगर खुद-ब-खुद न भी खुली तो यहाँ दूसरों की लंगोट खींचने वाले संत बहुतायत में है, बाबा के लिए सावधानमुद्रा लाभदायक रहेगी।
       क्या ही अच्छा हो बाबा देश के अगले प्रधानमंत्री बने और भगवा लंगोट देश की राष्ट्रीय पोशाक बने। रामदेव कट दाढ़ी देश में चल निकले। पूरा देश सुबह चार बजे उठकर शौचादि से निवृत होकर योगाभ्यास, प्राणायाम में लग जाए। बाबा राष्ट्रीय चैनल पर पूरे देश को प्रतिदिन तीन-चार घंटा कपालभाती, अनुलोम-विलोम इत्यादि कराएँ । देश रोटी, कपड़ा, मकान की चिन्ता छोड़कर अपनी सेहत पर ध्यान दें।
       वे प्रधानमंत्री बनें और स्वास्थ मंत्रालय अपने पास रखें। सारे आधुनिक अस्पताल बंद कर दिये जाए, डाक्टरों को जेल में डालकर बाबा खुद देश के सिविल सर्जन बन जाएँ और टी.वी. पर से देश के करोड़ों मरीज़ों का इलाज करें। कोई इंजेक्शन, टैबलेट-कैप्सूल नहीं, कोई पैथालाजी टेस्ट नहीं, कोई आपरेशन नहीं, बस योग और जड़ी-बूटी! देश का पूरा दवा उद्योग बंद होकर घर-घर में जड़ी-बूटियों के कुटाई केन्द्र खुल जाएँ। लोग लौकी का जूस पी-पीकर और एलोवेरा का हलुआ खा-खाकर सेहत बनाएँ। पेप्सी, कोक, हॉटडाँग, पिज्जा, बर्गर, चाऊमीन पर बंदिश लगाकर जगह-जगह बस दलिया बेचा जाए।
               बाबा की पार्टी सत्ता में आते ही देश-विदेश में जमा काले धन को बाहर निकालने की अपनी मुहीम चालू कर देगी। अभी तक यह पता नहीं चला है कि बाँबी में बैठे इस काले नाग को वे बाहर कैसे निकालेंगे। पुलिस-गुप्तचरों जैसे पारम्परिक सपेरों से तो वह काला नाग बाहर निकलने वाला नहीं, उनको यह काम करना ही होता तो वे सरकार का खजाना भरने के लिए न सही, अपनी जेब भरने के लिए तो उस काले धन को ज़रूर ढूँढ़ निकालते। ऐसे में बाबा का कौन सा आसन देश के गरीबों का भला करेगा जानने के लिए हम चौबीस घंटे आस्था चैनल खोले बैठे हैं, देखें कब बाबा अपने पत्ते खोलते हैं।

सोमवार, 7 मार्च 2011

उखाड़ने में हैं अव्वल हम


//व्यंग्य - प्रमोद ताम्बट//            
जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित
          उखाड़ने की कला में हम लोगों का जवाब नहीं। जंगल, पेड़, पहाड़, खंबा, सड़क, मकान, दुकान जो चाहे सो हमसे उखड़वा लो, हम उफ नहीं करेंगे। कोई कहे तो गाँव का गाँव, शहर का शहर उखाड़कर धर दें। दो सौ साल तक देश में मज़बूती से जमे अँग्रेजों को भी हमने यूँ ही चुटकियों में उखाड़ फेंका था। उसी ऐतिहासिक परम्परा को निबाहते हुए अभी कुछ ही समय पहले राजस्थान में आन्दोलनकारियों ने रेल की पटरियों को उखाड़ डाला। उखाड़ फेंकने के इस अत्योत्साह में खुद अपनी बिछाई पटरियाँ भी उन्होंने उखाड़ फेंकी हो तो कह नहीं सकते, रेल मंत्रालय को इसकी तस्दीक करनी चाहिए।
          उखाड़ा-उखाड़ी राजनैतिक पार्टियों में खूब चलती है, यही लोकतंत्र की निशानी है। इस पार्टी ने उस पार्टी को उखाड़ फेंका, उस पार्टी ने इस पार्टी को उखाड़ फेंका, लोकतंत्र की स्थापना हो गई। कभी-कभी हालात मुआफिक ना हों तो पार्टियाँ बिना किसी के उखाडे़ खुद-ब-खुद भी उखड़ जाती हैं, और उन्हें इस लोकतांत्रिक हादसे का पता हादसा हो चुकने के बाद चलता है। ऐसा बासठ साल से ही चलता चला आ रहा है, जाने कब तक चलेगा।
          उखाड़ने की क्रिया इतनी पापुलर है कि राजनैतिक पार्टियाँ आमतौर पर कुछ न कुछ गहरा गड़ा हुआ उखाड़ने का वादा करके ही सत्ता पर काबिज़ होती रहीं हैं, मगर पाँच वर्ष बीतने के बाद भी जब कहीं कोई तिनका तक नहीं उखड़ता, तो नौबत जनता के द्वारा उसका तंबू उखाड़ फेंकने तक आ पहुँचती है। कुछ पार्टियाँ आजीवन उखाड़ने की बातें कर जनता की उम्मीदों के ताजिए ठंडे करती रहती है।
          फिलवक्त भ्रष्टाचारको उखाड़ फेंकने का नारा बड़ा पापुलर है- ‘‘भष्टाचार को उखाड़ फेंको’’। दशकों से भ्रष्टाचार की जड़ें जमाने में खाद-पानी लेकर सबसे आगे खड़े राजनैतिक दल और उनके भ्रष्ट नरेश भी बेशर्मी से भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने का नारा लगाते हुए नज़र आते हैं, लेकिन चाहता कोई नहीं है कि भ्रष्टाचार उखड़े, क्योंकि अगर देश से भ्रष्टाचारही उखड़ गया तो फिर क्या वे राजनीति में रहकर भूट्टे सेकेंगे!
          बहरहाल, उखाड़ा-उखाड़ी एक किस्म का क्रान्तिकारी किरियाकरमहै, इसलिए हम हमेशा कुछ ना कुछ उखाड़ते रहते हैं स्थापित करने की चिंता करना मूर्खों का काम है।   

गुरुवार, 3 मार्च 2011

‘क्रिकेटोरिया’

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
       दुनिया के कुछ चुनिन्दा मुल्क एक बहुत ही भयानक किस्म के ‘फीवर’ की चपेट में आने वाले हैं। सबसे सनसनीखेज़ बात यह है कि हम और हमारे कुछ पड़ोसी मुल्कों के लाखों लोगों के इस खतरनाक फीवर की चपेट में आने की ज़बरदस्त संभावना है। वर्षों के शोध और अनुसंधान के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हमारी और हमारे अड़ोसी-पड़ोसी मुल्कों की ‘खसलत’ समान होने के कारण यह फीवर हम लोगों के बीच ही ज़्यादा फैलने वाला है। इस मामले का कतई हैरत में न डालने वाला पहलू यह है कि इस फीवर से सुरक्षा और बचाव का हमारी संप्रभु सरकार के पास क़तई कोई इंतज़ाम नहीं है। हमारे स्वास्थ्य विभाग को तो इसके फैलने का न तो ज़रा भी अंदेशा है और न ही उन्हें इसकी रोकथाम का इन्तज़ाम करने की कोई फिक्र है।
    खरामा-खरामा इस फीवर के बढ़ते जाने के प्रबल संकेत मिलने लगे हैं और आने वाले हफ्तों में यह ग्यारह-ग्यारह लोगों के दो-दो समूहों के चौदह सेटों से प्रारम्भ होकर हज़ारों हंगामाई प्रत्यक्षदर्शियों से होता हुआ, दर्जनों मुल्कों के करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले लेगा और दुनिया भर के अरबों लोगों का जीना हराम कर देगा।
    विगत अनुभवों से कहा जा सकता है कि इस फीवर के प्रारम्भ होते ही इंसान धीरे-धीरे अपनी सुध-बुध खोने लगता है। घर में कोई आए-जाए, दुनिया-जहान में कहीं भी कुछ चल रहा हो, मरीज़ उससे कोई मतलब नहीं रखता। यहाँ तक कि खाना-पीना, नहाना-धोना, स्कूल-कॉलेज-दफ्तर की ज़िम्मेदारियाँ, काम-काज तक भूल जाता है और दिन-रात बस टेलीविज़न की ओर टकटकी लगाए बैठा पापकॉर्न या चना-चबैना, जो मिल जाए चबाता रहता है। ।
    फीवरों के इतिहासकार इस फीवर की शुरुआत गौरांगप्रभुओं के देश ‘बरतानिया’ से मानते हैं। इस दुष्ट हुकूमत ने दुनिया के कई मुल्कों को अपना गुलाम बनाने के साथ ही इस फीवर के संक्रमण को षड़यंत्रपूर्वक काले मुल्कों में फैलाया ताकि गुलाम काली जनता इस फीवर से कभी उबर ही न सके। गुलामी की समाप्ति और प्रजातंत्र की स्थापना के साथ ही हमने और हमारे पड़ोसियों ने शिद्दत से इस फीवर को अपने गली-मुहल्लों, गाँव-खेड़ों, खेतों-पगडंडियों, मेलों-ठेलों, भीड़-भाड़ वाले बाज़ारों, यहाँ तक कि सूखे नदी-तालाबों, पोखरों तक पहुँचा दिया, जहाँ नौजवान लोग आज भी बेशरम के तीन डंडे गाड़कर उसके समक्ष हाथ में कोई भी मोगरीनुमा चपटी लकड़ी लेकर, किसी भी गोल वस्तु को पीटने को उद्धत दिखाई देते हैं, और फालतू लोग इस उत्तेजक क्रिया को घंटों तन्मयता से खड़े निहारते, और बात-बात में तालियाँ पीटते नज़र आते रहते हैं।
    इस फीवर के जीवाणु इतने ताकतवर हैं कि दूसरे किसी फीवर के जीवाणुओं को इंसान के भीतर पनपने ही नहीं देते, वे यहाँ-वहाँ उपेक्षित से पड़े रहते हैं। ‘क्रिकेटोरिया’ नाम के इस फीवर के जीवाणुओं पर अगर जल्दी से जल्दी काबू नहीं पाया गया तो इनसे भारी तबाही मचने का अंदेशा है। इसलिए, समय रहते आगाह कर रहा हूँ कि इस खतरनाक फीवर के आसन्न खतरे से तत्काल युद्धस्तर पर निपटना ज़रूरी है। 

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

सटोरियों का वर्डकप

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
         बस कुछ दिन और, सटोरियों का बहुप्रतीक्षित वर्डकप चालू होने वाला है। इधर जैसे-जैसे दुनिया की चौदह क्रिकेट टीमें अपने-आप को चाक-चौबंद कर वर्डकप के लिए तैयार कर रही हैं, वैसे-वैसे सटोरिए-बंधु भी अपनी ज़मीनी तैयारियों में भिड़ गए हैं। क्रिकेट खिलाड़ी जहाँ अपने तमाम हथियार यथा बैट-बल्ले, शिरस्त्राण नी-कैप, पैड, जूते-मोजे सम्हालने में लगें हैं, वहीं सटोरिये मोबाइल, टेलीफोन, लैपटॉप, कम्प्यूटर, टी.व्ही. और ‘ब्रीफकेस’ अप-टू-डेट करने लग पड़े हैं। कोई भी अपनी तैयारियों में कमी नहीं रखना चाहता आखिर वर्डकप चार साल के लम्बे अन्तराल के बाद जो आता है। 
    एक मायने में क्रिकेट और सट्टा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। इतने भयानक पूरक कि समझ में ही नहीं आता, क्रिकेट में सट्टा चल रहा है या सट्टे में क्रिकेट। खेल भावना दोनों में समान होती है।
सूने भवनों, सुनसान मैदानों, रहस्यमय गली-कूचों में ‘फड़’ खेलने वालों, या पुलिस की दबिश के दौरान घटिया होटलों के हर संभव निकास से कूद-कूद कर तीर की तरह भागते धुरंधर सटोरियों को खूब देखा है। वह किस्सा अब पुराना हुआ। किसी ज़माने के इस जोखिम भरे खेल का अब जबरदस्त रूप से सम्मानजनक रुपान्तरण हो गया है। अब बालकनियों से कूदकर पाँव तुड़वाने और पृष्ठ भाग पर पुलिस के डंडों की सुताई का  खतरा बिल्कुल नहीं रहा, बल्कि पुलिस के पूर्ण संरक्षण में किसी भी गुप्त स्थान पर बैठकर आधुनिक गजेट्स के सहारे सटोरिये दुनिया का अपना कोई भी टुर्नामेंट सम्पन्न कर ले सकते हैं। गली-कूँचों से लेकर सभी तरह के घरू क्रिकेट, एक विकिट, दो विकिट टूर्नामेंट, टेस्ट क्रिकेट, ओ.डी.आई, ट्वेंटी-ट्वेंटी, काउंटी मैचेस और सबसे कमाऊ आयोजन वर्डकप कुछ भी, सच्चे सटोरियों की खेल भावना से बिल्कुल अछूते नहीं रह सकते।
    वर्डकप क्रिकेट की तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं। दुनिया भर के खिलाड़ी नेट प्रेक्टिस में पिले पड़े हैं। इधर शातिर सटोरियों ने भी अपने जाल बिछाकर प्रेक्टिस शुरू कर दी है। पुलिस वालों ने अपने जाल खोलना चालू किये हैं या नहीं यह बात पूरी तौर पर ‘गुप्त’ है परन्तु वर्डकप के प्रथम मैच की पहली ईनिंग के साथ ही सटोरियों के वर्डकप की पहली ईनिंग भी शुरु हो जाएगी। आइये दोनों महान खेलों का खेल भावना से स्वागत करें।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

मुसीबतें अविष्कारों की

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
जनसंदेश टाइम्स लखनऊ में प्रकाशित
              कई लोगों को वैज्ञानिकों के किये कई अविष्कारों पर बड़ा गुस्सा आता होगा। जैसी इंचीटेप, तौलकाँटें, लीटर के माप, बिजली व बिजली के बल्ब, ताला-चाबी, किताब, चश्मा इत्यादि-इत्यादि। इन जैसे कई अविष्कारों ने लोगों को अपनी मनोकामनाएँ पूरी करने से बलात रोक रखा होता है।
          इंचीटेप न होता तो कपड़ची को कम कपड़ा नापने में सुविधा होती। टेप न हो तो ठेकेदार दस किलोमीटर सड़क को पाँच ही किलोमीटर बनाकर पूरे दस किलोमीटर के पैसे वसूल लेता और इन्जीनियर उसी सड़क को पन्द्रह किलोमीटर दिखाकर सरकारी खज़ाने को चूना लगा देता। किसी वैज्ञानिक ने तौलाकाँटा बनाया, वह यह कारस्तानी न करता तो किरानियों को कम सामान तौलने में कितनी सुविधा होती। लीटर के मापों का अविष्कार करके किसी दुष्ट वैज्ञानिक ने दूध वालों के लिए दिक्कत खड़ी की है।
          बिजली का अविष्कार कर वैज्ञानिकों ने पागलों के लिए कम मुसीबतें खड़ी नहीं की थीं कि किसी पागल वैज्ञानिक ने बिजली के बल्ब का अविष्कार कर मारा। इस बिजली के बल्ब से चोर-लुटेरों की नफरत किसी से छुपी हुई नहीं है, प्रेमियों को भी रात के अंधेरे में न मिलने देने के लिए यह बल्ब ही सबसे बड़ा जिम्मेदार है। यह बल्ब न होता तो चोर चैन से चोरी कर पाते और प्रेमी प्रेमलीला रचा पाते। इन दोनों का ही बस चलें तो ये दुनिया के सारे बल्ब तोड़ मारें। ताला-चाबी भी इसी तरह का अविष्कार है जो चोरों और प्रेमियों के भीतर गुस्सा पैदा करता है। इन दोनों में से कोई एक न होता तो चोर और प्रेमी दोनों का ही काफी काम बन जाता।
          किताबों और चश्मे के अविष्कार ने दुनिया को काफी रुला रखा है। किताब दुनिया में आई तो छात्रों को उसे पढ़ने का अप्रिय श्रम करना पड़ रहा है और चश्में के अविष्कार ने ऐसे-ऐसे पढ़ाकू पैदा कर दिये जो न केवल दुनिया भर की किताबें चट किये दे रहे हैं बल्कि वे जितने दिन जीवित रहेंगे उतने दिन किताबें रच-रचकर दुनिया पर भारी-भरकम साहित्य का बोझ बढ़ाते रहेंगे। चश्मा न होता तो आखिर आदमी कितना पढ़ता और कितना लिखता। आँख कमज़ोर होने के बाद चुपचाप एक कोने में बैठा रहता। कई लोगों को राहत मिलती।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

अच्छी जगह बैठे हैं


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जनसंदेश टाइम्स लखनऊ में प्रकाशित
            अक्सर कई लोग गर्व से अपनी गरदन ऊँट की तरह ऊँची किये हुए आत्मप्रशंसा करते हुए मिल जाते हैं-‘‘भगवान के आशीर्वाद से अच्छी जगह बैठे हैं।’’ भगवान के आशीर्वाद पर तो जितना ज़ोर ज़रूरी है, होता है, परन्तु ज़्यादा ज़ोर होता है-‘‘अच्छी जगह बैठे है’’ पर। सुनकर ऐसा लगता है जैसे किसी सिंहासन-विंहासन पर बैठे जनता के दुखदर्द दूर कर रहे हों या किसी धर्मात्मा की गद्दी पर विराजमान धर्मार्थ लंगर-वंगर चलाकर दीन-दुखियों की सेवा कर रहे हों, परन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है। वे किसी सरकारी कुर्सी पर जमे मोटी तनख्वाह के अलावा तगड़ी रिश्वत भी बटोर रहे होते हैं। अकेली तनख्वाह से उन्हें ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने का एहसास नहीं होता, वह होता है अच्छी ऊपरी आमदनी से। ऊपरी आमदनी अच्छी न हो या कुर्सी पर सूखी तनख्वाह के अलावा कुछ ऊपरी; नसीब न होता हो तो वह क़तई ‘‘अच्छी जगह’’ नहीं हो सकती, भले ही तनख्वाह खूब मिल रही हो।
          सरकारी दफ्तरों में तो चपरासी भी अगर मलाई मार रहे अफसर की घंटी पर बैठा हो तो वह भी मूँछों पर ताव देकर शेखी बघारता है-‘‘अच्छी जगह’’ बैठे हैं। दफ्तर का डफर से डफर आदमी भी जिसे सबसे निकृष्टतम काम में लगाया गया हो, अगर पच्चीस-पचास रुपये की ऊपरी आमदनी पर हाथ साफ कर लेता है तो वह भी ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने के एहसास से भरा रहता है।
          अच्छी रेलमपेल वाले चौराहे पर विराजमान भिकारी जब अच्छी कमाई कर रहा होता है तो इस गर्व से फूला हुआ रहता है कि वह ‘‘अच्छी जगह’’ बैठा है। टोलटैक्स नाके पर उगाही करने वाला कर्मचारी उगाही में चोरी-चुंगी की सुविधाओं के कारण अपने आपको अच्छी जगह बैठा महसूस करता है। मरघट में लकड़ी की टाल पर तौल में डंडी मारकर चार पैसे तनख्वाह से अधिक पा जाने वाला इंसान भी अपने इस घटियापन पर ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने का दंभ लिए घूमता है।
          क्या ज़माना आ गया है। किसी को ईमानदारी और मेहनत से काम करते हुए ‘‘अच्छी जगह’’ बैठे होने की अनुभूति कभी नहीं होती, ऐसी जगह बैठे हर आदमी को हर वक्त यह एहसास कचोटता रहता है जैसे उसे नर्क में बिठा दिया गया हो।