सोमवार, 8 मार्च 2010

अपहरण नारी मुक्ति आन्दोलन का

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
अन्तराष्ट्रीय नारी मुक्ति आन्दोलन का प्रतीक-अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च फिर आ गया। मेहनतकश, कामकाज़ी महिलाओं के इस ऐतिहासिक नारी मुक्ति आन्दोलन का बहुत पहले ही उन विदूषी नारियों द्वारा अपहरण किया जा चुका है जिनको खुद कभी कोई काम नहीं करना पड़ता। इसका अपहरण किया है अच्छे खाते-पीते घरों की मोटी-ताज़ी नारियों ने जो अपने घर में काम करने वाली बाइयों को साल में एक दिन भी छुट्टी मनाने की इजाज़त नहीं देतीं। बाई की तबियत नासाज़ हो, पति, बच्चा बीमार हो या दूसरा कोई झमेला हो, मालिकिन को अपने हाथ से बरतन माँजना, झाड़ू-पोछा लगाना इतना अखरता है कि गुस्से में आकर वे बाई की चुटकी भर तनखा भी काट लेती है। गिलास-प्लेट-मग्गा टूट जाए, इस्तरी करते हुए कपड़ा जल जाए, नुकसान को तुरन्त हिसाब में जोड़ लेती हैं। अपहरण किया है बड़के नौकरशाहों की अर्धांगिनियों की एसोसिएशनों ने जो बाहर तो नारी मुक्ति-नारी मुक्ति खेलती है और घर में बच्चे की आया को सुबह-शाम तमाचे जड़ती हैं।
अपहरणकर्त्तियों का महिला दिवस मनाने का तरीका अनोखा होता है। दस-बीस खाई-अघाई महिलाएँ बढ़िया आठ-दस हज़ार कीमत की साड़ियाँ पहन, नकली-असली जेवरों से लद-फदकर, नेल पालिश, लिपिस्टिक, रूज़-पाउडर लगाकर, इंपोर्टेड परफ्यूम की खुशबू में लिपटी हुई किसी होटल के लॉन में इकट्ठा होकर गेट-टुगेदर करती हैं। चेयररेस, तम्बोला, अंताक्षरी इत्यादि-इत्यादि खेलों के ज़रिए मनोरंजित होकर खाना-वाना खाकर मुक्ति के सुखद एहसास के साथ लक्झरी गाड़ी में सवार होकर घर लौट आतीं हैं। इनमें से कुछ बुद्धिजीवी किस्म की महिलाएँ महिलाओं की भाषण प्रतियोगिता, कविता-कहानी प्रतियोगिता, चित्रकला-रंगोली प्रतियोगिता इत्यादि टाइप की गतिविधियाँ सम्पन्न करतीं हैं जो बाज़ार सृजित सभ्य समाज में रचनात्मक गतिविधियों के नाम से बदनाम हैं।
कुछ उच्च शिक्षित नारीवादी नारियों का नारीवादी आन्दोलन उनके इर्द-गिर्द के पुरुषों से शुरू होता है और उन्हीं पर खत्म हो जाता है। ‘पुरुषमात्र’ उनके लिए दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। पुरुष रूप में उनके समीपस्थ किसी भी व्यक्ति में ऐन-केन-प्रकारेण दो-चार जूते घल जाएँ तो उनका कलेजा ठंडा हो जाता है और मुक्ति आन्दोलन सफल हो जाता है। ऐसी नारियों का नर तो बेचारा जैसे नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रयोगशाला में किसी गिनीपिग की तरह का प्राणी होता है जिस पर नए-नए परीक्षण किये जाकर नए-नए नारीवादी सिद्धांत खोजे जाते हैं। नारीवादी नारियों का यह एक अलग सम्प्रदाय सा होता है जो चाहता है कि दुनिया में क्रांति हो तो ऐसी हो कि सारे पुरुषों का खात्मा लग जाए और चारों ओर नारियों ही नारियों की सत्ता हो। इससे पीटने के लिए पुरुषों के अभाव की चिंता उन्हें बिल्कुल नहीं होती।
सुविधाभोगी नारियों से परे बहुत सारी मेहनतकश नारियाँ हैं जो सचमुच मुक्ति के इंतज़ार में हैं। वे यहाँ-वहाँ के महिला संगठनों के आव्हानों से आव्हानित होकर एक दिन की कमाई को तिलांजलि देकर एक जुट होती हैं, एकजुट होने का भाषण सुनती है, एकजुट होकर एकजुट होने के नारे लगाती है और एकजुटता से मुक्त होकर शाम को जैसे ही घर पहुँचती हैं, पति परमेश्वर को डंडा लिए तैयार बैठा पाती है। चूँकि एकजुटता को वह भाषण स्थल पर ही छोड़ आई है, इसलिए दारू के लिए पैसे ना देने पर पति के हाथों पिटते वक्त दिन भर एकजुटता और नारी मुक्ति का भाषण पिलाने वाला कोई नेता उसे बचाने नहीं आता।
इस तरह महिला अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस, निर्विकार भाव से, अगले साल फिर आने के लिए लौट जाता है।

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

टुन्न होकर गरियाने का पर्व

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट

लो फिर चन्दा खाने का त्यौहार आ गया।
जी हाँ, होली को हमने हमेशा सामूहिक रूप से चन्दा खाने के त्यौहार के रूप में ही देखा है। बचपन में मोहल्ले के सारे चन्दा खाऊ इकट्ठा होकर घर-घर जाकर खाने लायक चन्दा इकट्ठा करते और फिर बाकायदा बजट बनाकर उसे खाते। कुछ चन्दा इसे उगाहने की मुहीम के दौरान खाया जाता, कुछ झाड-झँकाड़ इकट्ठा करने के दौरान, और कुछ ऐसे ही चलते -फिरते कभी सेव-चूड़ा कभी समोसा-कचौड़ी, के भक्षण में उड़ाया जाता। जब मर्ज़ी हो तब नाश्ते-पानी के लिये चन्दे को निजी बपौती के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता। कुछ चन्दा होली के दिन खाने-पीने लिये रखा जाता और कुछ होली के बाद के लिये भी बजट में प्रावधानित होता जिसे सिनेमा वगैरह देखने और इन्टरवल में ठंडा यानी कोकाकोला वगैरह पीने में उड़ाया जाता। कुछ नेता किस्म के, या नेता किस्म के मोहल्लेदारों के बच्चे षड़यंत्रपूर्वक बजट के एक हिस्से को सबसे बचाकर सुरक्षित रखते व चुगलखोर लड़कों से लुका-छुपाकर पान-बीड़ी-सिगरेट का शौक भी फरमा आते, और चुगलखोर लड़कों की जासूसी दक्षता के कारण पकड़ा जाने पर माँ-बाप से धना-धन पिटते भी थे। इस तरह चन्दे के तीन-चौथाई हिस्से को खाने के पवित्र अनुष्ठान में ठिकाने लगाया जाता और एक चौथाई हिस्से से होलिका मैया का दहन किया जाता।
मोहल्ले के जिस स्वयंसेवक को होली से सबंधित आवश्यक खरीददारी की जिम्मेदारी दी जाती वही, जनता से एकत्रित उस सामाजिक धन से कुछ ना कुछ चुंगी कर लेता। हर सामग्री पहले आधी अपने घर में पहुँचाई जाती फिर सार्वजनिक उपयोग के लिये लाई जाती। यह सब जीवनचर्या के एक महत्वपूर्ण कला-कौशल की तन्मयतापूर्ण साधना की तरह का क्रियाकलाप होता, बच्चों की अम्माएँ बच्चों में इस प्रतिभा के होते विकास को देखकर भारी खुश होतीं और उनके सुनहरे भविष्य की कामना करतीं।
दरअसल होली का त्यौहार कम्बख्त एक ऐसा त्यौहार है जो हरेक को बचपन से ही भ्रष्टाचार के हुनर की सघन ट्रेनिंग देता है। भ्रष्टाचार कैसे सम्पन्न किया जाय, सार्वजनिक माल को बाप का माल कैसे समझा जाए, सामाजिक धन का बहादुरी से गबन कैसे किया जाए, सारे तौर तरीके बड़ी खूबसूरती से सिखाता है। बहुत से गुणी बच्चे बड़े होकर भी बचपन में सीखे इन गुरों को सफलतापूर्वक आजमाते हैं और जहाँ मौका मिलता है वहाँ अपनी इस काबिलियत का कुशलतापूर्वक प्रदर्शन करते हैं। कुछ अनुभवी शख्सियतें तो लड़कपने में होलिका दहन के इस कर्मकांड से मिले तमाम बेशकीमती अनुभवों को राष्ट्रीय-अन्तर्राट्रीय स्तर पर उपयोग भी करते हैं और नाम और दाम भी कमाते हैं।
परम्पराएँ आखिर परम्पराएँ हैं, जिनका हम भारतीय शिद्दत से निर्वहन करते हैं। मगर लाख टके का सवाल है कि आखिर होली जलाने के लिए चन्दा उगाहने और खाने की यह महान परम्परा चली कहाँ से आई ? हिरण्यकश्यप ने तो भक्त प्रहलाद और होलिका के लिए चन्दा इकट्ठा किया नहीं होगा जो उन्हें जलाने के अभिनव प्रयोग को अन्जाम दिया जा सके! और चलो माना कि छिछोरपन में आकर उसने, उन दोनों को जलाने के अपने आतिशी कार्यक्रम के तहत कंडों-लकड़ियों के लिए चन्दा कर भी लिया हो, लेकिन शर्तिया उसने चन्दा खाया तो हरगिज़ ही नहीं होगा! दुष्ट भले ही वह कितना भी था, ऐसा दो कौड़ी का टुच्चा तो हिरण्यकश्यप हो ही नहीं सकता था, जो इतने बड़े राजपाट के बावजूद टुच्चे से चन्दे पर नीयत रखे। इसलिए इतिहासकारों के समक्ष यह एक खोज का विषय है कि होली जलाने की परम्परा के साथ चंदा बटोरने और उसे उदरस्थ करने की परम्परा हमें आखिर मिली कहाँ से, जिसकी लीक पर चलते हुए हमारे देश में आज भी अनेक चन्दा खाऊ पैदा हो रहे हैं।
मुझे शक हैं कि ज़रूर यह बदमाशी हिरण्यकश्यप के दरबारियों ने की होगी। महाराज के नाम पर चन्दा इकट्ठा कर खा गए होंगे कम्बख्त। वही परम्परा उनके बच्चों के बच्चों, बच्चों के बच्चों से होती हुई धीरे-धीरे पूरे देश में छा गई होगी। अब तो चन्दा चाहे किसी कारथ हो उसे खाए बिना कोई मनोरथ पूरा ही नहीं होता। लोग हर सामाजिक-असामाजिक कार्य का चन्दा खाने में श्रद्धा का पूर्ण भाव दर्शाते हैं। किसी गरीब के कफन के लिये भी अगर चन्दा किया जाए, जो कि इस बदनसीब देश में अक्सर करना पड़ता रहता है, तो चंद शातिर चन्दा खाऊ उसे भी खाने से नहीं चूकते।
होली से जुड़ी कुछ अभूतपूर्व परम्पराएँ और भी हैं जिनके अपरम्परानुमा होते हुए भी उनके बिना होली मनती ही नहीं है। भँगेड़ियों को देखो ! ऐसे रंगबिरंगे त्योहार पर भी तमाम काले-पीले होकर भाँग-घोटा चढ़ाकर तरन्नुम में आय-बाय बके चले जाते हैं, या देसी ठर्रा चढ़ाकर नालियों में लोटते हुए नज़र आते हैं। हिरण्यकश्यप तो बेचारा इतिहासकारों द्वारा शराब पीता कभी धरा नहीं गया, ना ही वो कभी नालियों में लोटता हुआ ही पाया गया! भक्त प्रहलाद भी बेचारा गऊ किस्म का भक्त रहा है! फिर होली पर टुन्न होकर गरियाने की यह परम्परा किसने शुरू की। यह नौटंकी भी लगता है उन्हीं दरबारियों की खड़ी की हुई रही होगी। इधर हिरण्यकश्यप का पेट फटा होगा उधर वे सात दिवस के राष्ट्रीय शोक की छुट्टियों का फायदा उठाकर कलारी में जा बैठे होंगे। वही से प्रारंभ होकर यह परम्परा लगता है पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हुई हम तक आ पहुँची है, इसीलिए होली पर दारू पीकर दंगा करना एक अनिवार्यता बन गई है।
रंग-गुलाल की परम्परा और किसी ने भी चलाई हो, हिरण्यकश्यप ने तो हरगिज़ नहीं चलाई होगी! जिसकी बहन धोके में जल मरी हो वह क्यों उल्लास में रंग-गुलाल खेलेगा ? फिर वह तो खुद भगवान नरसिंह के हाथों मारा गया था, उसे मौका ही कहाँ मिला रंग-गुलाल उड़ाने का। तब फिर बचा प्रहलाद, परन्तु जिसके बाप का पेट फाड़ डाला गया हो वह उसकी अँतड़ियाँ समेटेगा या पिचकारी लेकर फुर्र-फुर्र रंग उड़ायेगा ? जिसकी बुआ ताजी-ताजी जल कर मरी हो वह उसके ‘फूल’ चुनेगा या रंग-गुलाल खेलेगा ? तब फिर किसे ऐसी हिमाकत सूझी जो हमें आज तक झेलनी पड़ रहीं है।
अजीब परम्परा है, जिस प्रकरण में दो-दो जाने गई हों उसकी पृष्ठभूमि में लोग ‘गुजिया’ बनाकर खा रहे हैं। मिठाईयाँ बनाकर मोहल्ले भर में बाँट रहे हैं। गजब की असंवेदनशीलता है ! लोग, एक औरत के जल मरने की खुशी में सराबोर होकर एक-दूसरे के गले मिल रहे हैं। हँसी-मजाक, ठट्ठा कर रहे है। हुरियारे बनकर झुँड के झुँड ढोल-ढमाके के साथ नाचते-गाते शहर भर में गश्त सी लगा रहे हैं, दूसरों को डरा रहे हैं, कि स्सालों सम्हलकर रहना, वर्ना खैर नहीं। अभी होली जलाई है समय आया तो तुम्हें भी जला देंगे। प्रहलाद की पार्टी तक ने होलिका दहन और हिरण्यकश्यप वध के बाद भी कभी ऐसा जुलूस न निकाला होगा........ । फिर हम क्यों बावले हुए जाते है ?
ठीक है, अभी तो खैर होली सर पर आ खड़ी है, परम्परा है, मना लीजियें। चन्दा भी खाइये, भाँग-घोटा, ठर्रा भी चढ़ाइये, खूब गाली-गलौच करिये, रंग में सराबोर हो जाइये, मिठाई-पकवान उड़ाइये, पड़ोसनों के गले लगिये, परन्तु भाइयों उस बदमाश को ज़रूर ढूँढ निकालिये जिसने होली की परम्परा के नाम पर चन्दा खाने, भाँग खाकर नालियों में लोटने, शराब पीकर गाली-गलौच करने, माँ-बेटियों के साथ बदतमीजी करने की अपरम्पराएँ चला दी हैं। उसे ढूँढकर लाओं उससे एक और जरूरी बात पूछना है कि ‘‘गटर के पानी में डुबकी लगवाकर फिर ‘‘बुरा ना मानो होली है’’ कहने की परम्परा आखिर किसने शुरू की। परम्परावादियों के पास कोई जवाब हो तो कृपया होली के पहले मुझे बताने का कष्ट करें।
 
समुचित संपादन के साथ दिनांक 28 फरवरी 2010की नईदुनिया साप्ताहिक पत्रिका के होली विशेषांक में प्रकाशित।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

उल्लू के पट्ठों बी.टी. बैगन खाते हो या नहीं ?

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
मास्टर जी बेहद गुस्से में थे। देश भर में घूम-घूमकर सबको डाँटते फिर रहे थे- तुम्हारे बाप ने कभी खाया है बैगन! खाया हो तो जानो कि बी.टी. बैगन का स्वाद क्या होता है। पागल हो तुम सब के सब, दिमाग का इलाज कराओ अपने। मेरी! मेरी नीयत पर शक कर रहे हो! मैं दूध का धुला जनता का सच्चा हितैशी, मुझे मोनसांटो का ऐजेंट समझते हो! समझते हो मैंने मल्टी नेशनल कम्पनी से पैसे खा लिए। समझते हो तो समझो, क्या उखाड़ लोगे! बिना बात एक अच्छी पौष्टिक गुणकारी सब्ज़ी का विरोध कर रहे हो, लगे हुए हो पटर-पटर करने में। दो कौड़ी के पब्लिक फोरम को संसद समझ रहे हो, सिर पर ही चढ़ते जा रहे हो। मगर मैं किसी के दबाव में आने वाला नहीं हूँ ? तुम दर्जन भर बुद्धिजीवी-साइन्टिस्ट तो क्या पूरा देश भी एकजुट होकर ऐलान करे कि बी.टी. बैगन नहीं खाएंगे, तब भी हमने तो कसम खा रखी है कि चाहे कुछ भी हो जाए देश के खेतों में उसे पहुँचा कर रहेंगे, एक-एक को बी.टी. खिलाकर ही मानेंगे।
कैसे अनपढ़ हो तुम लोग! गुरबक, जाहिल गँवार हो! कुछ समझते ही नहीं। तुमसे तो कुछ शोध-अनुसंधान होता नहीं, इतनी मेहनत करके किसी दूसरे ने कुछ बनाया है तो उसका तो खयाल करो। उसके पेट पर क्यों लात मार रहे हो! थोड़ा देख लो आजमाकर! ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, पारम्परिक फसलें खत्म होंगी, खेतों का सत्यानाश होगा, कर्जे में डूब जाओगे, मरोगे पाँच-दस हज़ार, तो क्या हुआ, चलता है। अपन हिन्दुस्तानी है, मोटी चमड़ी वाले। अपना तो काम ही है मरना। अपन नहीं मरेंगे तो क्या अमरीकी मरेंगे! अपन ने अगर बी.टी. बैगन नहीं चखा तो उन्हें पता कैसे चलेगा कि उनका अनुसंधान सफल हुआ कि नहीं। बैगन-भाजा, बैगन-भरवॉ, बैगन का भुरता, ये तो तुम्हारी प्रिय डिशें हैं, इनके आगे बस बी.टी. लगाना है, इतनी सी बात है। मगर तुम्हीं यदि रायता फैलाओगे तो देश की छवि कितनी खराब होगी। हमारी छवि कितनी खराब होगी। हमारी सरकार की छवि की तो दुनिया भर में मट्टीपलीत होकर रह जाएगी। सारी दुनिया थूकेगी हमारी सरकार पर, कहेगी-जो सरकार अपनी जनता को बैगन जैसी सड़ी सी चीज़ जबरदस्ती नहीं खिला सकती, उसको विकास करने का कोई हक नहीं, कर्ज़े बाटने की क्या ज़रूरत है! हम तो बेमौत मारे जाएंगे। देखते हैं कि कैसे तुम लोग नहीं खाते हो बी.टी. बैगन! ना एक-एक के हलक में इसे ठूसा तो हमारा नाम भी माट्साब नहीं।
फिलहाल थक-हारकर माट्साब ने डाँट-डपट कर देश-वासियों को बी.टी. बैगन खिलाने की अपनी मुहीम कुछ दिनों के लिए मुल्तवी की है, बमुश्किल वे मिनिस्ट्री के दूसरे गैर ज़रूरी कामों के लिए समय निकालकर अपने दफ्तर को लौटे हैं। इधर बैगन से पहले ही से परेशान जनता हैरान होकर सोच रही है कि आखिर यह आदमी इस बुरी तरह हाथ धोकर बी.टी. बैगन खिलाने के पीछे क्यों पड़ा हुआ है। वैसे ही इस बेगुण-बेस्वाद तरकारी के मारे जीना हराम है। पतियों से परेशान पत्नियाँ बदला लेने के लिए जब चाहे तब इस मनहूस को बघारकर धर देती है थाली में। कम्बख्त इस कदर बादी करता है कि गैस-अफारे से पूरा देश परेशान है, और ये माट्साब बी.टी. बैगन का उत्पादन बढ़ाकर किसानों को मालामाल करने की झक लिए बैठे हैं, जबरदस्ती इसे देशवासियों के हलक में उतारने पर उतारू हैं।
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि माट्साब साल-छः महीने बाद फिर कुछ और ब्रम्हास्त्र और मिसाइलें लेकर मैदान में उतरेंगे, एक-एक को ठीक करने के लिए। हो सकता है पुलिस-मिलिट्री भी साथ में लेकर आएँ और दादागिरी से पब्लिक मंचों को हथियाकर कहें- अब बोलों उल्लू के पट्ठों बी.टी. बैगन खाते हो या नहीं ?

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

मुम्बई का डॉन कौन

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
च्याइला! अपून एक-एक के कान के नीचे बजाएगा, कोई भंकस नहीं मँगता है। हिन्दी साइडर लोग को वार्निंग करके बोलता है कि इधर हँसने का तो मराठी में, रोने का तो मराठी में, गाना गाने का, खाना खाने का, सब मराठी में। कोई भी महाराष्ट्र के बाहेर का आदमी होय मराठी मेंइच सब काम करने का। मराठी मानूस के ऊपर पिच्छू बासठ साल से ‘हिन्दी’ में चल रहा जुलुम अब बंद होने कुइच मँगता है।
इधर अपून नक्की करके दियेला है कि चौपाटी पर दरियाव का लाट का जो आवाज आता है वो भी मराठी मेंइच आने कू मँगता है। उधर गेटवे ऑफ इन्डिया पर कबूतर लोग का लो फड़फड़-फड़फड़, गूटरगू-गूटरगू का आवाज आता है वो भी मराठी मेंइच मँगता है। मिल का भोंपू, लोकल ट्रेन का खड़-खड-खड़:फड़-फड़-फड़, मोटार, गाड़ी, ऐटो, विमान सबका आवाज मराठी में आने कोइच मँगता है। नई आएगा तो अपून अख्खा मुम्बई को आग लगा डालेगा।
पिच्चर जो इधर निकालता है सब मराठी मेंइच निकालने को मँगता है। अमिताच्चन को बोलने का है तो मराठी में बोलना मँगता है, शारुक को हकलाने का है तो मराठी मेंइच हकलाने को मँगता है । पिच्छू का अख्खा पिच्चर मदर इंडिया, मुघलेआझम, पाकीजा, सब अभी मराठी में ट्रांसलेट करने को मँगता है। शोले, बोले तो मराठी में डब करके दिखाने का। धर्मेन्दर का डायलाग अइसा होने को मँगता है - वसंती, ह्या कुत्र्यांच्या समोर नाचू नकोस! नया नया सब पिच्चर अभी मराठी में निकालने का, नई तो सब थेटर का पड़दा हम लोग राकेल डालकर फूँक डालेगा।
ये सब जो फाईस्टार में फैशन शो वगैरा में सब अउरत लोग नागड़ेपना चलाता है, अइसा अभी हम लोग बर्दाश्त नहीं करेगा। फैशन शो करने का है तो खूब करो पन लड़की लोग मराठी बाई के जैसा नउवारी लुगड़ा डालकर रेंप पर चलने कू मँगता है। उधर बिल्कुल गजरा-बिजरा डालकर रापचिक मराठी कल्चर दिखने कू मँगता है।
भाईगिरी, गुंडागिरी, टपोरीगिरी, मवालीगिरी जितना मर्जी करो वांदा नई, पन ये सब अगर हिन्दी भाषे में किया तो खबरदार! अख्खा मुम्बई का सेठ लोग कू जो मर्जी वो करने का, मिल खोलने का, शट डाउन-तालाबंदी करने का, गरीब मजदूर लोग का खून चूसने का, जोर-जुलुम सब करने का, पन ये सब हिन्दी में बिल्कुल चलने को नई मँगता। कोई भी मजदूर का हक अगर ‘हिन्दी’ में मारा तो हम उसको ‘मराठी’ में मार-मारकर हाथ-पाँव तोड़ डालेगा।
सब च्यॉनल वाला प्रोग्राम, नेशनल टी.व्ही. च्यॉनल, ऑल इंडिया रेडियो सब हमकू मराठी में दिखने-सुनने कू मँगता है। कुछ भी करने का, इन्टरप्रेटर लगाने का, ट्रांसलेटर लगाने का, स्टूडियों में भलेइच आवाज हिन्दी में एयर होए मगर इधर मुम्बई में आकर मराठी मेंइच सुनाई देने को मँगता है।
अख्खा शाइर लोग, पोएट अउर रायटर लोग मुंबई में अड्डा जमाके, मराठी का खाके, मराठी का पीके, मराठी हवा में श्वास लेके हलकट, हिन्दी में लिखता है। अभी हम बोलता है सब साला मराठी में लिखना शुरु करने का। हिन्दी पोयट्री, कहानी, कादम्बरी सब मराठी में लिखने का। गझल मराठी में बोलने का। इधर राजभाषा का अख्खा कारीक्रम हिन्दी में कर-करके तुम लोग दिमाग का दही करके रखेला है। अभी अइसा नहीं चलने कू मँगता है। हिन्दी डे का पखवाड़ा का सब प्रोग्राम मराठी में करने को मँगता है, नई तो मराठी में मार खाने कू तैयार रहने कू मँगता है।
अभी सब हिन्दी साइडर लोग को फायनल बोलता है, अख्खा इंडिया होएगा तुम्हारा राष्ट्र, अपून का राष्ट्र बोले तो महाराष्ट्र! हिन्दी होयेगा तुम्हारा राष्ट्रभाषा अपून का राष्ट्रभाषा बोले तो मराठी है। अभी अपून को अभी के अभीच्च राष्ट्रगान मराठी में ट्रांसलेट करके मँगता है, तिरंगा भी अख्खा के अख्खा मराठी कलर में तैयार करके मँगता है। जब 'हमारा' तिरंगा झेंडा मराठी में फर्र-फर्र बोलके फहराएगा तो हम सब मराठी मानूस लोग एक स्वर में अपना राष्ट्रगान मराठी में गाएँगा - ज़न गण मन अधिनायक........ और तुम सब हिन्दी साइडर लोग अगर मराठी का जागा में हिन्दी में सूर मिलाया तो कान के नीचे एक रखके देगा, फिर बोम मारते बैठने का हिन्दी मेंइच। मुम्बई का डॉन कौन ? अपून ! एक एक को बोल के रखता है भंकस नई करने का।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

क्रिकेट की मण्डी में कौन आएगा बिकने।

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट 
अब जाकर मेरे सामने सब्ज़ियों-भाजियों का दयनीय पहलू उद्घाटित हुआ है। सब्ज़ी मण्डी की खुली नीलामबोली में दलाल आढ़तियों द्वारा जब कभी भटे-टमाटरों की बोली नहीं लगाई जाती तो उनके नाज़ुक दिलों पर क्या गुजरती होगी, मुझे अब समझ में आया है, जब पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आई.पी.एल. क्रिकेट मण्डी से बिना नीलाम हुए वापस लौटना पड़ा।
आई.पी.एल. की क्रिकेट मंडी में पाकिस्तानी खिलाड़ियों की दशा सड़े टमाटरों से भी ज्यादा गई-गुज़री हो गई, क्योंकि सड़े टमाटरों को तो फिर भी कोई न कोई सॉस-चटनी बनाने वाला खरीद ही लेता है इन्हें तो किसी ने कौड़ी का भाव नहीं दिया। हद होती है बेदर्दी की! मुझे तो उनके प्रति घनघोर सहानुभूति हो रही है क्योंकि बेचारों को बिक ना पाने के कारण अपने देश में ना जाने कितने जूते खाना पड़ रहे होंगे, जबकि इसमें उन बेचारों की रत्ती भर भी गलती नहीं रही! भटे-टमाटर नहीं बिक पाते तो क्या इसमें उनकी गलती होती है! वे धुरंधर तो अपनी तरफ से बढ़िया नव्हे-धुले, क्रीम-पाउडर लगाकर शिद्दत के साथ बिकने के लिए तैयार खड़े थे। अच्छे हट्टे-कट्टे मजबूत और खूब मेहनती तो है ही, बिकने का जज़्बा भी कूट-कूटकर भरा हुआ था। कहीं कोई दिक्कत थी नहीं। जो कोई भी मालिक नीलामी में हाथ मार लेता, वे सिर नीचा कर दुम हिलाते हुए उसी के पीछे जाकर जा खडे़ हो जाते। मगर अफसोस कि बेचारों को हिन्दुस्तानी रोकड़े पर ऐश करने का सौभाग्य नहीं मिल पाया। क्रिकेट घरानों के मालिकों ने उन्हें पिच पर झाड़ू लगाने के काबिल तक नहीं समझा। सब के सब उन्हें छोड़कर ऐसे उठ गए जैसे उन्हें छूत का कोई गम्भीर रोग हो गया हो।
मैंने सुना है कि पाकिस्तान की जनता खास तौर पर क्रिकेटरों के मामले में काफी संजीदा है। बढ़िया भारी-भरकम जूते-चप्पल और पर्याप्त साइज़ के बोल्डर-पत्थरों के साथ हर वक्त आक्रामक मुद्रा में तैयार रहती है और बात-बात में इस प्राणघातक सामग्री का उदारतापूर्वक इस्तेमाल भी कर लेती है। क्रिकेटरों के चाहे जितने घर हों और पाकिस्तान की चाहे जिस भी गली में हों, उन सबमें आग लगाने के लिए पर्याप्त ईंधन और दियासलाई की व्यवस्था भी हमेशा चाक-चौबंद रखी जाती है। भले ही घर में चूल्हा जलाने के लिए मट्टी का तेल ना हो मगर हारने पर क्रिकेटरों के घर फूँकने के लिए तमाम ज्वलनशील पदार्थों की जुगाड़ यहाँ-वहाँ से कर ही ली जाती है। चूँकि उनके लाड़ले क्रिकेटर अपने-आपको आई.पी.एल. की मंडी में बेच नहीं पाए हैं तो पाकिस्तानी अवाम उनकी इस शर्मनाक असफलता पर अपने आप को लुटा-पिटा, ठगा हुआ महसूस कर रही है और अब वह काफी दिनों से जमा आग्नेयास्त्रों का जखीरा उन पर किस तरह से इस्तेमाल करेगी कुछ कहा नहीं जा सकता।   
बचपन से सुनते आएँ हैं कि हारने पर, और खासतौर से हम पड़ोसी काफिरों से हारने पर पाकिस्तानी सरकार द्वारा क्रिकेटरों को लाइन में खड़ाकर कोड़ों का प्रसाद दिया जाता है। अब चूँकि पाकिस्तान में सैनिकों की तानाशाही की जगह जरदारी का लोकतंत्र हैं, इसलिए बाज़ार से कन्साइन्मेंट रिजेक्ट होकर वापस आ जाने पर  कोड़े तो शायद ना पड़ें, लेकिन घर में क्रिकेटरों  को बीवियों की ओर से जूते-चप्पल शर्तिया घलने वाले हैं, और सड़क चलते शोहदे पत्थर भी मारेंगे सो अलग।
गली-गली में फिकरे कसे जाएँगे, क्रिकेटरों की बीवियाँ हाथ नचा-नचाकर मोहल्लेभर के सामने चिल्लाएँगी-अरे नासपीटे, चवन्नी भर की कीमत नहीं थी तो खड़ा क्यों हुआ नीलामी में जाकर! वह भी दुश्मनों के मुल्क में, कम्बख्त-मारे ने नाक कटवा दी मुल्क की! कोई बीवी चिल्ला-चिल्लाकर कहेगी-अरे निगोड़े कोई खरीद नहीं रहा था तो पटकनी क्यों नहीं दी एखाद को! लड़-मरके अपना हक लेना नहीं आता तुझे ! कैसा पाकिस्तानी है तू ? माँ-भेन की गालियाँ नहीं आतीं तुझे, देता मो भर-भरके कम्बख्तों को! कोई शरीफ बीवी कहती-अजी इतना तो कह ही सकते थे, ले लो-ले लो, हम फ्री में ही खेल लेंगे! न खरीदता कोई, ना देता पैसा, खाने खेलने पर तो ले सकता था टीम में! दौड़ दौड़कर बॉल ही उठा दिया करते फोर बाउन्ड्री से! कोल ड्रिंक, पानी ही पिला देते खिलाड़ियों को! मगर तुमने कोई कोशिश ही नहीं की! बस, न बिके तो मुँह उठाकर वापस चले आए। थोड़ा तकादा तो लगाना था।
पूरा पाकिस्तान ग़मज़दा है कि देखो हमारे बिकाऊ माल को न खरीदकर भारतीयों ने हमारे क्रिकेटरों की कैसी छीछालेदर की है ! कैसा अन्याय-अत्याचार किया है। इससे बड़ी बेइज्ज़ती तो कोई हो ही नहीं सकती कि हमारे खिलाड़ी बिकने के लिए उतावले हैं मगर कोई खरीददार ही नहीं है। पाकिस्तानी सरकार भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कह रही है कि हमारे माल की ऐसी उपेक्षा अच्छी नहीं-शान्ति स्थापित करने की कोशिशों में बाधा हो सकती है। भविष्य में यदि वह विश्व समुदाय के सामने दहाड़ें मार-मार कर रोए और शिकायतें करे कि देखो भारत ने हमारे खिलाड़ियों को ना खरीदकर हमारे मानव अधिकारों का हनन किया है तो कोई बड़ी बात नहीं। पाकिस्तानी सेना और आतंकवादियों के लिए भी एक नए मुद्दे ने जन्म लिया है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यदि किसी मण्डी में ना खरीदा जाए तो क्या एक्शन लिया जाए ! भारत में आतंकवादी हमले तेज किये जाएँ या सीमा पर गोलीबारी चालू की जाए।
जो भी हो क्रिकेट घरानों की इस अहमकाना हरकत से हमारी ईमानदार छवि को गहरा धक्का लगा है। दुनिया जान गई है कि हम बिकाऊ माल की खरीददारी में भी किस कदर पार्शलिटी करते हैं। यही हरकतें रहीं तो आई. पी. एल. की क्रिकेट मण्डी में कौन हमारे पास आएगा बिकने के लिए ?   

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

चेन खिच गई

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट

एक बार मेरे मोबाइल का नेटवर्क किन्हीं दूसरे मोबाइलों के नेटवर्क से गुथ गया। जो चर्चा सुनाई दी वह हुबहू पेश है:-
‘‘ऐ जी, सुनो जी, आज मेरी भी खिच गई !’’
‘‘तुमसे कितनी बार कहा है कि ऊँची हिल की सैंडल मत पहना करो, सुनती ही नहीं हो!’’
‘‘ऊँची हिल की कहाँ पहनी, स्लीपर पहनी हुई थी टायलेट वाली!’’
‘‘मैंने यह भी कितनी बार कहा है कि फालतू इधर-उधर मत भटका करो!’’
‘‘मैं कहाँ इधर-उधर भटकी, अब क्या घर के सामने भी ना टहलूँ ?’’
‘‘घर के सामने ऊबड़-खाबड़ गढ्ढों में टहलोगी तो खिचेगी ही।’’
‘‘कोई नहीं, सरला भैंजी के घर के सामने बढ़िया चिकना सीमेंट कांक्रीट रोड़ है, उनकी तो उसपर भी खिच गई!’’
‘‘वो भी ऊँची हिल की सैंडल पहनती होंगी!’’
‘‘नहीं, वे तो बेचारी नंगे पॉव मंदिर जा रहीं थी तब खिच गई उनकी तो।’’
‘‘क्या ज़रूरत थी जाने की जब पता है कि मंदिर की सीढ़िया बहुत खराब और टूटी फूटी हैं!’’
‘‘उससे क्या होता है, विमला भैंजी की तो शॉपिंग मॉल की सीढ़ियों पर खिची थी!’’
‘‘तुम सब औरतों की यही आदत होती है, फालतू यहाँ-वहाँ भटकती फिरती हो फिर खिंच जाती है तो रोने बैठ जाती हो।’’
‘‘फालतू बातें मत करो, कुछ कर सकते हो तो करो।’’
‘‘अब मैं यहाँ बैठे-बैठे मोबाइल से क्या करूँ ? घर पर होता तो मूव मल देता!’’
‘‘मूव मलने से क्या चेन वापस मिल जाती ?’’
‘‘चैन मिल जाता है, हिन्दी भी ठीक से नहीं बोल सकती!’’
‘‘अरे मैं चेन की बात कर रही हूँ, चेन खिच गई मेरी!’’
‘‘क्या ? चेन खिच गई ? बता क्यों नहीं रही हो इतनी देर से! मैं समझ रहा था पॉव की नस खिच गई है तुम्हारी!’’
‘‘तुम तो यूँ ही हरकुछ-हरकुछ समझ लेते हो! अब तो कुछ करो!’’
‘‘पहले बताओ कब गई, कैसे गई, कौन सी गई.......!’’
‘‘अरे बताया तो सुबह-सुबह पपी को बाहर सुसु करा रही थी, एक छोकरे ने आपका पता पूछा और गले से आधी चेन खीच कर भाग गया!’’
‘‘आधी क्यों ? पूरी नहीं चाहिए थी क्या उसको ?’’
‘‘आधी मेरे पास रह गई!’’
‘‘कौन सी गई दस तोले वाली कि बीस तोले वाली ?’’
‘‘तौली तो थी नहीं कभी.....!’’
‘‘ऐसे कैसे नहीं तौली, फालतू बात करती हो। बिना तौले कहीं चेन मिलती है!’’
‘‘ये तो पता नहीं, तुम्ही ने लाकर दी थी!’’
‘‘बताओ कैसा था छोटा, लम्बा, ठिगना, मोटा, गोरा, काला, मोटर साइकिल कैसी थी, काली, सफेद, लाल, पीली, बताओं मुझे, अभी फोन खड़काता हूँ। पूरा प्रशासन हिलाकर रख दूँगा। मजाल है, एक पुलिस अफसर की बीवी की चेन खिच जाए!’’
‘‘भूल रहे हो, अब तुम रिटायर हो गए हो!’’
‘‘तो क्या हुआ ?’’
‘‘तुम कुछ हिला-हिलू नहीं सकते। जैसे आम आदमी की बीवी की खिचती है वैसी तुम्हारी बीवी की खिंच गई।’’
‘‘तेल लेने गया आम आदमी, तुम तो बताओ वह मोटी वाली गई कि उससे पतली वाली कि उससे पतली वाली कि एकदम पतली वाली ?’’
‘‘अरे आहां, मेरे पिछले बर्डे पर तुम खरीद कर लाए थे ना वो चपटी वाली, वही थी!’’
‘‘चपटी वाली !’’
‘‘हा वही चपटी वाली।’’
‘‘अच्छा...........वोऽऽऽऽऽह, वो चपटी वाली.........’’
‘‘हाँ वही, वो जो मुझे पटाने के लिए तुमने गिफ्ट में दी थी!’’
‘‘हाँ हाँ याद है....... आधी बच गई ना..... चलो जाने दो.....क्या करना है!’’
‘‘करना क्या है, पुलिस में रिपोर्ट डालना है और क्या! ’’
‘‘अरे छोड़ो, क्या करना है, सब बदमाश है साले वहाँ आजकल !’’
‘‘अरे वाह, करना क्यों नहीं है, हराम की थी क्या!’’
‘‘ऊँहू...... वह बात नहीं है, जाने दो......कौन पुलिस के झँझट में पड़े!’’
‘‘अरे क्यों जाने दो........! तुम तो एफ.आई.आर. लिखवाओ।’’
‘‘अरे क्या करना है, आधी ही तो गई है, जाने दो!’’
‘‘ऐसे कैसे जाने दो, चोर के बाप का माल है क्या ?’’
‘‘अरे अब छोड़ो भी तुम्हें दूसरी ला देंगे।’’
‘‘अरे दूसरी भी ले लूँगी, पर इसे भी नहीं छोडूँगी!’’
‘‘अरे जाने भी दो, ऐसी ही थी बेकार!’’
‘‘क्यों बेकार क्यों, तेइस कैरट शुद्ध सोने की चेन थी मेरी वो, मैं तो नहीं छोड़ने वाली!’’
‘‘अरे कह तो दिया बेकार थी, लगी हो जबरन फकर-फकर करने! दस रुपल्ली में हर माल वालों से खरीदी थी, सौ आने शुद्ध नकली चेन थी, हाँ नहीं तो !’’
‘‘क्या कहा ? बेईमान कहीं के, धोकेबाज़! सारे पुलिस वाले ऐसे ही होते है, धोकेबाज़। तुमने शादी भी मेरे माँ-बाप को धोका देकर की! बच्चे भी धोका देकर पैदा कर लिए। घर आओ आज तुम......बताती हूँ। नकली चेन के बदले ना तुम्हें असली जूतों का स्वाद चखाया तो मेरा नाम नहीं!’’
दोनों मोबाइल बंद हो गए। उसके बाद कौन जाने क्या हुआ।

बुधवार, 13 जनवरी 2010

यह साम्राज्यवादी थपथपाहट

अभिव्यक्ति के 11 जनवरी के अंक में पढ़िए यह साम्राज्यवादी थपथपाहट

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट

अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को अपने परिवार का सदस्य बताया है। उनकी पत्नी ‘मिशेल’ और बच्चे एक ‘सरदारजी’ को अपने बीच में पाकर कैसा महसूस करेंगे यह तो जिज्ञासा का विषय है, मगर भारतीय होने के नाते मेरे लिए तो यह बड़ी खुशी की बात है। यूँ तो ओबामा स्वयं एक अमरीकी माता और केन्याई मुसलमान पिता की संतान हैं, और अब उनके परिवार का एक सदस्य पगड़ी‍‌‍धारी भारतीय सरदार निकल आया है। दुनिया के लिए यह एक बड़े आश्चर्य की घटना हो सकती है क्योंकि बेसिर-पैर की ही सही ‘धर्मनिरपेक्षता’ का अखंड ठेका तो पूरी दुनिया में सिर्फ भारतीयों के ही पास है, अमरीका में यह परम्परा कब पलायन कर गई, किसी को पता ही नहीं चल पाया।
नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने की अमरीकी कूट-पॉलिसी पर ओबामा के सत्तारूढ़ होने के बाद क्या परिवर्तन आया है इसका अद्यतन ज्ञान तो मुझे नहीं है मगर मुझे पूरा भरोसा है कि वे भी यदि भारत के प्रधानमंत्री होते तो ओबामा अपनी वैश्विक धर्मनिरपेक्षता का परिचय देते हुए उन्हें भी अपने परिवार का सदस्य बताते। मोदी क्या, यदि उनसे निचले दर्जे का कोई और भी नेता होता तो भी ज़रूर ओबामा यही करते। ऊपर वालों में अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण अडवाणी, यहाँ तक कि वकैया नायडू भी होते तब भी ओबामा के बयान में कोई परिवर्तन नहीं आता, यह बात पक्की है। इनकी छोड़िए, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, पासवान, मायावती बहन, ज्योतिबसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य, इनमें से कोई भी यदि भारतीय प्रधानमंत्री होता तब भी ओबामा यह करने में नहीं हिचकिचाते, मुझे पूरा भरोसा है।
भारतीय वामपंथियों ने राज-पाट के मामले में वह दर्जा हासिल कर लिया है कि एक धुर दक्षिणपंथी ताकत को उन्हें भी अपने परिवार का सदस्य बताने में कोई दिक्कत नहीं होती यदि उनका प्रधानमंत्री होता। जहाँ तक मेरी व्यक्तिगत पसंद का सवाल है, कोई माने या ना माने, जब ओबामा मायावती बहन को अपने परिवार का सदस्य बनाते तब मुझे जितनी खुशी होती वह डॉ. मनमोहन सिंह या किसी और के लिए होने वाली खुशी से लाख गुणा ज़्यादा होती। इसी बहाने बहनजी अपना एक पुतला व्हाइट हाउस में भी ठोक आतीं और अपनी ओबामा परिवार की सदस्यता पक्की और दीर्घजीवी कर लेतीं।
कांग्रेसी पाठक भाइयों के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि यह हरामज़ादा सारे विपक्षियों के नाम ले रहा है मगर कांग्रेसियों में मनमोहन सिंह के अलावा किसी का नाम नहीं ले रहा है, तो मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि भैया तुम्हारे कुनबे में और कोई प्रधानमंत्री की कद-काठी वाला नेता है कहाँ, विपक्षियों में तो एक से एक भरे पड़े हैं। देश में यदि बीस प्रधानमंत्रियों की एक साथ ज़रूरत पड़ जाए तो विपक्ष आराम से थोक सप्लाई कर सकता है। तुम्हारे पास एक शिशु प्रधानमंत्री ज़रूर है मगर उसे कुर्सी हासिल करने में कम से कम दस साल लगेंगे। उनकी मम्मी को अपने परिवार का सदस्य मानने न मानने के लिए ओबामा स्वतंत्र हैं क्योंकि यदि वे भारत की प्रधानमंत्री बन भी गईं तो इटली वालों को अपने परिवार में शामिल करना है कि नहीं यह फैसला तो उनके विवेक पर ही निर्भर। वैसे अगर उन्हें इटली वालों को अपने परिवार में शामिल करना ही होता तो वे इस मौके पर इटली के मौजूदा प्रधानमंत्री को अपने परिवार में शामिल कर अपना इरादा साफ कर देते।
जो भी हो, मुझे तो घोर आश्चर्य होगा अगर भारतीय प्रधानमंत्री को अमरीकी राजकीय अतिथि का यह सम्मान मिलने के बाद पाकिस्तानी नेतागण दाना-पानी लेकर ओबामा पर ना चढ़ बैठें कि - ऐसे कैसे तुमने हमारे पुश्तैनी दुश्मन को अपने परिवार का सदस्य बना लिया! हम क्या मर गए हैं! जो भी हो बाप-दादों की तरफ से हो तो मुसलमान ही! तो पाकिस्तानी मुसलमानों को छोड़कर किसी भारतीय सिख-हिन्दु को अपने परिवार का सदस्य बनाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ? फौरन से पेश्तर हमें भी अपने परिवार का सदस्य बनाओं या मनमोहन सिंह को अपने परिवार से बेदखल करों! वर्ना, हमसे बुरा इतिहास में न कोई हुआ है, ना होगा! हम भारतीय सीमा पर गोलीबारी तेज़ करके तुम्हारे परिवार के इस नए सदस्य की ऐसी-तैसी कर देंगे।
ज़ाहिर है व्हाइट हाउस में अर्जियों की बाढ़ आने वाली है। सारे के सारे देश गुहार लगाऐंगे-हुजूर हममें क्या कमी थी जो एक ‘सरदारजी’ को परिवार का सदस्य बना लिया, हमें छोड़ दिया। मगर इन सब ख़्याली बातों से परे मेरी एक चिंता है जो कि खासी गंभीर है। आखिर ओबामा ने किस परिवार का सदस्य माना है हमारे प्रधानमंत्री को? विश्व साम्राज्यवादी परिवार का या जी-८, जी-१५ के परिवारों का? आखिर इसका मतलब क्या है? क्या आर्थिक और राजनैतिक रूप से हमारा देश भी साम्राज्यवादी रूप-रंग, गुण-धर्म में ढल गया है, जो दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य के द्वारा दुनिया के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र के मुखिया की पीठ यूँ थपथपाई जा रही है।