शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

न देख बुरा सुन बुरा बोल बुरा


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          न देख देख देख बुरा, न सुन सुन सुन बुरा, न बोल बोल बोल बुरा- न देख बुरा सुन बुरा बोल बुरा। गाँधी जी के तीन बंदरों के इस ऐतिहासिक उपदेश को अगर किसी ने हृदय से आत्मसात किया है तो वे है हमारे प्रधानमंत्री। वे न बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं, और न बुरा बोलते हुए आज तक किसी ने उन्हें देखा-सुना है। बोलने के मामले में बुरा तो क्या, मैं तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि देश की निन्यानवे फीसदी आबादी ने तो उन्हें कभी बोलते हुए भी नहीं सुना होगा।
          भ्रष्टाचार कितनी बुरी बात़ है, इसे आँख खुली रखकर देखना और भी बुरी बात़ है। राष्ट्रव्यापी घोटालों के ऊपर चल रहे फालतू शोरगुल पर फिज़ूल कान देना भी उतनी ही बुरी बात है। देखना, फिर सुनना और फिर इन बुरी-बुरी हरकतों पर जबरन कुछ बोलना प्रजातंत्र के किसी भी सच्चे पहरुए के लिए बहुत ही बुरी बात है, इसीलिए अपने आँख, कान और मुँह बंद रखकर हमारे प्रधानमंत्री अद्वितीय धैर्य का परिचय देते हुए देश को चला रहे हैं, और वह शान से चल रहा है।
          देश में चल रही तमाम ऊलजलूल और ऊटपटांग हरकतों के बारे में फालतू की सूचनाएँ और जानकारियाँ दिमाग में भंडारित रखकर वे उसे ओव्हरलोड नहीं करते। उनकी सरकार के मंत्री-संत्री, मंत्रालयों के अफसर-बाबू, देश की जनता के वी.आई.पी. प्रतिनिधि, कब, कहाँ, क्या-क्या लीला रचाते रहते हैं, वे नहीं मालूम रखते। कौन-कौन सी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उनके चिर शांति पूर्ण जादुई मौनकी आकांक्षी, अभिलाषी हैं, कौन-कौन से व्यापारिक घराने उनके, निर्लिप्त, निरपेक्ष समभाव के लाभार्थी है, वे नहीं पता रखते। देश के किस कोने में कौन-कौन, क्या-क्या गुलखिला रहा होता है उन्हें बिल्कुल पता नहीं होता। यदि पता हो भी तो किसी को कोई टेन्शन नहीं होता क्योंकि उन्हें कुछ निर्णायक करना तो है नहीं, यह सबको पता है।
          मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनके किचन में क्या-क्या साग-भाजी कब, किस मंडी से कितनी-कितनी मात्रा में कितने पैसों में खरीदी जाती है उन्हें बिल्कुल पता नहीं रहता होगा। यही कारण है कि उनकी कुर्सी बचाने के लिए किस पार्टी के किस-किस सांसद की खरीद किस-किस दर पर की गई और इस खरीदारी पर जेब किसने ढीली की, यह भी उन्हें नहीं पता चला होगा। एक प्रधानमंत्री स्तर के राजनीतिज्ञ के सिर पर देश के दूसरे कितने लफड़ों-झपड़ों का टेन्शन रहता है, उससे यह उम्मीद रखना सरासर बेवकूफी है कि कब, कहाँ, क्या चीज खरीदी गई। अर्थशास्त्री होने का मतलब यह नहीं कि वह हर चीज़ का हिसाब-किताब रखता फिरे।
महँगाई के स्थाई मुद्दे पर देश की जनता जब-तब इस बेकसूर आदमी को बिलावजह कोसने लगती है, जैसे अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर उसने कोई अपराध कर दिया हो। एक प्रधानमंत्री जो अर्थशास्त्र का प्रकांड पंडित हो, वह देश के शिखर आर्थिक मुद्दों को सुलझाने में अपनी ऊर्जा खर्च करेगा कि महँगाई जैसी टुच्ची चीज़ की चौकीदारी करता फिरेगा। भूमंडलीकरण अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की तीव्र गति से, आर्थिक शक्ति बनते जा रहे हमारे देश का प्रधानमंत्री आटा-दाल-चावल, आलू-प्याज़ जैसे घटिया माल का खुदरा मूल्य पता रखे यह आशा करना तो यार सरासर अमानवीयता है।
          देश में भीषण बेरोज़गारी है, गरीबी हटाने का सपना धन्नासेठ की तिज़ोरी में कैद है, लोग मूलभूत सुविधाएँ नहीं हासिल कर पाते, स्विस बैंक में किसका माल रखा है, यह सब अगर प्रधानमंत्री जी को नहीं पता है तो इसका कारण गाँधी जी के वही ‘‘न देख बुरा, सुन बुरा, बोल बुरा’’ का मायावी सिद्धांत है। देश में साधु-संत राजनीति मे घुसने के लिए धड़पड़-धड़पड़ करते रहते हैं, हमारे प्रधानमंत्री राजनीति में साधुत्व की चरम सीमा पर पहुँचे हुए संत हैं उन्हें सांसारिक तांडव के बारे में कुछ पता नहीं होता।

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

आज़ादी की लडाई


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          वे बोले-‘‘भाई साहब आपको सहयोग देना ही पड़ेगा, आप इन्कार नहीं कर सकते, वर्ना अपनी-तुपनी दोस्ती टूट गई समझो।’’
          मैंने कहा-‘‘जनाब, घर के अन्दर घुसे आपको कई सेकण्ड हो चुके हैं आपने अब तक कोई सहयोग माँगा ही नहीं है, मैं आखिर इन्कार कैसे कर सकता हूँ।’’
          वे बोले-‘‘यह भी बजा फरमाया आपने। बात दरअसल यह है कि दूसरी आज़ादी की लड़ाई प्रारम्भ हो चुकी है, आप......’’
          उनकी बात पूरी होने से पहले ही मैंने चट आश्चर्य प्रकट कर डाला और कहा-‘‘ अच्छा, पहली वाली आज़ादी को क्या हुआ!
          वे हड़बडाते हुए बोले-‘‘हमारा मतलब है आज़ादी की दूसरी लड़ाई प्रारम्भ हो चुकी है।’’
          मैंने फिर कहा-‘‘वो तो मैं समझ गया, मगर पहले, पहली आज़ादी के बारे मैं नक्की कर लेना चाहिये कि वह कहा गई, वर्ना ऐसा हो कि पहली के रहते हुए आप दूसरी भी ले आओ, सौत-सौत एक जगह रह नहीं पाती है, बहुत कलह करती हैं।’’
          वे हँसने लगे-‘‘ही ही ही ही, आप व्यंग्यकार लोग भी खूब मज़ाक कर लेते हैं।’’
          मैंने पूछा-‘‘बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ!’’
          वे बोले-‘‘अरे साहब, हम तो सरकारी अफसरी में सेवा करवा-करवाकर अघा गए, इसलिये अब देश सेवा की सोची है। देश गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, इसे बाहर निकालना ज़रूरी है, इसलिए आप भी कृपया इस लड़ाई में कूँद पड़िये।’’
          मैंने कहा-‘‘बिल्कुल बिल्कुल! बताइये कहाँ हैं जंपिंग किट! हथियार, गोला बारूद की कुछ व्यवस्था हुई या बात करें किसी से ?’’
          वे बोले-श्रीमानं, हम गाँधी जी के रास्ते पर चलकर दूसरी आज़ादी लाएँगे।
          मैंने कहा-‘‘देखिए पहली भी गाँधी जी के रास्ते पर चल कर ही आई थी, उसे क्या हुआ आप बता नहीं रहे! मुझे भय है कि अपन लड़-लुड़ाकर इधर दूसरी आज़ादी ले आएँ और उधर     पहली वाली भी बाहर निकल आए, बड़ी समस्या हो जाएगी।’’
वे उसी उत्साह में बोले-‘‘वाह! क्या प्रश्न उठा दिया आपने। हमने तो कभी इस बिंदु पर विचार ही नहीं किया।’’
          मैंने कहा-‘‘फिर! आप ऐसे आधी-अधूरी तैयारी के साथ कैसे गए मुझसे सहयोग माँगने! जाइये, पहले अपने नेताओं से पूछकर आइये कि पहली आज़ादी को क्या हुआ, तब आकर हमसे बात करिये।’’
          वे उस वक्त तो अपना सा मुँह लेकर चले गए, मगर दूसरे दिन थके-हारे कदमों से चलते हुए फिर चले आए और निराशा के साथ बोले-‘‘अब रहने दीजिए, दूसरी आज़ादी की लड़ाई खत्म हो चुकी है। सरकार ने हमारी सारी माँगें मान ली हैं, अब हमें आपके सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं।’’
          मैंने उन्हें बधाई देते हुए फिर पूछा-‘‘भई, आखिर पहली आज़ादी का क्या हुआ कुछ पता चला!’’
          वे बुरी तरह भड़क गए और लगे चिल्लाने-‘‘भाड़ में गई पहली आज़ादी, हमें क्या पता! पड़ी होगी कहीं किसी की तिजोरी में। हमने क्या दुनिया भर का ठेका ले रखा है जो आज़ादियों का हिसाब रखते फिरें!’’
          वे पॉव पटकते हुए चले गए आज़ादी की दूसरी लड़ाई का उनका खुमार उतर चुका था। 

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

खाओ क्रिकेट, पीयो क्रिकेट, जीयो क्रिकेट

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
 
            मैं बेहद कुंठित हूँ कि बीस रुपये रोज़ औसत कमाई वाले इस देश में क्रिकेट को धर्मकी तरह अपनाऊँ या विज्ञानकी तरह! अपनाना तो पड़ेगा किसी न किसी रूप में, क्योंकि हमने हाल ही में क्रिकेट के बड़े-बड़े बल्लमों को धूल चटाकर विश्वकप जो जीता है। सारा देश धर्म से उन्मादऔर किक्रेट के विज्ञानके प्रभाव में है, इसलिए अपनी सभी प्राथमिकताओं को ताक पर रखकर तुरत-फुरत इसे अपनाना बेहद ज़रूरी है, वर्ना खेलद्रोही कहे जाने का खतरा आसन्न है।
          कभी क्रिकेट को एक खेल की तरह खेला जाता था, लेकिन अब इसमें से खेलत्वखत्म हो गया है। यह कमोबेश धर्मकी तरह नज़र आने लगा है, जिसे हम सर-माथे पर धारण करते हैं, ओढ़ते-बिछाते हैं और लगे हाथ दमीचते-पछीटते भी हैं। तुम्हारा धर्महमारे धर्म से महान कैसे कि तरह, तुम्हारा क्रिकेटहमारे क्रिकेटसे महान कैसे वाली भावना से लेकर क्रिकेट का विश्व-गुरू बनने तक की सनक इस फील्ड में दिखाई देने लगी है। कट्टरता की भाव-भंगिमा, रोंद डालो, काट डालो, पीट डालो, चटनी बना दो, यलगार हो, किलाफतह आदि-आदि डायलॉगबाज़ी जो धर्म के क्षेत्र में चलती है, अब क्रिकेट में भी नज़र आने लगी है।
          जिस तरह धर्म को अहर्निश ओढ़ा-बिछाया जाता है, जिस तरह धर्म में अंध-आस्था और अंध-विश्वास का पारायण किया जाता है, क्रिकेट में भी किया जाने लगा है। अपन तो हमेशा धर्म-निरपेक्ष के साथ-साथ खेल-निरपेक्ष भी रहे और खेलत्व की भावना भी जिन्दा रखी, मगर अब जिस तरह यह दोनों ही मूल्य खतरे में नज़र आ रहे हैं, लग रहा है क्रिकेट को धर्म की तरह अपनाना पडे़गा। अगर न अपनाऊँ तो मुझे विश्वास है लोग मार-मारकर अपनाने पर मजबूर कर देंगे।
          इधर क्रिकेट को विज्ञान की तरह मिस-यूज़ भी किया जाने लगा है, जो खासा आन्दोलित करने वाला है। जैसे विज्ञान हमें सिखाता है कि प्रकृति, विश्व ब्रम्हांड को अपने काबू में कैसे रखा जा सकता है, क्रिकेट दुनिया भर के सत्तानशीनों को सिखाता है कि पब्लिक को काबू में कैसे रखा जा सकता है। सत्तासीनों के पास क्रिकेट एक ऐसे अस्त्र के रूप में मौजूद है जिसके प्रक्षेपण से जनता के आक्रोश, गुस्से और कुंठा को कंट्रोल किया जा सकता है। कितनी भी महँगाई हो, बेरोज़गारी हो, जीना कितना भी मुश्किल हो, कितनी भी अराजकता हो, घोटालें हों, भ्रष्टाचार हो, देश गले-गले तक अव्यवस्थाओं का शिकार हो, बस एक के बाद एक क्रिकेट टूर्नामेंट करवाते रहो, सब ठीक हो जाएगा।
          जनता को जब देने के लिए के लिए कुछ न हो तो क्रिकेट का जुनून दे दो वह उछलते कूदते हुए जी लेगी। खाओ क्रिकेट, पीयो क्रिकेट, जीयो क्रिकेट ऐसी इक्वेशन है जो सारे गम भुला देती है, सारे दुखों का नाश कर देती है। विश्वकप का जुनून ऐसा चढ़ा की लोग जापान का भूकम्प और सुनामी भी भूल गये। लोग भूल गए कि देश में एक घोड़ों का व्यापारी कितना टैक्स दबाकर बैठ जाता है। क्या कलमाड़ीक्या राजा’, क्रिकेट के नशे में लोग भूल गए कि उन्होंने क्या किया। क्रिकेट ने ऐसी जादू की छड़ी घुमाई कि किसी का ध्यान ही नहीं गया कि मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ कहाँ-कहाँ बरबादी कर रहीं हैं। यह क्रिकेट का विज्ञान ही है जिसका उपयोग दुनिया भर की सत्ताएँ खूब करती हैं। खेल में धर्म सा उन्माद और सत्ताधारी ताकतों के इस क्रिकेट विज्ञान को देखकर भारी किंकर्त्तव्यविमूढ हूँ, आखिर क्या करूँ।
          सोचता हूँ भावी विश्वयुद्ध को सफलतापूर्वक मंचित करने के लिए एक विश्वस्तर का क्रिकेट टूर्नामेंट कितना कारगर होगा। दुनिया भर की पब्लिक क्रिकेट की खुमारी में रहेगी, कहीं कोई विरोध, कोई आन्दोलन न होगा और साम्राज्यवादी सेनाएँ प्रजातांत्रिक मूल्यों की सुभीते से बरबाद करती रहेगी। विश्वयु़द्ध उत्साहपूर्वक सफल हो जाएगा जैसे विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट सफल होता है। 

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

मॉडल और विश्वकप

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
              हम विश्वकप क्यों जीत गए ! इसलिए क्योकि एक खूबसूरत मॉडल ने एक बहुत ही शौर्य, पराक्रम और साहसपूर्ण घोषणा कर दी थी कि वह भारतीय क्रिकेट टीम के सामने निर्वस्त्र होकर केटवॉक करेगी, अगर टीम विश्वकप जीत पाई। इसी लालच में टीम इन्डिया ने वानखेड़े स्टेडियम में अपने सारे अस्त्रों-शस्त्रों को धो-माँजकर, ऑइलिंग-ग्रीसिंग करके श्रीलंका के खूँखार चीतों को धूल चटा दी। उन्हें शायद यह डर भी रहा होगा कि यदि वे हारे तो कहीं यह सुनहरा अवसर श्रीलंकाई टीम को न मिल जाए।
            आप लोग मेरी बात को यदि गंभीरता से लें तो आपको एहसास होगा कि उस नादान मॉडल को निर्वस्त्र होने से बचाने के लिए भारतीय संस्कृति का तकाज़ा क्या था! किसी भी संस्कृति रक्षक से पूछ लीजिए, वह यही कहेगा कि भाड़ में गया विश्वकप स्त्री की लाज की रक्षा करने के लिए भारतीय क्रिकेट टीम को फायनल मैच हार जाना चाहिए था, ताकि वह मॉडल कपडे़ पहनी रहे, दुनिया के सामने स्त्रीत्व की मर्यादा कायम रहे। लेकिन, चूँकि भारतीय क्रिकेट टीम ने फालतू के आदर्शवाद में पड़कर मैच को हाथ से नहीं जाने दिया, इसका मतलब यही है कि पूरी टीम अपनी आँखें सेंकना चाहती थी।
           अंततः हुआ क्या पता नहीं चला, परन्तु धोनी का सिर संदिग्धता के दायरे में है, पता नहीं उन्होंने मुँडन कराया है या उनकी नई नवेली पत्नी ने इस प्रकरण की पृष्ठभूमि में उनके बाल नोचे हैं। बहरहाल, पब्लिक भी किस कदर खुश हो होकर तालियाँ पीट रही थी, शायद इसीलिए कि मॉडलों को कम कपड़े पहने हुए देख-देखकर बोर हो गए, अब कुछ नया देखने को मिलेगा।
           वाहियादी की भी हद है। एक लड़की, एक अश्लील प्रस्ताव रखती है और उसे एक तमाचा जड़कर बाप की भूमिका निभाने वाला देश में कोई नहीं। कानून के पास भी वह आँखें नहीं जो चौड़ी करके दिखाई जाने पर बिगड़ी हुई बच्चियाँ रास्ते पर आ जाएँ। कितनी बड़ी बिडंबना है कि इस युग में द्रोपदियों के तन से कपड़े खींचने के लिए किसी दुर्योधन की ज़रूरत नहीं है, द्रोपदियाँ खुद ही कपड़े उतार-उतार कर फेंकने को बेताब हैं। कोई कृष्ण भी नहीं जो पीछे से कपड़ों की बेरोकटोक आपूर्ति करता रहे।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

पायलेटी का फर्ज़ी लायसेंस


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             जब से पायलेटों के साहस, शौर्य और पराक्रम की गाथा सुनी है, हवाई जहाज़ों की उड़ानें किसी हॉरर फिल्म की तरह रोज़ रात को बारबार सपने में आती हैं। हमारी खुशकिस्मती है कि हवाई ज़हाजों से फेरे लगाने की हमारी औकात नहीं, वर्ना फर्ज़ी प्रमाणपत्रों के आधार पर हासिल किया गया पायलेटी का लायसेंस हमें कौन से समुद्र में मछलियों का चारा बनवा देता, कुछ कहा नहीं जा सकता।
          क्या पता कब ये फर्जी पायलेट बंधु हवाई नक्शा ना समझ पाने की मजबूरी में जहाज़ को कहीं रेगिस्तान में ही उतार देते और कहते कि यहाँ से पैदल घर जाओ। इससे भी खतरनाक यह हो सकता था कि वे गफलत में हवाई जहाज दिल्ली की जगह इस्लामाबाद में उतार मारते, खामोखां पोलिटिकल इश्यू खड़ा हो जाता। आई.एस.आई. वाले जेल में डालकर कोड़े लगाते और वर्ड कम्यूनिटी के सामने इल्ज़ाम जड़ते कि हिन्दुस्तान के व्यंग्यकार आजकल पाकिस्तान की जासूसी करके पेट पाल रहे हैं। यह भी अच्छा हुआ जो आज तक हमें किसी ने हवाई जहाज़ का मुफ्त का टिकट पकड़ाकर उन कम्बख्तों के हवाले नहीं किया जो फर्जी लायसेंस जेब में रखकर बेकसूरों को मौत के मुँह में लेंडिंग-टेकआँफ कराते आ रहे थे।
          फर्जीवाडे़ का यह किस्सा हमारे बब्बन खाँ ने जब से सुना तभी से वे अफसोस के मारे मुँह लटकाकर बैठे हैं कि भटसुअर’ (टेम्पों) का लायसेंस बनवाते समय दो-चार फर्जी कागज़ात और बनवा लेते तो हवाई जहाज़ का भी लायसेंस बन जाता। देड़ सौ की जगह दो सौ खर्च होते और दलाल लायसेंस घर पर देकर जाता सो अलग। फिर, है क्या हवाई जहाज़ चलाने में, जैसे गेर’, ‘किलच’, ‘एक्सीलेटर’, भटसुअर में होता है वैसा ही तो हवाई जहाज़ में भी होता होगा, और क्या।
          पायलेट की सीट पर सफेद ड्रेस में कसम से क्या दिखलौट लगते! सुना है उसमें खूबसूरत मोहतरमाएँ ईत्र-फुलेल लगाए बार-बार पायलेट कने चक्कर लगाती रहती है। यहाँ भटसुअर में दिन रात धूल-धुआ और डीज़ल की बदबू के साथ-साथ, आठ-आठाने के लिए सवारियों से झिक-झिक करते रहो और पुलिस वालों को हफ्ता खिला-खिलाकर खुद कंगले हो जाओ। हवाई जहाज़ चलाते तो आसमान में कैसे हफ्ता वसूली करती पुलिस ! एयर कंडीशन काकपिट में बैठकर बड़े-बड़े लोगों को दिल्ली से बम्बई, बम्बई से कलकत्ता, कलकत्ता से चेन्नई, लिये घूमते। थोड़े और पैसों की जुगाड़ करके इन्टरनेशनल पायलेटी का लायसेंस बनवा लेते, फिर न्यूयार्क से लन्दन, लन्दन से पेरिस, पेरिस से होनोलूल गोरी सवारियाँ लिये घूमते, कितना मज़ा आता।
          इन दिनों पर्यावरणविदों की कारस्तानी से भटसुअर बंद हो गए हैं और बब्बन खाँ शान्तिवाहनमें मुर्दे ढो रहे हैं। बनियान तोंद के ऊपर चढ़ाए ड्रायवर की सीट पर बैठे-बैठे वे बस एक ही बात सोचते रहते हैं कि शांतिवाहनही चलाना था तो उससे अच्छा हवाई जहाज़ ही चला लेते, क्या फर्क पड़ता, एक ही तो बात है। नकली कागज़ातों पर पायलेट बना शख्स हवाई जहाज़ उड़ाए तो वह शांतिवाहनसे कम कतई नहीं हो सकता, न जाने कब, कहाँ हवाई यात्रियों को स्थाई शांति दिलवा दें।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

एव्री डे फूल्स डे

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            1 अप्रैल का दिन हो तो सारे बेवकूफोंका मन करता है कि कोई मूर्खतापूर्ण हरकत कर उन्हें बेवकूफ बनाए और कोई न कोई उन्हें मिल भी जाता है जो सुबह-सबेरे ही उन्हें बेवकूफ बनाकर ठहाके लगाता हुआ चलता बनता है। समझदारआदमी को मूर्ख बनाने के लिये किसी एक दिन की आवश्यकता नहीं है, अपने देश में तो हर एक दिन फूल्स डेहोता है और हर समझदारआदमी दूसरे को बेवकूफ समझकर एक-दूसरे को फूलबनाने में लगा रहता है। बेटा बाप को फूलबनाता है, बाप माँ को, माँ-बाप सास-ससुर को फूल बनाते हैं।
          सुबह होते ही दूध वाला ठाठ से पानी मिला दूध घर-घर बाँटकर सबको मूर्ख-बना जाता है, और उधर तमाम बाबा-बाबियाँ टी.व्ही. के भिन्न-भिन्न चैनलों पर साक्षात प्रकट होकर नाना विधियों से समझदारों को बेवकूफ बनाकर खुद नोट बनाते हैं। फिर दुनिया भर की कम्पनियाँ अपने घटिया उत्पादों को फिल्मी हीरो-हीरोइनों के ज़रिये बेचना प्रारंभ करती हैं। सिलसिला शुरू होता है चमड़ी का रंग गोरा करने के दावों और कपड़ों पर दूध सी सफेदी देने के झूठे विज्ञापनों से। देश भर को फूहड़ गीत-संगीत, कामेडी-सर्कसों और हमेशा बनी-ठनी, लड़ती रहने वाली औरतों के मूर्खतापूर्ण षड़यंत्रों वाले सिरियलों से एपीसोड दर एपीसोड मूर्ख बनाया जाता है।
          मूर्ख बनाने के कारोबार में सबसे आगे हैं राजनैतिक पार्टियाँ इनके पास एक से एक शातिर नेताओं की पलटन होती है जो हर परिस्थिति में अच्छे से अच्छे समझदारको पलक झपकते ही मूर्ख बना देती है। इन्हें कभी किसी फूल्स डेकी ज़रुरत नहीं पड़ती।         देश की हालत कितनी भी खराब हो, भूमंडलीकरण के मजे़ लूटने के लिये हमें दुनिया को मूर्ख बनाते रहना पड़ता है। बड़े-बड़े मॉलों, एयरपोर्टो, मेट्रो-सेट्रो और कॉमनवेल्थ, विश्वकप जैसे  आयोजनों के झंके-मंके से विश्व कम्यूनिटी को बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा करना पड़ता है। हमारे शीर्ष बिजनेस प्रबंधक यह काम बखूबी करते हैं, दुनिया को पता ही नहीं पड़ता कि आलीशान गगनचुंबी इमारतों के पीछे हमारी जनता की हालत क्या है।
          इस तरह देखा जाए तो एव्री डे फूल्स डेवाली बात है। पूरे साल हम किसी न किसी को मूर्ख बना रहे होते हैं या कोई हमें मूर्ख बना रहा होता है।