सोमवार, 25 अप्रैल 2011

जनसत्ता नई दिल्ली में प्रकाशित आलेख - "सेवा के मूल्य"


//व्यंग्य से परे-प्रमोद ताम्बट//
जनसत्ता नई दिल्ली में प्रकाशित
          किसी जमाने में खासी लोकप्रिय, अमरीकी लेखक जान रीड की सोवियत क्रांति पर लिखी गई पुस्तक दस दिन जब दुनिया हिल उठीमें लेखक का एक बेहद महत्वपूर्ण अनुभव उल्लेखित है। जॉन रीड जब सोवियत रूस के किसी रेस्तरॉ में गए तो उन्होंने वहाँ एक पोस्टर लगा देखा जिस पर लिखा था ‘‘कृपया टिप देकर हमें शर्मिंदा न करें!’’ जॉन रीड का विश्लेषण था कि ‘‘वह पोस्टर देखकर मैं समझ गया कि सोवियत रूस में शीघ्र ही क्रांति होने वाली है।’’ कहने को बात बहुत ही छोटी सी है परन्तु लेखक का विश्लेषण बहुत बड़ा था। सचमुच कुछ दिनों बात सोवियत रूस की महान क्रांति का सूत्रपात हुआ, जिसके सर्वाधिक हलचल वाले प्रारम्भिक दस दिनों का विवरण उस पुस्तक में है। जॉन रीड शायद कहना चाहते थे कि उस वक्त रूसी आम जनता और मजदूर वर्ग का नैतिक स्तर इतना ऊँचा उठ चुका था कि क्रांति अवश्यम्भावी थी।
          अभी कल ही जब मैं अपने परिवार के साथ अपना जन्मदिन मनाने के लिए, चूँकि इस दिन घर में खाने की हड़ताल रहती है, भोपाल के एक मध्यम दर्जे के होटल में गया तो मैंने वहाँ के कर्मचारियों को आते-जाते कई बार ग्राहकों को सलाम करते हुए देखा। प्रवेश द्वार पर खड़ा वर्दीधारी व्यक्ति भी हर आने जाने वाले को शिद्दत से सलाम कर रहा था। कई लोग इस सलाम के बदले में तुरन्त अपनी जेब से कुछ न कुछ रुपए निकालकर उन्हें दे रहे थे और बदले में फिर सलाम ले रहे थे।
          होटलों में इस प्रचलन को टिप देना कहा जाता है। इस टिप की आशा में होटल के तमाम कर्मचारी  बड़ी विनम्रता से आपकी सेवा करते हैं, मगर यदि आप उन्हें सम्मानजनक टिप (?) नहीं देते हैं तो उनके चेहरे पर अप्रसन्नता स्पष्ट दिखाई देती है । वेटर-गण अच्छी टिप न देने वालों को अक्सर खुशी-खुशी विदा नहीं करते हैं और यदि ग्राहक हमारी तरह कभी-कभार होटलों की अय्याशी करने वाला न हो, अक्सर वहाँ जाता हो और वेटरों ने उसे अच्छी तरह पहचान रखा हो तो वे उसे आमतौर पर ठीक से तवज्जो भी नहीं देते, यहाँ तक कि पानी तक को नहीं पूछते।
          पिछले दिनों शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनों मैं भी मैंने देखा कि खान-पान व्यवस्था के कर्मचारी खाना वगैरह खिलाने के बाद हाथ में ट्रे, जिसमें औपचारिकता के लिए एक प्लेट में सौंफ के दाने रखे होते हैं, लेकर एक-एक सीट पर जाते हैं और यात्रियों को सलाम करते हैं। उनका मकसद यात्रियों को सौंफ खिलाना या सलाम करना नहीं बल्कि उनकी की गई सेवा के बदले कुछ टिप प्राप्त करना होता है। वे टिप मिलने के बाद बाकायदा आपको सलाम करके अगली सीट की और बढ़ जाते हैं। हाँ, बच्चों और शक्ल से ही टिप न देने वाला खड़ूस दिखाई देने पर वे उन्हें सलाम नहीं करते हैं और स्टेशन पर उतरने के तुरन्त बाद तो फिर वे आपको बिल्कुल पहचानते ही नहीं हैं।
          बहुत सारे लोग एक अदद सलाम से आत्मतुष्ट होकर होटल के वेटरों या ट्रेनों के खान-पान कर्मचारियों को बड़ी खुशी-खुशी टिप देते हैं मगर मुझे पता नहीं क्यों इस संस्कृति से बेहद ग्लानि होती है। मज़ेदार बात यह है कि ग्लानि तो उन्हें होना चाहिए मगर वह मुझे होती है। आमतौर पर मुझे ऐसी जगह जाने में बेहद संकोच होता है जहाँ इंसान भिकारियों की तरह टिप के लिए हाथ पसारकर खड़ा हो जाता हो। भिकारी शब्द मैंने जानबूझ कर इस्तेमाल किया है क्योंकि ऐसे लोगों को भिकारी कहने पर कुछ लोगों को हमेशा गम्भीर आपत्ति रहती है, लेकिन मुझे सड़क पर हाथ पसार कर खड़े भिकारियों और ऐसे टिप-खोरों में कोई अन्तर नज़र नहीं आता क्योंकि मेरी नज़र में ऐसा आचरण शुद्ध रूप से उन लोगों के नैतिक और मानसिक दिवालिएपन का परिचायक है। कोई थोड़ा बहुत भी शिक्षित व्यक्ति स्वेच्छा से दूसरों की दी बख्शीश पर जीवन यापन करना पसन्द करता है यह बात मेरे मन में गहरा अवसाद और गुस्सा पैदा करती है। ऐसे व्यक्ति को आर्थिक रूप से कमज़ोर मानने की अपेक्षा मैं मानसिक रूप से पंगु मानता हूँ और मुझे बहुत चिन्ता होती है कि जिस समाज में आम जन मानस ऐसे सांस्कृतिक पतन का शिकार हो वह समाज क्रान्ति-वान्ति तो दूर सामान्य वैचारिक प्रगति भी कैसे करेगा।
          इस वक्त हमारे देश का आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृष्य सचमुच बहुत ही दयनीय दशा में है। क्या यह व्यवस्था मनुष्य को उसकी तमाम खूबियों, विशेषताओं और उच्चतम नैतिक गुणों के साथ आगामी युग की ओर जाने देना नहीं चाहती ?

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार की अम्मा कब तक खैर मनाएगी


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जनसंदेश टाइम्स लखनऊ में
           भ्रष्टाचार के खिलाफ उसके विरोधियों का गुस्सा फूटकर भलभल-भलभल निकल पड़ा है। इसका बहाव कुछ ठीक-ठीक नहीं बताया जा सकता किस तरफ है, और इससे जहाँ-तहाँ संचित भ्रष्टाचार का कूड़ा-करकट बहेगा भी या नही, पता नहीं, मगर गुस्से को यूँ बहता देखकर लोग काफी खुश हैं, तालियाँ पीट रहे हैं। नदी-नालों की बहुतायत देख मुझे डर है कि यह गुस्सा, भ्रष्टाचार के कूड़े-करकट के ढेरों को जस का तस छोड़कर, दूर बहकर समुद्र में न निकल न जाए।
          जंजीर से बंधे कुत्तों के प्राण चींथकर भौंकने के बावजूद भी जिस तरह हाथी अपनी मस्ती में आगे बढ़ता चला जाता है, उसी तरह भ्रष्टाचार भी बेफिक्र सा झूमता-झामता चलता चला जा रहा है, क्योंकि उसे अपनी अम्मा का पूर्ण संरक्षण प्राप्त हैं। अम्मा सबकी आँखों से बची हुई आराम से घूमती फिर रही है, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। यह मानी हुई बात है कि जब बच्चा पैदा होकर यहाँ-वहाँ शैतानी करता फिर रहा है, तो उसकी अम्मा तो ज़रूर अस्तित्व में होगी और बच्चे से ज़्यादा खतरनाक भी होगी। जब तक उसकी अम्मा पकड़ में नहीं आएगी और उसे छठी का दूध याद नहीं दिलाया जाएगा वह चोरी-छुपे अपने बिगडैल बच्चे को दूध पिलाती रहेगी और बच्चा दिन दूना रात चौगुना बढ़ता रहेगा।
          भ्रष्टाचार के सताए हुए कुछ बंदे और बंदियाँ गाँधीवाद की बैलगाड़ी पर सवार होकर भ्रष्टाचार को खदेड़ने निकले हैं जबकि भ्रष्टाचार चार सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार वाली बुलेट ट्रेन पर सवार फर्राटे से आगे बढ़ता जा रहा है। उसे पता है कि बैलगाड़ी पर सवार लोग आजीवन उस तक पहुँचने वाले नहीं हैं, वह बेखौफ सर्र-सर्र करता हुआ इधर से उधर, उधर से इधर फर्राटे भर रहा है। लेकिन उन बेचारों की इसमें कोई गलती नहीं। दरअसल, गाँधीजी भ्रष्टाचार की अम्मा के रूप-रंग, गुण-लक्षणों के बारे में किसी को कुछ बता कर ही नहीं गए, तो उसे कैसे कोई पहचानेगा ? यही कारण है कि लोग, भ्रष्टाचार की अम्मा को न तो आज़ादी के समय पहचान पाए और न ही आज़ादी के चौसठ साल बाद पहचान रहे हैं। इसलिए भ्रष्टाचार की अम्मा हमेशा खैरमनाती रहती है, लेकिन आखिर कब तक मनाएगी !

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

एक अदद ‘शुक्रिया’ से चलेगा देश !

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
शुक्रिया अदा करना भी अपने-आप में कितने मजे का काम है। आजकल की बाज़ारू अर्थव्यवस्था में जब बिना धन के कुछ मिलता ही नहीं है, शुक्रियाएक ऐसी चीज़ है जिसमें सामने वाले को वास्तव में अपनी जेब से कुछ अदा करना ही नहीं पड़ता। वस्तुकी समस्त विशेषताएँ अपने भीतर समेटे, ठोस, प्रामाणिक, वज़नदार, कीमती चीज़ लेकर भी आदमी बेशर्मी से दो कौड़ी का शुक्रिया अदा कर चलता बनता है। अड़ोसी-पड़ोसी आए दिन कोई न कोई घरेलू सामान माँगकर ले जाते हैं और बिना तोड़े-बिगाड़े, उसे लौटाते नहीं। कभी तोड़ना भले ही भूल जाएँ परन्तु लौटाते समय कभी, नींद में भी टका साशुक्रिया अदा करना नहीं भूलते।
          कितना अच्छा हो अगर दुनिया की हर चीज़ एक अदद शुक्रियाके बदले में उपलब्ध हो जाए! बाज़ार गए, मन पसन्द सब्जी-भाजी झोले में भरी और उदारता से शुक्रियाकी अदायगी कर चले आए। रेलगाड़ी-हवाई जहाज की टिकट खिड़की पर गए, टिकट लिया और एक रूखा सा शुक्रियाकाउन्टर पर पटककर सीट पर जा बैठे। अगर एक बढ़िया सी लक्ज़री गाड़ी खरीदना है तो बैंक बैलेंस, लोन, ब्याज, किश्त और चेक बाउँस की फिक्र करने की जरूरत ही नहीं, तड़ से शुक्रियाफेंका और फर्राटा भरते हुए चल दिये। पेट्रोल की अन्तराष्ट्रीय कीमतों की भी चिन्ता नहीं, चाहे जितना भरवा लो, शुक्रियाही तो अदा करना है, और उसके लिए जेब, पर्स कुछ टटोलने की भी आवश्यकता नहीं, ओठों को थोड़ा सा गोल बनाकर रेडीमेड तैयार रखे शुक्रियाको निकालकर सामने वाले के मुँह पर मार चलते बने।
          कसम से क्या अद्भुत समाज होगा, न किसी को श्रम बेचने की ज़रूरत न खरीदने की। काम पर गए, काम किया नहीं किया, बदले में शुक्रियालिया और रास्ते से शुक्रियाके बदले में बच्चों के लिए मिठाई-फल लिए और घर आ गए। न किसी को चोरी करने की ज़रूरत, न डाका डालने की। ठगी, जालसाजी, घोटालेबाज़ी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार सब बंद। सबसे अच्छी बात होगी औरतों की जिस्मफरोशी बंद हो जाएगी। जब हर चीज़ शुक्रियाके बदले में मिलने लगेगी तो बेचारियों को अपना जिस्म बेचकर अपना और बच्चों का पेट पालने की क्या ज़रूरत होगी! कम्पलीट समाजवाद आ जाएगा शुक्रियाका समाजवाद।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

न देख बुरा सुन बुरा बोल बुरा


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          न देख देख देख बुरा, न सुन सुन सुन बुरा, न बोल बोल बोल बुरा- न देख बुरा सुन बुरा बोल बुरा। गाँधी जी के तीन बंदरों के इस ऐतिहासिक उपदेश को अगर किसी ने हृदय से आत्मसात किया है तो वे है हमारे प्रधानमंत्री। वे न बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं, और न बुरा बोलते हुए आज तक किसी ने उन्हें देखा-सुना है। बोलने के मामले में बुरा तो क्या, मैं तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि देश की निन्यानवे फीसदी आबादी ने तो उन्हें कभी बोलते हुए भी नहीं सुना होगा।
          भ्रष्टाचार कितनी बुरी बात़ है, इसे आँख खुली रखकर देखना और भी बुरी बात़ है। राष्ट्रव्यापी घोटालों के ऊपर चल रहे फालतू शोरगुल पर फिज़ूल कान देना भी उतनी ही बुरी बात है। देखना, फिर सुनना और फिर इन बुरी-बुरी हरकतों पर जबरन कुछ बोलना प्रजातंत्र के किसी भी सच्चे पहरुए के लिए बहुत ही बुरी बात है, इसीलिए अपने आँख, कान और मुँह बंद रखकर हमारे प्रधानमंत्री अद्वितीय धैर्य का परिचय देते हुए देश को चला रहे हैं, और वह शान से चल रहा है।
          देश में चल रही तमाम ऊलजलूल और ऊटपटांग हरकतों के बारे में फालतू की सूचनाएँ और जानकारियाँ दिमाग में भंडारित रखकर वे उसे ओव्हरलोड नहीं करते। उनकी सरकार के मंत्री-संत्री, मंत्रालयों के अफसर-बाबू, देश की जनता के वी.आई.पी. प्रतिनिधि, कब, कहाँ, क्या-क्या लीला रचाते रहते हैं, वे नहीं मालूम रखते। कौन-कौन सी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उनके चिर शांति पूर्ण जादुई मौनकी आकांक्षी, अभिलाषी हैं, कौन-कौन से व्यापारिक घराने उनके, निर्लिप्त, निरपेक्ष समभाव के लाभार्थी है, वे नहीं पता रखते। देश के किस कोने में कौन-कौन, क्या-क्या गुलखिला रहा होता है उन्हें बिल्कुल पता नहीं होता। यदि पता हो भी तो किसी को कोई टेन्शन नहीं होता क्योंकि उन्हें कुछ निर्णायक करना तो है नहीं, यह सबको पता है।
          मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनके किचन में क्या-क्या साग-भाजी कब, किस मंडी से कितनी-कितनी मात्रा में कितने पैसों में खरीदी जाती है उन्हें बिल्कुल पता नहीं रहता होगा। यही कारण है कि उनकी कुर्सी बचाने के लिए किस पार्टी के किस-किस सांसद की खरीद किस-किस दर पर की गई और इस खरीदारी पर जेब किसने ढीली की, यह भी उन्हें नहीं पता चला होगा। एक प्रधानमंत्री स्तर के राजनीतिज्ञ के सिर पर देश के दूसरे कितने लफड़ों-झपड़ों का टेन्शन रहता है, उससे यह उम्मीद रखना सरासर बेवकूफी है कि कब, कहाँ, क्या चीज खरीदी गई। अर्थशास्त्री होने का मतलब यह नहीं कि वह हर चीज़ का हिसाब-किताब रखता फिरे।
महँगाई के स्थाई मुद्दे पर देश की जनता जब-तब इस बेकसूर आदमी को बिलावजह कोसने लगती है, जैसे अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर उसने कोई अपराध कर दिया हो। एक प्रधानमंत्री जो अर्थशास्त्र का प्रकांड पंडित हो, वह देश के शिखर आर्थिक मुद्दों को सुलझाने में अपनी ऊर्जा खर्च करेगा कि महँगाई जैसी टुच्ची चीज़ की चौकीदारी करता फिरेगा। भूमंडलीकरण अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की तीव्र गति से, आर्थिक शक्ति बनते जा रहे हमारे देश का प्रधानमंत्री आटा-दाल-चावल, आलू-प्याज़ जैसे घटिया माल का खुदरा मूल्य पता रखे यह आशा करना तो यार सरासर अमानवीयता है।
          देश में भीषण बेरोज़गारी है, गरीबी हटाने का सपना धन्नासेठ की तिज़ोरी में कैद है, लोग मूलभूत सुविधाएँ नहीं हासिल कर पाते, स्विस बैंक में किसका माल रखा है, यह सब अगर प्रधानमंत्री जी को नहीं पता है तो इसका कारण गाँधी जी के वही ‘‘न देख बुरा, सुन बुरा, बोल बुरा’’ का मायावी सिद्धांत है। देश में साधु-संत राजनीति मे घुसने के लिए धड़पड़-धड़पड़ करते रहते हैं, हमारे प्रधानमंत्री राजनीति में साधुत्व की चरम सीमा पर पहुँचे हुए संत हैं उन्हें सांसारिक तांडव के बारे में कुछ पता नहीं होता।

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

आज़ादी की लडाई


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          वे बोले-‘‘भाई साहब आपको सहयोग देना ही पड़ेगा, आप इन्कार नहीं कर सकते, वर्ना अपनी-तुपनी दोस्ती टूट गई समझो।’’
          मैंने कहा-‘‘जनाब, घर के अन्दर घुसे आपको कई सेकण्ड हो चुके हैं आपने अब तक कोई सहयोग माँगा ही नहीं है, मैं आखिर इन्कार कैसे कर सकता हूँ।’’
          वे बोले-‘‘यह भी बजा फरमाया आपने। बात दरअसल यह है कि दूसरी आज़ादी की लड़ाई प्रारम्भ हो चुकी है, आप......’’
          उनकी बात पूरी होने से पहले ही मैंने चट आश्चर्य प्रकट कर डाला और कहा-‘‘ अच्छा, पहली वाली आज़ादी को क्या हुआ!
          वे हड़बडाते हुए बोले-‘‘हमारा मतलब है आज़ादी की दूसरी लड़ाई प्रारम्भ हो चुकी है।’’
          मैंने फिर कहा-‘‘वो तो मैं समझ गया, मगर पहले, पहली आज़ादी के बारे मैं नक्की कर लेना चाहिये कि वह कहा गई, वर्ना ऐसा हो कि पहली के रहते हुए आप दूसरी भी ले आओ, सौत-सौत एक जगह रह नहीं पाती है, बहुत कलह करती हैं।’’
          वे हँसने लगे-‘‘ही ही ही ही, आप व्यंग्यकार लोग भी खूब मज़ाक कर लेते हैं।’’
          मैंने पूछा-‘‘बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ!’’
          वे बोले-‘‘अरे साहब, हम तो सरकारी अफसरी में सेवा करवा-करवाकर अघा गए, इसलिये अब देश सेवा की सोची है। देश गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, इसे बाहर निकालना ज़रूरी है, इसलिए आप भी कृपया इस लड़ाई में कूँद पड़िये।’’
          मैंने कहा-‘‘बिल्कुल बिल्कुल! बताइये कहाँ हैं जंपिंग किट! हथियार, गोला बारूद की कुछ व्यवस्था हुई या बात करें किसी से ?’’
          वे बोले-श्रीमानं, हम गाँधी जी के रास्ते पर चलकर दूसरी आज़ादी लाएँगे।
          मैंने कहा-‘‘देखिए पहली भी गाँधी जी के रास्ते पर चल कर ही आई थी, उसे क्या हुआ आप बता नहीं रहे! मुझे भय है कि अपन लड़-लुड़ाकर इधर दूसरी आज़ादी ले आएँ और उधर     पहली वाली भी बाहर निकल आए, बड़ी समस्या हो जाएगी।’’
वे उसी उत्साह में बोले-‘‘वाह! क्या प्रश्न उठा दिया आपने। हमने तो कभी इस बिंदु पर विचार ही नहीं किया।’’
          मैंने कहा-‘‘फिर! आप ऐसे आधी-अधूरी तैयारी के साथ कैसे गए मुझसे सहयोग माँगने! जाइये, पहले अपने नेताओं से पूछकर आइये कि पहली आज़ादी को क्या हुआ, तब आकर हमसे बात करिये।’’
          वे उस वक्त तो अपना सा मुँह लेकर चले गए, मगर दूसरे दिन थके-हारे कदमों से चलते हुए फिर चले आए और निराशा के साथ बोले-‘‘अब रहने दीजिए, दूसरी आज़ादी की लड़ाई खत्म हो चुकी है। सरकार ने हमारी सारी माँगें मान ली हैं, अब हमें आपके सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं।’’
          मैंने उन्हें बधाई देते हुए फिर पूछा-‘‘भई, आखिर पहली आज़ादी का क्या हुआ कुछ पता चला!’’
          वे बुरी तरह भड़क गए और लगे चिल्लाने-‘‘भाड़ में गई पहली आज़ादी, हमें क्या पता! पड़ी होगी कहीं किसी की तिजोरी में। हमने क्या दुनिया भर का ठेका ले रखा है जो आज़ादियों का हिसाब रखते फिरें!’’
          वे पॉव पटकते हुए चले गए आज़ादी की दूसरी लड़ाई का उनका खुमार उतर चुका था। 

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

खाओ क्रिकेट, पीयो क्रिकेट, जीयो क्रिकेट

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
 
            मैं बेहद कुंठित हूँ कि बीस रुपये रोज़ औसत कमाई वाले इस देश में क्रिकेट को धर्मकी तरह अपनाऊँ या विज्ञानकी तरह! अपनाना तो पड़ेगा किसी न किसी रूप में, क्योंकि हमने हाल ही में क्रिकेट के बड़े-बड़े बल्लमों को धूल चटाकर विश्वकप जो जीता है। सारा देश धर्म से उन्मादऔर किक्रेट के विज्ञानके प्रभाव में है, इसलिए अपनी सभी प्राथमिकताओं को ताक पर रखकर तुरत-फुरत इसे अपनाना बेहद ज़रूरी है, वर्ना खेलद्रोही कहे जाने का खतरा आसन्न है।
          कभी क्रिकेट को एक खेल की तरह खेला जाता था, लेकिन अब इसमें से खेलत्वखत्म हो गया है। यह कमोबेश धर्मकी तरह नज़र आने लगा है, जिसे हम सर-माथे पर धारण करते हैं, ओढ़ते-बिछाते हैं और लगे हाथ दमीचते-पछीटते भी हैं। तुम्हारा धर्महमारे धर्म से महान कैसे कि तरह, तुम्हारा क्रिकेटहमारे क्रिकेटसे महान कैसे वाली भावना से लेकर क्रिकेट का विश्व-गुरू बनने तक की सनक इस फील्ड में दिखाई देने लगी है। कट्टरता की भाव-भंगिमा, रोंद डालो, काट डालो, पीट डालो, चटनी बना दो, यलगार हो, किलाफतह आदि-आदि डायलॉगबाज़ी जो धर्म के क्षेत्र में चलती है, अब क्रिकेट में भी नज़र आने लगी है।
          जिस तरह धर्म को अहर्निश ओढ़ा-बिछाया जाता है, जिस तरह धर्म में अंध-आस्था और अंध-विश्वास का पारायण किया जाता है, क्रिकेट में भी किया जाने लगा है। अपन तो हमेशा धर्म-निरपेक्ष के साथ-साथ खेल-निरपेक्ष भी रहे और खेलत्व की भावना भी जिन्दा रखी, मगर अब जिस तरह यह दोनों ही मूल्य खतरे में नज़र आ रहे हैं, लग रहा है क्रिकेट को धर्म की तरह अपनाना पडे़गा। अगर न अपनाऊँ तो मुझे विश्वास है लोग मार-मारकर अपनाने पर मजबूर कर देंगे।
          इधर क्रिकेट को विज्ञान की तरह मिस-यूज़ भी किया जाने लगा है, जो खासा आन्दोलित करने वाला है। जैसे विज्ञान हमें सिखाता है कि प्रकृति, विश्व ब्रम्हांड को अपने काबू में कैसे रखा जा सकता है, क्रिकेट दुनिया भर के सत्तानशीनों को सिखाता है कि पब्लिक को काबू में कैसे रखा जा सकता है। सत्तासीनों के पास क्रिकेट एक ऐसे अस्त्र के रूप में मौजूद है जिसके प्रक्षेपण से जनता के आक्रोश, गुस्से और कुंठा को कंट्रोल किया जा सकता है। कितनी भी महँगाई हो, बेरोज़गारी हो, जीना कितना भी मुश्किल हो, कितनी भी अराजकता हो, घोटालें हों, भ्रष्टाचार हो, देश गले-गले तक अव्यवस्थाओं का शिकार हो, बस एक के बाद एक क्रिकेट टूर्नामेंट करवाते रहो, सब ठीक हो जाएगा।
          जनता को जब देने के लिए के लिए कुछ न हो तो क्रिकेट का जुनून दे दो वह उछलते कूदते हुए जी लेगी। खाओ क्रिकेट, पीयो क्रिकेट, जीयो क्रिकेट ऐसी इक्वेशन है जो सारे गम भुला देती है, सारे दुखों का नाश कर देती है। विश्वकप का जुनून ऐसा चढ़ा की लोग जापान का भूकम्प और सुनामी भी भूल गये। लोग भूल गए कि देश में एक घोड़ों का व्यापारी कितना टैक्स दबाकर बैठ जाता है। क्या कलमाड़ीक्या राजा’, क्रिकेट के नशे में लोग भूल गए कि उन्होंने क्या किया। क्रिकेट ने ऐसी जादू की छड़ी घुमाई कि किसी का ध्यान ही नहीं गया कि मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ कहाँ-कहाँ बरबादी कर रहीं हैं। यह क्रिकेट का विज्ञान ही है जिसका उपयोग दुनिया भर की सत्ताएँ खूब करती हैं। खेल में धर्म सा उन्माद और सत्ताधारी ताकतों के इस क्रिकेट विज्ञान को देखकर भारी किंकर्त्तव्यविमूढ हूँ, आखिर क्या करूँ।
          सोचता हूँ भावी विश्वयुद्ध को सफलतापूर्वक मंचित करने के लिए एक विश्वस्तर का क्रिकेट टूर्नामेंट कितना कारगर होगा। दुनिया भर की पब्लिक क्रिकेट की खुमारी में रहेगी, कहीं कोई विरोध, कोई आन्दोलन न होगा और साम्राज्यवादी सेनाएँ प्रजातांत्रिक मूल्यों की सुभीते से बरबाद करती रहेगी। विश्वयु़द्ध उत्साहपूर्वक सफल हो जाएगा जैसे विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट सफल होता है।