बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

अपनी तो पौ-बारह हो गई



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             ज़िन्दगी भर घास छीली, अब जाकर मेहनत सफल हुई, भैयाजी ‘मनीस्टर’ बन गए। हमने अपनी पूरी जिन्दगानी भैयाजी की चम्मचगिरी में स्वाहा कर दी। जहाँ- जहाँ भैयाजी रहे, हम उनकी फटी चप्पल की नाई उनके पाँवों से चिपटे रहे, जब-जब भैयाजी ने आवाज लगाई, हमने भैयाजी के चरणों के नीचे अपने पलक-पॉवड़े बिछा दिये, और जब-जब भैयाजी ने अपनी बैल सी गरदन उठाकर ऊपर की ओर ताका, हम झट से उनके लिए पोर्टेबल सीढ़ी बन गए। आखिरकार बरसों-बरस की कड़ी तपस्या और संघर्ष आखिर रंग लाया, भैयाजी ‘मनीस्टर’ बन ही गए।
भैयाजी जब टाकीज़ में टिकटों की ब्लेकमेलिंग किया करते थे, हम उनके चम्मच थे। भैयाजी जब मुन्सीपाल्टी में राशनकार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने की दलाली करते थे, हम उन के चम्मच थे, भैयाजी जब कलेक्टरी में जाति प्रमाणपत्र, मूल निवासी प्रमाणपत्र, बन्दूक के लायसेंस बनवाने की दलाली करते थे, हम उनके चम्मच थे, भैयाजी जब आर.टी.ओ. में लायसेंस परमिट की दलाली में आए, हमने उनका तन-मन से साथ दिया। भैया जी जब राष्ट्रीय-अन्तर्राट्रीय स्तर के सौदे पटाने लगे, हमने उनकी सफल पीए गिरी की। बदले में भैयाजी ने जो भी ‘धन’ दिया हमने भगवान का प्रसाद समझकर जेब में रख लिया। भैयाजी की कृपा से मिली इसी खुरचन को जमा कर-कर के इस गुलाम ने प्रापर्टी की दलाली का यह छोटा सा बिजनेस प्रारम्भ किया। अब चूँकि भैयाजी ‘मनीस्टर’ बन गए हैं तो अब हमें यह दल्लेगिरी करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। हमारी सामाजिक-राजनैतिक जिम्मेदारियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि क्या बतावे। अब हम भी अपना यह छोटा सा कारोबार मंथली के रेट से किसी को सौंप कर भैयाजी के साथ-साथ देश की सेवा के लिए मैदान में उतरने वाले हैं।
            दलाली, पार्षदी, चेयरमेनी, विधायकी आदि-आदि तरक्की की सीढ़ियों पर भी हमारे सिर पर कुछ कम काम नहीं थे, सारे दंद-फंद हम ही को सम्हालना पड़ते थे।  अब तो भैयाजी चूँकि पहली बार ‘मनीस्टर’ बने हैं तो हमें तो सॉस लेने की फुरसत मिलने वाली नहीं है। भैयाजी का सच्चा चम्मच साबित होने की परीक्षा सही मायनों में तो अब शुरू हुई है। चमचों की भीड़ में एक सफल चमचा बनकर उभरना कोई मामूली बात नहीं है, एड़ी चोटी के बीच का जोर लगाकर दम साधे रहना पड़ता है। कौन आकर खो कर जाएगा कोई भरोसा नहीं रहता।
लायसेंस, कोटा, परमिट, टेन्डर, ट्रांसफर-पोस्टिंग-एपाइंटमेंट, और न जाने क्या-क्या। रात-दिन बस काम ही काम। इस सबमें भैयाजी की फिक्सिंग आखिर हमी तो करवाएँगे। उसके बाद लेन-देन का प्रापर हिसाब रखना, प्रापर्टी, इन्वेस्टमेंट, नईं-नईं बिजनेस डील, पार्टनरशिप, शेयर-डिबेंचर, इत्यादि-इत्यादि मामलों की पकड़ उस ‘गधे’ को तो बिल्कुल ही नहीं है, वह सब हमको ही तो लुक आफ्टर करना पडे़गा।
            सबसे बड़ी समस्या यह है कि समय बहुत कम बचा है, और काम बहुत पड़ा है। साल डेढ़ साल के लिए कोई ‘मनीस्टर’ बने तो चाहे कितने हाथ-पैर मार ले, आखिर क्या उखाड़ लेगा! और फिर, भैयाजी की किस्मत बहुत ही खराब है, क्योंकि उनके ‘मनीस्टर’ बनने से पहले ही देश में सारे बड़े-बडे़ घोटाले हो चुके हैं अब भैयाजी को करने के लिए बचा ही क्या है। मगर फिर भी हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भैयाजी जैसी शातिर प्रतिभाएँ हाथ पर हाथ धरे बैठने के लिए नहीं पैदा होती हैं। कुछ न कुछ कहीं न कहीं से भैयाजी कूट ही लेंगे। भैयाजी जैसा काबिल ‘मनीस्टर’ है तो अपनी तो पौ-बारह हो गई, अपन को कौन रोक सकता है बहती गंगा में हाथ धोने से।      

रविवार, 19 अगस्त 2012

मेरे गहरे साहित्य प्रेमी दोस्त और मैं



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
व्‍यंग्‍ययाञा के अप्रैल-जून 2012 के अंक में प्रकाशित 

एक विकट साहित्य प्रेमी से इन दिनों मेरी गहरी दोस्ती है। मतलब गहरी तो वे मानते हैं, मैं अलबत्ता इतनी गहराई में जा नहीं पाता, उनसे सामना होते ही ऊपर ही सतह पर कहीं फड़फड़ाने लगता हूँ। जिस दिन से उन्हें पता चला है कि मैं थोड़ा बहुत साहित्यिक रुचि रखने वाला जीव हूँ, दोस्ती के बहाने उन्होंने मेरा जीना हराम कर रखा है।
दरअसल वे जब प्रायमरी स्कूल में पढ़ा करते थे तब कोई साहित्यकार किस्म के अध्यापक उनके स्कूल में चार-छः दिन के लिए आए थे और अपने कुछ कीट कक्षा के सभी छात्रों पर छोड़ गए। बाकी छात्र तो समय रहते उन साहित्य-कीटों से मुक्त हो गए और यहाँ-वहाँ काले धंधों में लग कर गंगा नहा ली, मगर मेरे ये दोस्त जिनका नाम कोमलचंद सुखनंदन विद्याधर वाचस्पति और तखल्लुस ‘पागल’ था अपने नितांत असाहित्यिक शिक्षण-दीक्षण के लम्बे दौर और हिन्दी विषय में अनुत्तीर्ण होने की क्रमबद्ध परम्परा के बावजूद उन संक्रामक साहित्यिक कीटों को अपने साथ जीवंत ढोते रहे। उनके ये साहित्यिक कीट रेलवे स्टेशन के बुक-स्टॉल, रद्दी वाले के ठेले, सेकंड हैंड किताबों के ठीए या किसी बुद्धिजीवी के घर पर किताबों का जखीरा देखकर सक्रिय हो जाते थे। मेरे घर में भी छुपा कर रखी होने के बावजूद उन्होंने किताबें देख ली थीं और इसका नतीजा यह हुआ कि तब से वे मेरे घर को अपना ही घर समझने लगे थे। वे जब भी मुझे समक्ष में पाते अपने सुप्तप्रायः साहित्यिक कीटों की सम्पूर्ण ताकत के साथ मुझ पर हमला कर देते और अपने ऊटपटांग सवालों से मुझे घायल करते रहते।
एक दिन वे आए और मुझसे बोले ‘‘फ्राड की थ्योरी पढ़ी है ?’’
मैंने कहा ‘‘नहीं फ्राड करने की मेरी कभी कोई योजना नहीं रही।
वे रुष्ठ हो गए, बोले ‘‘सिरीयस बातों पर मज़ाक मत करो जी। फिलास्फर फ्राड की पूछ रहा हूँ मैं ?’’
मैंने कहा अच्छा फ्रायड की बात कर रहे हैं आप।
वे लपक कर बोले ‘‘वही वही, उसी की बात कर रहा हूँ मैं। कहाँ तो फॉरेन कंट्री में हुआ था वो.....याद ही नहीं....! मैंने उन्हें दूसरी बातों में उलझाकर फ्रायड को उनके दिमाग से निकाला वर्ना वे उस दिन ज़रूर मेरे दिमाग का कचूमर निकाल कर ही मानते।
आए दिन वे कोई ना कोई अजीब सवाल ले आते और बुद्धिजीवितापूर्ण गंभीरता से मुझसे जवाब माँगने लगते। एक दिन उन्होंने मुझ पर एक ऐसा सवाल दागा कि मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाया। उन्होंने प्रश्न किया था, ‘‘क्यों ये गुलेरी जी आजकल जिन्दे हैं कि मर गए ?’’
मैंने कहा, ‘‘यार उन्हें गुज़रे हुए ज़माना हो गया।
वे तुरन्त बोले,‘‘ तभी आजकल उनकी कोई कहानी किसी अख़बार, पत्र-पत्रिका में छप नहीं रही। ‘उसने कहा था’ के बाद कोई कहानी कहीं देखने-सुनने में ही नहीं आई। उनकी रील जाने किस ज़माने में अटकी हुई थी।
एक दिन वे मेरे घर आए। मेरी किताबों की रैक में कुछ लेखकों के समग्र संकलन एक के ऊपर एक रखे हुए हैं। मुक्तिबोध रचनावली के छः खंडों के ठीक ऊपर परसाईं रचनावली के छः खंड इस तरह रखे हुए थे कि प्रत्येक खंड की स्पाइन पर बडे़-बड़े अक्षरों में लिखा ‘मुक्तिबोध रचनावली’, ‘परसाईं रचनावली’ साफ-साफ दिख रहा था। उन्होंने घर में घुसते ही पता नहीं अपनी अलौकिक दृष्टि के किस कोण से पुस्तकों को देखा कि देखने के तुरंत बाद उनकी अद्भुत प्रतिक्रिया से मुझे गश आते-आते रह गया। वे अपने खुद के अज्ञान पर अज्ञान का एक अनोखा व्यंग्य बाण सा चलाते हुए बोले, ‘‘अच्छा, हमें तो पता ही नहीं था कि ‘परसाईं जी’ ने ‘मुक्तिबोध’ भी लिखी है।’’ मैं उनकी इस नई खोज पर हतप्रभ रह गया परन्तु आगामी वैचारिक संघर्ष के डर से मुँह में दही जमाए चुपचाप बैठा रहा और उनके जाते ही तुरंत किताबों का स्थान बदल दिया ताकि कोई और विद्धान ऐसी अनोखी खोज प्रतिपादित ना कर सके। दरअसल उनके पुराने डाटा बेस में किन्ही कारणों से परसाईं तो मौजूद थे परन्तु चूँकि मुक्तिबोध की लॉचिग उस वक्त हो नहीं पाई थी इसलिए उनके दिमागी प्रोसेेसर ने गलत गणना कर परिणाम पेश कर दिया था।
एक दिन उन्होंने बड़े उत्साह से मुझसे पूछा, ‘‘अत्री जीे को जानते हो ?’’
मैंने कहा, ‘‘हाँ, सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।
वे बोले, ‘‘नहीं यार जिन्होंने ‘चन्द्रकांता’ और ‘संतति’ जैसी धाँसू किताबें लिखी हैं।’’
मैंने कहा, ‘‘अत्री नहीं यार खत्री कहो, देवकी नन्दन खत्री।
वे बोले, ‘‘हाँ हाँ वही, एक अक्षर का ही तो हेरफेर है। उनकी चंद्रकांता तो मैंने पढ़ी है, मगर संतति नहीं पढ़ पाया। आपके पास हो तो देना ज़रा, पढ़ ही डालें।’’
मैंने कहाँ, ‘‘अकेली ‘संतति’ तो हमने भी नहीं पढ़ी कभी। ‘चन्द्रकांता संतति’ चाहिए तो ले जाइए।’’  
वे बोले, ‘‘चन्द्रकांता दोबारा पढ़कर क्या करेंगे, आप तो अकेली संतति दे दो।’’
मेरे पास माथा पकड़ कर बैठने के अलावा कोई चारा नहीं था।
मैंने उन्हें कुछ पुस्तकें पढ़ने के लिए दीं थी। शराफत से उन्होंने सारी पुस्तकें वापस तो कर दी परन्तु एक ऐसा सवाल उन्होंने मेरे माथे पर दे मारा जिसका सामना मैंने ताज़िन्दगी कभी नहीं किया। वे तीर की तरह तमाम जोशियों के नाम अपने मुखारबिंद से उच्चारित करते हुए बोले, ‘‘क्यों, ये प्रभाष जोशी, शरद जोशी, हरी जोशी, प्रभु जोशी, ज्योतिष जोशी सब भाई-भाई हैं क्या.......?’’ मेरा मन हुआ कि कह दूँ ‘‘हाँ और मालती जोशी इन सबकी बहन हैं।’’
एक बार प्रेमचंद और शरदचंद्र पर कहीं से कोई विश्लेषण पढ़कर वे सीधे मेरे पास आए और घर में इन दोनों लेखकों की जितनी पेपरबैक पुस्तकें थीं सब इकट्ठा कर लीं और जाते-जाते एक प्रश्न मेरे लिए छोड़ गए जिसके संबंध में ना तो स्वर्गीय श्री विष्णु प्रभाकर जी ने कभी सोचा होगा ना ही श्री कमल किशोर गोयनका जी ने। उनका प्रश्न था, ‘‘क्यों प्रेमचन-शरदचन क्या बाप बेटे थे ?
मैंने कहा, ‘‘नहीं यार !’’
‘‘तो फिर भाई-भाई होंगे.....? वे तपाक से बोले।
मैंने एक गहरी खामोशी अख्तियार कर ली और वे निरुत्तर प्रस्थान कर जाने के लिए मजबूर हो गए।
व्यंग्यकार होने के नाते मेरे सौजन्य से उन्हें ज़्यादातर व्यंग्य ही पढ़ने को मिलते हैं, नतीजतन वे कभी-कभी हँसते-हँसते और कभी-कभी गहरी स्तब्धता ओढे हुए मुझे रात-बे-रात फोन करते रहते हैं, और वैसे ही हँसते-हँसते या स्तब्धता ओढे़ हुए फोन पर बिना कुछ कहे फोन काट दिया करते हैं। एक दिन उन्होंने रात को बारह बजे मुझे फोन किया और कहा, ‘‘यार कुछ भी कहो, शरद जोशी भी थे प्रतिभा के धनी इंसान, एक तरफ उन्होंने अपने व्यंग्यों से लोगों की नाक में दम कर दिया तो दूसरी ओर किसान आन्दोलन भी क्या जोरदार चलाया, एट ए टाइम दो-दो काम, वाह।’’ मैंने खामोशी से फोन बंद किया और इस विकट व्यक्तित्व के मस्तिष्क प्रकोष्ठों में विचरण करने लगा, कहीं तो वो खाना होगा जहाँ ताला लगा देने से ये मेरे अनन्य मित्र खुद भी चैन से रह सकेंगे और मुझे भी परेशान नहीं करेंगे।   
अगली सुबह तड़के वे मेरे घर के बाहर खडे़ थे और उनकी जु़बान पर बिल्कुल ताज़ा सवाल तैयार रखा हुआ था, यार ये रवीन्द्रनाथ टैगोर और रवीन्द्रनाथ ठाकुर दोनों ने ही एक सी गीतांजलि लिख मारी ?’’ मैंने चट से बाथरूम का दरवाज़ा खोला और अन्दर घुस गया। उनके सवालों से बचने का इससे अच्छा कोई तरीका नहीं था। बाथरूम में मैं मेरे इन साहित्य प्रेमी गहरे दोस्त से छुटकारा पाने की तरकीबें सोचता रहा और वे मेरे बुक शेल्फ से किताबें उठाकर नई किसी गुत्थी में उलझने की तैयारी करने लगे।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

आखिर गॉड पार्टिकल मिलेगा तो मिलेगा कैसे


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जब से ‘‘कण-कण में भगवान’’ का नितांत मौलिक, भारतीय चिन्तन कानों में पड़ा तब से यह मूरख उन कणों की तलाश में दर-दर भटक रहा था जिनमें भगवान निवासरत हों। हालाँकि मेरे सम्मुख यह एक विराट प्रश्न हमेशा मौजूद था कि जब मुझे रहने के लिए कम से कम दस बाई दस का एक सर्वसुविधा युक्त कमरा ज़रूरी है तो भगवान महाशय ‘कण‘ जैसी छोटी सी जगह में कैसे रहते होंगे। और, चलो मान लिया किसी जादू-टोने के बल पर या हाथ की सफाई, अथवा भ्रम का सृजन कर किसी तरह वे उस कण में पहुँच भी गए तो फिर यह कैसे संभव है कि वे एक ही समय में, एक साथ करोड़ों, अरबों, खरबों कणों में जा विराजें, वहीं से एक साथ अपने दैनिक क्रियाकर्म एवं ब्रम्हांडीय ज़िम्मेदारियाँ निभाएँ। ऐसे ही हज़ारों सवाल अपने मन-मस्तिष्क में लिए बंदा अक्ल आने के बाद से ही अपना सिर धुनता रहा है और ज़माने भर के ज़िम्मेदार लोग ‘पागल है’ कह का अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते रहे।
अब ज़बरदस्त शोर उठ खड़ा हुआ है- गॉड पार्टिकल मिल गया, गॉड पार्टिकल मिल गया। फिर मेरे समक्ष प्रश्नों की झड़ी लग गई है! क्या वह कण मिल गया जिसमें ‘गॉड’ यानी ‘भगवान’ रहता है या बात ‘ईसाइयों’ के ‘गॉड’ के मिलने की की जा रही है, भगवान का उससे कोई लेना-देना नहीं है। अथवा वह आदि ‘कण’ मिल गया जिसे सर्वप्रथम गॉड या भगवान ने बनाकर खुला छोड़ दिया था कि जा बेटा चक्रवर्ती ब्याज की तरह अपनी संख्या बढ़ाता जा और ब्रम्हांड रच दे। ऐसे में तो विश्व ब्रम्हांड और मानव समाज की उत्पत्ति के सभी धार्मिक फार्मूले ध्वस्त हो जाएँगे।
इधर वे वैज्ञानिकगण भी मेरे शक के दायरे में आ गये हैं जो कोई एक नया ‘कण’ देखकर बावले हुए जा रहे हैं। हमें तो छँटवी कक्षा में साइंस टीचर ने बताया था कि दुनिया में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो दो भागों से मिल़कर न बनी हो, अर्थात अणु-परमाणु, अथवा महीन से महीन संरचना के दो टुकड़े किये जा सकते हैं, हर एक भाग को फिर-फिर तोड़ा जा सकता है। बात मानने लायक भी है। ऐसे में उस मिल गये रहे तथाकथित गॉड पार्टिकल के मिलने की खुशी की जगह फिर से उसे तोड़ने का टेन्शन वैज्ञानिकों को ज़्यादा होना चाहिए। आखिर यह भी तो एक काफी बड़ा चुनौती भरा काम है। पहले उस कण को पकड़ो फिर फिक्स करो, जैसे बॉक पर लकड़ी फिक्स करते हैं, फिर उसे तोड़ो। तोड़ते जाओ, तोड़ते जाओ। हरेक टूट के बाद क्या तमाशा होगा कोई नहीं जानता। अमरीकियों ने कम्बख्त परमाणु को तोड़कर हिरोशिमा और नागासाकी पर पटक दिया था तो वहाँ आज तक घास नहीं उग रही है और बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं। इस हींग-बोर पार्टिकल को तोड़ने का पराक्रम पता नहीं क्या हंगामा बरपाएगा। ऐसी स्थिति में आखिर ‘गॉड पार्टिकल’ मिलेगा तो मिलेगा कैसे!

मंगलवार, 15 मई 2012

अगले आम चुनाव का मुद़दा - बोरियॉं

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 
देश में आए दिन किसी न किसी चीज़ का अभाव हो जाता है, आजकल बोरियों का अभाव चल रहा है। किसानों को बोरियाँ नहीं मिल पा रही है नतीजतन गेहूँ का बफर स्टॉक अपनी जन्मभूमि पर पड़ा पानी से सड़ने की कगार में है। बोरी इस समय किसान के मौलिक अधिकार के रूप में उभर कर सामने आई है जिसे पाने के लिए किसान जान हथेली पर लेकर संघर्षरत है सोच रहा है, शायद इस रास्ते से उसे सचमुच बोरी मिल ही जाएगी! हम देख रहे है कि उसे बोरियों की जगह ‘गोलियाँ’ मिल रही हैं।
बोरियों का यह अभाव फिलहाल सिर्फ मध्यप्रदेश में ही देखा जा रहा है सम्भव है कुछ दिनों में यह पसर कर देश व्यापी हो जाए। ‘केन्द्र’ हमारी बोरियों की तरह देश भर की बोरियों पर कुंडली मारकर बैठ जाए। एक बात समझ में नहीं आ रही है कि डनलप के मोटे-मोटे गद्दे उपलब्ध होने के बावजूद ‘केन्द्र’ आखिर राज्यों की बोरियों पर कुंडली मारे क्यों बैठा है! देश को पहली बार पता चला कि राज्यों को खाली बोरियों की सप्लाई केन्द्र करता है। ताज्जुब की बात है, देश में कितनी सारी महत्वपूर्ण चीज़ों का उत्पादन और सप्लाई केन्द्र ने प्रायवेट सेक्टर को दे दी है, मगर बोरी जैसी टुच्ची चीज़ की सप्लाई की जिम्मेदारी वह अपने मथ्थे धारण किये हुए है।
प्रश्न है कि आखिर केन्द्र हमें बोरियाँ दे क्यों नहीं देता। इतनी सारी बोरियों का क्या वह अचार डालेगा। केन्द्र ने कभी सोचा है कि इतनी सारी बोरियों का अचार डालने के लिए कितनी बरनियों की ज़रुरत पड़ेगी। इतनी बरनियों की व्यवस्था आखिर केन्द्र कहाँ से करेगा। यदि बरनियों की व्यवस्था न हुई तो डला-डलाया अचार बरबाद हो जाएगा। केन्द्र को यह नहीं भूलना चाहिये कि बारिश तो आखिर दिल्ली में भी आएगी। अगर उसने बोरियाँ नहीं दी तो जिस तरह हमारा गेहूँ सड़ेगा उसी तरह उनका बोरियों का अचार भी सड़ेगा। भीगा गेहूँ खरीदने की घोषणा तो हमारे यहाँ हो ही चुकी है, ईश्वर ने चाहा तो सड़ा गेहूँ खरीदने की घोषणा भी शीघ्रातिशीघ्र हो जाएगी। हमारा माल तो इस तरह ठिकाने लग ही जाएगा मगर तुम्हारा भीगी बोरियों के अचार का क्या  होगा सोचा है कभी! शराफत इसी में है कि केन्द्र हमें बोरियाँ दे दे, हम भी नहीं चाहते कि हमारा गेहूँ खुले आसमान के नीचे सड़े, बोरियों में सड़ेगा तो सुविधाजनक रहेगा।
            देखा जाए तो यह तो दलालों के किस्म की हरकतें हैं। दलालगण किसी चीज़ को दबाकर फिर दनादन मुनाफा कूटते हैं। बोरिया अगर खुले बाज़ार में मिल रही होती तो संभव था दलाल बोरियों का कृतिम अभाव पैदा कर, गेहूँ के भीगने-सड़ने का डर पैदाकर औने-पौने दामों में माल खरीद लेते। यही हरकतें ‘केन्द्र’ कर रहा है। ऐसी ओछी हरकते किसी भी देश के केन्द्र का शोभा नहीं देती। जल्दी से जल्दी हमें बोरियाँ पहुँचा दो, वर्ना अगले आम चुनाव का मुद्दा और कुछ नहीं बोरियाँ होंगी। 

रविवार, 15 अप्रैल 2012

बाबागिरी का चोखा धंधा


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 

बाबा बनकर सलाह बेचने का धंधा आजकल चोखा धंधा है, ‘हींग लगे न फि‍टकरी फि‍ऱ भी रंग चोखा’ कहावत इसी धंधे से निकली है। सलाहें मूर्खता पूर्ण हो तो धंधा इतनी ज़ोर-शोर से चलता है कि पूछो मत। हाल ही में मैंने एक बाबा के समागम में शिरकत की और जो डायलॉग सुने उन्‍हें प्रस्‍तुत कर रहा हूँ :-
भक्‍त- बाबा बहुत दिनों से बेरोज़गार हूँ, नौकरी नहीं मिलती, क्‍या करूँ ?
बाबा- पिछली बार चिकन तंदूरी कब खाया था ?
भक्‍त- आज तक नहीं चखा बाबा!
बाबा- तभी तो कृपा कम हो रही है, पहले कहीं फाइव स्‍टार होटल में बैठकर चिकन तंदूरी खा, ‘कृपा’ दौड़ी चली आएगी, नौकरी भी लग जाएगी।
भक्‍त- बाबा बिल क्‍या ‘कृपा’ भरेगी ?
बाबा- बिल भरने को भी पैसा नहीं है तो फि‍र आया क्‍यों यहॉं ?
भक्‍त- बाबा जो कुछ था उससे समागम की एन्‍ट्री फीस भर दी, अब कहॉं से लाऊँ पैसा ?
बाबा- अच्‍छा यहॉं भी कृपा कम हो रही है, चना कब से नहीं खाया ?
भक्‍त- बाबा रोज़ चना खाकर ही गुज़ारा करता हूँ !
बाबा- आज से चना खाना बंद कर दो, कृपा आना शुरू हो जाएगी। चने के पैसे बचेंगे तो तंदूरी चिकन खा लेना, सब ठीक हो जाएगा।
भक्‍त- चना नहीं खाउँगा तो जिंदा कैसे रहूँगा।
बाबा- यह मेरी समस्‍या नहीं है।
---

भक्‍त- बाबा मेरी दोनी किडनियॉं खराब हो गईं हैं और लीवर सड़ गया है,  डाक्‍टरों ने जवाब दे दिया है, कुछ करो बाबा !
बाबा- ठर्रा कब से नहीं पीया ?
भक्‍त- क्‍या बात करते हो बाबा, मैं तो चाय-काफी भी नहीं पीता !
बाबा- यहीं तो कृपा कम हो रही है, जीवन में कभी भी ठर्रा नहीं पीयोगे तो लीवर-कीडनी खराब नहीं होगी तो क्‍या होगा ? जाओ पहले किसी कलारी पर जाकर ठर्रा चढ़ाओ, सब ठीक हो जाएगा।
---
भक्‍त- बाबा मेरी शादी नहीं हो रही है।
बाबा- शादी में लड्डू कब से नहीं खाया ?
भक्‍त- कल ही खाया था बाबा।
बाबा- कल के पहले कब खाया था?
भक्‍त- परसो !
बाबा- परसो के पहले ?
भक्‍त- नरसो !
बाबा- दूसरों की शादियों में रोज़-रोज़ लड्डू खाओगे तो कृपा कैसे आएगी। आज से लड्डू खाना बंद करके बरफी खाओ, कृपा आना शुरू हो जाएगी।
भक्‍त- बाबा मैं तो लड्डू के साथ-साथ बर्फी भी खाता हूँ !
बाबा- यही तो गड़बड़ करते हो। जाओ लड्डू खाना बंद करके सिर्फ बरफी खाओ। बहुत जल्‍दी शादी हो जाएगी।
---
भक्‍त- बाबा मैं बहुत पढ़ता हूँ बहुत पढ़ता हूँ लेकिन पास ही नहीं होता।
बाबा- अच्‍छा, क्‍या कर रहे हो ?
भक्‍त- बाबा बी.एस सी. कर रहा हूँ।
बाबा- कौन से सब्‍जेक्‍ट से बी.एस सी. कर रहे हो।
भक्‍त- फि‍जिक्‍स, केमेस्‍ट्री, मैथ्‍स बाबा।
बाबा- इसीलिए तो कृपा नहीं आ रही है, कल से राजनीति और दर्शनशास्‍ञ की पढ़ाई करके बी.एस.सी. की परीक्षा दो पास हो जाओगे।
---
यह सब सीन देख-सुनकर मुझे पूरा भरोसा हो गया है कि इस देश में ठगी का धंधा अब बड़ी इज्‍ज़त का धंधा हो गया है और अब इसमें जूते पड़ने की संभावनाऍं नगण्‍य हो गईं है। चूँकि व्‍यंग्‍यकारों के पास ऐसी धांसू सलाहों की कोई कमी नहीं होती इसलिए सभी व्‍यंग्‍यकारों को भी मेरी विनम्र सलाह है कि जबरन कलम घिसना छोड़कर बाबागिरी का धंधा शुरू कर मूर्खता पूर्ण सलाहें देने लग पड़ें, कहीं कोई खतरा नहीं है, फायदा ही फायदा रहेगा। मैं तो बहुत जल्‍द यह धंधा शुरु करने वाला हूँ। प्रथम सौ लोगों को फीस में मोटी छूट दी जाएगी। पहले आऍं पहले पाऍं।   

सोमवार, 5 मार्च 2012

कीचड़ उछालना एक कला कला है


व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
            एक दूसरे के ऊपर कीचड़ उछालना भी क्या खूब कला है, और दिनों-दिन परवान भी चढ़ती जा रही है। जब, जहाँ, जैसे, जितना, जिस क्वालिटी का, जिस किसी पर चाहो कीचड़ उछाल दो और खुद नव्हे-धुले से चुपचाप अपने घर में बैठे रहो। अगला, अपने बदन पर उछला कीचड़ साफ करने की कोशिश में घाट-घाट पर ‘गंगा’ नहाता फिरे, अपन अपने खी-खी करके हँसते रहो।
            कीचड़ उछालने के इस काम के लिए देश में जब, जहाँ, जितना चाहो कीचड़ हर वक्त उपलब्ध है। मनों, टनों, लीटरों, क्विंटलों की क्वांटिटी में बेहतरीन, बदबूदार, लटपटा कीचड़, किसी भी नहा-धोकर बाहर निकले आदमी पर उलीचने के लिए थोक मात्रा में, हर वक्त तैयारशुदा हालत में मिलता है। इसमें राशनिंग की कोई समस्या नहीं है। आप चाहे सामने वाले किसी शरीफ आदमी पर अपनी ऊँगलियों के पोरों से कीचड़ की चंद बूँदे छिड़क दो, अंजुली में लेकर उछालों, या बाल्टी, मग्गे, तगारी से भर-भरके फेंको, अथवा टेंकरों-ट्रालियों में भरकर किर्लोस्कर पम्प के माध्यम से ही क्यों ना उड़ाओ, इफरात मात्रा में यह आपको बिना किसी उठा-पटक के रेडीमेड प्राप्त हो सकता है। यदि कीचड़ ज़्यादा फोर्स से उछालने की ज़रूरत नहीं है  तो आप इसे एक नन्हें से टुल्लू पम्प से भी उछाल सकते हैं, यह उछलेगा और बड़ी खूबी से उछलकर लक्ष्य का दामन गंदा करेगा। वैसे भी किसी बड़े पम्प से उड़ाकर कीचड़ को इधर-उधर फालतू वेस्ट करके भी क्या फायदा! जितना, जिस पर और जिस जगह पर उछालने की आवश्यकता है बस उतना, उसी पर और उसी जगह पर उछले तो ज़्यादा अच्छा है। आगे के लिए बचाकर रखना भी जरूरी है, पता नहीं कब किस पर उछालने की जरूरत आन पडे़।
जैसे भी उछालों, विगत तिरेसठ साल के लम्बे अनुभव एवं गहन अध्ययन से प्राप्त ज्ञान के आधार पर हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में, पूर्ण आत्मविश्वास और कमिटमेंट के साथ उछाला गया एक अदद कीचड़ का छोटा सा छींटा भी, सामने वाले का मुँह पर्याप्त रूप से काला करेगा ही करेगा। कीचड़ बना ही लोगों का मुँह काला करने के लिए है। अब तक कीचड़ उछालने की इस प्रदर्शनकारी कला के पीछे एक मात्र जायज़ और सर्वमान्य, नीतिसंगत, तर्कसंगत कारण लोगों का मुँह काला करना ही रहा है और आगे भी रहेगा। इससे इतर दूसरी कोई भी वजह कीचड़ को उछालने की इस रचनात्मक गतिविधि के पीछे ना तो भूतकाल में देखी ही गई है और ना ही भविष्य में देखी जा सकेगी।
            जिस व्यक्ति के दर्शनीय व्यक्तित्व से उस पर आपादमस्तक कीचड़ उछालने की क्रांतिकारी प्रेरणा मिलती हो, उसका मुखमण्डल चाहे शुद्ध उजला, गोरा-चिट्टा, साँवला हो, या कि काला-पीला हरा-नीला, वह व्यक्ति अपने ठेठ मोहल्ले-पड़ोस का हो या कि पाकिस्तान, चीन, इटली-जापान का, दूध पीता बच्चा हो या कि मलाई खाता बूढ़ा-नौजवान, नर-नारी हो या कि किन्नर, कीचड़ यदि उछाला गया है तो वह अपना काम करके ही मानेगा। क्रिया के विरुद्ध यह एक अटल प्रतिक्रिया है, और शत्-प्रतिशत् होनीहार है।
जिस तरह मुँह से निकली बात और कमान से छूटा तीर वापस नहीं आ सकता उसी तरह एक बार तबियत से उछाला हुआ कीचड़ कभी भी वापस आकर अपनी जगह पर गिर ही नहीं सकता, भले ही वह अपनी जन्मस्थली से लम्बवत ही क्यों ना उछाला गया हो। इस मामले में पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल का नियम भी पूरी तौर पर प्रभावहीन है, इसलिए यह खतरा भी नहीं है कि किसी पर उछाला गया कीचड़ वापस आकर उछालने वाले का ही मुँह काला कर दें। यह संभावना नगण्य है। यह बात अलग है कि कोई अनाड़ीपने में अपने ही मुँह पर कीचड़ उछाल ले। तब तो वह मुँह काला करेगा ही करेगा, चाहे कीचड़ उछालने के तत्काल बाद उछालने वाले को आत्मज्ञान हो जाए कि-‘‘अरे अरे अरे, यह क्या अनर्थ हो गया’’, और वह खुद अपने उछाले कीचड़ से मुँह छुपाता यहाँ-वहाँ भागता फिरे, कीचड़ पीछा छोड़ने वाला नहीं है, उछला है तो बिना मुँखमंडल की शिनाख्त के मुँह काला करेगा। इतिहास गवाह है कि कीचड़ उछालने की कला का ठीक से रियाज़ किये बगैर जब-जब अनाड़ीपने से कीचड़ उछाला गया है वह उछालने वाले पर ही आकर गिरा है।
तो महानुभाव, कीचड़ उछालने की कला की बारीकियों को समझ लेना आपके हित में है, ताकि वह उछले तो लक्ष्य पर ही उछले, आप पर नहीं, और लक्ष्य को मुँह दिखाने लायक ना छोड़े।
राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक पञिका "शुक्रवार" के होली विशेषांक में प्रकाशित।