शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

आदमी नहीं मरता



 व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
तम्‍बाकू की वकालत करने वालों के हौसले देखकर कई सौदाइयों की हौसला अफजाई हुई है और अब वे भी अपना-अपना धंधा चमकाने के लिए अपनी क्रांतिकारी दलीलों के साथ मैदान में कूँदने की तैयारी कर रहे हैं। सबसे पहले सीना फूलाने वालों में शराब लॉबी के सज्‍जन लोग होंगे। बयान आने ही वाला है कि-“ शराब पीने से कोई नहीं मरता। शराब पीकर आदमी जानवर नहीं बनता न अपनी बीवी को पीटता है। शराब पीने से कभी किसी का लीवर नहीं सड़ता। शराब से कभी किसी के घर के बरतन-भांडे़ नहीं बिकते। इसलिए इसे घर पहुँच व्‍यवस्‍था के अन्‍तर्गत लाया जाना चाहिए। पाउचों और बोतल बंद पानी की तरह इसे स्‍टॉल-स्‍टॉल पर उपलब्‍ध कराया जाना चाहिए और तो और मुन्‍सीपाल्‍टी के नलों के ज़रिए इसे घर-घर पहुँचाने का व्‍यापक प्रबंध किया जाना चाहिए।”
गाँजा, भाँग, चरस, कोकीन, हेरोइन आदि-आदि पदार्थों के समर्थक भी एकजुट होने की फिराक में हैं। इनका यह मत स्‍ट्रांग होने ही वाला है कि- “इन अमृत तुल्‍य पदार्थों के सेवन से कभी कोई नहीं मरता। ड्रग एडिक्‍शन एक भ्रम है। नशाखोरी एक दुष्‍प्रचार है। इससे कभी किसी का कुछ बुरा नहीं होता, बल्कि अर्थव्‍यवस्‍था और इंसान दोनों को पंख लग जाते हैं।
इनकी देखा-देखी मिलावट के क्षेञ के विद्वान भी अपनी बिरादरी को सपोर्ट करने वाले शक्तिशाली जन-प्रतिनिधि की तलाश में लग गए हैं। उन्‍हें भारी अफसोस है कि उन्‍होंने समय रहते चुनाव में अपना आदमी नहीं खड़ा किया। उनका भी सीना ठोककर कहना है कि-“मिलावट से कोई नहीं मरता। पिछले सढ़सठ सालों से हल्‍दी में पीली मिट्टी, मिर्च पाउडर में ईट का चूरा और धनिया में घोड़े की लीद मिलाई जाती आ रही है, आज तक किसी के मरने का कोई समाचार नहीं है। खान-पान की कौनसी सामग्री नकली नहीं बनती, कभी किसी की मौत हुई है? हमारे देश में तो मरीज़ लोग नकली दवाइयों से ही ठीक होते हैं और ह्रष्‍ट-पुष्‍ट बने रहते हैं। लिहाज़ा मिलावट और नकली उत्‍पादों के संरक्षण-संवर्धन के लिए शीध्र कुछ किया जाना चाहिए। अलग से एक मंञालय बना दिया जाए तो मिलावटी और नकली उत्‍पादों में इफरात वृद्धि की जा सकती है।“
फल-सब्जि़यों और तमाम तरह के कृषि उत्‍पादों में पेस्‍टीसाइड्स के इस्‍तेमाल से लोगों का स्‍वास्‍थ खराब होने की अफवाहें आम हैं, मगर इन्‍हें खाकर कभी किसी के मरने की खबर सुनी है? सुनी भी होगी तो वह सरासर झूठ है। बेवजह पेस्‍टीसाइट्स को ज़हर बताकर इन्‍हें बंद करवाने का षड़यंञ रचाया जाता है। यह लॉबी तो इस बात की भी सिफारिश करवाने की फिराक में है कि पेस्‍टीसाइट्स को नमक और चटनियों की तरह थाली में परोसकर खाने की प्रथा को प्रचलन में लाने के लिए कुछ कद्दावर जन-प्रतिनिधियों का समर्थन मिल जाए तो पेस्‍टीसाइट के उत्‍पादन के सारे रिकार्ड टूट पड़े।
इधर हाल ही में जयपुर में खून के नाम पर थैली में लाल रंग का पानी भरकर बेच देने की अद्भुत घटना सामने आई है। किधर हैं महान लोग, आओ और मुनादी करो कि शरीर में खून की जगह लाल रंग का पानी चढ़ाने से कभी कोई नहीं मरता, क्‍योंकि आदमी का खून वैसे ही पानी हो चुका है। आदमी यूँ ही नहीं मरता।  

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

बजट का अनुमान

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
कुछ ही घंटों में ‘आम’ बजट आने वाला है। इससे पहले कि टी.वी. वाले बजट पूर्व अनुमानों का कलरव शुरू करें, पेश-ए-खिदमत है आने वाले बजट की कुछ ऐतिहासिक घोषणाओं का पूर्व अनुमान। समझा जाता है कि इस बार ‘आम-बजट’ में सचमुच ‘आम’ लोगों के लिए ही सब कुछ होगा और खास लोग इसके आगमन से भारी ठगा हुआ महसूस कर उपद्रव करेंगे।
इसकी विशेषता होगी कि यह बजट हमेशा की तरह ‘घाटे’ का बजट न होकर बंफर ‘फायदे’ का बजट होगा, और बजट में दर्शाए जाने वाले ‘फायदे’ को आम जनता के बीच बराबर-बराबर बाँटने के लिए समुचित प्रावधान किये जाएंगे ताकि जनता के सिर पर लदे हुए राष्ट्रीय कर्ज़ का बोझ कुछ हलका हो सके और वह सुभीते से चल-फिर सके।
आम जनता को जबरदस्त झटका लगेगा कि इस बार आटा, दाल, चावल, नून, तेल सब कुछ बेहद सस्ता कर दिया जाएगा। रोटी कपड़ा मकान आम आदमी की इतनी पहुँच में आ जाएंगे कि ‘परोपकारी राज्य’ की संवैधानिक अवधारणा से भी ऊपर उठकर ‘समाजवादी समाज’ का भ्रम पैदा हो जाए। बजट की इस करतूत से बड़ी संख्या में आम जनता कुंठित होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए प्रेरित हो जाएगी क्योंकि ज़ालिम बाज़ार से मुकाबले के लिए रात-दिन बस कमाई की जद्दोजहद में काले-पीले काम करने की मजबूरी के समाप्त होने से उनके सामने जो खालीपन आ खड़ा होगा, उसको भरने के लिए उनके पास कोई रचनात्मक रास्ता नहीं होगा।
शिक्षा-दीक्षा से संबंधित सारे खर्चों की जिम्मेदारी सरकार खुद अपने सिर पर ले लेगी, ऊँची से ऊँची पढ़ाई के लिए फीस की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी एवं पाठ्य पुस्तकें और तमाम शिक्षण सामग्री मुफ्त में उपलब्ध होगी। जरूरी हुआ तो नालायक बच्चों को फीस दे-देकर पढाया जाएगा।
बिड़ी-सिगरेट-तमाकू और देसी-विदेशी शराब, तमाम ड्रग्स, भांग, अफीम, चरस इत्यादि पर महँगाई कि जबरदस्त मार होगी और ये सिर्फ खास बड़े-बड़े रईस लोगों की पहुँच मात्र में ही रह सकेंगे। राजस्व के नुकसान से बचने के लिए कीमत को ऐसे अनुपात में बढ़ाया जाएगा कि आम जनता द्वारा मजबूर होकर इन लतों को छोड़ने से सरकारी खज़ाने पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े और सरकार की कमर सही सलामत रहें। जीवन रक्षक दवाइयाँ, टानिक्स, ग्लूकोस, टिंचर, आयोडीन और तमाम सर्जिकल आयटम्स की कीमतें ज़मीन पर पटककर इन्हें घरेलू उद्योग के दायरे में लाया जाएगा ताकि पान-बिड़ी सिगरेट की दुकानों के प्रोपराइटरों को बेरोजगारी का सामना न करना पड़े।
पेट्रोल, डीजल, एल.पी.जी. की कीमतों में इस कदर कमी लाई जाएगी कि ओपेक कंट्रीज़ भी इनकी खरीद के लिए भारत के चक्कर लगाए और अमरीका को डीज़ल-पेट्रोल, गैस भरवाने के लिए यहाँ आना पड़े। देश के भीतर तो पाइप लाइन से घर पहुँच सप्लाई का व्यापक प्रबंध किया जाएगा ताकि हर भारतीय रोज़ सुबह चार बजे पेट्रोल-डीजल, गैस का नल आने पर अपनी सपनों की लक्झरी कार का टेंक फुल कर सके।
मोबाइल, कम्प्यूटर, आई-फोन, टी.वी. इत्यादि-इत्यादि इलेक्ट्रानिक गजेट्स इतने सस्ते कर दिये जाएंगे कि लोगों को खरीदने में शरम आए और वे इसके इस्तेमाल में खोटी होने वाले टाइम को बचाकर देश की दूसरी समस्याओं पर ध्यान देने के लिए खर्च कर सकें। 
इसके अतिरिक्त भी इस बार अनेक क्रांतिकारी प्रावधान बजट में किये जाने की पूर्ण संभावनाएँ हैं जो कि मेरा यह बजट अनुमान फेल न हो गए तो अवश्य ही बजट में नज़र आएंगे। अनुमान तो आखिर अनुमान हैं, फेल भी हो सकते हैं, उसमें क्या! दिल को समझाने के लिए गालिब ये बजट पूर्व अनुमान अच्छा है।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

फैक्चर्ड मैनडेट



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
दिल्ली की जनता को ‘फैक्चर्ड मैनडेट’ देने की सज़ा मिली है-दोबारा चुनाव! इसके बाद भी यदि जनता न मानी तो दोबारा, तिबारा फिर चौबारा और पाँचवी बार भी हो सकते हैं चुनाव। जब तक किलियर कट मैजोरिटी नहीं दोगे बेटों, झेलते रहो चुनाव। सही हों-गलत हों, चोर हों-लुटेरी हों, भ्रष्ट हों-निकम्मी हों, कैसी भी हों राजनैतिक पार्टियाँ, मैनडेट तो तुम्हें किसी एक को देना ही पड़ेगा नासपिटों, यही लोकतंत्र का तकाज़ा है।
लेकिन मुझे लगता है कि अगर राजनैतिक पार्टियाँ आपस में तालमेल न बिठाकर यूँ ही बार-बार चुनाव-चुनाव खेलती रही तो कहीं ऐसा न हो कि जनता, तमाम पार्टियों को घर बैठने की सलाह देकर खुद ही सरकार बना ले और कुटिर उद्योग की तरह उसे चलाए। क्या कहा ? लोकतंत्र है! जनता ऐसा नहीं कर सकती! ऐसा करना तो सरासर देशद्रोह कहलाएगा। सरकार तो किसी न किसी पार्टी को ही चलाना पड़ेगी! जनता का फर्ज़ है कि वह चुपचाप किसी एक पार्टी को मैनडेट थमाकर सरकार चलाने का अधिकार दे और घर जाकर आराम करे। भूले से भी खुद उस अधिकार का इस्तेमाल करने की जुर्रत की तो समझ लेना, इतने डंडे पडेंगे कि नानी याद आ जाएगी।
फिर क्या करें? किसी को भी पकड़कर राज्याभिषेक कर दें? आ भई, तू फालतू बैठा है, आजा बैठ जा आकर गद्दी पर और फटाफट अपने नौरत्‍न एपाइंट कर ले। चलने दे नादिरशाही की तर्ज पर दिल्ली की सरकार। यह भी नहीं हो सकता, लोकतंत्र इसकी इजाज़त नहीं देता। लोकतंत्र इस बात की इजाज़त दे देता है कि जनता तीन-चौथाई तादात में नादिरशाहों को चुनकर क्लियर मेनडेट दे दे, बाकी सरकार चलाने का काम वे खुद कर लेंगे। जनता को तकलीफ उठाने की कोई ज़रूरत नहीं।
एक और आइडिया है। इधर सरकारी सेवकों की सुप्रसिद्ध मक्कारी की वजह से बहुत सारी सेवाएँ प्रायवेट सेक्टर को सौंपी जाने लगी हैं। क्यों न लगे हाथ यह एक्सपेरीमेंट भी कर लें, कि दिल्‍ली में सरकार चलाने का जिम्मा प्रायवेट सेक्टर को सौंप दिया जाए। शीर्ष कार्पोरेट घरानों को आमंत्रित कर दिल्ली सरकार बनाकर उसे चलाने के प्रस्ताव प्राप्त किये जाए। या फिर, सीधे ओपन टेंडर आमंत्रित कर सरकार बनाने और चलाने की दरें प्राप्त कर लें और लोएस्ट दर के आधार पर सरकार बनाने का ठेका किसी फर्म को देकर झंझट से छुटकारा पा लिया जाए। ठेके में स्पर्धा को और व्यापक बनाना है तो ग्लोबल टेंडरिंग की जा सकती है ताकि मल्टीनेशनल्स भी दिल्ली सरकार बनाने के प्रस्ताव पेश कर सके, और यदि किसी अपने वाले को उपकृत करना है तो कोटेशन कॉल कर पीसवर्क पर सरकार बनाने का ठेका दिया जा सकता है। अर्थात प्रत्येक डिपार्टमेंट अलग-अलग राजनैतिक पार्टी को देकर दिल्ली सरकार का कामकाज सुचारू रूप से चलाया जा सकता है।
देखो भई, पुरानी कहावत है जैसा देस वैसा भेस । नहीं मान रहे बापड़े और हर बार फैक्चर्ड टूटा-फूटा, बेमतलब का मैनडेट देते रहेंगे तो अपन को तो भई देश चलाना है। कम्बख्त इस जनता का क्या, जहाँ मर्ज़ी वहाँ अपना वोट पटक कर लोकतंत्र के सामने मुसीबत खड़ी कर देती है। अब फिर अगर जनता ने वही हरकत की तो मैं तो दूसरी स्टेट से जनता बुलवाकर दिल्ली में चुनाव करवाने तक के पक्ष में हूँ, किसी को अच्‍छा लगे या बुरा। जैसे भी हो भाई लोकतांत्रिक ढॉचे की सुरक्षा तो होना ही चाहिए।   
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रविवार, 19 अक्टूबर 2014

मुफ्त का माल


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//  
इनदिनों बाज़ार में डरते-डरते घुसना पड़ता है। कोई सोच सकता है हमारा अपना बाज़ार है, ‘भारतीय बाज़ार’, उसमें डरते हुए घुसने की क्या ज़रूरत है, आराम से सीना फुलाकर घुसना चाहिए! मगर नहीं साहब, मेरे हिसाब से तो बिल्कुल डरते हुए ही घुसने की ज़रुरत है, क्योंकि इन वक्त हरेक दुकानदार अपनी दुकान में ‘फ्री’ का सामान लिए बैठा रहता है। रोजमर्रा के उपयोग वाले घरेलू सामान की बनिस्पत ‘फ्री’ में बँटने वाले माल से ही सारी दुकान भरी रहती है। खुद दुकानदार को भी खड़े होने को जगह नहीं होती। फिर ग्राहक देव भी माले-मुफ्त के चक्कर में दुकान में आकर भीड़-भड़क्का करते हैं। ऐसी ठसा-ठसी में मुझ जैसा सीधा-शरीफ आदमी तो बेचारा घबराहट में मर ही जाए।
बड़े से बडे़ शो रूम का मैनेजर हो या छोटे-मोटे जनरल स्टोर का मालिक इस वक्त मनुहार, प्यार-मोहब्बत, नम्र निवेदन से, जैसे भी हो आपको जबरदस्ती फ्री का माल टिपाने की जुगत में रहता है। आप दुकान पर पहँुचे और उसने आपको मुफ्त का माल टिपाकर दुकान खाली की, ताकि अगला लॉट भरा जा सके। आप खरीदने कुछ जाओगे वह आपको ‘फ्री’ के चार ‘अल्तुए’ के साथ कुछ और ही पकड़ा देगा जिनकी जन्म-ज़िन्दगी में आपको कोई ज़रूरत नहीं पड़ने वाली। जैसे, चाय-पत्ती लेने जाओगे तो दुकानदार आपको दो सेकंड की प्लास्टिक के गिलास थमा देगा। वाशिंग पाउडर खरीदने जाओगे तो वो दो घटिया से मग्गे पहले काउंटर पर निकालकर रखेगा फिर वाशिंग पाउडर का डिब्बा बाहर निकालेगा। आपको झक मार कर प्लास्टिक का यह कबाड़ अपने साथ ले जाना पडे़गा, क्योंकि आपको मालूम है चाय-पत्ती और वाशिंग पाउडर की कीमत के साथ उस माले-मुफ्त की कीमत भी जुड़ी हुई है।
एक बार बाज़ार में एक दुकान पर लिखा देखा-‘‘हमारे यहाँ हर सामान पर भरपूर ‘मुफ्त‘ उपहार ‘गारन्टीड‘ मिलेगा। मुफ्त के उपहारों पर भी ढेरों उपहार मुफ्त मिलने की पूर्ण संभावना। जल्दी से जल्दी आइए और मुफ्त दीपावली की खुशियाँ मनाइये।’’ अपने घर को दुनिया भर के कचरे से भर लेने के लालच में लोग खुद भी बाकायदा झुंड बनाकर ऐसी दुकानें ढूढ़ने निकलते हैं जहाँ से खरीदारी करने पर उनका झोला मुफ्त के माल से भर जाए।  
एक दिन मैं एक साड़ियों की दुकान की ओर निकल गया। दुकान पर एक सूचना पट्ट बड़ी बेफिक्री से लटका हुआ सूचना दे रहा था, जिसे देखकर मख्खी घुस जाने के डर के बावजूद मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। आँखें कोटरों से बाहर आ गर्इं। बोर्ड पर लिखा था-छः साड़ी लेने पर आठ साड़ी मुफ्त, मात्र एक हज़ार रुपए में। यानी कि चौदह साड़ियाँ हज़ार रुपए में मतलब लगभग 70 रुपए की एक साड़ी। आजकल सत्तर रुपए की औकात ही क्या है! छोटे-मोटे शापिंग मॉल में पोछे का कपड़ा तीन-चार सौ रुपए से कम का नहीं मिलता। सोचा साड़ियाँ लूँ न लूँ कम से कम आफर को जी भर के निहार तो लूँ। जम गया तो जिन्दगी में पहली बार मुफ्त के माल से घरवाली को खुश कर दूँगा। दुकान में जाकर साड़ियाँ देखी तो पाया कि उनसे अच्छी साड़ियाँ तो घर की काम वाली बाई पहनकर आती है। उस बाई को भी यदि ये साड़ियाँ उपहार में दी जाएँ तो वह भी उन्हें मुँह पर मार कर चल दे। 
एक दुकान पर बेतहाशा भीड़ हो रही थी। लोग एक दूसरे के ऊपर चढ़े जा रहे थे। बोर्ड लगा था एक ब्रांडेड कमीज पर दो कमीज फ्री, दो ब्रांडेड कमीज पर तीन कमीज फ्री, तीन ब्रांडेड कमीज पर चार कमीज फ्री। मैंने दुकानदार से पूछा-भाई साहब वह कमीज़ कितने की है जिस पर आप ‘फ्री’ पर ‘फ्री’ कमीज़ें बाँटकर ग्राहकों को खुश कर रहे हैं। दुकानदार ठसक के साथ बोला-उनतीस सौ पिन्‍चानवे! एक मामूली कमीज़ की इतनी ऊँची कीमत सुनकर मेरे चेहरे का तो ब्रांड ही बदल गया, जिसे देखकर दुकानदार मुझ पर हिकारत की नज़रें बरसाता हुआ मात्र आधा वाक्य बोला- ‘‘ब्रांडेड है !’’ दुकानदार का आधा वाक्य मन ही मन मैंने खुद पूरा कर लिया - ‘‘तुम्हारे बाप ने भी कभी खरीदी है !’’
आगे कहीं पर एक जींस पर दो जींस फ्री की तख्ती लगी थी, और कहीं दो टी शर्ट पर तीन टी शर्ट फ्री का बैनर लगा हुआ था। जैसे-जैसे मैं बाज़ार की गहराइयों में घुसता चला गया ‘फ्री फ्री फ्री’ के तख्ती-बैनरों और चिल्लाचोट ने मुझे बुरी तरह आतंकित कर दिया था। बाज़ार भर में जबरदस्ती विज्ञापन पढ़ाया जा रहा था, एक अंडरवियर पर दो अंडरवियर फ्री, एक बनियान पर एक बनियान फ्री, एक लक्स पर एक लक्स फ्री, एक आइसक्रीम पर एक आइसक्रीम फ्री। फ्रिज पर माइक्रोवेव फ्री, माइक्रोवेव पर राइस कुकर फ्री, साइस कुकर पर बाउल सेट फ्री आदि-आदि और लोग मारा-मारी करके खरीद भी रहे थे। गोया यह फ्री का माल अगर उनके हाथ से निकल गया तो उनका सब कुछ लुट जाएगा।
भारतीय बाज़ारों में यूँ फ्री-फंड में माल बँटता हुआ देखकर लग रहा है हम कहीं गलती से कहीं समाजवाद, साम्यवाद के दौर में तो प्रवेश नहीं कर गए! या कि रामराज्य आ गया है और पूँजीवाद का चरित्र सुधर रहा है। वामपंथी कहते हैं कि साम्यवाद में बाज़ार नहीं रहेगा, माल मुफ्त में मिलेगा, मुनाफे की प्रवृति खत्म हो जाएगी। लो भाई माल मुफ्त में मिल रहा है। हिन्दुवादी कहते हैं रामराज्य आ जाएगा तो पूँजीपति की नियत ठीक हो जाएगी, वो मुनाफे की लूटमार नहीं करेगा। देढ़ हज़ार की मिक्सी पर पाँच हज़ार मूल्य के दस-दस आयटम बुला-बुला कर मुफ्त दिये जा रहे हैं, तो इसे सेठजी की नियत दुरुस्त होना ही तो कहना पडे़गा। पक्का आ गया भाई रामराज्य। 
मुझ जैसे मुफ्त के माल से दूर भागने वाले सयाने खरीदारों को इस फ्री-फंड के बाज़ार कुछ सामग्री इतनी सफाई से थमाई जाती हैं कि पता ही नहीं चल पाता कि कब उन्होंने उसकी कीमत चुका दी। जैसे बच्चे की ज़िद पर आपने खरीदा पोटेटो चिप्स और साथ में उसकी ज़ोरदार पेकिंग भी खरीद लाए जिसका स्थान सीधा डस्टबिन में है। एक शर्ट खरीदी आपने, कम्पनी ने आपको आकर्षक छपाई वाला महंगा पैकिंग मटेरियल, प्लास्टिक, पॉलीथिन, फोम, पुट्ठा बगैरह यहाँ तक कि आलपिन भी बेच दी आप खुशी-खुशी घर ले आए। माल की कीमत के साथ ही पेकिंग की भी कीमत वसूल की जाकर बाकायदा उसकी रसीद दी जाती है और यह खूबसूरत कचरा घर डस्टबिन और अटाले की शोभा बढ़ाने के लिए भेज दिया जाता है।
रोजमर्रा उपयोग की वस्तुओं जैसे चाय, कॉफी, साबुन, वॉशिंग पाउडर, टूथपेस्ट, ब्रश आदि-आदि सैकड़ों चीजों के साथ चम्मचें, कटोरियाँ, बरनियाँ, डिब्बे-डुब्बे, कप, मग्गे बगैरह कई चीज़ें थमाई जाती हैं और हम मुफ्तखोरी की अपनी आदत से मजबूर यह ना जानते हुए कि इसकी कीमत भी हम चुका चुके हैं, दॉत निपोरते हुए चले आते हैं। यह तमाम फालतू का कचरा बड़ी सफाई से हमारी आधी से ज्यादा कमाई उड़ा ले जा रहा है और व्यापार का आंकड़ा दिन दुगना रात चौगुना बढ़ रहा हैं। बेचने वालों की तिजोरियाँ भर रही हैं और अपने घर में कचरा डंप हो रहा है।
हम जैसे लाखों हैं जिनकी तनख्वाह से कुछ बचता ही नहीं है लिहाज़ा बाज़ार की भेंट भी नहीं चढ़ पाता । हम तो बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं कि कब एक तनख्वाह पर दो तनख्वाह फ्री बँटे तो हम भी बाज़ार की भावी संभावनाओं के मज़े लूटें। क्या पता एक नैनो पर दो नैनो फ्री मिलने लगें। इंतज़ार कर रहे हैं कि बाज़ार इतना उदार हो जाए कि एक फ्लेट पर दो फ्लेट फ्री और एक बंगले पर दो बंगले मुफ्त मिलें। हम भी मुफ्त के माल का सुख ले लें।
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