रविवार, 10 अक्टूबर 2010

नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            जलकुकड़े देखना हो तो कोई भारत आए। अब बताइये, दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र की सबसे ताकतवर संस्था के सदस्यगण, महँगाई के बोझ से दबकर टेढ़े होने से बचने के लिए अगर अपनी पगार खुद बढ़ा लेते हैं तो इसमें जलने की क्या बात है। यह हमारे देश देश की विशेषता है, किसी को कुछ ज़्यादा ही हासिल हो जाए, भले ही वह तनख्वाह हो, बख्शीस हो, लूट में हिस्सा हो, भीख हो........तो दूसरे लोग धूँ-धूँ कर जलने लगते हैं।
            देश के नेतृत्व की तनख्वाह बढ़ी देख जो ज्वलनशील लोग जल रहे हैं उनमें ज़्यादातर वे लोग हैं जो खुद भी तनखैये हैं और जिन्हें अपनी तनख्वाह खुद बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। इन तनखैयों की भी बढ़ जाती, भले ही उतनी ना बढ़ती जितनी जनसेवकों की बढ़ी है, तो जलने की यह क्रिया उतनी लपटदार नहीं होती जितनी होती देखी जा रही है।
          अरे जलकुकड़ों, ज़रा शर्म करो ! यह भी कोई बात होती है, आखिर वे देश के कर्णधार हैं, दाल उनके लिए भी सौ रुपए किलो हुई है, सब्ज़ियाँ उनकी सब्ज़ी मंडी में भी सत्तर-अस्सी चल रही है, पेट्रोल-डीज़ल उनकी भी बारह बजा रहा है। एक तुम्हीं नहीं हो जिसे महँगाई डायन खाए जा रही है। यह बात अलग है कि वे पूरे के पूरे घी की कड़ाही में तर हैं।
            बकवादी बकवास कर रहे हैं कि जब सन्तानवे फीसदी आम जनता औसत बीस रुपट्टी रोज़ पर गुज़र-बसर कर रही है तो ये जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कौन से लाट साहब हैं जो उनकी तनख्वाह हज़ारों-लाखों में हो.......! अरे, जनता को बीस ही रुपए रोज़ मिल रहे हैं तो इसमें बेचारे जनसेवकों का क्या दोष! बीस रुपए क्या अगर बीस पैसे भी मिलें तो इसमें उनका क्या कसूर ! अंबानी भाइयों को करोड़ों रुपया महीना मिलते हैं तो क्या उसमें भी उन बेचारों का दोष है! मूर्खों, क्या वे लोगों की तनख्वाहें, मजदूरी तय करने के लिए संसद में बैठे हैं! और कोई दूसरा काम नहीं है उनके पास। कितने महत्वपूर्ण काम उनके कंधों पर हैं, कार्पोरेट घरानों का खयाल रखना पड़ता है, उनके हितों के लिए ईंट से ईंट बजानी पड़ती है, खुद कभी स्कूल में सवालों के जवाब न लिखें हों मगर संसद में भाँति-भाँति के सवाल बनाकर उठाना पड़ते हैं, सवालों का ‘हिसाब किताब’ रखना पड़ता है। देश की समस्याओं के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए कुर्सियाँ तोड़नी पड़ती हैं, माइक फेंकने पड़ते हैं, एक दूसरे का सिर तोड़ना पड़ता है, क्या कुछ नहीं करना पड़ता। यह सब क्या मुफ्त में हो जाएगा ? भुट्टे भूनने के लिए तो कोई जन प्रतिनिधि बनता नहीं है ? इन्कम तो कुछ होना ही मंगता है ना! 
            यह तो बहुत ही नाइन्साफी है, देश सेवा के बदले चार पैसे अगर वे गरीब किसी से ले लें तो आपको दिक्कत, संसद में सवाल उठाने के अगरचे वे पैसे चार्ज कर लें तो आपको दिक्कत, स्विस बैंक में खाता रखें तो आपको दिक्कत, तो अब क्या अपनी तनख्वाह भी छोड़ दें ? भूखों मर जाए ? क्या चाहते क्या हो आप लोग, क्या अब लोग देश सेवा भी करना बंद कर दें ? क्या देश की आम जनता का नेतृत्व करना भी बंद कर दें ? साधु बनकर पहाड़ों में चलें जाएँ ? जनता को यू ही सड़क पर छोड़ दें ?
            देखिए यह पैसा ये पगार हाथों का मैल है, किसी के हाथ कम मैले है किसी के ज़्यादा! इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है! फर्क सिर्फ इतना ही तो है कि हम खुद अपना हाथ मैला नहीं कर पा रहे हैं और वे दनादन किए जा रहे हैं! अगर वे अपनी मर्ज़ी से इतना भी ना कर सकें तो फिर लानत है दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र पर, नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे ! 
दिनांक 10.10.10 को नईदुनिया रविवारीय मैगज़िन में प्रकाशित।

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

भारतीय संस्कृति का हैवी डोज़


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
नईदुनिया में प्रकाशित व्यंग्य
     हम समालोचक थे इसलिए बच गए, मगर दीगर आलोचकों पर बुरी बीती। कॉमनवैल्थ खेलों का भव्य उद्घाटन समारोह देखकर सभी तमाम कट्टर आलोचक पहले तो दाँतों तले अपनी ऊँगलियाँ चबा-चबाकर लोहू-लूहान करते रहे, फिर अपना सिला हुआ मुँह लेकर टी.वी. के सामने बैठ गए और भारतीय संस्कृति के भारी भरकम मुजाहिरे को विस्फारित नेत्रों से घूरते रहे। उनमें कुछ निश्चित ही ऐसे रहे होंगे जो टी.वी. में घुसे यह देखने का प्रयास कर रहे होंगे कि समारोह स्थल पर कहीं किसी दीवार का प्लास्टर झडे़, कोई टाइल्स टूटे, बालकनी या छत का धप्पड़ गिरे तो हम अपने सिले हुए मुँह के टाँके तोड़कर चिल्लाते हुए सड़क पर निकल आएँ - ओय ओय असफल हो गया, कॉमनवैल्थ असफल हो गया। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, उद्घाटन समारोह जिस स्टेडियम में हुआ उसका कुछ नहीं गिरा। नतीजतन अगले दिन सारे आलोचक अपने सिले हुए मुँह के टाँकों की ड्रेसिंग कराते हुए मिले, ताकि कहीं पक ना जाएँ। ये सब अगले ग्यारह दिनों तक ऐसे ही ड्रेसिंग कराते रहेंगे, बशर्ते सब कुछ सफलतापूर्वक ठीक-ठाक निबटता चला जाए। अगर कहीं ज़रा सा मीन-मेख उन्हें मिल गया तो फिर समझ लीजिए, ये फिर बीच खेल में अपने सिले हुए मुँह के टाँके तुड़ाकर चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देंगे- ओय ओय असफल हो गया, कॉमनवैल्थ असफल हो गया।
          कामनवैल्थ आयोजन के भारतीय योजनाकारों को भी मानना पडे़गा, बड़े दूरदर्शी हैं। एक तो छह सौ उन्नीस सदस्यों का भारी-भरकम दल बाकी देशों की छाती पर मूँग दलने के लिए रख छोड़ा, जीतो बेटा कैसे जीतते हो, ऊपर से पहले ही दिन भारतीय संस्कृति का ऐसा हैव्वी डोज़ दुनिया भर के खिलाड़ियों को पिला दिया कि वे अब चार-छः दिन होश में आने से रहे। होश में आ भी गए तो ढंग से खेल भी पाएंगे इसमें शक है। भारतीय संस्कृति की डोपिंग सी हो गई है दिमाग में। भारतीय खिलाड़ी तो कई सालों से अपनी संस्कृति को झेलते आ रहे हैं, सो उन्हें तो आदत है, नतीजतन अब खेल मुकाबलों में भारतीय संस्कृति के ओव्हर डोज़ से पस्त पड़े अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को जगह-जगह पछाड़कर ज़्यादा से ज़्यादा मेडल झोली में डालना आसान हो गया है। जहाँ कोई दूसरा जीतता हुआ दिखाई दे तो चीयर गर्ल्स की तरह भरत नाट्यम की दसेक नृत्यांगनाएँ स्टेडियम के कोने में नचाकर उसकी हिम्मत पस्त की जा सकती है।
          बचा-खुचा काम भारतीय खान-पान करने वाला है। जलेबियाँ, रसगुल्ले, बूँदी के लड़डू खिलाकर सबका वजन बढ़ा दिया जाए फिर ओव्हर वेट घोषित कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए, कैसा रहेगा। भकोसकर छोल-भटूरे, आलूबडे़-समोसे और बेसन के खाद्य पदार्थ अन्तराष्ट्रीय खिलाड़ियों को यदि खिला दो तो वे सुबह-सवेरे जल्दी स्टेडियम ही ना पहुँच पाएँगे। हमारे खिलाड़ियों को तो पता है कि इसप घोल की भूसी क्या होती है, वे सबसे पहले जाकर ट्रेक पर खड़े मिलेंगे और जीत आसान हो जाऐगी।
          तो इस तरह साबित हो रहा है कि भारतीय संस्कृति बड़े काम की चीज़ है। कम से कम हमारे देश में होने वाली अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अव्वल आने में तो मदद कर ही सकती है। पसीने की कमाई का सत्तर हज़ार करोड़ फूँककर हम अगर इतना भी नहीं कर पाए तो लानत है कामनवेल्थ आयोजन समिति पर।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

हे महान भारतीय इंतज़ाम-अलियों, नही चाहिए हमें मैडल

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
भौचक शेरा
           कॉमन वेल्थ खेलों के प्रारम्भ होने से पहले ही हमने अपनी पताका फहरा ली है, लापरवाही, बदइंतज़ामी और भ्रष्टाचार की पताका! पिछले दो-तीन सालों से यह पताका शांतिपूर्वक मंद-मंद फरफरा रही थी, कहीं कोई समस्या नहीं थी, सब कुछ आराम से चल रहा था। मगर देश में शान्ति से कुछ हो दुष्ट विघ्नसंतोषियों को यह बिल्कुल पसंद नहीं। जहाँ कोई चार पैसे हराम के कमाता हुआ दिखाई दिया कि लोगों का पेट दुखने लगता है, चढ़ बैठते हैं दाना-पानी लेकर। चोर चोर चोर का समवेत स्वर चारों ओर उठने लगता है और दुनिया भर के साहुकार डंडे लेकर इधर उधर दौड़ने लगते हैं। मूर्खों को इतना भी नहीं पता कि जब हम अमीर देशों की देखा-देखी बड़े आयोजनों में अपनी नाक घुसाते हैं तो, चोरी-चकारी और भ्रष्टाचार के अन्तर्राष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के लिए हमें उम्दा प्रदर्शन करना ही होता है, ताकि आगामी अन्य आयोजनों की मेजबानी के रास्ते खुलें।  
            पहले यहाँ-वहाँ जहाँ-तहाँ भ्रष्टाचार का ‘खेल’ खेलते देखा जाता था अब ‘खेलों’ में भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है। खेल-खेल में करोड़ों रुपयों को ठिकाने लगाकर कॉमनवेल्थ में जहाँ एक ओर कुछ महत्वाकांक्षी राजनीतिकों, खेल प्रशासकों और बड़े-बड़े उद्यमियों ने अपना राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाया है, वहीं कुछ विध्नसंतोषियों ने इसकी धुँआधार आलोचना कर अपना अन्तर्राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाया है और निभाते चले जा रहे हैं।
          आगंतुक खिलाड़ियों, खेल प्रेमियों, पर्यटक समूहों, विदेशी पत्रकारों, मीडिया वालों को लूटने-ठगने का अपना कत्र्तव्य निभाने के लिए देश के अन्य छोटे-बड़े उद्यमी यथा आॅटो, रिक्शा वाले, होटलों-रेस्टोरेंटों ढाबे वाले, यहाँ तक कि पान-बिड़ी-सिगरेट वाले तक कमर कसकर बैठे हैं। मोटी कमाई की आस लगाए कई असली-नकली भिखारी भी सटीक मेकप, स्वर एवं वाणी के कठिन रियाज़ और अभिनय की तगड़ी रिहर्सल के साथ बिल्कुल तैयार हैं, कि बाहर की पब्लिक आना शुरू हो और वे आंगिक और वाचिक अभिनय की अपनी कला का प्रदर्शन कर उनसे भीख माँग सकें। चोर-गिरहकट, ठग-लुटेरे आतुरता से प्रतीक्षारत हैं कि ‘‘आओ कदम तो रखो भारत भूमि पर, हम तुम्हारी आरती उतारें।’’ बार बालाएँ और रेड लाइट सुन्दरियाँ थालियाँ सजाए, पलक पॉवड़े बिछाकर मेहमानों का स्वागत-वंदन कर माल बनाने की व्यूह रचना में व्यस्त हो गई हैं। जब देश के दिग्गजों ने कॉमनवेल्थ से वेल्थ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो फिर बाकी लोग क्यों पीछे रहेंगे। मगर ताज़ा परिस्थितियों ने सब के माथे पर चिंता की लकीरें खोद दी हैं, पता नहीं आयोजन होगा भी या नहीं! न हुआ तो बरसों बाद छप्पर फाड़ कमाई का यह मौका हाथ से निकल जाएगा। आगे फिर कभी इस तरह बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिले या ना मिले।
          कुछ लोगों का खयाल शायद ज़्यादा दूरदृष्टिपूर्ण हो। रिश्वतें देकर कॉमनवेल्थ की मेजबानी हासिल करने से लेकर कमाई का हर संभव रास्ता हम अब जान गए हैं। सार्वजनिक धन की लुटाई में विशेषज्ञता, कौशल, निपुणता आदि-आदि सब कुछ हमने हासिल कर लिया है। भ्रष्ट इन्जीनियरों, ठेकदारों, लापरवाह अफसरों, ब्यूरोक्रेटों का यह आत्मविश्वास हमें आने वाले समय में और भी बड़े बड़े आयोजनों को हाथ में लेने का बल देता है। अब हम ओलम्पिक खेलों के लिए भी अपने इस अनुभव का इस्तेमाल बखूबी कर सकते हैं, एक बार कोई उसकी मेजबानी देकर तो देखें, फोड़ डालेंगे। इतना फैलारा कर के दिखाएँगे कि हमारे बाप से न सिमटे, अपने-अपने लोगों में रेवड़ियाँ बाँटेंगे और बदले में अपने बैंक बैलेंसों को समृद्ध कर के दिखाएँगे। खेलों की दुनिया में देश का नाम उससे भी ज़्यादा ऊँचा कर के दिखाएँगे जितना कॉमनवेल्थ खेलों में अब तक हुआ है। हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन, पूरा है विश्वास।
          इधर खुलती पोलों, गिरती छतों, टूटते पलंगों, धँसती सड़कों के मद्देनज़र डर है कि हवाई अड्डे पर उतरते ही विदेशी खिलाड़ीगण पलट कर भाग ना खड़ें हों कि भाड़ में गया कॉमन वेल्थ, घर लौटकर अपने देशवासियों से पिट लेंगे भले, मगर भ्रष्टाचार की नींव पर खड़े कोर्टों मैदानों पर हाथ पॉव तुड़वाने के लिए हरगिज़ न उतरेंगे। भ्रष्टाचार की आबोहवा में कदम रखते ही कहीं वे गिड़गिड़ाने ना लगें कि हे महान भारतीय इंतज़ाम-अलियों, नही चाहिए हमें मैडल, हमें तो सही सलामत घर जाने दो, जान बख्श दो हमारी बस।


बुधवार, 29 सितंबर 2010

काम के ना काज के दुश्मन अनाज के



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
नईदुनिया दिल्ली में प्रकाशित संपादित अंश
     भूखों का एक डेलीगेशन खाद्य मंत्री से मिलने गया। पहले तो खाद्य मंत्री ने यह सोचकर कि-‘‘भुख्खड़ साले आ गए मुफ्त में गेहूँ माँगने’’, मिलने से साफ इन्कार कर दिया, फिर जब दलालों ने समझाया कि वे गेहूँ माँगने नहीं आएँ हैं, बल्कि अब तक सड़े और भविष्य में सड़ने वाले गेहूँ के बारे में सार्थक चर्चा करने आएँ हैं, तब जाकर खाद्य मंत्री डेलीगेशन से मिलने के लिए राज़ी हुए।
          भूखों का डेलीगेशन जब कान्फ्रेन्स हॉल की कुर्सियों पर चढ़कर बैठ चुका तब खाद्य मंत्री अपने ‘गेहूँ सचिव’ के साथ  अवतरित हुए और बिन्दास अपनी कुर्सी पर जमते हुए भूखों से मुखातिब होकर बोलने लगे- ‘‘भाइयों और बहनों मुझे बड़ा दुख है कि आप सब लोग भूखे हैं, परन्तु मैं आपको स्टॉक में मौजूद गेहूँ एक दाना भी नहीं दे सकता।’’
          भूखों के नेता ने तपाक से कहा- ‘‘अपना वह गेहूँ का दाना आप अपने पास रखिए, हमें उसकी कोई ज़रूरत नहीं। भगवान की दया से शहर में इतनी भीख मिल जाती है कि हम आप जैसे छत्तीसों को खिला सकते हैं।’’
          गेहूँ सचिव भूखों के नेता की इस बदतमीज़ी पर उखड़ कर बोला- ‘‘बदतमीज़, मंत्री जी से ऐसे बात करते हैं ? सबको जेल भिजवा दूँगा।’’
          मंत्री जी गेहूँ सचिव को शांत करते हुए बोले-‘‘कंट्रोल युवर सेल्फ माय बॉय। मैं देखता हूँ। हाँ भई, अपनी समस्या बताइये, बस ध्यान रखिएगा कि मैं आपको गेहूँ का एक दाना भी मुफ्त में न देने के लिए कटिबद्ध हूँ, चाहे कुछ भी हो जाए। हमारा लक्ष्य देश के पूरे गेहूँ भंडार को सड़ाने का है। जब वह पूरी तौर पर सड़ जाएगा और बदबू और संड़ांध के मारे जीना हराम कर देगा तब हम आगामी योजना पर काम करेंगे।’’
          भूखों का नेता मंत्री जी से बोला-‘‘सर हम उसी गेहूँ के सड़ाने की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय योजना पर आपसे कुछ चर्चा करने के लिए आएँ हैं। वैसे हम जानते हैं कि आप इस मामले में पर्याप्त दूरदृष्टि रखते हैं परन्तु फिर भी चूँकि हम इस देश के जिम्मेदार भूखे नागरिक हैं इसलिए इस दिशा में अपना रचनात्मक योगदान देने के लिए उपस्थित हुए हैं। आप कहें तो हम देना चालू करें ?’’
          मंत्री जी का इशारा मिलते ही भूखों का नेता, नेताओं की तरह शुरू हो गया- ‘‘सर देश में गेहूँ को गोदामों में सुरक्षित रखने की पुरानी परम्परा ठीक नहीं है, इससे कितना गेहूँ फिज़ूल अनसड़ा पड़ा हुआ है। अविलंब सारे गोदामों की छतों को उखड़वा देना चाहिए, ताकि बारिश का पानी गोदामों में भरकर गेहूँ को अच्छी तरह सड़ा सके। गोदाम के दरवाज़ों को ईट-गारे से सील कर देना चाहिये, ताकि पानी बाहर ना निकल सके और बाहर खुले मैदानों में रखे गेहूँ के ऊपर पड़ा टरपोलिन तुरन्त हटाकर गेहूँ को खुले आसमान के नीचे ‘नंगा’ छोड़ देना चाहिए। गेहूँ देश भर में जहाँ कहीं भी सुरक्षा की नीयत से इधर-उधर लुकाकर रखा गया है, उसे फौरन जलवृष्टि को समर्पित किया जाना चाहिये। घर-घर में लोग गेहूँ सड़ाने के कार्यक्रम में रचनात्मक योगदान दें, इस दृष्टि से सरकार की ओर से जन-जागृति का व्यापक कार्यक्रम हाथ में लेना चाहिए।’’
            डेलीगेशन द्वारा मंत्री जी और गेहूँ सचिव को, दिये जा रहे सुझाव उनकी योजना एवं कार्यक्रम की टक्कर के होने के बावजूद पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था जैसे सारे भूखें उनका मज़ाक उड़ाने के लिए एकत्र हुए हों। गेहूँ सचिव ने फिर गुर्राते हुए कहा-‘‘देखिए, हमारा           कार्यक्रम एक राष्ट्रीय महत्व का कार्यक्रम है, आपको इस तरह उसका मज़ाक उड़ाने का कोई हक नहीं है। आप सबको सरकारी कामकाज में बाधा डालने के जुर्म में अन्दर किया जा सकता है।’’
          भूखों के नेता ने कहा-‘‘श्रीमान कौन कहता है कि हम आपका मज़ाक उड़ाने के लिए यहाँ आएँ हैं। अरे, हमें मज़ाक ही उड़ाना होता तो हम अपने झोपड़े में बैठे-बैठे ही ना उड़ा लेते ? क्या कर लेते तुम ? हमें पागल कुत्तों ने तो काटा है नहीं, जो हम अपनी गाँठ का पैसा खर्च करके यहाँ आएँ, और तुम जैसे मसखरों का मज़ाक उडावें। हम तो यह चाहते हैं कि गेहूँ को सड़ाने की इस सरकारी योजना में किसी तरह की लापरवाही ना हो सके। आप तो जानते ही हैं कि ‘हरामखोरी’ सरकारी योजनाओं में किस कदर हावी है। इस योजना में भी अगर वही ‘खोरी’ चली, गेहूँ ठीक से ना सड़ाया गया, कोई कोताही हुई तो फिर योजना खामोखां बदनाम हो जाएगी। वैसे ही आजकल मीड़िया वाले कुत्तों की तरह ‘स्कैम’ ढूढ़ते फिर रहे हैं। कोई कमी बेशी रही, कहीं थोड़ा बहुत गेहूँ सूखा सट्ट पड़ा मिल गया, बिन-सड़े गेहूँ का कहीं स्टिंग ऑपरेशन हो गया तो हफ्ता भर अखबार टी.वी. में सुर्खियाँ चलती रहेगी, ‘‘गेहूँ सड़ाने की योजना में भारी भ्रष्टाचार और घोटाला.......। तुम लोग बर्खास्त और होते फिरोगे।’’
          गेहूँ सचिव और भूखों के नेता में यह गंभीर चर्चा चल ही रही थी कि डेलीगेशन के साथ आए एक तंदरुस्त से भूखे ने खड़े होकर मंत्री जी से पूछा-‘‘हजूर हजूर, हमें तो यहाँ सड़ा गेहूँ बटोरने का लालच देकर लाया गया है, अब लग रहा है कि हमें सरासर ठगा गया है। आपके इरादे नेक नहीं हैं। मेहरबानी करके यह बताया जाए कि आप लोगों की तमाम मेहनत और कर्त्तव्य निष्ठा के साथ गेहूँ को सड़ाने की तमाम कोशिशों के बाद जब वह गेहूँ पूरी तौर पर सड़ जाएगा और बदबू मारने लगेगा, उसमें कीड़े पड़ जाऐंगे, हज़ार-हज़ार कोस दूर तक संड़ांध के मारे लोगों का जीना हराम हो जाएगा........ तब तो हजूर हमें वह सड़ा गेहूँ खाने को मिलेगा कि नही ?’’
          मंत्री जी नाराज़ से होकर आनन-फानन में उठ खड़े हुए और भूखों के नेता से डपटकर बोले-‘‘ऐसे आलतू -फालतू लोगों को लेकर क्यों आते हो ? साले काम के ना काज के दुश्मन अनाज के ?’’ फिर उस डेलीगेट से मुखातिब होकर बोले, माननीय -‘‘मंत्रिमंडल में आपके इस प्रश्न पर विस्तार से चर्चा कर ली जावेगी, ऐसी स्थिति में अगर सड़ा गेहूँ समुद्र में फिकवाने अथवा जलवाने अथवा ज़मीन में गड़वाने से आम जनता में बँटवाना सस्ता पड़ा तो फिर इस विषय पर मंत्रिमंडल द्वारा सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा। तब तक के लिए आज्ञा दीजिए। धन्यवाद। जयहिन्द।’’        

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

ओय ओय, फुट ब्रिज गिर गया



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            ओय ओय ओय ओय, फुट ब्रिज गिर गया, फुट ब्रिज गिर गया, बच्चे लोग ताली बजाओं। आज हम विध्नसंतोषियों के लिए बहुत खुशी का दिन है। हम ना कहते थे-भ्रष्टाचार चल रहा है, भ्रष्टाचार चल रहा है! कोई सुन ही नहीं रहा था, हम इतनी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे कि-धाँधली चल रही है, मगर कोई सुनने को ही तैयार नहीं था। अब देख लिया अपनी आँख से भ्रष्टाचार का नमूना- फुट ब्रिज गिर गया। चलो अपना अपना हाथ आगे करो, अब लड्डू बँटने वाले हैं।
            दो-तीन दिन पहले टुरिस्ट बस पर फायरिंग हुई, कुकर बम फूटा हमारे लिए बड़ी खुशी की बात थी। हम चिल्ला रहे थे-सुरक्षा कमज़ोर है, सुरक्षा कमज़ोर है, किसी के कान पर जूँ रेंगने को तैयार न थी, रेंगेगी भी कैसे, लोगों के सिरों में जूँ है कहाँ आजकल जो कानों पर आकर रेंगे! अब तो मानोगे, कि दो-चार ब्लॉस्ट और होंगे, या ठीक कॉमनवैल्थ खेलों के उद्घाटन में ही धम-धम होगी तभी मानोगे, कि हम सही कह रहे थे। हम हमेशा सही कहते हैं, कहते रहते हैं, कहते रहते हैं, तुम लोग सुनते कहाँ हो! अब तो सुनोगे झक मार के। हमारे लिए इससे बड़ा खुशी का मौका दूसरा नहीं। दो-चार धमाके और हों तो मजा आए।
            सालों से पानी नहीं बरसा ढँग से, गटर और जमुना में फर्क करना मुश्किल था। अब कॉमनवैल्थ होने को हैं तो देख लो, पानी बरस- बरस कर हमारा समर्थन कर रहा है। छतें टपक रहीं हैं, खुद भी टपक जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। पानी शहर में घुसा चला आ रहा है, सारी पोलें खोल रहा है, दुनिया देख रही है, कोस रही है कि - जो देश अपना गटर सिस्टम सही नहीं कर सकता उसे कॉमनवैल्थ कराने की जिम्मेदारी किस उल्लू के पट्ठे ने दी है। हम यहीं तो कह रहे हैं इतने दिन से - कि लापरवाहों, अकर्मण्यों, मक्कारों का देश है यह, चोट्टों, भ्रष्टाचारियों का देश है यह, इनसे कुछ होना-हवाना नहीं है, काहे को तो इतनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी गई इन्हेंं। कंडे थोपने भर की औकात है इनकी, वही करते रहते तो ही ठीक था।
            अब देखो, खेल गॉव में कितनी गंदगी मचा के रखी है, जैसे सुअरबाड़ी हो। विदेशी खिलाड़ियों के बिस्तरों पर कुत्ते सो रहे हैं। जिन मजदूरों की औकात दो कौड़ी की नहीं वे भी कमीशन के गद्दों पर लोट लगा रहे हैं। इनका बस चले तो दुनियाभर के ढोर-डंगरों को भी वहाँ लाकर बसा दें।
            हम ना कहते थे, जिम्मेदारी तो किसी एक में नहीं है, आज़ाद देश मिल गया है तो सब साले मकरा गए हैं। देश की इज्ज़त का किसी को रत्ती भर खयाल नहीं है। अब हमी को देख लो, बकर-बकर हमसे चाहे जितनी करवा लो, टाँग खिचाई, टाँग अड़ाई, छिलाई, जग-हँसाई हमसे चाहे जितनी करवा लो, निंदा, आलोचना, बुराई हमसे जी भर के करवा लो, मगर बाकी दिनों में, जब कोई कॉमनवैल्थ सिर पर नहीं होता, हम कहाँ भाड़ झोकते रहते हैं, हमसे कोई मत पूछना।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

संतई के कारोबार की डांवाडोल नींव


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          आजकल साधु-संतों, महंतों-मठाधीशों का कार्यभार पृथ्वी पर पहले की अपेक्षा काफी बढ गया है। पहले उन्हें मात्र वैराग्य धारण कर कन्दराओं में जाना होता था और शेष जीवन ईश्वर की अनंत खोज में बिता देना होता था। ज़्यादा से ज़्यादा दो-चार साल में कभी-कभार बाहर आकर कान्ट्रेक्ट बेसिस पर धर्म की रेडीमेड ध्वजा ऊँची रखने के लिए प्रवचन, सत्संग कर लेना पड़ता था। परन्तु, आजकल बेचारों को सक्रिय राजनीति से लेकर सेक्स रैकेटों के संचालन, षड़यंत्र, हत्या, बलात्कार, ड्रग ट्रॉफिकिंग, ब्लेकमेलिंग जैसे शुद्ध सांसारिक (कु)कर्मों की जिम्मेदारी भी निभाना पड़ रही है। धर्म के प्रचार-प्रसार के ज़रिए विज्ञान की ऐसी-तैसी करने के ऐतिहासिक मनोरथ के साथ-साथ इन (कु)कर्मों की दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी से दबकर बेचारे हलकान हुए चले जा रहे हैं, प्रभु की प्राप्ति के प्रयासों के लिए समय ही नहीं मिल रहा है।
          जबसे ईश्वर से पृथ्वी के पाप सम्हलना मुश्किल हुए, और भारत की धर्म-परायण आम जनता को पक्का भरोसा हुआ कि पर्याप्त मात्रा में पाप-दुराचार बढ़ने के बावजूद भी पृथ्वी पर कोई भगवान-वगवान अवतार लेने के मूड़ में नहीं हैं, तभी से पब्लिक ने मामले को लोकतांत्रिक ढंग से स्व-कर-कमलों से सुलझाने की जगह इन साधु-संतों के हवाले कर दिया, और भारी-भरकम पढ़ाई के डर से अथवा ज़्यादा ही पढ-लिख जाने के कारण साधु बन गए इन ज्ञानियों-ध्यानियों ने विषय विशेषज्ञों को लात मारकर, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक उत्थान का यह काम स्वयं देखना चालू कर दिया, जो उनके खानदान तक में किसी ने कभी नहीं देखा। जगह-जगह मठ-आश्रम खुलना प्रारम्भ हो गए, जिनके वातानुकूलित चेम्बरों में पसरकर मोटे-ताजे गुरू-महात्मा अपनी अमृतवाणी से सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पापियों का उद्धार करने में लग गए। मगर, पृथ्वी को पतन के गर्त में ले जाने की इच्छुक कलियुगी शक्तियों ने धर्म की ध्वजा के इन वाहकों की मति की नृशंस हत्या कर उनसे ऐसे सांसारिक (कु)कर्म करवा लिए कि उनके सामने अब जेल की सलाखों के पीछे बैठकर सुस्ताने के अलावा कोई चारा नहीं है। अन्दर, सादे भजन तक सुनने के लिए श्रोता मिलने की कोई संभावना नहीं है। आत्मा तो थी ही कैद शरीर के पिंजरे में, शरीर भी लोहे के पिंजरे में बैठकर फड़फड़ाने को मजबूर है। लोग अलग चप्पलें लेकर बाहर खड़े हैं, जमानत कराकर बाहर निकलें तो टाट गंजी करें।
          इधर-उधर फटके खाते फिर रहे देश के बेरोज़गार नौजवानों के लिए इन ज्ञानियों-ध्यानियों द्वारा छोड़े गए पद चिन्हों पर अपने पाँव रख कर खड़े होने का बढ़िया रास्ता खुला है। बड़े-बडे वातानुकूलित मठ-आश्रम, महँगी गाड़ियाँ, सुख-समृद्धि-आनन्द! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों को बेरोकटोक, तन-मन से भोगने का रोमांटिक अवसर आखिर किस धंधे में मिलता है ! किसी बेरोज़गार को चोरी-चकारी, लूट-डकैती, नकबजनी, अपहरण, बलात्कार इत्यादि अंजाम देकर खामोखां इंडियन पीनल कोड का कोपभाजन बनने की अब कोई ज़रूरत नहीं है। बस संतई का चमत्कारी चोला धारण कर लिया जाए, बाकी सारे सुख आपो-आप पीछे-पीछे चले आएंगे। वी.आई.पी. भक्तजनों की लबालब श्रद्धा व केश और काइंड चढावों की ऐसी रेलमपेल इस फील्ड में रहती है कि दूसरे किसी धंधे से इसकी तुलना की ही नहीं जा सकती।
            स्त्री सुख से वंचित ब्रम्हचारी कुँवारों, विधुर, रंडुओं को भी एक उत्साहवर्धक मौका हाथ आया है, वे दूसरों की औरतों को देखकर जलने की बजाय स्वयंभू संत का चोला धारण कर दस-बीस सुन्दर स्त्रियों का एक भरापूरा हरम चलाकर, पोल खुलने तक तो मजे कर ही सकते है। अपनी निजी अय्याशी के अलावा हरम के माल की कमीशन आधारित आॅर्डर पर घर-पहुँच सप्लाई देकर बडे़-बडे़ ग्राहक भक्तों की कृपा प्राप्त की जा सकती है ताकि देह व्यापार के इस परम्परागत कारोबार पर धर्म की सीढ़ी लगाकर, अर्थ और राजनीति के स्वार्थ साधे जा सकें, जिनके सधे बिना प्रभु से मिलाने का सपना दिखाकर भक्तजनों को बेवकूफ बनाना भी संभव नहीं है।
            कर्म से कांड बन गए इस मार्मिक प्रकरण में कैमरा नामक यंत्र की दुष्टता से संत-महंत समाज को उठाना पड़ी परेशानी बेहद लज्जाजनक है। वास्तव में समय का तकाज़ा यह है कि कुकर्म करते समय भले ही भगवान से ना डरा जाए मगर विज्ञान के इस चमत्कारी यंत्र से थोड़ा डरकर ही चला जाए। इस यंत्र की खासियत होती है कि इसके पीछे एक दुष्ट आँख होती है जो वही सब कुछ देखने की आदी होती है जो इंसान देखकर भी अनदेखा करनां चाहता है। कुछ ऐसा-वैसा देखा हुआ यदि सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय सार्वजनिक हो गया तो खामोखां उस छोटी सी लंगोटी को भी छोड़ गली-गली चैराहे-चैराहे भागते फिरना पडे़गा जिसके दम पर संतई के तमाम कारोबार की नींव धरी है, और कहीं कोई ठौर-ठिकाना मिल जाएगा ऐसी संभावना आज की तारीख में तो बिल्कुल नहीं है। 
मासिक पत्रिका सबलोक के मार्च 2010 अंक में प्रकाशित।        

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

एक पखवाड़ा मुकर्रर है हिन्दी की मातमपुर्सी के लिए

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
हिन्दी भाषी होने के नाते आज के दिन हमें अपनी भाषा पर गर्व करना सिखाया गया है, मगर सच्चाई यह है कि स्वातंत्रोत्तर काल में जैसे-जैसे हिन्दी आन्दोलन फलता-फूलता पल्लवित होता गया है, वैसे-वैसे देश में हिन्दी की खटिया-खड़ी होती देखी गई है। कुछ तो देश के कर्ता-धर्ताओं ने उसे गर्व करने लायक नहीं छोड़ा, रही-सही कसर हम जैसे सैकड़ों लिख्खाड़ पूरी कर रहे हैं जिन्हें अपने शिक्षणकाल में हिन्दी के पर्चे में कभी तैतीस से ज़्यादा अंक नसीब नहीं हुए। दरअसल वस्तुस्थिति तो तैतीस अंक प्राप्त करने लायक भी नहीं थी परन्तु मास्टरनियों की रहमदिली और हिन्दी के प्रति ‘हिन्दी ही तो है, क्या फर्क पड़ता है’ के उदारता भाव के कारण हमारा भविष्य वर्ष-प्रतिवर्ष सुरक्षित होता चला गया, और अब हम हिन्दी के भविष्य का ‘बिस्तर गोल’ करने में सक्रिय सहयोग देकर ‘खटिया खड़ी बिस्तर गोल’ वाला चालू मुहावरा चरितार्थ करने में लगे हुए हैं।
    हिन्दी का बंटाधार करने वालों में प्रायमरी, मिडिल स्कूल के क्रीड़ा, संगीत व चित्रकला मास्टरों से लेकर बड़े-बडे़ सूरमा भाषा विशेषज्ञों का भी सश्रम योगदान रहा है। हिन्दी फिल्म-टी.वी. वाले विद्वजनों ने भी बहती गंगा में हाथ धोकर हिन्दी की ‘वाट’ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्म वालों ने इस श्रमसाध्य कार्य के लिए अवार्ड हासिल किए तो क्रीड़ा-संगीत-चित्रकला शिक्षकों ने, जो अक्सर हिन्दी शिक्षकों के टोटे में जबरदस्ती हिन्दी पढ़वाने के उपयोग में आते हैं, हिन्दी का क्रियाकर्म बाकायदा तनखा लेकर किया, साथ में इंक्रीमेंट भी लिए। वे बेचारे पढ़ाई के बोझ से घबराकर प्रदर्शनकारी कलाओं की शरण में पहुँचे होते हैं, उन्हें फिर घर में होमवर्क से मगजमारी के बाद बच्चों को हिन्दी पढ़ाने की बेगारी करना पड़ती है, नतीजतन हिन्दी का सत्यानाश करने वाली विदूषी पीढ़ी जन्म लेती है, कालान्तर में मौका पड़ने पर जिसे हिन्दी में अर्जी लिखना भी नहीं आता, जिसकी ज़रूरत हमारे देश में कदम-कदम पर पड़ती है।
    देश के भाषा विशेषज्ञों का तो दुनिया में कोई सानी ही नहीं है। उन्होंने हमेशा चौकस रहते हुए इस बात का ध्यान रखा कि कैसे हिन्दी को ना समझ में आने वाली क्लिष्टतम भाषा बनाए रखा जा सके ताकि लोग अपनी राष्ट्र भाषा को जन्म-जन्मान्तर तक समझ ही ना पाएँ और इससे बिदककर अंग्रेजी की शरण में जा खडे़ हों या गाली- गलौच की सुप्रचलित भाषा का आदान-प्रदान कर अभिव्यक्ति की अपनी समस्या खुद ही सुलझा लें, भूलकर भी हिन्दी के दरवाज़े पर आकर खड़े ना हों।
    फिल्म वालों ने तो गज़ब ही कर डाला। पब्लिक के मुँह में ऐसी छिछोरी भाषा परोस दी कि हिन्दी का भूत दशकों से जान बचाता भागता फिर रहा है। इन फिल्मचियों ने ‘अख्खे’ देश को अनोखी बम्बइया भाषा में पिरो कर रख दिया है। इस मामले में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक वास्तव में भारत एक है। गुजरात से लेकर बंगाल तक भारत के एक होने का मतलब भी यही है कि भले ही देश के हर कोने में स्थानीय भाषा का बोलबाला और हिन्दी का मुँह काला हो मगर – ‘सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे’ का रचनात्मक अर्थ गली-गली में लोग बखूबी जानते हैं। जन-गण-मन अधिनायक से ज्यादा आरेला ए, जारेला ए, खारेला ए, पीरेला ए, खाली-पीली बोम मारेला ए जैसी उच्चकोटि की शब्दावली देश के हर गली-कूचे में आसानी से समझ ली जाती है। हमारे मध्यप्रदेश में भी आरिया हे, जारिया हे किस्म की हिन्दी का प्रचलन है, इसमें माँ-बहनों से निकटतम गुप्त संबंधों की खुली चर्चा साथ में और नत्थी कर हिन्दी की प्रतिष्ठा में अरसे से चार चाँद ठोके जा रहे हैं।
    हिन्दी आन्दोलन चल रहा है, चल रहा है, चलता चला जा रहा है, मगर पान-ठेलों, चौक-चौराहों, टी.वी., सिनेमा, सांस्कृतिक केन्द्रों, सरकारी गैर सरकारी दफ्तरों से लेकर संसद तक रोजाना इस अबला की अस्मत तार-तार होती रहती है। साल का एक पखवाड़ा मुकर्रर है, बीच बाज़ार में इसे घायल पड़ा देखकर मातमपुर्सी करने के लिए। जिसे मर्ज़ी हो मातमपुर्सी करे या फिर चाहे तो नजरें बचा कर निकल जाए।