//व्यंग्य से परे-प्रमोद ताम्बट//
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| जनसत्ता नई दिल्ली में प्रकाशित |
किसी जमाने में खासी लोकप्रिय, अमरीकी लेखक जान रीड की सोवियत क्रांति पर लिखी गई पुस्तक ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ में लेखक का एक बेहद महत्वपूर्ण अनुभव उल्लेखित है। जॉन रीड जब सोवियत रूस के किसी रेस्तरॉ में गए तो उन्होंने वहाँ एक पोस्टर लगा देखा जिस पर लिखा था ‘‘कृपया टिप देकर हमें शर्मिंदा न करें!’’ जॉन रीड का विश्लेषण था कि ‘‘वह पोस्टर देखकर मैं समझ गया कि सोवियत रूस में शीघ्र ही क्रांति होने वाली है।’’ कहने को बात बहुत ही छोटी सी है परन्तु लेखक का विश्लेषण बहुत बड़ा था। सचमुच कुछ दिनों बात सोवियत रूस की महान क्रांति का सूत्रपात हुआ, जिसके सर्वाधिक हलचल वाले प्रारम्भिक दस दिनों का विवरण उस पुस्तक में है। जॉन रीड शायद कहना चाहते थे कि उस वक्त रूसी आम जनता और मजदूर वर्ग का नैतिक स्तर इतना ऊँचा उठ चुका था कि क्रांति अवश्यम्भावी थी।
अभी कल ही जब मैं अपने परिवार के साथ अपना जन्मदिन मनाने के लिए, चूँकि इस दिन घर में खाने की हड़ताल रहती है, भोपाल के एक मध्यम दर्जे के होटल में गया तो मैंने वहाँ के कर्मचारियों को आते-जाते कई बार ग्राहकों को सलाम करते हुए देखा। प्रवेश द्वार पर खड़ा वर्दीधारी व्यक्ति भी हर आने जाने वाले को शिद्दत से सलाम कर रहा था। कई लोग इस सलाम के बदले में तुरन्त अपनी जेब से कुछ न कुछ रुपए निकालकर उन्हें दे रहे थे और बदले में फिर सलाम ले रहे थे।
होटलों में इस प्रचलन को टिप देना कहा जाता है। इस टिप की आशा में होटल के तमाम कर्मचारी बड़ी विनम्रता से आपकी सेवा करते हैं, मगर यदि आप उन्हें सम्मानजनक टिप (?) नहीं देते हैं तो उनके चेहरे पर अप्रसन्नता स्पष्ट दिखाई देती है । वेटर-गण अच्छी टिप न देने वालों को अक्सर खुशी-खुशी विदा नहीं करते हैं और यदि ग्राहक हमारी तरह कभी-कभार होटलों की अय्याशी करने वाला न हो, अक्सर वहाँ जाता हो और वेटरों ने उसे अच्छी तरह पहचान रखा हो तो वे उसे आमतौर पर ठीक से तवज्जो भी नहीं देते, यहाँ तक कि पानी तक को नहीं पूछते।
पिछले दिनों शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनों मैं भी मैंने देखा कि खान-पान व्यवस्था के कर्मचारी खाना वगैरह खिलाने के बाद हाथ में ट्रे, जिसमें औपचारिकता के लिए एक प्लेट में सौंफ के दाने रखे होते हैं, लेकर एक-एक सीट पर जाते हैं और यात्रियों को सलाम करते हैं। उनका मकसद यात्रियों को सौंफ खिलाना या सलाम करना नहीं बल्कि उनकी की गई सेवा के बदले कुछ टिप प्राप्त करना होता है। वे टिप मिलने के बाद बाकायदा आपको सलाम करके अगली सीट की और बढ़ जाते हैं। हाँ, बच्चों और शक्ल से ही टिप न देने वाला खड़ूस दिखाई देने पर वे उन्हें सलाम नहीं करते हैं और स्टेशन पर उतरने के तुरन्त बाद तो फिर वे आपको बिल्कुल पहचानते ही नहीं हैं।
बहुत सारे लोग एक अदद सलाम से आत्मतुष्ट होकर होटल के वेटरों या ट्रेनों के खान-पान कर्मचारियों को बड़ी खुशी-खुशी टिप देते हैं मगर मुझे पता नहीं क्यों इस संस्कृति से बेहद ग्लानि होती है। मज़ेदार बात यह है कि ग्लानि तो उन्हें होना चाहिए मगर वह मुझे होती है। आमतौर पर मुझे ऐसी जगह जाने में बेहद संकोच होता है जहाँ इंसान भिकारियों की तरह टिप के लिए हाथ पसारकर खड़ा हो जाता हो। भिकारी शब्द मैंने जानबूझ कर इस्तेमाल किया है क्योंकि ऐसे लोगों को भिकारी कहने पर कुछ लोगों को हमेशा गम्भीर आपत्ति रहती है, लेकिन मुझे सड़क पर हाथ पसार कर खड़े भिकारियों और ऐसे टिप-खोरों में कोई अन्तर नज़र नहीं आता क्योंकि मेरी नज़र में ऐसा आचरण शुद्ध रूप से उन लोगों के नैतिक और मानसिक दिवालिएपन का परिचायक है। कोई थोड़ा बहुत भी शिक्षित व्यक्ति स्वेच्छा से दूसरों की दी बख्शीश पर जीवन यापन करना पसन्द करता है यह बात मेरे मन में गहरा अवसाद और गुस्सा पैदा करती है। ऐसे व्यक्ति को आर्थिक रूप से कमज़ोर मानने की अपेक्षा मैं मानसिक रूप से पंगु मानता हूँ और मुझे बहुत चिन्ता होती है कि जिस समाज में आम जन मानस ऐसे सांस्कृतिक पतन का शिकार हो वह समाज क्रान्ति-वान्ति तो दूर सामान्य वैचारिक प्रगति भी कैसे करेगा।
इस वक्त हमारे देश का आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृष्य सचमुच बहुत ही दयनीय दशा में है। क्या यह व्यवस्था मनुष्य को उसकी तमाम खूबियों, विशेषताओं और उच्चतम नैतिक गुणों के साथ आगामी युग की ओर जाने देना नहीं चाहती ?





