सोमवार, 29 जून 2020

चीन के पिट्ठू का यहाँ कोई काम नहीं, यह बासठ का हिन्दुस्तान नहीं


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
अगड़म-बगड़म चाइनीज़ सामान की दुकान का आधा शटर खुला हुआ है और चीन के साथ हो गए पंगे से बेखबर चार-छः लोग सस्ता चाइनीज़ सामान खरीद भी रहे हैं। अचानक राष्ट्रवादी नवयुवकों का एक झुंड दुकान पर आ धमकता है और उनका नेता दुकान के बाहर से ही दुकानदार को ललकार कर पूछता है-कौन है बे अन्दर? साले राष्ट्रद्रोही की औलाद। टीवी न्यूज़ नहीं देखता क्या? वो हरामज़ादा चीन हमारी भारतमाता की छाती पर चढ़ा चला आ रहा है और तू उसे फाइनेंशिल सपोर्ट कर रहा है? बाहर निकल राष्ट्रदोही कहीं के।
घबराया हुआ एक अधेड़ उम्र का दुकानदार आधे शटर से बाहर निकलता है और झुंड से मुखातिब होकर पूछता है-अरे क्या हुआ पप्पू भैया? अरे डंपू तुम भी हो? क्या हो गया यार?
पप्पू भैया बोले- यह देश के साथ सरासर गद्दारी है। चीन हमें कुचले दे रहा है और तुम खुलेआम उसका माल बेचकर उसे फायदा पहुँचा रहे हो। चलो बंद करो सब वर्ना दुकान को आग लगा देंगे।
दुकानदार गिड़गिड़ाता हुआ बोला- पप्पू भाईसाहब कैसी बात कर हो यार। हम और गद्दार? क्या बताएँ पप्पू भैया, लॉकडाउन के एकदम पहले ही उधार लेकर 20 लाख का माल सीधे चीन से लाए थे। चार महीने से एक पैसे का धंधा नहीं हुआ। यार पैसे न फँसे होते तो कसम से मैं भी तुम्हारे साथ गद्दारों को सबक सिखाने के लिए निकल पड़ता। डंपू यार समझाओं पप्पू भैया को। हम तो खुद पक्के राष्ट्रवादी है, मगर अपना पैसा तो नहीं डुबा सकते न भाई।
डंपू बगलें झाँकता हुआ बोला- अंकल मैं क्या करूँ? अभी तो चीन के खिलाफ लहर चल रही है। आपको दुकान नहीं खोलना चाहिए थी।
दुकानदार बोला-तुम्हारी बात एकदम सोला आना दुरुस्त है। मैं कहाँ मना कर रहा हूँ। बिल्कुल दुकान नहीं खोलना चाहिए थी। मगर भाई क्या करुँ, घर में फाँके पड़ने की नौबत आ गई है। पैसा रिकवर नहीं हुआ तो घर-दुकान सब बिक जाएगा। उधारी वापस करना है भाई समझा करो। वर्ना हम कोई राष्ट्रवादी से एक रत्ती भी कम नहीं। थोड़ा माल निकलने तक राष्ट्रवाद को साइड में रखते है न भाई। तुम्हारा सब खर्चा पानी मैं दूँगा, पक्का। बस थोड़ा माल बेच लेने दो, नहीं तो मैं पटियों पर आ जाऊँगा।
पप्पू भैया और उनके राष्ट्रवादी साथियों ने दुकान का पूरा शटर उठा दिया और पूरा टोल अन्दर घुस गया। अन्दर सामान खरीद रहे लोगों को हड़काते हुए पप्पू भैया बोले-क्यों बे चीन के पिट्ठुओं, चीन का सामान खरीदकर चीन के हाथ मजबूत कर रहे हो? तुम्हें पता नहीं चीन ने क्या हरकत की है। हमारे बीस बहादुर सैनिकों की जान ले ली है, और तुम लोग खुद तो गद्दारी कर ही रहे हो और ऊपर से दुकानदार को भी पाप का भागीदार बना रहे हो। चलो फुटो यहाँ से।
दुकानदार फिर गिड़गिड़ाने लगा-पप्पू भैया क्या कर रहे हो यार। ग्राहक देवता होता है, उसे ही भगा दोगे तो मेरी रिकवरी कैसे होगी? भाई शटर इसीलिए तो डाल रखा है कि न हमें शर्मिंदगी हो न ग्राहक को, और माल भी ठिकाने लग जाए। भाई अपने ग्राहक भी कम राष्ट्रवादी नहीं है, कसम से। मेरा माल खत्म हो जाने दो, यही ग्राहक अपने बुलावे पर इसी खरीदे हुए चाइनीज़ माल की होली जलाने के लिए बाहर न निकलें तो मेरा नाम बदल देना। मैं चलूँगा भाई आपके साथ चीनी सामान की होली जलवाने। आप प्रोग्राम तो बनाओ। बस मेरा माल बिक जाने दो।
पप्पू भैया बोले-यह अच्छा आइडिया दिया सेठ तूने। यहीं दुकान में ही चीनी माल की होली जला दें तो कैसा रहेगा? प्रेस वालों से कह देंगे कि दुकानदार ने देशभक्ति में खुद अपना बीस लाख का माल फूँक लिया।
दुकानदार बुरी तरह घबरा गया। हाँथ-पाँव जोड़ता हुआ बोला-अरे नहीं नहीं नहीं नहीं पप्पू भाई साहब। अरे डंपू तेरा पापा तो मेरे साथ रोज़ की बैठक वाला है। समझा न यार इसे। देख भाई राष्ट्रवाद हमारी रग-रग में है। हम कभी देश के खिलाफ कोई काम नहीं करते। पाकिस्तान के खिलाफ हम कभी पीछे नहीं रहते। चीन के खिलाफ भी कोई मनाही नहीं है। मगर बीस लाख कोई कम नहीं होते यार। मर जाऊँगा मैं। अपन करेंगे न बाद में, अभी थोड़े दिन राष्ट्रवाद स्थगित रख लो न। राष्ट्रवाद कहीं भागा थोडे ही जा रहा है। न चीन अपनी हरकतों से बाज आने वाला हैं। भाई जित्ते की कहोगे उत्ते की रसीद कटवा लूँगा। खर्चे पानी का वादा मैं पहले ही कर चुका हूँ। और क्या चाहिए बोलो?
पप्पू भाई जेब से बीड़ी माचिस निकालते हुए बोले- देखो सेठ, यह देश की इज्‍ज़त का सवाल है। हमने चीनी माल का बहिष्कार करने का प्रोग्राम हाथ में लेकर भारत माता की इज्‍ज़त को बचाने का प्रण लिया है। और तुम भारतमाता की इज्‍ज़त की धज्जियाँ उड़ा रहे हो। ऐसा बिल्कुल नहीं चलेगा। फिर धीरे से दुकानदार के कान में फुसफुसाते हुए बोले- बीस लाख का माल है, चालीस लाख तो बनाओगे ही। फिफ्टी-फिफ्टी कर लेते हैं।
दुकानदार ने पप्पू भैया के चरणों में लोट लगा दी। वह एक कुशल अभिनेता की तरह रोने गिड़गिड़ाने की एक्टिंग करता हुआ बोला-क्या बोल रहे हो पप्पू भैया, दोगुना? बीस का चालीस? भैया, बड़ी मुश्किल से खरीद के रेट में निकाल रहे हैं माल, आपको कहाँ से दें? ए डंपू समझा न भाई इनको। मैं तो जीते जी मर जाउँगा। आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा मेरे पास भाई, दया करो।
पप्पू भाई अपने सपाट चेहरे को और सपाट बनाते हुए बोले- राष्ट्रद्रोहियों के साथ कोई दया नहीं। गद्दारों के साथ कोई मुरव्वत नहीं। चीन के पिट्ठू का यहाँ कोई काम नहीं, यह बासठ का हिन्दुस्तान नहीं। नारेबाजी ज़ोर पकड़ने लगी। राष्ट्रभक्तों की भीड़ दुकान के अन्दर घुस गई जिसमें डंपू सबसे आगे था। देखते ही देखते दुकान का सारा सामान बाहर सड़क पर फेंक दिया गया और आसपास मौजूद सैंकड़ों तमाशबीन चीनी सामान उठा-उठाकर भागने लगे।            
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बुधवार, 17 जून 2020

चोटी का आत्मनिर्भर बन जाऊँ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आत्मनिर्भरता अपने-आप में बहुत ही ज़बरदस्त किस्म की फिलॉसफी है। पुराने ज़माने के सभी बाप लोग यह फिलॉसफी जम कर झाड़ा करते थे। मूछों के रुएँ फूटने से पहले ही ‘‘आत्मनिर्भर बनो-आत्मनिर्भर बनो’’ का राग अलापते हुए वे हाथ धोकर अपने बच्चों के पीछे पड़ जाते थे और कुछ धनकुबेरों के, खंभे के नीचे लालटेन की रोशनी में पढ़ाई से लेकर बड़ा कार्पोरेट हाउस खड़ा करने तक की कहानियाँ सुना-सुना कर बोर किया करते थे। दरअसल इसके पीछे उनका मकसद यह स्पष्ट कर देना होता था कि-भैया, बहुत बड़े ढोर हो गए हो अब तुम, तुम्हारे खर्चे उठाना हमारे बस की बात नहीं है। अपना इंतज़ाम खुद कर लिया करो। सिर्फ खर्चे ही नहीं, युवा अवस्था के लफड़े-झपड़े, समस्याएँ-झँझटें, सिरदर्द इत्यादि से तंग आकर बाप लोग आते-जाते आत्मनिर्भरता की यह फिलॉसफी बच्चे पर जगह-जगह चिपका दिया करते थे।
यूँ तो आत्मनिर्भरता की कहानी काफी पुरानी है। पूँजीवाद के पाँव पसारने से पहले लोग आत्मनिर्भर ही हुआ करते थे। अपना आटा खुद अपनी घट्टी पर पीसकर रोटी बनाते और खाते थे। अब तो आटा पीसने की ज़िम्मेदारी भी बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों ने ले रखी है। वे आधुनिक प्लांटों-मशीनों में आटा पीसकर बढ़िया लुभावनी पेकिंग में लपेटकर हमें बेच देते हैं। हमारी आत्मनिर्भरता उनकी तिजोरी में जाकर बैठ जाती है।
आज़ादी आन्दोलन के समय गाँधीजी ने चरखे का काफी प्रचार किया था। उनकी मंशा थी कि घर-घर में चर्खा स्थापित हो, जैसे कि घट्टी स्थापित थी। वे चाहते थे कि जनता-जनार्दन अपना कुर्ता-पजामा, साड़ी-ब्लाउज खुद बनाकर पहने, बिड़ला के भरोसे न रहें। आत्मनिर्भर बने। लेकिन उन्हें पता ही नहीं था कि उनका करीबी वह आदमी उन्हीं की नाक के नीचे बैठा उनके आत्मनिर्भरता के सपने में पलीता लगा रहा है। बिड़ला जी ने मौका मिलते ही देश भर में अपनी कपड़ा मिलें खोल ली और कपड़ा बना कर बेचने लगे। बापू का सपना और लोगों की आत्मनिर्भरता बिड़ला मंदिर की देहरी पर पड़ी रह गई। 
   आत्मनिर्भरता की फिलॉसफी पिछले सत्तर सालों में कई बार सुनी गई। अब फिर पलट कर आई है। पहले उस वक्त आई थी जब कुछ नहीं था, अब तब आई है जब सब कुछ होने के साथ-साथ गजब की सक्षम सरकार भी है। सरकार चाहती हैं कि हम आत्मनिर्भर बनें, उन्हें कोई तकलीफ न दें। हम रोज़गार न माँगें आत्मनिर्भर बनें, हम अच्छी शिक्षा न माँगें आत्मनिर्भर बनें, अच्छा और सस्ता इलाज न माँगें आत्मनिर्भर बनें। कुछ लोग तो हैं भी इन सब मामलों में प्रचंड आत्मनिर्भर। रोज़गार का मसला चोरी-चकारी करके सुलझा लेते हैं या छोटी-मोटी कोई रहेड़ी-ठेली लगा लेते हैं। शिक्षा का मामला फर्ज़ी सर्टिफिकेट बनवाकर निबटा लेते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में तो लम्बे समय से आत्मनिर्भरता है। मुँह से हवा अन्दर-बाहर करो या आस-पास लगी कोई भी जड़-पत्ती पीसकर, उबालकर पी लो।
मैं भी अब सोच रहा हूँ कि चोटी का आत्मनिर्भर बन जाऊँ। अपना गेहूँ खुद उगाऊँ, आटा खुद पीसूँ और खाऊँ। अपना कपास उगाऊँ, कपड़ा बुनूँ, कपड़े सिलूँ और पहनूँ। बस, ट्रेन, रिक्‍शा पर चढ़ना बंद कर दूँ, पैदल रास्ता नापूँ। बीमार पड़ने पर सरपट डॉक्टर के पास भागता हूँ, यह छिछोरी आदत बंद कर दूँ। अपना डाइग्नोसिस, पैथोलॉजी टेस्‍ट और इलाज खुद कर लिया करूँ। छोटा-मोटा आपरेशन खुद ही निबटा लूँ, फाइव स्टार अस्पतालों को कोई तकलीफ न दूँ। होटल, रेस्टोरेंट का खाना न खाऊँ, जीभ लपलपाए तो खुद बनाऊ खुद खाऊँ। अपने हाथ से कपड़े फचीटूँ वाशिंग मशीन के भरोसे न रहूँ। कपड़ों पर इस्तरी भी खुद कर लूँ रामसिंह को परेशान न करूँ।
मेरा बस चले तो मैं तो भैया अपना बजट खुद ही बना लूँ, एलोकेट करूँ, और अपना विकास खुद ही कर लूँ। विकास के नाम पर चुनाव जीतने वालों के भरोसे कुछ न छोड़ूँ। अपनी सड़क खुद खोदूँ खुद बना लूँ। अपना मकान खुद ही तामीर कर लूँ। अपना पुल, अपना बाँध, अपना तालाब खुद बनाऊँ और सरकार के भरोसे बिल्कुल न बैठूँ । अपना कच्चा तेल मैं खुद निकाल लूँ, अपना पेट्रोल अपनी गैस खुद बना लूँ, अंबानी-अडानी को कोई कष्ट न दूँ। और कितना आत्मनिर्भर हो जाऊँ बताओ आप?
मैं तो हर उस चीज़ में आत्मनिर्भर होने को तैयार हूँ जिसकी जवाबदेही लेने से जवाबदार लोग कतराते हैं। चलो मैं अर्थव्यवस्था, जी,डी,पी, और महँगाई सूचकांक में भी आत्मनिर्भर हो लूँगा, ताकि अपनी बरबादी का मातम खुद मना लूँ, तुम पर कोई आँच न आए।
मैं तो यहाँ तक आत्मनिर्भर होने को तैयार हूँ कि अपनी मौत को भी आत्मनिर्भरता से मर लूँ। चाहे रेल के नीचे आ कर मरूँ, चाहे बस के नीचे, चाहे भूखा-प्यासा तड़फ-तड़फ कर मर जाऊँ। चाहे कोरोना वायरस से या सार्स-इबोला किसी से भी मरूँ, पूरी आत्मनिर्भरता बरतते हुए मरूँ। तुम पर कोई दोष न आने दूँ। यहाँ तक कि खुद मरघट में जाकर अपनी मृत्‍युशैया खुद ही बना लूँ, खुद ही उसपर लेट जाऊँ और खुद ही अग्नि लेकर भस्म हो जाऊँ। अब इससे ज्यादा आत्मनिर्भर और किस देश की जनता हो सकती है, बताओ भला?
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सोमवार, 8 जून 2020

स्‍थानांतरण मस्तिष्‍क का

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          मानव शरीर के सबसे कीमती ऊतकों के समूह ‘मस्तिष्‍क’ को सुरक्षित एवं चलायमान बनाए रखने के लिए प्रकृति ने मनुष्‍य के शरीर में मात्र एक जगह बनाई है, ‘खोपड़ी’, परन्‍तु कुछ महान लोगों ने अथक परिश्रम, दीर्घकालीन प्रयासों एवं अपने आस्‍था व विश्‍वास के बल पर प्रकृति की इस स्‍थायी व्‍यवस्‍था के विरुद्ध जाकर मस्तिष्‍क को रखने के लिए दूसरा ही ठीकाना विकसित कर लिया है, वह है ‘घुटना’। खोपड़ी के साइज़ के मस्तिष्‍क को घुटने के साइज़ में लाने के लिए उन्‍होंने क्‍या किया होगा पता नहीं। मगर जब किसी ज्‍़यादा आयतन वाली वस्‍तु को उसके आयतन से बनिस्‍पत कम जगह में ठूँस-ठूँस कर घूसेड़ा जाए तो निश्चित ही उसकी कार्य-क्षमता सदियों नीचे जाकर गिर सकती है, और तो और उसकी अकाल मृत्‍यु भी हो सकती है। 
          इन दिनों हो यही रहा है कि अक्‍़ल और सोच-विचार संबंधी सभी कार्य उसी ज़बरदस्‍ती घुटने में ठुँसे हुए मस्तिष्‍क से कराया जा रहा है जो या तो कार्य-क्षमता विहीन है या मरणासन्‍न अथवा मृत अवस्‍था को पा चुका है। 
          खोपड़ी वाला रिक्‍त स्‍थान अधिकतर खाली मकान की तरह खाली पड़ा-पड़ा धूल-धक्‍कड़ और मकड़ी के जालों का उत्‍पादन करता रहता है। अन्‍दर यहाँ-वहाँ तंत्रिका तंत्र के केबल उखड़े हुए बिजली के तारों की तरह तटके हुए, हवा में झूलते देखे जा सकते हैं। इन केबलों की कोई उपयोगिता नहीं रह गई है क्‍योंकि जिस मस्तिष्क को वे सूचनाएँ पहुँचाने का काम करते थे वह तो घुटने में शिफ्ट कर दिया गया है। दाएँ या बाएँ किस घुटने में यह भी अज्ञात है। खोपड़ी मालिक ने वे कीमती केबल शायद इसलिए लटके छोड़ दिए हैं क्‍योंकि क्‍या पता निज़ाम बदलने पर शायद फिर मस्तिष्‍क को घुटने से निकालकर खोपड़ी में स्‍थापित करना पड़ जाए। या हो सकता है बुरे वक्‍त में उन केबलों को निकाल कर कबाड़ी को बेचने का भी इरादा हो। 
          मस्तिष्‍क विहीन खाली पड़ी खोपड़ी में किसी-किसी के द्वारा कूढ़ा-करकट इकट्ठा करने की बातें सुनी जाती हैं। बाहर कचरा फेंकना मना जो है। जुर्माना हो सकता है। कूढ़े से कम्‍पोस्‍ट अच्‍छा बनता है। देशभक्‍त शोहदों के बालों की बढ़वार शायद इसीलिए आजकल ऊफान पर है क्‍योंकि कूढ़े की खाद जो प्रचूर मात्रा में उपलब्‍ध है। कुछ लोग खाली पड़ी खोपड़ी में भूसा स्‍टॉक कर के रखते हैं। जैसे आमतौर पर गाँवों में दबंग लोग अपने जानवरों के लिए स्‍कूल के कमरे में भूसा भर कर रखते हैं। हालाँकि खोपड़ी में भूसा भरा होना खासा खतरे का काम है। देश में आग लगाने वालों की कमी तो है नहीं। तभी तो आजकल लोग भड़की हुई खोपड़ी लिए दनदनाते फिरते हैं। ऐसा कोई हाई वोल्‍टेज सीन देखकर लोग आसानी से समझ जाते हैं कि अगले का दिमाग उसके घुटने में है। 
          जबसे गो और गो-उत्‍पादों की महत्‍ता बढ़ी है, लोग खाली खोपड़ी में गोबर भी भर के रखने लगे हैं। वक्‍त-ज़रूरत के हिसाब से उसे बाहर निकाल कर उपयोग में लाते रहते हैं। वैचारिक रूप से नापसंद लोगों के मुँह पर पोतने के लिए गोबर सबसे मुफीद रहता है। या फिर यूँ ही अपनी बातों-भाषणों के साथ मुँह से फुर्र-फुर्र उड़ाते रहो। नेता लोग यही करते हैं। गीला होने से गोबर में आग लगने का खतरा कम रहता है मगर यदि वह पड़ा-पड़ा सूख गया हो तो उसमें थोड़ी सी हवा के साथ आग दे दो, बस, वह आग भीतर ही भीतर सुलगती रहेगी और दशकों सदियों तक सुलगती रह सकती है। कब वहाँ से निकल कर निरीह मानव समाज को राख कर दे कह नहीं सकते। ऐसी काफी सारी राख हम अपने चेहरों पर पहले ही से पोते घूम रहे हैं। 
          मेरा मानना है कि भविष्‍य में मानव घुटने के अलावा भी मस्तिष्‍क को रखने के लिए कोई न कोई जगह अवश्‍य खोज लेगा। जैसे पिंडली या टखने में भी दिमाग को ठूँसकर रखा जा सकता है। हो सकता है घुटने में गठिया का प्रकोप हो जाने की दशा में लोग ऐसा करते भी हों। जो लोग दिन-रात खाने में लगे रहते हैं वे शायद पेट में मस्तिष्‍क रखने लगें। खाने से मेरा मतलब छप्‍पन भोग से नहीं बल्कि रिश्‍वत, सरकारी धन-संपत्ति, जनता की गाढ़ी कमाई खाने से है। उनके मस्तिष्‍क को सोच-विचार से क्‍या काम, पड़ा रहेगा पेट में। 
          बात निहायत ही अवैज्ञानिक है मगर मेरा बस चले तो मैं सबका मस्तिष्‍क उनके दिलों में स्‍थानांतरित करवा दूँ ताकि फिर वे अपने दिल से सोचने को मजबूर हो जाएँ। कहते हैं न दिल से सोचने वाले ज्‍़यादा भावुक होते हैं। शायद, दिल में रहकर आदमी का मस्तिष्‍क प्‍यार-मोहब्‍बत, भावनाओें, रिश्‍तों की खूबसूरती को समझने लगे। बेशकीमती इन्‍सानी जि़न्‍दगी की कद्र करने लगे, नफरतों की जुगाली करना भूल जाए, शायद ? ऐसा हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता।
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रविवार, 31 मई 2020

आत्‍मनिर्भर बनो ट्रेन बनो


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
स्टेशन पर एनाउन्समेंट गूँजा- मुंबई से चलकर इंदौर, हैदराबाद, जयपुर, बिलासपुर के रास्ते छपरा जाने वाली धारवाड़-गोरखपुर एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से एक पखवाड़ा विलंब से चल रही है। यात्रियों से निवेदन है कि वे रेल प्रशासन का सहयोग करें। यात्रियों की सुविधा के लिए रेल विभाग दृढ़संकल्पित है। धन्यवाद। टिंग-टाँग।
मैंने एनाउंसमेंट में बताए गए रूट का खाका अपने दिमाग में खींचने की असफल कोशिश की एवं लपककर पास खड़े टीसी को पकड़ लिया और पूछा- भाईसाहब, मुझे लखनऊ  जाना है, जिस गाड़ी का अभी-अभी एनाउंसमेंट हुआ उसमें बैठ जाऊँ क्या?
टीसी बोला- एनाउंसमेंट में लखनऊ  का नाम आया क्या?
मैने कहा- नहीं, सुना तो नहीं।
वह बोला-तो कैसे बैठ जाओगे? पिताजी की ट्रेन है क्या?
मैने कहा- सर नाम तो भोपाल का भी नहीं सुना, तो फिर वह गाड़ी भोपाल क्यों आ रही है?
वह बोला-ससुराल है उसकी। तुमसे पूछकर भोपाल आएगी क्या गाड़ी?
मैंने कहा- मगर एनाउंसमेंट ......
वह बात काटता हुआ बोला-ऐसा कहीं लिखा हुआ है क्या कि गाड़ी जिस स्टेशन पर नहीं आ रहीं है वहाँ एनाउंसमेंट नहीं किया जा सकता?
मैं निरुत्तर हो गया। मैंने याचना पूर्वक कहा-साहब कोई तरकीब बताइये। मुझे किसी भी हालत में लखनऊ  पहुँचना है। दूसरा कोई साधन नहीं है। क्या करूँ बताइये।
वह बोला- आत्मनिर्भर बनो। जैसे हज़ारों मजदूर, औरतें, बच्चे रेल के भरोसे न बैठकर पैदल ही अपने गणतव्य की और कूच कर गए हैं। तुम भी निकल लो। भगवान ने चाहा तो ट्रेन से पहले लखनऊ  पहुँच जाओगे। ट्रेन का कोई भरोसा नहीं है। आत्मनिर्भर हो गई है न, तुम भी आत्मनिर्भर बन जाओ। निकल लो।
मैंने कहा-मज़ाक मत करिये साहब। मुझे तो लखनऊ  का रास्ता भी नहीं पता।
वह बोला- भाई गूगल कर ले। ट्रेनें भी आजकल गूगल से ही चल रही हैं। आ गई, आ गई- नहीं आई, नहीं आई। और नहीं तो ये सामने रही पटरी, पकड़ले, और निकल जा।
मैंने कहा- नहीं नहीं, मैं इतना लम्बा रास्ता पैदल नहीं चल सकता। मैं तो ट्रेन से ही जाऊँगा। मुझे भारतीय ट्रेनों पर पूरा भरोसा है। परन्तु ऐसा तो नहीं होगा न कि ट्रेन मुझे लखनऊ  की बजाय अहमदाबाद पहुँचा दे? गूगल का कोई भरोसा तो है नहीं।
वह बोला- बिल्कुल हो सकता है। क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी लॉकडाउन में सारे शहर एक जैसे होते हैं।
मैंने कहा- आप मज़ाक बहुत अच्छा कर लेते हो। मगर मेरी समस्या को समझिये। मुझे किसी भी कीमत पर लखनऊ  पहुँचना है।
वह रुष्ठ हो गया। झल्लाकर बोला- अरे यार, रेल्वे ने क्या हरेक को यहाँ-वहाँ पहुँचाने का ठेका ले रखा है? चले आए मुँह उठाकर, लखनऊ  जाना है, लखनऊ  जाना है।
मैंने कहा- साहब टिकट है मेरे पास। दस गुना ज्यादा पैसा देकर खरीदा है। अब आप कह रहे हैं कि ठेका ले रखा है क्या? क्या मतलब है। अरे जब पहुँचाना ही नहीं था तो टिकट दिया क्यों?
वह बोला- अबे तो टिकट तो बहुतों को मिलता है। सब लखनऊ पहुँच जाते हैं क्या? मेरा माथा मत खाओ। जिसने टिकट दिया है उससे बात करो।
मैंने कहा- माथा न खाऊँ तो क्या खाऊँ? मज़ाक बना रखा है आप लोगों ने। एक तो ट्रेन एक पखवाड़ा विलम्ब से चल रही है, ऊपर से पता ही नहीं है कि लखनऊ  जाएगी या नहीं जाएगी।
वह बोला- यार तो जहाँ जाएगी वहाँ चले जाओ। बाद में एडजस्ट कर लेना।
मैंने कहा- अरे तो भोपाल आएगी कि नहीं इसकी क्या गारंटी है?
वह बोला- भोपाल में एनाउंसमेंट हो रहा है न?
मैंने कहा- हाँ, सो तो है।
वह बोला- तो क्या हमें पागल कुत्ते ने काटा है जो उसे यहाँ आना नहीं है और हम गला फाड़-फाड़कर एनाउंसमेंट कर रहे हैं?
मैं फिर निरुत्तर हो गया। थोड़ी देर पहले कह रहे थे, कहीं लिखा है क्या कि जहाँ ट्रेन नहीं आएगी वहाँ एनाउंसमेंट नहीं कर सकते, अब कह रहे है पागल कुत्ते ने काटा है क्या।
अचानक फिर टिंग-टाँग का स्वर गूँज उठा और एनाउंसमेंट होने लगा- मुंबई से चलकर हावड़ा, झारसुगड़ा, त्रिवेंदम के रास्ते छपरा जाने वाली धारवाड़-गोरखपुर एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से अनिश्चितकालीन विलंब से चल रही है। यात्रियों से निवेदन है कि वे रेल प्रशासन का सहयोग करें। यात्रियों की सुविधा के लिए रेल विभाग दृढ़संकल्पित है। धन्यवाद। टिंग-टाँग।
मैंने पास की बैंच पर आड़े हो गए उसी टीसी को घूर कर देखा। टीसी कंधे उचकाता हुआ बोला- बोल तो रहे हैं, आत्मनिर्भर बनो, पैदल निकल लो। हमारी ट्रेन भी अब आत्मनिर्भर हो गईं हैं। या फिर एक काम करो, खुद ही ट्रेन बन जाओ। आत्‍मनिर्भर बनो, ट्रेन बनो, एक ही बात है।
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ऑनलाइन विवाह का ऑनलाइन निमंत्रण



//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//

ईश्‍वर की असीम अनुकम्पा से हमारे पुत्र चि. फलांना फलांना (बिल्लू) का ऑनलाइन शुभविवाह सौ.कां. ढिकाना ढिकाना (पम्मी) के साथ सम्पन्न होना सुनिश्चित हुआ है। अतः आप सबसे विनम्र अनुरोध है कि लग्न मुहूर्त ज्येष्ठ माह की फलां फलां तारीख को फलां फलां समय पर अपने-अपने लैपटॉप, डेस्कटॉप, टेबलेट, मोबाइल इत्‍यादि पर उपस्थित रहने का कष्ट करें। विवाह अनुष्ठान का सीधा प्रसारण फेसबुक लाइव, गूगल मीट, ज़ूम, स्काइप, इन्स्टाग्राम इत्यादि पर किया जावेगा जिसके लिए आवश्‍यक लिंक इत्यादि आपको विवाह पूर्व वाट्सअप कर दी जाएंगी।
इस शुभ-विवाह में हमारा पुत्र चि. फलांना (बिल्लू) सिनसिनाटी, यूनाइटेट स्टेट्स ऑफ अमेरिका से एवं श्री/श्रीमति फलां फलां की पुत्री सौ.कां ढिकाना (पम्मी) वैंकूवर, कनाड़ा से ऑनलाइन सम्मिलित होंगे। वर के माता-पिता भोपाल, मध्यप्रदेश से एवं वधु के माता-पिता गुलबर्गा, कर्नाटक से ऑनलाइन रहकर वर-वधु को आशीर्वाद देंगे। विधि-विधान पूर्वक विवाह सम्पन्न कराने की ज़िम्मेदारी काशी के प्रकांड पंडित श्री श्री 101 फलां फलां महाराज द्वारा ऑनलाइन निर्वहन की जाएगी एवं उनके सहायक के रूप  में उज्जैन के पंडित श्री श्री 51 ऑनलाइन उपस्थित रहेंगे। आरती की थाली में दक्षिणा हेतु पंडितजी का पेटीएम नम्बर निमन्त्रण के फुटनोट में उल्लेखित है।
विवाह की समस्त औपचारिकताओं के पश्‍चात ऑनलाइन उपस्थित समस्त घराती एवं बराती वर-वधु को अपना आशीर्वाद केश अथवा काइंड में दे सकते हैं। केश के लिए वर-वधु का बैंक एकाउन्ट नम्बर, पेटीएम नम्बर, गूगल पे, फोन पे इत्यादि के डिटेल निमन्त्रण के फुटनोट में दे दिए गए हैं। काइंड में आशीर्वाद हेतु हमारा एवं समधियाने का डाक पता नीचे लिखा गया है, आप अमेज़न, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, इत्यादि किसी भी खरीद एप से ऑनलाइन आर्डर कर डिलिवरी सीधे हमें पहुँचा सकते हैं।
विवाह के अन्त में स्वरुचि भोज का आयोजन है जिसके लिए खाद्य सेवाओं ज़ोमेटो, उबर ईट, इत्यादि पर व्यवस्था की गई है जो कि सांय 7 बजे से आपके जागते रहने तक डिब्बाबंद पद्धति से आपको उपलब्ध करा दिया जाएगा। आप चाहें तो लोकल स्तर पर अपने किसी पसंदीदा ऑनलाइन खाद्य प्रदाता से अपनी पसन्द का खाना मंगा सकते हैं जिसके लिए आपकी इच्छा अनुसार आपको ऑनलाइन भुगतान कर दिया जाएगा। खाने में किसी प्रकार के परहेज की स्थिति में आप स्वयं घर पर ही अपना परहेजी खाना बनाकर खा सकते हैं।
आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि इस ऑनलाइन विवाह के ऑनलाइन निमंत्रण को व्यक्तिगत उपस्थिति मानकर कृपया नियत समय पर सपरिवार ऑनलाइन रहकर वर-वधू को आशीर्वाद प्रदान करने का कष्ट करें।
विशेष निवेदन- अपने ऑनलाइन उपस्थित रहने, नागिन डांस, भंगड़ा व खाने-पीने इत्यादि की ताज़ा तस्वीरे वाट्सअप पर तत्काल हमसे साझा करने का कष्ट करें ताकि समस्त तस्वीरें इन्स्टाग्राम पर एलबम के रूप में संकलित की जा सके।
ऑनलाइन विनीत - वर के माता-पिता भोपाल, म.प्र. से एवं वधू के माता-पिता गुलबर्गा, कर्नाटक से।
ऑनलाइन स्वागतातुर- वर के चाचा-चाची घाना, अफ्रिका से एवं ताऊ-ताई मस्कट, ओमान से। वधु के चाचा-चाची गुलू, उगांडा से एवं ताऊ-ताई वूहान, चाइना से।
ऑनलाइन दर्शनाभिलाषी- वर के मामा-मामी (1) लिसेस्टर, ग्रेट ब्रिटेन से एवं (2) थाना, महाराष्ट्र से। वधु के मामा-मामी (1) दुर्ग, छत्तीसगढ से एवं (2) ओस्लो, नार्वे से।  वर के मौसा-मौसी रावेत, पूणे इंडिया से एवं वधु के मौसा-मौसी श्रीकाकूलम, आंध्रप्रदेश से।
कृपया अवश्‍य अवश्‍य ऑनलाइन पधारकर हमारा मान बढ़ाएँ।
बाल आग्रह भोपाल से छोटू  - अमाले बैया की शादी में जलूल जलूल ऑनलाइन होना।
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सोमवार, 18 मई 2020

कोरोना काल में रचनात्‍मकता


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
लॉकडाउन में लोगों की रचनात्मकता उफन-उफनकर निकली पड़ रही हैं जिसने जीवन में कभी रचनात्मक का नहीं जाना वह भी, जो हाथ में आए उठाकर रचनात्मक हुआ जा रहा है। पुराने जमाने के बाप आज होते तो लट्ठ लेकर अपनी औलादों पर पिल पड़ते- सालों, बहुत रचनात्मकता सूझ रही है? कोई ढंग का काम कर लो तो जीवन सुधर जाएगा। बापों की इसी घुड़की की वजह से बहुत सारे लोग अब तक नीरचअर्थात अरचनात्मकज़िन्दगी जी रहे थे। लॉकडाउन ने उनकी उसी दबी-कुचली रचनात्मकता को खोद-खोद कर बाहर निकाल दिया है।
ज़्यादातर मर्द किचन में रचनात्मक हो रहे हैं। जो चीज़ बीवी बनाने से साफ-साफ मना कर दे उसे बनाकर रचनात्मकता का सुख ले रहे हैं, फिर भले ही वह पापड़ भूनने की रचनात्मकता हो। लौकी, तुरई, कद्दू जैसी नीरस सब्ज़ियों के पकवान बना-बनाकर रचनात्मक शोषण में लगे पड़े हैं। वैसे तो किचन पारम्परिक रूप से महिलाओं की रचनात्मकता का क्षेत्र रहा है मगर सदियों से रोज़ किचन में खटने के बावजूद भी उन्हें कभी रचनात्मक होने का श्रेय नहीं मिला। मात्र महीना भर वही काम करके पुरुष लोग एक-दूसरे की पीठ ठोके ले रहे हैं।
किचन में तो कई लोगों की रचनात्मकता विकट किस्म की हो पड़ी है। वे पूरे हलवाई बनने पर उतारू हैं। माफ कीजिएगा हलवाईनहीं आजकल शेफकहा जाता है। तो ये नव शेफ गण ऐसे-ऐसे आयटम बना-बनाकर बमुश्किल हासिल किया हुआ घर का सारा किराना बरबाद कर रहे हैं जो शादी पार्टियों या बड़ी-बड़ी मिठाई की दुकानों में ही दिखाई पड़ते हैं। कुछ लोग बेकरी आयटमों में हाथ आजमा कर आटा-मैदा चीनी का सत्यानाश कर रहे हैं तो कुछ लोग जलेबी, इमरती बनाने की असफल कोशिशों में लगे हैं।
रचनात्मकता का यह दौरा लेखन में भी देखा जा सकता है। जो हमेशा काम-धंधे और पैसा कमाने की चिंता में जीवन-यापन करते रहें हैं वे कविता लिखने पर उतारू हैं। शेरो-शायरी लिख-लिख कर गालिब और ज़ौक की आत्मा को झकझोरा जा रहा है। कोरोना काल है तो लेखन की रचनात्मकता का केन्द्र बिन्दु ज़ाहिर है कोरोना ही होगा। कोरोना पर दोहा, चौपाई, कविता, सानेट, शायरी, व्यंग्य, व्‍यंग्‍य चित्रों, चुटकुलों, वन लाइनरों की बाढ़ आ गई है। उन्हें लग रहा है इस बाढ़ में कोरोना ज़रूर डूब मरेगा।
किचन और लेखन यह दोनों गूढ़ विषय जिन महानुभावों से नहीं सधते उनके लिए रचनात्मकता का तीसरा क्षेत्र है बागवानी। यूँ कभी ज़िन्दगी में गमले में पानी न डाला गया हो मगर आजकल वे हाथ में खुरपा-खुरपी लेकर अपनी बीवी के तैयार किए किचन गार्डन की ऐसी-तैसी करने पर तुले नज़र आ रहे हैं। लगे हैं ज़बरदस्ती पौधों की कटाई-छटाई, रिपॉटिंग, ग्राफ्टिंग, एयर लेयरिंग करने में। उन्हें कौन बताए कि भैया फिलहाल इन सब कामों को करने का मौसम नहीं है। पानी भर देते रहो पौधों में। मगर मुश्किल यह है कि पानी दिन भर तो नहीं दिया जा सकता न! सो जो कुछ कर के टाइम काटा जा सके वह कर रहे हैं।
कुछ भाई लोग तो रचनात्मकता को बड़े ही खतरनाक क्षेत्र में खोज रहे हैं। एक भाई साहब का मैसेज आया मेरे पास - घर में दारू बनाने की विधि आती है क्या। मैंने कहा- भाई इतने ज़्यादा रचनात्मक मत बन जाओ कि लेने के देने पड़ जाए। फिलहाल घर में ही क्वारनटाइन हो, दारू बनाने लगोगे तो जेल में क्वारनटाइन होना पड़ेगा।
देखते चलिए, कोरोना काल में रचनात्‍मकता और कितने दिन दिलो-दिमाग पर तारी रहती है।   

शुक्रवार, 15 मई 2020

कोरोना के साथ रहना सीखना होगा


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
बोल रहे हैं कोरोना के साथ रहना सीखना होगा। अब बोल रहे हैं, पहले ही बोल देते। क्यों डेढ़ महीने से देश को बंद कर रखा है। पहले तो बड़े गा-गाकर बोलते रहे, कोरोना को हराना है कोरोना को हराना है, अब अचानक बोलने लगे कोरोना के साथ रहना सीखना होगा। हम तो सीख ही लेते। जैसे दुनिया भर के वायरस बैक्टेरिया के साथ रहना सीख कर बैठे हैं वैसे ही कोरोना के साथ भी रहना सीख लेते। ,?
घर में छिपकली, मकड़ी, काकरोज, चूहों के साथ रहना सीखते है न? कीट-पतंगों और खटमल-मच्छरों के साथ भी रह लेते हैं। कोरोना कौन सी बड़ी चीज़ है, उसके साथ भी रहना सीख लेंगे। ऐसी कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।
बड़े-बड़े बालों के झुरमुट और कौवे के घोंसलों सी दाढ़ी के साथ कोई कितने दिन रह सकता है? लेकिन इस लॉकडाउन में हमने रहना सीख लिया है। इस भयानक रूप में देखकर आस-पड़ोस के बच्चे हमसे डरने लगे हैं। शोड़षियाँ हिकारत की नज़रों से देखने लगी हैं। लेकिन हमने ऐसे अघोरी बाबाओं की तरह रहना सीख लिया है। लॉकडाउन दो-चार पखवाड़े और चले तो अड़ोसी-पड़ोसी बच्चे, नादान शोड़षियाँ भी धीरे-धीरे बर्दाश्‍त करना सीख जाएंगी।
सुना है कि लॉकडाउन में जालंधर से हिमालय दिखने लगा। पहले भी पृथ्वी से स्वर्ग-नर्क दिख जाया करते थे। देवता लोग अपने बीवी-बच्चों के साथ तीनों लोकों के बीच आते-जाते साथ-साफ दिखाई देते थे। बाद में इतना प्रदूषण हो गया कि सब दिखना बंद हो गया। इंसान को इंसान तक दिखना बंद हो गया। प्रदूषण हुआ तो हम मर-खप तो नहीं गए न? जीवित रहे। कड़ाके की ठंड पड़ते ही देश के तमाम शहरों में प्रदूषण के मारे आँखें बाहर निकल पड़ती है। साँस लेना दूभर हो जाता है। फिर भी हम जीते हैं। क्यों? क्योंकि हमने प्रदूषण के साथ रहना सीख लिया है। हमें सिखाने की ज़रूरत नहीं है, हम खुद ब खुद सब सीख जाते हैं।
बता रहे हैं कि लॉकडाउन में नदियों तालाबों का पानी एकदम शुद्ध हो गया। लॉकडाउन नहीं होता है तब? इन्हीं नदियों तालाबों का पानी गटर के पानी से बीस ही साबित हो उन्नीस नहीं। उद्योगों की मेहरबानी से नदियों में पानी नहीं एसिड को बहना पड़ता है। घरों में मुंसीपाल्टी के नलों से पानी की जगह कल-कल करती बीमारियाँ चली आती हैं। हमने बिना ना-नुकुर किये बीमारियों के साथ रहना सीख लिया। बी-कोलाई, हेपीटाइटस बी, कॉलेरा, हम सबके साथ रहते हैं। मलेरिया, चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू, आदि-आदि हर प्रकार के वायरस और बैक्टेरिया के साथ हमने बिल्कुल गंगा-जमुनी तहज़ीब की तरह रहना सीखा है। अस्पताल हो न हो, दवा हो न हो, डॉक्टर हो न हो, हम हर हाल में इन परजीवियों के साथ रहना सीख लेते हैं। कोरोना क्या चीज़ है? रह लेंगे उसके साथ भी। तुम्हारे कहने से नहीं, इस तरह किसी भी चीज़ के साथ सुखपूर्वक रह लेना हमारा जन्मजात गुण है।
भूख के साथ रहना कितना मुश्किल होता है न? लेकिन रह ही रहे हैं न गरीब लोग। पहले दो सौ साल अंग्रेजों के समय भूखे रहे, फिर आज़ादी के बाद तिहत्तर साल भूखे रहना सीखा, अब लॉकडाउन में चालीस-पचास दिन से भूखे रहते-रहते लाखों लोगों ने भूखा रहना सीख लिया है। किसी को पता ही नहीं चला। अपना सर्वस्व न्योछावर करके भूख के साथ रहना वे पीढ़ी दर पीढी से सीखते चले आए हैं। उन्हें कोरोना के साथ रहना सिखाने की कोई ज़रूरत नहीं है। वे माहिर हैं सीखने के।
महँगाई-बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के वादों के साथ नेता लोग गद्दी पर काबिज़ हो जाते हैं पर वादाखिलाफी करना सीखने में उन्हें टाइम नहीं लगता। हम भी अच्छे खासे बेशरम हैं जो अपने जीवट से महँगाई-बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के साथ भी रहना सीख जाते हैं। शोषण, दमन, उत्पीड़न कौन सी ऐसी बला है जिसके साथ हमने रहना नहीं सीखा है। इसके लिए हम कोई तुम्हारे स्कूल-कॉलेजों के भरोसे नहीं बैठे रहे, न भाषणों-प्रवचनों के भरोसे बैठे, हमने खुद अपने अन्दर इतनी ज़बरदस्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है कि हम हर अच्छी बुरी चीज़ के साथ खुशी-खुशी रहना सीख जाते हैं, फिर कोरोना कौन से खेत की मूली है? देर-सवेर उसके साथ भी हम रहना सीख लेंगे। पहले बता दिया होता तो अब तक न केवल हम कोरोना के साथ रहना सीख चुके होते, बल्कि कोरोना को कुत्‍ते की तरह बाँधकर एक कोने में खड़ा भी कर दिया होता।