//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जापान में आए भूकम्प और सुनामी में हुए जान ओ माल के नुकसान को देखकर अपना तो क्या अच्छे-अच्छे पापियों का भी मुँह बंद है। आदत के विपरीत लोग सोचने लग पड़े हैं कि अगर अपने भी देश में इस तरह की विपदा आन पड़ी तो क्या होगा। ऐसे मामलों में लोग सरकार पर, चाहे वह कितनी भी ‘काबिल’ क्यों न हो, जाने क्यों अविश्वास करते है! विश्वास करें भी कैसे! जापान में फुकुशिमा परमाणु संयंत्र की भट्टियाँ परमाणु बम की तरह उड़ जाने से उपजी परिस्थितियों से सबक लेने की नीयत से कुछ दिन पहले मुम्बई में सम्पन्न हुई एक हाईप्रोफाइल कान्फ्रेंस में जिस तरह मंत्री और विधायक खुर्राटे लेते नज़र आए, उससे भले ही यह गलतफहमी हो कि हमारे नेतागण कितने ग़ज़ब के सेवाभावी हैं, सोते हुए भी जनता की चिन्ता करते हैं, लेकिन आम आदमी के पास दूसरी ढेरों ऐसी वजहें हैं जिनके कारण ऐसी आपदाओं के समय वह सरकार पर ना चाहते हुए भी अविश्वास करने पर मजबूर है। मोहल्ले में एक छोटी सी आग लग जाने पर हमारे देश में जिस तरह सैकड़ों नखरों के बाद तीन घंटे की न्यूनतम देरी से फायर बिग्रेड की एक अदद गाड़ी राख के ढेर से चिन्गारियाँ बुझाने आया करती है, अगर भूकम्प या सुनामी आ जाए, परमाणु हादसा हो जाए तो इस अनुभव से तो हम दावे के साथ कह सकते हैं कि भले ही उत्तरी अमेरिका से रेस्क्यू टीम भारत आ जाए परन्तु हमारी फायर बिग्रेड कभी आएगी ही नहीं।
जापान की प्राकृतिक त्रासदी से (अभी हम इंतज़ार कर रहे हैं कि कोई राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय एन.जी.ओ. इसे मानव निर्मित त्रासदी साबित करे) कुछ दिन स्तब्ध रहने के बाद पैसा उगाने वाले दुनिया भर में अब तक जाग चुके होंगे। कुछ तो स्तब्ध हुए ही नहीं होंगे बल्कि पहले ही दिन से टी.वी. पर त्रासदी की तस्वीरें देख-देखकर कमाई की संभावनाएँ टटोलने में लग गए होंगे। जैसे ‘कबाड़ी’। विकासशील देशों में कबाड़ी होते हैं या नहीं पता नहीं लेकिन हमारे जैसे देश में तो कौन कबाड़ी ऐसा होगा जिसकी, इतनी बड़ी मात्रा में ‘कबाड़’ देखकर बाँछे न खिल गईं हों। कबाड़ भी मामूली लकड़ी, लोहा-लंगड़ भर का नहीं, टी.वी. फ्रिज, इलेक्ट्रॉनिक आयटम, कम्प्यूटर, इंपोर्टेड लक्झरी गाड़ियों यहाँ तक कि हवाई जहाज़ों और पानी के जहाज़ों तक का कबाड़। ऐसा बेशकीमती कबाड़ दुनिया के किसी देश में मिलने वाला नहीं है चाहे कितनी बड़ी उथल-पुथल हो जाए। मेरा खयाल है कि अब तक तो बहुत सारे कबाड़ी पासपोर्ट, वीज़ा दफ्तरों की ओर दौड़ लगा चुके होंगे। हसन अली जैसे बडे़ कबाड़ी तो हो सकता है टोकियों पहुँच भी गए हों।
जापान में बरबादी का दौर अभी थमा नहीं है, मगर दुनियाभर की कन्स्ट्रक्शन कम्पनियाँ और अन्तर्राष्ट्रीय ठेकेदार जापान को फिर से खड़ा कर देने के लिए उतावले होने लग पड़े होंगे। विभिन्न देशों की सरकारें जापान के साथ अपने मधुर संबंधों की टोह लेने लगी होंगी ताकि वक्त ज़रूरत अपने देश की ठेकेदार फर्मों की मदद कर सकें। एस्टीमेट बनने लग गए होंगे, टेंडरों की चिन्ता दुनिया की सबसे बड़ी चिन्ता के रूप में आकार लेने लगी होगी। भिन्न-भिन्न दलाल सक्रिय होकर मालामाल होने की जुगाड़ें लगाने लगे होंगे। कुछ एजेंसियाँ तो जापानी मंत्रियों-अफसरों की खरीद फरोख्त का ठेका लेने के लिए आतुर हो रही होंगी ताकि टेंडर मनचाही फर्मों के पक्ष में खुल सकें। जापानियों के दुख में कुछ दिन सहभागी बने रहने का धैर्य इन लक्ष्मी उपासकों के पास कहाँ, वे आँखों में अथाह कमाई का लालच लिए जापान के पुनर्निर्माण की बाट जोहने लगे होंगे जबकि जापान अभी ढंग से मातम भी नहीं मना पाया है।
जापान की प्राकृतिक त्रासदी से (अभी हम इंतज़ार कर रहे हैं कि कोई राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय एन.जी.ओ. इसे मानव निर्मित त्रासदी साबित करे) कुछ दिन स्तब्ध रहने के बाद पैसा उगाने वाले दुनिया भर में अब तक जाग चुके होंगे। कुछ तो स्तब्ध हुए ही नहीं होंगे बल्कि पहले ही दिन से टी.वी. पर त्रासदी की तस्वीरें देख-देखकर कमाई की संभावनाएँ टटोलने में लग गए होंगे। जैसे ‘कबाड़ी’। विकासशील देशों में कबाड़ी होते हैं या नहीं पता नहीं लेकिन हमारे जैसे देश में तो कौन कबाड़ी ऐसा होगा जिसकी, इतनी बड़ी मात्रा में ‘कबाड़’ देखकर बाँछे न खिल गईं हों। कबाड़ भी मामूली लकड़ी, लोहा-लंगड़ भर का नहीं, टी.वी. फ्रिज, इलेक्ट्रॉनिक आयटम, कम्प्यूटर, इंपोर्टेड लक्झरी गाड़ियों यहाँ तक कि हवाई जहाज़ों और पानी के जहाज़ों तक का कबाड़। ऐसा बेशकीमती कबाड़ दुनिया के किसी देश में मिलने वाला नहीं है चाहे कितनी बड़ी उथल-पुथल हो जाए। मेरा खयाल है कि अब तक तो बहुत सारे कबाड़ी पासपोर्ट, वीज़ा दफ्तरों की ओर दौड़ लगा चुके होंगे। हसन अली जैसे बडे़ कबाड़ी तो हो सकता है टोकियों पहुँच भी गए हों।
जापान में बरबादी का दौर अभी थमा नहीं है, मगर दुनियाभर की कन्स्ट्रक्शन कम्पनियाँ और अन्तर्राष्ट्रीय ठेकेदार जापान को फिर से खड़ा कर देने के लिए उतावले होने लग पड़े होंगे। विभिन्न देशों की सरकारें जापान के साथ अपने मधुर संबंधों की टोह लेने लगी होंगी ताकि वक्त ज़रूरत अपने देश की ठेकेदार फर्मों की मदद कर सकें। एस्टीमेट बनने लग गए होंगे, टेंडरों की चिन्ता दुनिया की सबसे बड़ी चिन्ता के रूप में आकार लेने लगी होगी। भिन्न-भिन्न दलाल सक्रिय होकर मालामाल होने की जुगाड़ें लगाने लगे होंगे। कुछ एजेंसियाँ तो जापानी मंत्रियों-अफसरों की खरीद फरोख्त का ठेका लेने के लिए आतुर हो रही होंगी ताकि टेंडर मनचाही फर्मों के पक्ष में खुल सकें। जापानियों के दुख में कुछ दिन सहभागी बने रहने का धैर्य इन लक्ष्मी उपासकों के पास कहाँ, वे आँखों में अथाह कमाई का लालच लिए जापान के पुनर्निर्माण की बाट जोहने लगे होंगे जबकि जापान अभी ढंग से मातम भी नहीं मना पाया है।



