सोमवार, 17 मई 2010

ब्लॉगिंग में ठलुआते हुए एक साल

//प्रमोद ताम्बट//
ब्लॉगिंग में ठलुआते हुए 15 मई को हमें एक साल पूरा हो गया। यू तो इसमें घुसने की जद्दोजहद हम 15 मई 2009 से भी पहले कई महीनों से कर रहे थे लेकिन कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में इसके चर्चे सुन-सुनकर दिमाग पर एक आतंक सा तारी था ब्लॉगिंग का, मगर इस आतंक से मुक्त होने के लिए ब्लॉगिंग की राह बताने वाला कोई नहीं था। सोचते थे कि एक टाँग लेखन में और दूसरी कम्प्यूटर में होने के बावजूद कम्बख्त यह ब्लॉगिंग हमारे अत्याचारों से महरूम कैसे रह सकती है। आखिर गूगल पर ढूढ़-ढूढ़कर पता चला कि ब्लॉगिंग है किस चिड़िया का नाम, फिर भी यह खोज काफी दिन तक चली कि आखिर हमारा सिर ब्लॉगिंग में कैसे घुसे।
जैसे तैसे www.blog.co.in का राज खुला और हमने हफ्तों की मेहनत के बाद इस पर अपना ब्लॉग बनाने में सफलता पाई, मगर फिर सबसे बड़ा एक सवाल सामने आ खड़ा हुआ कि इसमें पोस्ट कैसे लगाई जाए। पूरे बारह घंटे की मेहनत के बाद हमने देवनागरी फोन्ट में टंकित अपनी व्यंग्य रचनाओं को उसमें चिपकाने में सफलता पाई, और जब ब्लॉग खोला तो देखा कि वहाँ तो अंग्रेजी फोंट की खिचड़ी सी पकी हुई है। अब खोज का एक और क्षेत्र खुला कि कम्बख्त ये ब्लॉगर्स दुनियाभर को अपनी पोस्ट हिन्दी में पढ़वाने में कैसे कामयाब हो जाते हैं। फिर गूगल की शरण में जाना पड़ा। कई तरह की सर्च लगाने के बाद एक और नई बला सामने आई जिसका नाम था ‘यूनीकोड’। कम्प्यूटर के जितने जानकार मेरे परिचितों में थे उन दिनों उन सबसे मैंने इस बला के बारे में जानना चाहा, लेकिन कोई ठीक-ठीक बता नहीं पाया कि यह ‘यूनीकोड’ है क्या चीज़। कोई बोला यह एक तरह का कोड होता है जो किसी को नहीं मालूम होता है, किसी ने कहा यह तो परमाणु बम का कोड है जो कि प्रधानमंत्री के पास होता है और कोई हाँकने लगा, यह तो जैसे मास्टर की होती है वैसा एक कोड होता है जिससे दुनिया का कोई भी कम्प्यूटर खुल सकता है। जितने मुँह उतनी बातें। किसी ने तो यह भी कहा कि वो जो दवाइयों के रैपर पर बार कोडिग बनी होती है उसे यूनीकोड कहते हैं।
आखिर फिर गूगल काम आया और उसने हमें वेबदुनिया की यूटिलिटी तक पहुँचाया जहाँ देवनागरी को यूनीकोड में ट्रांसफर करने की सुविधा उपलब्ध थी। यह खोज हमारे लिए किसी हीरे की खदान से कम नहीं थी। तुरंत उसमें अपने व्यंग्य यूनीकोड में परिवर्तित ब्लॉग पर लगाएँ और उसका लिंक अपने कुछ परिचित-अपरिचितों को भेजा कि भैया पढ़ो हमने भी तीर मार लिया है।
मुझे याद है सबसे पहले श्यामल सुमन जी ने मुझे हड़काया कि भैये हिन्दी तो ठीक से लिखना सीख लो। श को ष लिख रहे हो, और भी कई गलतियों की तरफ उन्होंने मेरा ध्यान आकर्षित किया। गलती मेरी नहीं थी, वेवदुनिया के यूनीकोड कन्वर्टर में जो कमियाँ थी वे सब उस व्यंग्य में दिखाई दे रहीं थी। मैंने श्यामल जी को समस्या बताते हुए निवेदन किया कि कोई अच्छा यूनीकोड कन्वर्टर हो तो बताएँ। उन्होंने मुझे गूगल ट्रांसलिटरेशन का लिंक भेजा। इसमें रोमन में लिखना मुझे दुनिया का सबसे बोर काम लगा। चूँकि मुझे हिन्दी टाइपिंग आती थी इसलिए मैं चाहता था कि मेरे व्यंग्य फटाफट बिना किसी कान्हा-मात्रा, नुक्ते की त्रृटि के हुबहू यूनीकोड में परिवर्तित हो जाएँ, लेकिन आज जबकि मैं काफी बेहतर सुविधाओं का उपयोग कर रहा हूँ फिर भी ऐसा कोई कन्वर्टर मुझे अब तक नहीं मिला है जिसमें त्रृटिहीन कन्वर्शन हो जाए।( मेरे ब्लॉग व्यंग्य पर इस पोस्ट के बाद श्री रवि रतलामी जी ने मुझे एक त्रृटिहीन कन्वर्टर भेज दिया है।)
खैर, ‘व्यंग्य’ नाम का मेरा ब्लॉग चल निकला। मैंने अपने सम्पर्कों की सूची लगातार बढ़ाते हुए हरेक नई पोस्टिंग पर अपने ब्लॉग का लिंक और आलोचना समालोचना प्रतिक्रिया का निवेदन लोगों को भेजना शुरू कर दिया। लोगों ने प्रतिक्रिया में तारीफों की झड़ी लगा दी। कुछ लोगों ने मेरा निवेदन मानते हुए आलोचना और समालोचना भी की। एक बोला -है कौन बे तू, तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे मेल बाक्स में आने की ? खबरदार जो आइन्दा आया ! एक बहनजी बोलीं, तुम जैसे लफंगों को मैं खूब जानती हूँ, आइन्दा अगर ऐसी हरकत की तो पुलिस में कम्पलेंट कर दूँगी। हमने तुरंत ऐसे गुस्सैल आलोचकों को अपनी मेलिंग लिस्ट से बिदा किया। लेकिन फिर भी बहुत सारे लोगों ने दुनिया भर से ब्लॉग का तहेदिल से स्वागत किया और हमारे लेखन को खूब सराहा। तारीफों के वे पुलंदे मैंने अपने ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया के तहत सजा कर रखे हैं। हालॉकि सारी प्रतिक्रियाएँ मैं उसमें अब तक नहीं डाल पाया हूँ क्यों कि यह जो www.blog.co.in वेवसाइट है, अपने आप में बेहद नखरैल वेवसाइट है। मन होता है तो पोस्टिंग, एडिटिंग करने देती है, नहीं होता तो अपना थोबड़ा तक नहीं दिखाती। आज भी जब मुझे कुछ संदर्भों के लिए इसपर अपना ब्लॉग देखना है यह खुलने में नखरे कर रही है। इससे तंग आकर मुझे ब्लॉगस्पाट डॉटकॉम पर एक नया ब्लॉग ‘व्यंग्यलोक’ खोलना पड़ा। अभी मैं दोनों ब्लॉगों में बराबरी से पोस्टिंग करता हूँ।
इस समय तक हमें एग्रीगेटरों के बारे में मालूम नहीं था। जहाँ तक मुझे याद है माननीय दिनेश्वर द्विवेदी जी ने मुझे कई सारे एग्रीगेटरों के लिंक दिए जिनके साथ मैंने मशक्कत करके उनके लिंक अपने ब्लॉग पर लगाए, मगर मेरा अनुभव है कि इनमें से कोई भी एग्रीगेटर अच्छी तादात में पाठक मुहैया नहीं कर पाता। इसलिए मैं तो अब भी अपने ब्लॉग की, व्यंग्य रचनाओं की पसंद नापसंद का आकलन अपने व्यक्तिगत सम्पर्कों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर करता हूँ। एग्रीगेटरों पर बमुश्किल 5-10 से लेकर 20-25 पाठक मिलते हैं, जिसमें हमारा रिकार्ड तो 0 तक का भी है, प्रतिक्रियाएँ भी कभी कभी 1-2 मिल पातीं हैं ( अपवादस्वरूप व्यंग्य में इस पोस्ट पर 25 कमेन्ट मिले हैं ), लेकिन आंकड़ों के लिए हमारे द्वारा तैनात गूगल एनालेटिक्स की माने तो इस एक साल में हमारे ब्लॉग पर 56 देशों के 346 शहरों के 3000 से ज़्यादा विजिटर्स आ चुके हैं, 7500 से ज़्यादा विज़िट्स हो चुकी हैं। यह आंकड़े मेरे लिए बेहद उत्साहित करने वाले हैं, और देश विदेश के मेरे इन्हीं पाठक महानुभावों को धन्यवाद देने के लिए मैंने व्यंग्य से हटकर आज की यह पोस्ट लिखी है।
पिछले दिनों मैंने अपने इतने दिनों के अनुभवों के आधार पर परिकल्पना ब्लॉग के श्री रवीन्द्र प्रभात जी के अनुरोध पर परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के लिए एक लेख ‘‘ब्लॉगिंग को परिवर्तन के हथियार के रूप में ढालने की जरूरत है......’’ लिखा था जो कि http://utsav.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_7114.html पर उपलब्ध है। आशा करता हूँ ब्लॉगिंग जगत में इसे समझने की कोशिश की जाएगी।
अंत में पुनः मैं अपने सभी प्रशंसकों, आलोचकों, समालोचकों, और विशेषकर अनुज खरे (व्यंग्यकार) जैसे मित्रों का आभार प्रकट करना चाहूँगा जो लगातार मुझे उत्साहित करते हुए लेखन की ऊर्जा प्रदान करते रहते हैं। मैं उन बलाओं का भी तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जो मुझे पाज़ीटिव एनर्जी प्रदान करती रहती हैं जो कि सृजन के लिए बेहद ज़रूरी है।

रविवार, 2 मई 2010

व्यंग्य-संतई का संभावनापूर्ण रास्ता


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

     इन दिनों झूर के संत बनने का मन कर रहा है। क्या मजे है संतों के! बड़े-बड़े वातानुकूलित आश्रम, बड़ी-बड़ी लक्झरी गाड़ियाँ, धन-दौलत, सुख-समृद्धि, आनंद-मंगल सभी कुछ! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों का प्रेम-भक्तिभाव, ऐसा स्वर्णिम अवसर भला और किस धंधे में मिलता है! वैसे तो हर कहीं औरतों को निहार भर लेने से महिला उत्पीड़न का आरोप और बेभाव जूते पड़ने की सीधी संभावना प्रबल बनी रहती है। एक यही संतई का धंधा ऐसा है जिसमें विशेष आशीषाभिलाषिनों को किसी भी कोण से, किसी भी प्रकार का आशीर्वाद दे दो लाभदायक होता है।
    जवानी से लेकर इस अधेड़ावस्था तक क्या-क्या लंपटयाई नहीं की! लम्बी-लम्बी ज़ुल्फें रखीं, रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर छैला बने घूमे, दर्जनों बालाओं के इर्द-गिर्द भँवरों की तरह मंडराए, फेरे मारे, चप्पलें घिसीं, मगर परिणाम अनुकूल  नहीं आए। फिर फिल्मी कवियों-शायरों के अनुयाई बनकर पथभ्रष्ट हुए, कविताई की, शायरी लिखी, मगर मछुआरे सी तपस्या के अभाव में एक मछली तक जाल में नहीं फाँस पाए। उस वक्त यह अक्ल नहीं आई कि लफूटियाई छोड़कर कहीं छोटा-मोटा  आश्रम डाल लेते, सन्यास धारण कर लेते, आशीर्वाद देने का धंधा करते, तो काम आसानी से बन जाता, और आज एक-दो नहीं दर्जनों दुःखी आत्माएँ अपना तन-मन-धन अर्पण कर स्वेच्छा से आश्रम में पड़ी रहतीं, जब जिसको जी चाहे आशीर्वाद दे लेते, सम्पन्न भक्तों से भी दिला देते।
    ज़िन्दगी भर सर पटकते रहे कि कहीं कोई छोटा-मोटा धंधा कर लेंते जो आगे जाकर विशाल नेटवर्क का रूप ले सके, मगर फालतू पूँजी और नसों-नाड़ियों में धंधे के उस कला-कौशल का उद्याम प्रवाह ना होने के कारण यह संभव नहीं हुआ। संत हुए होते तो ना पूँजी की ज़रूरत होती ना किसी पुश्तैनी कला-कौशल की- स्वयंस्फूर्त आयोजना से दुनिया के सबसे पुराने धंधे के एक विशाल रैकेट का निर्माण निश्चित रूप से हो सकता था जिसके सफल प्रबंधन के माध्यम से हम किसी छोटे-मोटे साम्राज्य का सुख तो भोग ही सकते थे, मगर जीवन में कभी कोई प्लास्टिक का रैकेट तक हाथ में पकड़ा हो तब ना दूसरा कोई रैकेट पकड़ पाते।
    सुनहरे भविष्य के सपनों की दुनिया में ऐसे मदहोश रहे कि धन के मुक्त प्रवाह का उद्गम और दिशा ही देख ना पाए, छोटी-मोटी, घटिया सी चाकरी को ही ऐशो-आराम और जीवन का सार समझते रहे, ताड़ ही नहीं पाए कि असली ऐश तो वहाँ हैं जहाँ छूछा पुण्य भर बाँटने के बदले में अकूत धन मिलता है, वास्तव में जो जीवन का सार है। अन्दाज़ा ही नहीं लगा पाए कि बड़े-बडे़ ओहदेदारों का लाइन लगाकर आश्रम के दरवाजे पर खडे़ रहने का सुख क्या होता है, जिनके खुद के दरवाज़े पर आम जनता लाइन लगाए खड़ी रहती है। ये ओहदेदार अपनी-अपनी ओहदादारी के हिसाब से सेवाएँ भी देते रहते हैं और आश्रम में सम्पन्न हो रहे गोरखधंधों पर पर्दा डालने के साथ ही साथ केश और काइंड में मोटे-मोटे चढ़ावे भी पेश करते हैं। आश्रम के किसी कोने में हत्या, आत्महत्या, बलात्कार, ड्रग कारोबार जैसा, भारतीय दंड संहिता में वर्णित मामूली सा अपराध घटित  हो जाए तो प्राण-प्रण से जान बचाने के लिए दौड़ भी पड़ते हैं।
    कभी-कभी मति मारी जाती है तो आदमी संभावनापूर्ण रास्तों को छोड़कर आलतू-फालतू रास्तों पर चला जाता है। संतई का रास्ता ऐसा विकट संभावनापूर्ण रास्ता है जिसमें सन्यास का अद्भुत आनंद भी है और क्षूद्र सांसारिकता का सुख भी। अब भी समय है, बीती ताहि बिसार कर आगे की सुध लें, तो जिन्दगी का कुछ मज़ा आए।          

रविवार, 11 अप्रैल 2010

माया के नोटों की माला की माया

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट // 
बहन मायावती ने नोटों की माला क्या पहनी भाइयों के पेट में दर्द होने लगा। इस देश में यहीं दिक्कत है, बहनें कुछ करें तो भाइयों को हज़म ही नहीं होता। तैतीस प्रतिशत् आरक्षण के मुद्दे पर हम देश भर में भाइयों का हड़बोंग देख ही चुके हैं। भाइयों को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं है कि लोकतांत्रिक लूटमार के उनके अभियान में बहनें भी हिस्सेदार बनें।

यूँ देखा जाए तो गुप्त आदान-प्रदान के इस जमाने में बहन मायावती के इस पारदर्शितापूर्ण नोट्यार्पण कार्यक्रम की आलोचना करने का अधिकार किसी को नहीं है। आखिर ऐसा किया क्या है उन्होंने ! चोरी तो की नही है! ना ही डाका डाला है! लोग, दबे-छुपे इस चतुराई से नोट ले लेते हैं कि किसी को कानों-कान खबर नहीं होती। दाएँ हाथ को सूचना नही मिल पाती कि बाएँ हाथ ने भ्रष्टाचार कर कुछ ले लिया है। मगर बहन मायावती ने ऐसा कुछ नहीं किया। चमचों के सत्कार को दुर्लभ विनम्रता के साथ खुलेआम, सारी दुनिया के सामने स्वीकार किया है। उनकी किस्मत से उन्हें करोड़ों नोटों की लाटरी लग गई तो इसमें उनका क्या कुसूर। उन्होंने औरों की तरह चुपचाप इस कमाई को अन्दर कर रजाई-गद्दों, डबल बेडों में तो छुपा नहीं दिया! ना संडास-बाथरूम के फर्श के नीचे गाड़कर रखा। परवारे-परवारे स्विस बैंक में भी नहीं पहुँचाया। बल्कि कलात्मक रूप से माला में गुँथे हाथों के इस मैल को अपने कीमती गले में अर्पणवाया है। नोटों का युक्तिसंगत आदान-प्रदान भी हर किसी के बस की बात नहीं है, इस मामले में बहन मायावती को मानना ही पडे़गा। भेंट-पूजा का ऐसा सार्वजनिक कार्यक्रम भारतीय राजनीति के इतिहास में पहले कभी देखना नसीब नहीं हुआ।

मुझे लगता है कि बहनजी के गले की यह माला अब मील के पत्थर की तरह हमेशा उनके गले में पड़ी रहने वाली है और मासूम फूलों को दुष्टों के गले में पड़े रहने की मजबूरी से छुटकारा मिलने वाला है। माल्यार्पण की जगह अब नोट्यार्पण का नया चलन अस्तित्व में आ जाएगा। यही अब नेताओं का कद नापने का नया पैमाना हो चलेगा। किसके गले में पड़ी माला कितने-कितने के कितने नोटों की पाई गई, इससे तय होगा कि कौन ज़्यादा कद्दावर नेता है। जितने ज़्यादा नोट माला में, उतने बड़े कद का नेता। माया बहन का कद छोटा दिखाने के लिए उस ऐतिहासिक माला से दो-चार पेटी ज़्यादा की माला तुरंत अगर किसी नेता ने अपने गले में नहीं पड़वाई तो फिर बहनजी को निर्विवाद बड़ा नेता माने जाने से कोई नहीं रोक पाएगा। वे ऐसी ही बड़ी-बड़ी मालाएँ पहनकर अपनी आकांक्षा की कुर्सी की ओर लगातार बढ़ती चलीं जाएंगी, बाकी लोग मुँह ताकते रह जाएंगे।

फूलों की मालाओं का तो बुरा हश्र होने को है, उसकी तुलना जूतों की माला से होने लगेगी। जिस मात्रा और कोटि की बेइज्जती कोई नालायक जूतों की माला पहनकर महसूस करता है उसी मात्रा और कोटि की बेइज्जती अब फूलों की माला से उपजा करेगी। लोग विरोधियों को जूते मारने के लिए जानबूझकर सार्वजनिक रूप से फूलों की माला पहना जाएंगे।

नोटों की माला के लोकप्रिय होने से मान-सम्मान के सारे प्रतिमान ध्वस्त होते नज़र आएंगे। लोग शिकायतें करते मिला करेंगें, हम पाँच हज़ार की माला के पात्र थे, कम्बख्तों ने पाँच सौ एक की माला पहनाकर चलता कर दिया, घोर बेइज्जती हो गई। इधर दूसरों को नीचा दिखाने के लिए चूरन के नकली नोटों का चलन भी निश्चित रूप से बढे़गा। आजकल यह चूरन का नोट बाज़ार में मिलता है कि नहीं पता नहीं, परन्तु नेता लोग बाज़ार में उपलब्ध तमाम चूरन के नोट उठाकर उसे कौशलपूर्वक माला में गुँथवाकर एक दूसरे की टोपी उछालने का काम किया करेंगे। कुछ तो शुद्ध बदमाशी और ठगी पर उतर आऐंगे, रद्दी पेपर, कॉपी-किताब के रंगीन पन्नों की माला गुथवाकर उसी को गले में पड़वा लेगे और चमचों के माध्यम से अफवाह उड़वाऐंगे कि-नेताजी पर दस करोड़ की माला की चढ़ी, अब उन्हें राष्ट्रीय स्तर का नेता होने से कोई नहीं रोक सकता।

माया की नोटों की माला की माया और भी ना जाने क्या-क्या परिवर्तन लाने वाली है। हो सकता है फानी दुनिया से रुख़सत हो गए लोगों के ऊपर भी श्रद्धाजंलि स्वरूप लोग नोटों की माला ही अर्पण करने लगें, ताकि इस फानी दुनिया में उसकी औकात का खुलासा हो जाए।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

क्रिकेट के भगवान का आविर्भाव

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
    बहुत सालों से हम भगवान की तलाश कर रहे थे, जो अब जाकर पूरी हो पाई है।  पिछले दिनों भगवान ने ग्वालियर के रूपसिंह स्टेडियम में डबल सेंचूरी ठोक कर अपने मौजूद होने का प्रमाण दे दिया।  सारा देश अपने भगवान की इस लीला से आल्हादित है।
    बड़ी समस्या थी, तैतीस करोड़ देवी-देवताओं में से किसी ने भी अपने जमाने में क्रिकेट नहीं खेला, पुराणों में ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि किसी देवी-देवता ने बल्ला भी पकड़ा हो, ऐसे में क्रिकेट के भगवान का पद युगों-युगों से खाली पड़ा था। इस पद पर अब सचिन तेंदुलकर की पदस्थापना हो गई है। कुछ बड़े-बड़े अखबार, पत्र-पत्रिकाएँ अगर यह घोषणा नहीं करते तो हमें पता ही नहीं चलता कि भगवान अवतरित हो चुके हैं और उनकी पहचान मास्टर-ब्लास्टर के रूप में हो चुकी है। उन्होंने मुंबई के उपनगर बांद्रा में जन्म लिया था और बालपन से ही बल्ला-लीलाओं का प्रदर्शन करते हुए वे अब ढलती उम्र में भी मजबूती से जमे दुनिया भर में चौकों-छक्कों की बरसात करते घूम रहे हैं।
    यूँ तो सचिन भगवान ने गेदों की पिटाई के अलावा अब तक कुछ भी ऐसा नहीं किया है कि उनकी भगवान के रूप में पहचान हो पाती, परंतु भगवान का तो ऐसा ही होता है, वे तो एखाद घटना भर से दुनिया को बता देते हैं कि मैं भी भगवान हूँ, जैसे तेंदुलकर भगवान ने साउथ अफ्रीका के खिलाफ वन-डे मैच में नाबाद दोहरा शतक मारकर बता दिया और लोगों ने श्रद्धा से नतमस्तक होकर मान भी लिया।
    अच्छा हुआ जो यह खुलासा जल्दी हो गया, वर्ना अब तक क्रिकेट की भगवानी करते आ रहे, दूसरे कोई अज्ञात देव डबल चार्ज से मुक्त ही ना हो पाते। चूँकि क्रिकेट का घोषित भगवान अब तक कोई था नहीं, इसलिये निश्चित रूप से दूसरे कोई भगवान ही अपनी मूल जिम्मेदारी के साथ-साथ क्रिकेट की भगवानी का काम भी देखते होंगे, और चूँकि क्रिकेट खेला भी खूब जा रहा है आजकल, तो काम के बोझ से दबे काफी झल्ला भी रहे होंगे। लेकिन अब उन्हें बिना भत्ते की इस डबल ड्यूटी से छुटकारा मिल जायेगा क्योंकि अब अंजली-पति भगवान तेंदुलकर ब्रम्हांड भर के लिए ना सही क्रिकेट बिरादरी के उत्थान के लिए ज़रूर अवतरित हो चुके हैं।
    बड़ी परेशानी थी। क्रिकेट में भविष्य बनाने की जद्दोजहद करने वाले गली-कूचे के खिलाड़ियों को सर्वसुलभ हनुमान जी के चरणों में, या क्रिकेट मैदान के रास्ते में उपलब्ध किसी भी पसंद-नापंसद भगवान के मंदिर में नाक रगड़ने जाना पड़ता था, ताकि बॉल बार-बार बल्ले पर आए और वे सम्मानजनक स्कोर बनाकर अपनी इज्ज़त बचाने में सफल हों या बॉल बराबर विकेट पर फिक जाए, कोई कैच अनलपका ना रहे, या फिल्डिंग में बॉल सुभीतेपूर्वक पकड़ में आ जाए। दूसरे भगवान अन्य दुखियारों की माँगों को निपटाने के भारी काम के बोझ के मारे उन भक्त क्रिकेटरों की ओर ध्यान ही नहीं दे पाते थे जो मैदान में हर काम आसमान ताकते हुए ही सम्पन्न करते हैं। अब यह समस्या खत्म हो जायेगी। जल्द ही तेंडुलकर भगवान के मंदिरों की स्थापना हर छोटे-बड़े क्रिकेट मैदान के भीतर ही कर ली जायेगी ताकि भक्त खिलाड़ी वहीं दंडवत लेटकर, चौकों-छक्कों अथवा बॉलर होने की दशा में ज़्यादा से ज़्यादा विकेटों की माँग कर धूप-बत्ती कर सकें नारियल फोड़ सके, चरणामृत और प्रसाद का वितरण कर फिर पिच की धूला लेने पहुँचें। बाकी क्रिकेट भक्त आम जनता के लिये यह व्यवस्था देश भर में फैले उत्साही मंदिर निर्मातागण अतिक्रमण के माध्यम से मदिरों की श्रृंखला खड़ी कर स्वयं ही कर देंगे। लोग बीच सड़क में अपनी श्रद्धा उढेल कर सचिन भगवान की आराधना कर सकेंगे।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

1 अप्रैल 2010, 0000 आवर्स से महँगाई खत्म

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
    31 मार्च 2010 समय 2400 आवर्स, कमाल ही हो गया। सरकार ने महँगाई बढ़ाने वाले तमाम बदमाशों को बुलाकर सीधे-सीधे कह दिया कि देखो अगर तुमने फौरन से पेश्तर हमारा हुक्म मानते हुए महँगाई खत्म नहीं की तो हर एक को चुन-चुनकर जेल में डाल दिया जाएगा। जेल में डालने के बाद भी अगर महँगाई नीचे नहीं आई तो तुम लोगों को काला पानी भेज दिया जाएगा। उसके बाद भी अगर तुम नहीं सुधरे और कीमतें ज़मीन पर नहीं आईं तो तुम सबको तोप के मुँह से बांधकर उड़ा दिया जाएगा।
    इतनी खतरनाक धमकियों के बाद सुनते हैं महँगाई बढ़ाने वाले तमाम बदमाशों में बला की घबराहट फैल गई है और उन्होंने समझौता करने की गरज से सरकार के सामने कुछ महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे हैं। उन्होंने कहा है कि हम कारों की कीमत पाँच हज़ार से आठ हज़ार के बीच में फिक्स कर देते हैं। टी.वी., फ्रिज, ए.सी. इत्यादि दो सौ से पाँच सौ रुपये कर देंगे। स्वतंत्र डुप्लेक्स बंगलों और फ्लेटों की कीमत छः हज़ार से नौ हज़ार तक की जा सकती हैं। ज़मीनों की कीमत हज़ार-बारह सौ रुपये प्रति वर्ग किलोमीटर हो सकती है। हवाई जहाज़ का किराया पैतीस रुपये और ट्रेन का किया तीन से सात रुपये करने में भी उन्हें कोई हर्ज नहीं है। बड़ी-बड़ी सितारा होटलों में खाना दस रुपये से बीस रुपये थाली, शराब दो-दो रुपये पैग और स्पा, तेल मालिश, सोना बाथ, एक-एक रुपये में दिया जाएगा।
    सरकार के प्रतिनिधियों ने महँगाई बढ़ाने वाले बदमाशों की इस स्वयंस्फूर्त पहल पर काफी प्रसन्नता व्यक्त की है और उनसे आटा, दाल, चावल, शक्कर, तेल, घी, मिट्टी का तेल, गैस सिलेन्डर, कॉपी-किताब, शिक्षा, चिकित्सा, दवाइयों और बेबी फूड की कीमतों को भी कम करने का अनुरोध किया है परन्तु बदमाशों ने इस मुद्दे पर सरकार से चरण छूकर माफी माँग ली है। उन्होंने कहा है कि चाहे तो हमें बीच चौराहे पर कोड़े लगा लो, पत्थर मार-मारकर संगसार कर दो, फाँसी पर चढ़ा दो मगर आटा, दाल, चावल और इन सारी चीज़ों के भाव कम करने में हम असमर्थ हैं। बदमाशों के प्रतिनिधि ने सरकार से कहा है कि  वे इन सारी आम जनसाधारण के उपयोग में आने वाली ज़रूरी चीज़ों को घर-घर जाकर मुफ्त में बाँटने के लिए राजी है परन्तु इनके दाम कम कर पाप का भागीदार बनने का उनका कोई इरादा नहीं है।
     बदमाशों के इस खतरनाक इरादे से सरकार के लिए हालाँकि व्यवस्था भंग होने का गंभीर खतरा पैदा  हो गया है परन्तु 1 अप्रैल 2010 को समय 0000 आवर्स से यह व्यवस्था लागू होने जा रही है।
    मुझे पता है कि चूँकि 1 अप्रैल, फूल डे होता है, इसलिए अधिकतर बेवकूफ लोग इस समाचार पर भरोसा नहीं करेंगे, लेकिन मेरी इल्तजा है कि थोड़ी देर के लिए बेवकूफ बनने में किसी के बाप का आखिर जाता क्या है ?  

सोमवार, 8 मार्च 2010

अपहरण नारी मुक्ति आन्दोलन का

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
अन्तराष्ट्रीय नारी मुक्ति आन्दोलन का प्रतीक-अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च फिर आ गया। मेहनतकश, कामकाज़ी महिलाओं के इस ऐतिहासिक नारी मुक्ति आन्दोलन का बहुत पहले ही उन विदूषी नारियों द्वारा अपहरण किया जा चुका है जिनको खुद कभी कोई काम नहीं करना पड़ता। इसका अपहरण किया है अच्छे खाते-पीते घरों की मोटी-ताज़ी नारियों ने जो अपने घर में काम करने वाली बाइयों को साल में एक दिन भी छुट्टी मनाने की इजाज़त नहीं देतीं। बाई की तबियत नासाज़ हो, पति, बच्चा बीमार हो या दूसरा कोई झमेला हो, मालिकिन को अपने हाथ से बरतन माँजना, झाड़ू-पोछा लगाना इतना अखरता है कि गुस्से में आकर वे बाई की चुटकी भर तनखा भी काट लेती है। गिलास-प्लेट-मग्गा टूट जाए, इस्तरी करते हुए कपड़ा जल जाए, नुकसान को तुरन्त हिसाब में जोड़ लेती हैं। अपहरण किया है बड़के नौकरशाहों की अर्धांगिनियों की एसोसिएशनों ने जो बाहर तो नारी मुक्ति-नारी मुक्ति खेलती है और घर में बच्चे की आया को सुबह-शाम तमाचे जड़ती हैं।
अपहरणकर्त्तियों का महिला दिवस मनाने का तरीका अनोखा होता है। दस-बीस खाई-अघाई महिलाएँ बढ़िया आठ-दस हज़ार कीमत की साड़ियाँ पहन, नकली-असली जेवरों से लद-फदकर, नेल पालिश, लिपिस्टिक, रूज़-पाउडर लगाकर, इंपोर्टेड परफ्यूम की खुशबू में लिपटी हुई किसी होटल के लॉन में इकट्ठा होकर गेट-टुगेदर करती हैं। चेयररेस, तम्बोला, अंताक्षरी इत्यादि-इत्यादि खेलों के ज़रिए मनोरंजित होकर खाना-वाना खाकर मुक्ति के सुखद एहसास के साथ लक्झरी गाड़ी में सवार होकर घर लौट आतीं हैं। इनमें से कुछ बुद्धिजीवी किस्म की महिलाएँ महिलाओं की भाषण प्रतियोगिता, कविता-कहानी प्रतियोगिता, चित्रकला-रंगोली प्रतियोगिता इत्यादि टाइप की गतिविधियाँ सम्पन्न करतीं हैं जो बाज़ार सृजित सभ्य समाज में रचनात्मक गतिविधियों के नाम से बदनाम हैं।
कुछ उच्च शिक्षित नारीवादी नारियों का नारीवादी आन्दोलन उनके इर्द-गिर्द के पुरुषों से शुरू होता है और उन्हीं पर खत्म हो जाता है। ‘पुरुषमात्र’ उनके लिए दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। पुरुष रूप में उनके समीपस्थ किसी भी व्यक्ति में ऐन-केन-प्रकारेण दो-चार जूते घल जाएँ तो उनका कलेजा ठंडा हो जाता है और मुक्ति आन्दोलन सफल हो जाता है। ऐसी नारियों का नर तो बेचारा जैसे नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रयोगशाला में किसी गिनीपिग की तरह का प्राणी होता है जिस पर नए-नए परीक्षण किये जाकर नए-नए नारीवादी सिद्धांत खोजे जाते हैं। नारीवादी नारियों का यह एक अलग सम्प्रदाय सा होता है जो चाहता है कि दुनिया में क्रांति हो तो ऐसी हो कि सारे पुरुषों का खात्मा लग जाए और चारों ओर नारियों ही नारियों की सत्ता हो। इससे पीटने के लिए पुरुषों के अभाव की चिंता उन्हें बिल्कुल नहीं होती।
सुविधाभोगी नारियों से परे बहुत सारी मेहनतकश नारियाँ हैं जो सचमुच मुक्ति के इंतज़ार में हैं। वे यहाँ-वहाँ के महिला संगठनों के आव्हानों से आव्हानित होकर एक दिन की कमाई को तिलांजलि देकर एक जुट होती हैं, एकजुट होने का भाषण सुनती है, एकजुट होकर एकजुट होने के नारे लगाती है और एकजुटता से मुक्त होकर शाम को जैसे ही घर पहुँचती हैं, पति परमेश्वर को डंडा लिए तैयार बैठा पाती है। चूँकि एकजुटता को वह भाषण स्थल पर ही छोड़ आई है, इसलिए दारू के लिए पैसे ना देने पर पति के हाथों पिटते वक्त दिन भर एकजुटता और नारी मुक्ति का भाषण पिलाने वाला कोई नेता उसे बचाने नहीं आता।
इस तरह महिला अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस, निर्विकार भाव से, अगले साल फिर आने के लिए लौट जाता है।

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

टुन्न होकर गरियाने का पर्व

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट

लो फिर चन्दा खाने का त्यौहार आ गया।
जी हाँ, होली को हमने हमेशा सामूहिक रूप से चन्दा खाने के त्यौहार के रूप में ही देखा है। बचपन में मोहल्ले के सारे चन्दा खाऊ इकट्ठा होकर घर-घर जाकर खाने लायक चन्दा इकट्ठा करते और फिर बाकायदा बजट बनाकर उसे खाते। कुछ चन्दा इसे उगाहने की मुहीम के दौरान खाया जाता, कुछ झाड-झँकाड़ इकट्ठा करने के दौरान, और कुछ ऐसे ही चलते -फिरते कभी सेव-चूड़ा कभी समोसा-कचौड़ी, के भक्षण में उड़ाया जाता। जब मर्ज़ी हो तब नाश्ते-पानी के लिये चन्दे को निजी बपौती के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता। कुछ चन्दा होली के दिन खाने-पीने लिये रखा जाता और कुछ होली के बाद के लिये भी बजट में प्रावधानित होता जिसे सिनेमा वगैरह देखने और इन्टरवल में ठंडा यानी कोकाकोला वगैरह पीने में उड़ाया जाता। कुछ नेता किस्म के, या नेता किस्म के मोहल्लेदारों के बच्चे षड़यंत्रपूर्वक बजट के एक हिस्से को सबसे बचाकर सुरक्षित रखते व चुगलखोर लड़कों से लुका-छुपाकर पान-बीड़ी-सिगरेट का शौक भी फरमा आते, और चुगलखोर लड़कों की जासूसी दक्षता के कारण पकड़ा जाने पर माँ-बाप से धना-धन पिटते भी थे। इस तरह चन्दे के तीन-चौथाई हिस्से को खाने के पवित्र अनुष्ठान में ठिकाने लगाया जाता और एक चौथाई हिस्से से होलिका मैया का दहन किया जाता।
मोहल्ले के जिस स्वयंसेवक को होली से सबंधित आवश्यक खरीददारी की जिम्मेदारी दी जाती वही, जनता से एकत्रित उस सामाजिक धन से कुछ ना कुछ चुंगी कर लेता। हर सामग्री पहले आधी अपने घर में पहुँचाई जाती फिर सार्वजनिक उपयोग के लिये लाई जाती। यह सब जीवनचर्या के एक महत्वपूर्ण कला-कौशल की तन्मयतापूर्ण साधना की तरह का क्रियाकलाप होता, बच्चों की अम्माएँ बच्चों में इस प्रतिभा के होते विकास को देखकर भारी खुश होतीं और उनके सुनहरे भविष्य की कामना करतीं।
दरअसल होली का त्यौहार कम्बख्त एक ऐसा त्यौहार है जो हरेक को बचपन से ही भ्रष्टाचार के हुनर की सघन ट्रेनिंग देता है। भ्रष्टाचार कैसे सम्पन्न किया जाय, सार्वजनिक माल को बाप का माल कैसे समझा जाए, सामाजिक धन का बहादुरी से गबन कैसे किया जाए, सारे तौर तरीके बड़ी खूबसूरती से सिखाता है। बहुत से गुणी बच्चे बड़े होकर भी बचपन में सीखे इन गुरों को सफलतापूर्वक आजमाते हैं और जहाँ मौका मिलता है वहाँ अपनी इस काबिलियत का कुशलतापूर्वक प्रदर्शन करते हैं। कुछ अनुभवी शख्सियतें तो लड़कपने में होलिका दहन के इस कर्मकांड से मिले तमाम बेशकीमती अनुभवों को राष्ट्रीय-अन्तर्राट्रीय स्तर पर उपयोग भी करते हैं और नाम और दाम भी कमाते हैं।
परम्पराएँ आखिर परम्पराएँ हैं, जिनका हम भारतीय शिद्दत से निर्वहन करते हैं। मगर लाख टके का सवाल है कि आखिर होली जलाने के लिए चन्दा उगाहने और खाने की यह महान परम्परा चली कहाँ से आई ? हिरण्यकश्यप ने तो भक्त प्रहलाद और होलिका के लिए चन्दा इकट्ठा किया नहीं होगा जो उन्हें जलाने के अभिनव प्रयोग को अन्जाम दिया जा सके! और चलो माना कि छिछोरपन में आकर उसने, उन दोनों को जलाने के अपने आतिशी कार्यक्रम के तहत कंडों-लकड़ियों के लिए चन्दा कर भी लिया हो, लेकिन शर्तिया उसने चन्दा खाया तो हरगिज़ ही नहीं होगा! दुष्ट भले ही वह कितना भी था, ऐसा दो कौड़ी का टुच्चा तो हिरण्यकश्यप हो ही नहीं सकता था, जो इतने बड़े राजपाट के बावजूद टुच्चे से चन्दे पर नीयत रखे। इसलिए इतिहासकारों के समक्ष यह एक खोज का विषय है कि होली जलाने की परम्परा के साथ चंदा बटोरने और उसे उदरस्थ करने की परम्परा हमें आखिर मिली कहाँ से, जिसकी लीक पर चलते हुए हमारे देश में आज भी अनेक चन्दा खाऊ पैदा हो रहे हैं।
मुझे शक हैं कि ज़रूर यह बदमाशी हिरण्यकश्यप के दरबारियों ने की होगी। महाराज के नाम पर चन्दा इकट्ठा कर खा गए होंगे कम्बख्त। वही परम्परा उनके बच्चों के बच्चों, बच्चों के बच्चों से होती हुई धीरे-धीरे पूरे देश में छा गई होगी। अब तो चन्दा चाहे किसी कारथ हो उसे खाए बिना कोई मनोरथ पूरा ही नहीं होता। लोग हर सामाजिक-असामाजिक कार्य का चन्दा खाने में श्रद्धा का पूर्ण भाव दर्शाते हैं। किसी गरीब के कफन के लिये भी अगर चन्दा किया जाए, जो कि इस बदनसीब देश में अक्सर करना पड़ता रहता है, तो चंद शातिर चन्दा खाऊ उसे भी खाने से नहीं चूकते।
होली से जुड़ी कुछ अभूतपूर्व परम्पराएँ और भी हैं जिनके अपरम्परानुमा होते हुए भी उनके बिना होली मनती ही नहीं है। भँगेड़ियों को देखो ! ऐसे रंगबिरंगे त्योहार पर भी तमाम काले-पीले होकर भाँग-घोटा चढ़ाकर तरन्नुम में आय-बाय बके चले जाते हैं, या देसी ठर्रा चढ़ाकर नालियों में लोटते हुए नज़र आते हैं। हिरण्यकश्यप तो बेचारा इतिहासकारों द्वारा शराब पीता कभी धरा नहीं गया, ना ही वो कभी नालियों में लोटता हुआ ही पाया गया! भक्त प्रहलाद भी बेचारा गऊ किस्म का भक्त रहा है! फिर होली पर टुन्न होकर गरियाने की यह परम्परा किसने शुरू की। यह नौटंकी भी लगता है उन्हीं दरबारियों की खड़ी की हुई रही होगी। इधर हिरण्यकश्यप का पेट फटा होगा उधर वे सात दिवस के राष्ट्रीय शोक की छुट्टियों का फायदा उठाकर कलारी में जा बैठे होंगे। वही से प्रारंभ होकर यह परम्परा लगता है पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हुई हम तक आ पहुँची है, इसीलिए होली पर दारू पीकर दंगा करना एक अनिवार्यता बन गई है।
रंग-गुलाल की परम्परा और किसी ने भी चलाई हो, हिरण्यकश्यप ने तो हरगिज़ नहीं चलाई होगी! जिसकी बहन धोके में जल मरी हो वह क्यों उल्लास में रंग-गुलाल खेलेगा ? फिर वह तो खुद भगवान नरसिंह के हाथों मारा गया था, उसे मौका ही कहाँ मिला रंग-गुलाल उड़ाने का। तब फिर बचा प्रहलाद, परन्तु जिसके बाप का पेट फाड़ डाला गया हो वह उसकी अँतड़ियाँ समेटेगा या पिचकारी लेकर फुर्र-फुर्र रंग उड़ायेगा ? जिसकी बुआ ताजी-ताजी जल कर मरी हो वह उसके ‘फूल’ चुनेगा या रंग-गुलाल खेलेगा ? तब फिर किसे ऐसी हिमाकत सूझी जो हमें आज तक झेलनी पड़ रहीं है।
अजीब परम्परा है, जिस प्रकरण में दो-दो जाने गई हों उसकी पृष्ठभूमि में लोग ‘गुजिया’ बनाकर खा रहे हैं। मिठाईयाँ बनाकर मोहल्ले भर में बाँट रहे हैं। गजब की असंवेदनशीलता है ! लोग, एक औरत के जल मरने की खुशी में सराबोर होकर एक-दूसरे के गले मिल रहे हैं। हँसी-मजाक, ठट्ठा कर रहे है। हुरियारे बनकर झुँड के झुँड ढोल-ढमाके के साथ नाचते-गाते शहर भर में गश्त सी लगा रहे हैं, दूसरों को डरा रहे हैं, कि स्सालों सम्हलकर रहना, वर्ना खैर नहीं। अभी होली जलाई है समय आया तो तुम्हें भी जला देंगे। प्रहलाद की पार्टी तक ने होलिका दहन और हिरण्यकश्यप वध के बाद भी कभी ऐसा जुलूस न निकाला होगा........ । फिर हम क्यों बावले हुए जाते है ?
ठीक है, अभी तो खैर होली सर पर आ खड़ी है, परम्परा है, मना लीजियें। चन्दा भी खाइये, भाँग-घोटा, ठर्रा भी चढ़ाइये, खूब गाली-गलौच करिये, रंग में सराबोर हो जाइये, मिठाई-पकवान उड़ाइये, पड़ोसनों के गले लगिये, परन्तु भाइयों उस बदमाश को ज़रूर ढूँढ निकालिये जिसने होली की परम्परा के नाम पर चन्दा खाने, भाँग खाकर नालियों में लोटने, शराब पीकर गाली-गलौच करने, माँ-बेटियों के साथ बदतमीजी करने की अपरम्पराएँ चला दी हैं। उसे ढूँढकर लाओं उससे एक और जरूरी बात पूछना है कि ‘‘गटर के पानी में डुबकी लगवाकर फिर ‘‘बुरा ना मानो होली है’’ कहने की परम्परा आखिर किसने शुरू की। परम्परावादियों के पास कोई जवाब हो तो कृपया होली के पहले मुझे बताने का कष्ट करें।
 
समुचित संपादन के साथ दिनांक 28 फरवरी 2010की नईदुनिया साप्ताहिक पत्रिका के होली विशेषांक में प्रकाशित।