//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
वे अभी-अभी जीर्ण-शीर्ण, पीली काया लेकर अस्पताल से वापस लौटी हैं, हफ्ते भर एनीमिया का इलाज कराया है, दो-तीन दर्जन ग्लूकोज़ की बोतलें और चार छः पाउच खून गटककर बीस-पच्चीस हज़ार का चढ़ावा अस्पताल पर चढ़ाकर घर आकर बैठी ही हैं कि पंचांग पर नज़र पड़ गई-अरे, कल तो करवा चैथ है, भूखे रहने की तैयारी करना है। अच्छा हुआ देख लिया नहीं तो इस बीमारी के चक्कर में पापिन बन जाती।
बाकी बारहों महीने घर पर हम्माली करते रहने के कारण धूल-धूसरित ‘भूतनी’ बनी रहना एक बात है, मगर करवा चौथ के दिन सज-सँवरकर सुहागन दिखाई देना जरूरी है। फिर, चौबीस घंटे दूसरी औरतों के चक्कर में पडे़ रहने वाले अपने नशेड़ी, गंजेड़ी, भंगेड़ी और जुआरी पति की लंबी आयु के लिए भूखों रहकर स्त्री धर्म निभाना है। डॉक्टर का दिया दवा-टॉनिकों का ढेर एक कोने में फेंककर, दिनभर निर्जला व्रत रखना है और रात को पति का हड़प्पा कालीन सुन्दर मुखड़ा देखकर, लात का आशीर्वाद लेकर ही आहार-पानी ग्रहण करना है।
चाहे रात दो बजे तक घर ना लौटने पर पड़ोसियों को साथ लेकर अपने पति परमेश्वर को ढूँढ़ने के लिए शहर भर की नालियाँ क्यों ना खंगालना पड़ें। पतिदेव जब नशे में धुत्त किसी गटर में पड़े मिल जाएँ तो फिर आदर सहित अपने प्रिय प्राणेश्वर को घर लाकर स्वच्छ जल से उसका कीचड़ सना मुखमंडल धोकर उसके मनोहारी दर्शन करना है, फिर जाकर अपने कमज़ोर बीमार शरीर को कैलोरी की पूर्ति के लिए अन्न-जल उपलब्ध कराना है, यदि सदियों के भूखे पति महोदय से बचा रह जाए तो।
यह भारतीय परम्परा है जिसे उन जैसी कर्तव्यपरायणा-पतिव्रता स्त्रियों को सात जन्म तक निभाना है, चाहे पतिदेव अपना शराब का शौक पूरा करने के लिए घर के जेवर-बरतन बेचने से लेकर रोज़ाना उनके शरीर पर भारी बल प्रयोग तक करने से न चूकते हों। पारम्परिक गालियाँ और अपशब्दों से गुड मार्निंग किया करते हों और गुडनाइट तो उनकी कभी होती ही ना हो। अपने मासूम सगे बच्चों से ज़्यादा सड़क छाप कुत्तों को पहचानते हों। यह उन्हीं पति-परमेश्वर की दीर्घायु होने की कामना करने का अनोखा व्रत है जिसकी सनसनाती गालियाँ सुन-सुनकर दूसरे शब्द याद रखना मुश्किल हो जाता है। माँ-बाप, भाई-बहन और इतर रिश्तेदारों के असल नामों की जगह जब स्त्री को घड़ी-घड़ी वे गालियाँ ही याद आएँ, जिनसे पति-परमेश्वर अपने ससुराल पक्ष को अक्सर संबोधित करते हैं तब जानिए स्त्री का पतिव्रत सफल जा रहा है।
इतना ही नहीं, घर की बच्चियों को भी इन समस्त परम्पराओं के साथ करवा चौथ का व्रत रखकर भूखा रहना सिखाना भी एक महत्वपूर्ण कर्त्तव्य है ताकि वह बड़ी होकर अपने भावी पति की सेवा में करवा चौथ पर भूखी रहकर पतिव्रता स्त्री का धर्म निभा सके, चाहे उसका पति भी अपने ससुर की तरह ही तमाम दुष्ट मर्दाना परम्पराओं का निर्वाह किया करता हो।
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