बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

आओ घर में दुबक कर वेलेन्टाइन डे मनाएँ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

माई डियर वेलेन्टाइन,
फिर वो मनहूस दिन आ गया है जिस दिन लाख एहतियात बरतने, लुकने-छुपने के बावजूद पिछले आठ बरस से बिलानागा हम भारतीय संस्कृति के हाथों पिटते आ रहे हैं। तुम्हें याद होगा जानेमन, कि पिछले उन आठ वेलेन्टाइन डेज़ में हमने तीन बार सार्वजनिक पार्कों में थप्पड़ खाए, दो बार महँगे रेस्टोरेंट से (आधा फास्ट फूड और कोक छोड़) मुँह छुपाकर भागे, दो बार कोतवाली में कान पकड़कर उठक-बैठक लगाने के बावजूद दो-दो सौ रुपये की रिश्वत देकर छूटे और एक बार बिरला मंदिर की सीढ़ियों पर आधा घंटे तक मुर्गा-मुर्गी बनाकर खड़े किये गए। मोहल्ले के बच्चे कम्बख़्त अब तक कुकुड़-कू, कुकुड़-कू की आवाज़ निकाल कर चिढ़ाते हैं। प्रिये, इसलिए अब हमने कसम खा ली है कि भले ही सरकार हमें बन्दूक का लायसेन्स बनवा दे, या मिलेट्री की सुरक्षा मुहैया करा दे, भले ही अपोजिट पार्टी के गुंडे हाथों में डंडे-झंडे लेकर हमारी रक्षा के लिए सड़कों पर उतर पड़ें, या अपने मम्मी-पापा ही पीछे खड़े होकर अपन को आशीर्वाद दें, कि मनाओं बेटा वेलेन्टाइन डे’, मगर हम वेलेन्टाइन डे पर किसी सूरत में घर से बाहर नहीं निकलने वाले।


प्रिये, उस महान संत को क्या पता था कि वे जिस डेको दुनिया की सबसे खूबसूरत नेमत के लिए मुकर्रर कर रहे हैं, भारतभूमि पर उसकी कैसी छिछालेदर होने वाली है। उन्हें अगर ज़रा भी अन्दाज़ होता कि इस पवित्र दिन हमारे देश में प्रेमी जोड़ों को जगह-जगह अपनी इज्ज़त का फालूदा करवाना पडे़गा और पार्कों-उद्यानों नदी-तालाबों के मनोरम किनारों से चप्पल-जूते छोड़कर भागना पड़ेगा तो वे वेलेन्टाइन डे को भारतभूमि पर न मनाने का उपदेश भी साथ ही साथ दिये जाते। पता नहीं संत वेलेन्टाइन पहले हुए थे या मथुरा-वृन्दावन के ग्वाले, मगर राधा-कृष्ण इस मामले में बड़े सौभाग्यशाली कहे जा सकते हैं जो द्वापर में ही रासलीला रचाकर चले गए, इधर कलयुग तक अगर निकल आते तो मुन्सीपाल्टी के बाग-बगीचों में उन बेचारों की क्या गत होती हम ही समझ सकते हैं।


प्रियतमें, तुम समझ रही हो ना कि आजकल का माहौल कितना उजड्ड हो गया है। देश के पार्कों में लड़कियों के साथ खुले-आम छेड़-छाड़, गुंडागर्दी बलात्कार की तो खुली छूट है, परन्तु प्रेम-विरहियों को मिलने की इजाज़त नहीं है। भारतीय संस्कृति के रखवाले तब डंडा लेकर नहीं घूमते जब सड़क पर किसी अबला की इज्ज़त लुट रही होती है, मगर तब वे कुकरमुत्तों की तरह निकल आते हैं जब वेलेन्टाइन डे करीब आने लगता है।


      प्रियतमा, आशा है तुम्हारा ब्लडप्रेशर नार्मल होगा, मेरे हाथ-पाँव भी अभी काँपना शुरू नहीं हुए हैं। फिर भी तुम कहो तो वेलेन्टाइन डे के दिन हम कहीं चोरी-छुपे मिलने की बजाय किसी अच्छे डाक्टर का एपाइंटमेंट लेकर कम्पलीट चेकप करा लेते हैं। दवा-गोली साथ में रहेगी तो हौसला रहेगा। आओ इस बार हम घर में ही दुबक कर वेलेन्टाइन डे मना लें! तुम अपने घर और मैं अपने, किसी को हवा भी नहीं लगेगी। मगर क्या भरोसा घर में बैठे संस्कृति के रक्षक ही हमारी पिटाई कर दें तो फिर अपन क्या करेंगे!

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

बलात्‍कारियों की गुप्‍त मीटिंग


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

अभी-अभी खबर मिली है कि दिल्‍ली में वरिष्‍ठ बलात्‍कारियों की एक गुप्‍त मीटिंग हुई है। इस क्‍लोज़ मीटिंग में बड़ी संख्‍या में अनुभवी बलात्‍कारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया और हाल ही में चलती बस में हुई सामुहिक बलात्‍कार की एक घटना की ञृटियों-खामियों पर गम्‍भीरतापूर्वक विचार विमर्श किया। बलात्‍कारियों ने सबसे पहले अपने उन बलात्‍कारी साथियों को सफलतापूर्वक पकड़ लिए जाने की आश्‍चर्यजनक घटना पर पुलिस वालों की कड़े शब्‍दों में निन्‍दा एवं भर्त्‍सना की उसके बाद बारी-बारी से अपनी सामाजिक चिन्‍ताएँ साझा की।

बलात्‍कारियों के नेता ने मीटिंग में जबरदस्‍त हुंकार भरते हुए कहा कि- हम उन नपुंसकों एवं नामर्दों की र्इंट से ईंट बजा कर रख देंगे जो हमें हमारे जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करना चाहते हैं। उन्‍होंने उपस्थिति बलात्‍कारियों के समक्ष एक क्रांतिकारी नारा दिया कि - बलात्‍कार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हमसे कोई नहीं छीन सकता। नेता ने इस नारे के नीचे सभी बलात्‍कारियों को एक जुट होने का फतवा जारी किया।   

नेता के भाषण से उत्‍साहित होकर एक बलात्‍कारी जो मुँह ढापे चुपचाप सभा में बैठा था अचानक चौक कर आश्‍चर्य से चिल्‍लाया- अच्‍छा, यह बात हमें तो पता ही नहीं थी, हम फालतू में अपना मुँह छुपाए फि‍र रहे हैं। कोई चीज़ जन्मसिद्ध अधिकार हो तो फिर खामोखां डरने की क्‍या बात है। इससे पहले कि ये शरीफज़ादे एकजुट हो जाएँ हम सबको एकजुट होना ज़रूरी है। 

एक अन्‍य बलात्‍कारी जिसकी आँखों में धन से ज्‍़यादा वासना की भूख दिखाई दे रही थी उत्‍तेजित होकर चीखने लगा- इन कम्‍बख्‍तों को आईन-कानून का कोई खयाल ही नहीं है। अरे हम ही अगर हाथ पर हाथ बैठे रहेंगे तो तुम क्‍या अपने कानून की किताबों को बैठकर चाटोगे ? जब बलात्‍कारियों के खिलाफ बढ़िया कानून बने हुए हैं तो फि‍र हमें स्‍वतंञतापूर्वक बलात्‍कार भी तो करने दो। तभी तो पता चलेगा कि कानूनों का पालन होता भी है या नहीं होता। हमें अपना काम करने की स्‍वतंञता होना चाहिए कानून तो हमेशा अपना काम करता ही है।   

एक और बलात्‍कारी उठकर रोष प्रकट करने लगा- ये लो हमें कमज़ोर समझ रहे हैं मिञों, तभी तो फाँसी दो फाँसी दो की रट लगाए बैठे हैं, जैसे हमारी कोई सुनेगा ही नहीं। फि‍र किस-किस को फाँसी दोगे बाबा ! हम तो घर-घर में घात लगाए बैठे हैं, एक ढूँढ़ोगे तो हज़ार की तादात में मिलेंगे, कर लो क्‍या करते हो।

एक जवान बलात्‍कारी जिसे इस क्षेञ में बहुत ज्‍़यादा अनुभव नहीं था उठकर बोलने लगा- आप सब अनुभवी बलात्‍कारियों से निवेदन है कि हम जैसों के लिए भी कुछ करें जो बस आँखों ही से बलात्‍कार कर लेने के लिए मजबूर हैं ज्‍़यादा हुआ तो फब्‍तियों से बलात्‍कार कर लेते हैं या सीटियाँ से। यह भी कोई जि़न्‍दगानी है, कानून-पुलिस के डर के मारे इससे ज्‍़यादा कुछ कर ही ना पाओ। थोड़ा और खुलापन देश में आना चाहिए ताकि हम भी ठीक से बलात्‍कारियों की जमात में गिने जा सकें।    ्‍या िदृध अधिकार हो तो ्रो ्रि  

और इसके बाद इन बलात्‍कारियों ने देश भर में आम जनसाधारण एवं महिलाओं द्वारा बलात्‍कारियों को फाँसी की सजा की की जा रही माँग के विरुद्ध एकजुट होने अपने हितों की रक्षा के लिए मानवाधिकार संगठनों की लाँबिंग करने एवं मानवाधिकार आयोग के समक्ष अपने बुनियादी अधिकारों की रक्षा की गुहार लगाने के निर्णय का सामुहिक प्रस्‍ताव पास किया, एवंिन्‍दा जनक लात्‍कारियों के पकड़े प्रधानमंञी से मिलकर अपना चार्टर ऑफ डिमांड उनके समक्ष प्रस्‍तुत करने का सैंद्धांतिक निर्णय लिया। समझा जाता है कि बलात्‍कारियों को प्रधानमंञी महोदय की चुप्‍पी से बहुत आशाएँ हैं। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्‍वास है कि आज नहीं तो कल अवश्‍य बलात्‍कारियों की ही सुनी जाएगी और उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा भी हो जाएगी, क्‍योंकि अपने देश का तो ऐसा है कि सीधे-साधे नागरिकों कि भले खटिया खड़ी हो जाए, मगर अपराधियों का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए।

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

अपनी तो पौ-बारह हो गई



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             ज़िन्दगी भर घास छीली, अब जाकर मेहनत सफल हुई, भैयाजी मनीस्टरबन गए। हमने अपनी पूरी जिन्दगानी भैयाजी की चम्मचगिरी में स्वाहा कर दी। जहाँ- जहाँ भैयाजी रहे, हम उनकी फटी चप्पल की नाई उनके पाँवों से चिपटे रहे, जब-जब भैयाजी ने आवाज लगाई, हमने भैयाजी के चरणों के नीचे अपने पलक-पॉवड़े बिछा दिये, और जब-जब भैयाजी ने अपनी बैल सी गरदन उठाकर ऊपर की ओर ताका, हम झट से उनके लिए पोर्टेबल सीढ़ी बन गए। आखिरकार बरसों-बरस की कड़ी तपस्या और संघर्ष आखिर रंग लाया, भैयाजी मनीस्टरबन ही गए।
भैयाजी जब टाकीज़ में टिकटों की ब्लेकमेलिंग किया करते थे, हम उनके चम्मच थे। भैयाजी जब मुन्सीपाल्टी में राशनकार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने की दलाली करते थे, हम उन के चम्मच थे, भैयाजी जब कलेक्टरी में जाति प्रमाणपत्र, मूल निवासी प्रमाणपत्र, बन्दूक के लायसेंस बनवाने की दलाली करते थे, हम उनके चम्मच थे, भैयाजी जब आर.टी.ओ. में लायसेंस परमिट की दलाली में आए, हमने उनका तन-मन से साथ दिया। भैया जी जब राष्ट्रीय-अन्तर्राट्रीय स्तर के सौदे पटाने लगे, हमने उनकी सफल पीए गिरी की। बदले में भैयाजी ने जो भी धनदिया हमने भगवान का प्रसाद समझकर जेब में रख लिया। भैयाजी की कृपा से मिली इसी खुरचन को जमा कर-कर के इस गुलाम ने प्रापर्टी की दलाली का यह छोटा सा बिजनेस प्रारम्भ किया। अब चूँकि भैयाजी मनीस्टरबन गए हैं तो अब हमें यह दल्लेगिरी करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। हमारी सामाजिक-राजनैतिक जिम्मेदारियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि क्या बतावे। अब हम भी अपना यह छोटा सा कारोबार मंथली के रेट से किसी को सौंप कर भैयाजी के साथ-साथ देश की सेवा के लिए मैदान में उतरने वाले हैं।
            दलाली, पार्षदी, चेयरमेनी, विधायकी आदि-आदि तरक्की की सीढ़ियों पर भी हमारे सिर पर कुछ कम काम नहीं थे, सारे दंद-फंद हम ही को सम्हालना पड़ते थे।  अब तो भैयाजी चूँकि पहली बार मनीस्टरबने हैं तो हमें तो सॉस लेने की फुरसत मिलने वाली नहीं है। भैयाजी का सच्चा चम्मच साबित होने की परीक्षा सही मायनों में तो अब शुरू हुई है। चमचों की भीड़ में एक सफल चमचा बनकर उभरना कोई मामूली बात नहीं है, एड़ी चोटी के बीच का जोर लगाकर दम साधे रहना पड़ता है। कौन आकर खो कर जाएगा कोई भरोसा नहीं रहता।
लायसेंस, कोटा, परमिट, टेन्डर, ट्रांसफर-पोस्टिंग-एपाइंटमेंट, और न जाने क्या-क्या। रात-दिन बस काम ही काम। इस सबमें भैयाजी की फिक्सिंग आखिर हमी तो करवाएँगे। उसके बाद लेन-देन का प्रापर हिसाब रखना, प्रापर्टी, इन्वेस्टमेंट, नईं-नईं बिजनेस डील, पार्टनरशिप, शेयर-डिबेंचर, इत्यादि-इत्यादि मामलों की पकड़ उस गधेको तो बिल्कुल ही नहीं है, वह सब हमको ही तो लुक आफ्टर करना पडे़गा।
            सबसे बड़ी समस्या यह है कि समय बहुत कम बचा है, और काम बहुत पड़ा है। साल डेढ़ साल के लिए कोई मनीस्टरबने तो चाहे कितने हाथ-पैर मार ले, आखिर क्या उखाड़ लेगा! और फिर, भैयाजी की किस्मत बहुत ही खराब है, क्योंकि उनके मनीस्टरबनने से पहले ही देश में सारे बड़े-बडे़ घोटाले हो चुके हैं अब भैयाजी को करने के लिए बचा ही क्या है। मगर फिर भी हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भैयाजी जैसी शातिर प्रतिभाएँ हाथ पर हाथ धरे बैठने के लिए नहीं पैदा होती हैं। कुछ न कुछ कहीं न कहीं से भैयाजी कूट ही लेंगे। भैयाजी जैसा काबिल मनीस्टरहै तो अपनी तो पौ-बारह हो गई, अपन को कौन रोक सकता है बहती गंगा में हाथ धोने से।      

रविवार, 19 अगस्त 2012

मेरे गहरे साहित्य प्रेमी दोस्त और मैं



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
व्‍यंग्‍ययाञा के अप्रैल-जून 2012 के अंक में प्रकाशित 

एक विकट साहित्य प्रेमी से इन दिनों मेरी गहरी दोस्ती है। मतलब गहरी तो वे मानते हैं, मैं अलबत्ता इतनी गहराई में जा नहीं पाता, उनसे सामना होते ही ऊपर ही सतह पर कहीं फड़फड़ाने लगता हूँ। जिस दिन से उन्हें पता चला है कि मैं थोड़ा बहुत साहित्यिक रुचि रखने वाला जीव हूँ, दोस्ती के बहाने उन्होंने मेरा जीना हराम कर रखा है।
दरअसल वे जब प्रायमरी स्कूल में पढ़ा करते थे तब कोई साहित्यकार किस्म के अध्यापक उनके स्कूल में चार-छः दिन के लिए आए थे और अपने कुछ कीट कक्षा के सभी छात्रों पर छोड़ गए। बाकी छात्र तो समय रहते उन साहित्य-कीटों से मुक्त हो गए और यहाँ-वहाँ काले धंधों में लग कर गंगा नहा ली, मगर मेरे ये दोस्त जिनका नाम कोमलचंद सुखनंदन विद्याधर वाचस्पति और तखल्लुस पागलथा अपने नितांत असाहित्यिक शिक्षण-दीक्षण के लम्बे दौर और हिन्दी विषय में अनुत्तीर्ण होने की क्रमबद्ध परम्परा के बावजूद उन संक्रामक साहित्यिक कीटों को अपने साथ जीवंत ढोते रहे। उनके ये साहित्यिक कीट रेलवे स्टेशन के बुक-स्टॉल, रद्दी वाले के ठेले, सेकंड हैंड किताबों के ठीए या किसी बुद्धिजीवी के घर पर किताबों का जखीरा देखकर सक्रिय हो जाते थे। मेरे घर में भी छुपा कर रखी होने के बावजूद उन्होंने किताबें देख ली थीं और इसका नतीजा यह हुआ कि तब से वे मेरे घर को अपना ही घर समझने लगे थे। वे जब भी मुझे समक्ष में पाते अपने सुप्तप्रायः साहित्यिक कीटों की सम्पूर्ण ताकत के साथ मुझ पर हमला कर देते और अपने ऊटपटांग सवालों से मुझे घायल करते रहते।
एक दिन वे आए और मुझसे बोले ‘‘फ्राड की थ्योरी पढ़ी है ?’’
मैंने कहा ‘‘नहीं फ्राड करने की मेरी कभी कोई योजना नहीं रही।
वे रुष्ठ हो गए, बोले ‘‘सिरीयस बातों पर मज़ाक मत करो जी। फिलास्फर फ्राड की पूछ रहा हूँ मैं ?’’
मैंने कहा अच्छा फ्रायड की बात कर रहे हैं आप।
वे लपक कर बोले ‘‘वही वही, उसी की बात कर रहा हूँ मैं। कहाँ तो फॉरेन कंट्री में हुआ था वो.....याद ही नहीं....! मैंने उन्हें दूसरी बातों में उलझाकर फ्रायड को उनके दिमाग से निकाला वर्ना वे उस दिन ज़रूर मेरे दिमाग का कचूमर निकाल कर ही मानते।
आए दिन वे कोई ना कोई अजीब सवाल ले आते और बुद्धिजीवितापूर्ण गंभीरता से मुझसे जवाब माँगने लगते। एक दिन उन्होंने मुझ पर एक ऐसा सवाल दागा कि मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाया। उन्होंने प्रश्न किया था, ‘‘क्यों ये गुलेरी जी आजकल जिन्दे हैं कि मर गए ?’’
मैंने कहा, ‘‘यार उन्हें गुज़रे हुए ज़माना हो गया।
वे तुरन्त बोले,‘‘ तभी आजकल उनकी कोई कहानी किसी अख़बार, पत्र-पत्रिका में छप नहीं रही। उसने कहा थाके बाद कोई कहानी कहीं देखने-सुनने में ही नहीं आई। उनकी रील जाने किस ज़माने में अटकी हुई थी।
एक दिन वे मेरे घर आए। मेरी किताबों की रैक में कुछ लेखकों के समग्र संकलन एक के ऊपर एक रखे हुए हैं। मुक्तिबोध रचनावली के छः खंडों के ठीक ऊपर परसाईं रचनावली के छः खंड इस तरह रखे हुए थे कि प्रत्येक खंड की स्पाइन पर बडे़-बड़े अक्षरों में लिखा मुक्तिबोध रचनावली’, ‘परसाईं रचनावलीसाफ-साफ दिख रहा था। उन्होंने घर में घुसते ही पता नहीं अपनी अलौकिक दृष्टि के किस कोण से पुस्तकों को देखा कि देखने के तुरंत बाद उनकी अद्भुत प्रतिक्रिया से मुझे गश आते-आते रह गया। वे अपने खुद के अज्ञान पर अज्ञान का एक अनोखा व्यंग्य बाण सा चलाते हुए बोले, ‘‘अच्छा, हमें तो पता ही नहीं था कि परसाईं जीने मुक्तिबोधभी लिखी है।’’ मैं उनकी इस नई खोज पर हतप्रभ रह गया परन्तु आगामी वैचारिक संघर्ष के डर से मुँह में दही जमाए चुपचाप बैठा रहा और उनके जाते ही तुरंत किताबों का स्थान बदल दिया ताकि कोई और विद्धान ऐसी अनोखी खोज प्रतिपादित ना कर सके। दरअसल उनके पुराने डाटा बेस में किन्ही कारणों से परसाईं तो मौजूद थे परन्तु चूँकि मुक्तिबोध की लॉचिग उस वक्त हो नहीं पाई थी इसलिए उनके दिमागी प्रोसेेसर ने गलत गणना कर परिणाम पेश कर दिया था।
एक दिन उन्होंने बड़े उत्साह से मुझसे पूछा, ‘‘अत्री जीे को जानते हो ?’’
मैंने कहा, ‘‘हाँ, सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।
वे बोले, ‘‘नहीं यार जिन्होंने चन्द्रकांताऔर संततिजैसी धाँसू किताबें लिखी हैं।’’
मैंने कहा, ‘‘अत्री नहीं यार खत्री कहो, देवकी नन्दन खत्री।
वे बोले, ‘‘हाँ हाँ वही, एक अक्षर का ही तो हेरफेर है। उनकी चंद्रकांता तो मैंने पढ़ी है, मगर संतति नहीं पढ़ पाया। आपके पास हो तो देना ज़रा, पढ़ ही डालें।’’
मैंने कहाँ, ‘‘अकेली संततितो हमने भी नहीं पढ़ी कभी। चन्द्रकांता संततिचाहिए तो ले जाइए।’’  
वे बोले, ‘‘चन्द्रकांता दोबारा पढ़कर क्या करेंगे, आप तो अकेली संतति दे दो।’’
मेरे पास माथा पकड़ कर बैठने के अलावा कोई चारा नहीं था।
मैंने उन्हें कुछ पुस्तकें पढ़ने के लिए दीं थी। शराफत से उन्होंने सारी पुस्तकें वापस तो कर दी परन्तु एक ऐसा सवाल उन्होंने मेरे माथे पर दे मारा जिसका सामना मैंने ताज़िन्दगी कभी नहीं किया। वे तीर की तरह तमाम जोशियों के नाम अपने मुखारबिंद से उच्चारित करते हुए बोले, ‘‘क्यों, ये प्रभाष जोशी, शरद जोशी, हरी जोशी, प्रभु जोशी, ज्योतिष जोशी सब भाई-भाई हैं क्या.......?’’ मेरा मन हुआ कि कह दूँ ‘‘हाँ और मालती जोशी इन सबकी बहन हैं।’’
एक बार प्रेमचंद और शरदचंद्र पर कहीं से कोई विश्लेषण पढ़कर वे सीधे मेरे पास आए और घर में इन दोनों लेखकों की जितनी पेपरबैक पुस्तकें थीं सब इकट्ठा कर लीं और जाते-जाते एक प्रश्न मेरे लिए छोड़ गए जिसके संबंध में ना तो स्वर्गीय श्री विष्णु प्रभाकर जी ने कभी सोचा होगा ना ही श्री कमल किशोर गोयनका जी ने। उनका प्रश्न था, ‘‘क्यों प्रेमचन-शरदचन क्या बाप बेटे थे ?
मैंने कहा, ‘‘नहीं यार !’’
‘‘तो फिर भाई-भाई होंगे.....? वे तपाक से बोले।
मैंने एक गहरी खामोशी अख्तियार कर ली और वे निरुत्तर प्रस्थान कर जाने के लिए मजबूर हो गए।
व्यंग्यकार होने के नाते मेरे सौजन्य से उन्हें ज़्यादातर व्यंग्य ही पढ़ने को मिलते हैं, नतीजतन वे कभी-कभी हँसते-हँसते और कभी-कभी गहरी स्तब्धता ओढे हुए मुझे रात-बे-रात फोन करते रहते हैं, और वैसे ही हँसते-हँसते या स्तब्धता ओढे़ हुए फोन पर बिना कुछ कहे फोन काट दिया करते हैं। एक दिन उन्होंने रात को बारह बजे मुझे फोन किया और कहा, ‘‘यार कुछ भी कहो, शरद जोशी भी थे प्रतिभा के धनी इंसान, एक तरफ उन्होंने अपने व्यंग्यों से लोगों की नाक में दम कर दिया तो दूसरी ओर किसान आन्दोलन भी क्या जोरदार चलाया, एट ए टाइम दो-दो काम, वाह।’’ मैंने खामोशी से फोन बंद किया और इस विकट व्यक्तित्व के मस्तिष्क प्रकोष्ठों में विचरण करने लगा, कहीं तो वो खाना होगा जहाँ ताला लगा देने से ये मेरे अनन्य मित्र खुद भी चैन से रह सकेंगे और मुझे भी परेशान नहीं करेंगे।   
अगली सुबह तड़के वे मेरे घर के बाहर खडे़ थे और उनकी जु़बान पर बिल्कुल ताज़ा सवाल तैयार रखा हुआ था, यार ये रवीन्द्रनाथ टैगोर और रवीन्द्रनाथ ठाकुर दोनों ने ही एक सी गीतांजलि लिख मारी ?’’ मैंने चट से बाथरूम का दरवाज़ा खोला और अन्दर घुस गया। उनके सवालों से बचने का इससे अच्छा कोई तरीका नहीं था। बाथरूम में मैं मेरे इन साहित्य प्रेमी गहरे दोस्त से छुटकारा पाने की तरकीबें सोचता रहा और वे मेरे बुक शेल्फ से किताबें उठाकर नई किसी गुत्थी में उलझने की तैयारी करने लगे।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

आखिर गॉड पार्टिकल मिलेगा तो मिलेगा कैसे


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जब से ‘‘कण-कण में भगवान’’ का नितांत मौलिक, भारतीय चिन्तन कानों में पड़ा तब से यह मूरख उन कणों की तलाश में दर-दर भटक रहा था जिनमें भगवान निवासरत हों। हालाँकि मेरे सम्मुख यह एक विराट प्रश्न हमेशा मौजूद था कि जब मुझे रहने के लिए कम से कम दस बाई दस का एक सर्वसुविधा युक्त कमरा ज़रूरी है तो भगवान महाशय कणजैसी छोटी सी जगह में कैसे रहते होंगे। और, चलो मान लिया किसी जादू-टोने के बल पर या हाथ की सफाई, अथवा भ्रम का सृजन कर किसी तरह वे उस कण में पहुँच भी गए तो फिर यह कैसे संभव है कि वे एक ही समय में, एक साथ करोड़ों, अरबों, खरबों कणों में जा विराजें, वहीं से एक साथ अपने दैनिक क्रियाकर्म एवं ब्रम्हांडीय ज़िम्मेदारियाँ निभाएँ। ऐसे ही हज़ारों सवाल अपने मन-मस्तिष्क में लिए बंदा अक्ल आने के बाद से ही अपना सिर धुनता रहा है और ज़माने भर के ज़िम्मेदार लोग पागल हैकह का अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते रहे।
अब ज़बरदस्त शोर उठ खड़ा हुआ है- गॉड पार्टिकल मिल गया, गॉड पार्टिकल मिल गया। फिर मेरे समक्ष प्रश्नों की झड़ी लग गई है! क्या वह कण मिल गया जिसमें गॉडयानी भगवानरहता है या बात ईसाइयोंके गॉडके मिलने की की जा रही है, भगवान का उससे कोई लेना-देना नहीं है। अथवा वह आदि कणमिल गया जिसे सर्वप्रथम गॉड या भगवान ने बनाकर खुला छोड़ दिया था कि जा बेटा चक्रवर्ती ब्याज की तरह अपनी संख्या बढ़ाता जा और ब्रम्हांड रच दे। ऐसे में तो विश्व ब्रम्हांड और मानव समाज की उत्पत्ति के सभी धार्मिक फार्मूले ध्वस्त हो जाएँगे।
इधर वे वैज्ञानिकगण भी मेरे शक के दायरे में आ गये हैं जो कोई एक नया कणदेखकर बावले हुए जा रहे हैं। हमें तो छँटवी कक्षा में साइंस टीचर ने बताया था कि दुनिया में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो दो भागों से मिल़कर न बनी हो, अर्थात अणु-परमाणु, अथवा महीन से महीन संरचना के दो टुकड़े किये जा सकते हैं, हर एक भाग को फिर-फिर तोड़ा जा सकता है। बात मानने लायक भी है। ऐसे में उस मिल गये रहे तथाकथित गॉड पार्टिकल के मिलने की खुशी की जगह फिर से उसे तोड़ने का टेन्शन वैज्ञानिकों को ज़्यादा होना चाहिए। आखिर यह भी तो एक काफी बड़ा चुनौती भरा काम है। पहले उस कण को पकड़ो फिर फिक्स करो, जैसे बॉक पर लकड़ी फिक्स करते हैं, फिर उसे तोड़ो। तोड़ते जाओ, तोड़ते जाओ। हरेक टूट के बाद क्या तमाशा होगा कोई नहीं जानता। अमरीकियों ने कम्बख्त परमाणु को तोड़कर हिरोशिमा और नागासाकी पर पटक दिया था तो वहाँ आज तक घास नहीं उग रही है और बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं। इस हींग-बोर पार्टिकल को तोड़ने का पराक्रम पता नहीं क्या हंगामा बरपाएगा। ऐसी स्थिति में आखिर गॉड पार्टिकल मिलेगा तो मिलेगा कैसे!

मंगलवार, 15 मई 2012

अगले आम चुनाव का मुद़दा - बोरियॉं

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 
देश में आए दिन किसी न किसी चीज़ का अभाव हो जाता है, आजकल बोरियों का अभाव चल रहा है। किसानों को बोरियाँ नहीं मिल पा रही है नतीजतन गेहूँ का बफर स्टॉक अपनी जन्मभूमि पर पड़ा पानी से सड़ने की कगार में है। बोरी इस समय किसान के मौलिक अधिकार के रूप में उभर कर सामने आई है जिसे पाने के लिए किसान जान हथेली पर लेकर संघर्षरत है सोच रहा है, शायद इस रास्ते से उसे सचमुच बोरी मिल ही जाएगी! हम देख रहे है कि उसे बोरियों की जगह गोलियाँमिल रही हैं।
बोरियों का यह अभाव फिलहाल सिर्फ मध्यप्रदेश में ही देखा जा रहा है सम्भव है कुछ दिनों में यह पसर कर देश व्यापी हो जाए। केन्द्रहमारी बोरियों की तरह देश भर की बोरियों पर कुंडली मारकर बैठ जाए। एक बात समझ में नहीं आ रही है कि डनलप के मोटे-मोटे गद्दे उपलब्ध होने के बावजूद केन्द्रआखिर राज्यों की बोरियों पर कुंडली मारे क्यों बैठा है! देश को पहली बार पता चला कि राज्यों को खाली बोरियों की सप्लाई केन्द्र करता है। ताज्जुब की बात है, देश में कितनी सारी महत्वपूर्ण चीज़ों का उत्पादन और सप्लाई केन्द्र ने प्रायवेट सेक्टर को दे दी है, मगर बोरी जैसी टुच्ची चीज़ की सप्लाई की जिम्मेदारी वह अपने मथ्थे धारण किये हुए है।
प्रश्न है कि आखिर केन्द्र हमें बोरियाँ दे क्यों नहीं देता। इतनी सारी बोरियों का क्या वह अचार डालेगा। केन्द्र ने कभी सोचा है कि इतनी सारी बोरियों का अचार डालने के लिए कितनी बरनियों की ज़रुरत पड़ेगी। इतनी बरनियों की व्यवस्था आखिर केन्द्र कहाँ से करेगा। यदि बरनियों की व्यवस्था न हुई तो डला-डलाया अचार बरबाद हो जाएगा। केन्द्र को यह नहीं भूलना चाहिये कि बारिश तो आखिर दिल्ली में भी आएगी। अगर उसने बोरियाँ नहीं दी तो जिस तरह हमारा गेहूँ सड़ेगा उसी तरह उनका बोरियों का अचार भी सड़ेगा। भीगा गेहूँ खरीदने की घोषणा तो हमारे यहाँ हो ही चुकी है, ईश्वर ने चाहा तो सड़ा गेहूँ खरीदने की घोषणा भी शीघ्रातिशीघ्र हो जाएगी। हमारा माल तो इस तरह ठिकाने लग ही जाएगा मगर तुम्हारा भीगी बोरियों के अचार का क्या  होगा सोचा है कभी! शराफत इसी में है कि केन्द्र हमें बोरियाँ दे दे, हम भी नहीं चाहते कि हमारा गेहूँ खुले आसमान के नीचे सड़े, बोरियों में सड़ेगा तो सुविधाजनक रहेगा।
            देखा जाए तो यह तो दलालों के किस्म की हरकतें हैं। दलालगण किसी चीज़ को दबाकर फिर दनादन मुनाफा कूटते हैं। बोरिया अगर खुले बाज़ार में मिल रही होती तो संभव था दलाल बोरियों का कृतिम अभाव पैदा कर, गेहूँ के भीगने-सड़ने का डर पैदाकर औने-पौने दामों में माल खरीद लेते। यही हरकतें केन्द्रकर रहा है। ऐसी ओछी हरकते किसी भी देश के केन्द्र का शोभा नहीं देती। जल्दी से जल्दी हमें बोरियाँ पहुँचा दो, वर्ना अगले आम चुनाव का मुद्दा और कुछ नहीं बोरियाँ होंगी। 

रविवार, 15 अप्रैल 2012

बाबागिरी का चोखा धंधा


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 

बाबा बनकर सलाह बेचने का धंधा आजकल चोखा धंधा है, हींग लगे न फि‍टकरी फि‍ऱ भी रंग चोखा कहावत इसी धंधे से निकली है। सलाहें मूर्खता पूर्ण हो तो धंधा इतनी ज़ोर-शोर से चलता है कि पूछो मत। हाल ही में मैंने एक बाबा के समागम में शिरकत की और जो डायलॉग सुने उन्‍हें प्रस्‍तुत कर रहा हूँ :-
भक्‍त- बाबा बहुत दिनों से बेरोज़गार हूँ, नौकरी नहीं मिलती, क्‍या करूँ ?
बाबा- पिछली बार चिकन तंदूरी कब खाया था ?
भक्‍त- आज तक नहीं चखा बाबा!
बाबा- तभी तो कृपा कम हो रही है, पहले कहीं फाइव स्‍टार होटल में बैठकर चिकन तंदूरी खा, कृपा दौड़ी चली आएगी, नौकरी भी लग जाएगी।
भक्‍त- बाबा बिल क्‍या कृपा भरेगी ?
बाबा- बिल भरने को भी पैसा नहीं है तो फि‍र आया क्‍यों यहॉं ?
भक्‍त- बाबा जो कुछ था उससे समागम की एन्‍ट्री फीस भर दी, अब कहॉं से लाऊँ पैसा ?
बाबा- अच्‍छा यहॉं भी कृपा कम हो रही है, चना कब से नहीं खाया ?
भक्‍त- बाबा रोज़ चना खाकर ही गुज़ारा करता हूँ !
बाबा- आज से चना खाना बंद कर दो, कृपा आना शुरू हो जाएगी। चने के पैसे बचेंगे तो तंदूरी चिकन खा लेना, सब ठीक हो जाएगा।
भक्‍त- चना नहीं खाउँगा तो जिंदा कैसे रहूँगा।
बाबा- यह मेरी समस्‍या नहीं है।
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भक्‍त- बाबा मेरी दोनी किडनियॉं खराब हो गईं हैं और लीवर सड़ गया है,  डाक्‍टरों ने जवाब दे दिया है, कुछ करो बाबा !
बाबा- ठर्रा कब से नहीं पीया ?
भक्‍त- क्‍या बात करते हो बाबा, मैं तो चाय-काफी भी नहीं पीता !
बाबा- यहीं तो कृपा कम हो रही है, जीवन में कभी भी ठर्रा नहीं पीयोगे तो लीवर-कीडनी खराब नहीं होगी तो क्‍या होगा ? जाओ पहले किसी कलारी पर जाकर ठर्रा चढ़ाओ, सब ठीक हो जाएगा।
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भक्‍त- बाबा मेरी शादी नहीं हो रही है।
बाबा- शादी में लड्डू कब से नहीं खाया ?
भक्‍त- कल ही खाया था बाबा।
बाबा- कल के पहले कब खाया था?
भक्‍त- परसो !
बाबा- परसो के पहले ?
भक्‍त- नरसो !
बाबा- दूसरों की शादियों में रोज़-रोज़ लड्डू खाओगे तो कृपा कैसे आएगी। आज से लड्डू खाना बंद करके बरफी खाओ, कृपा आना शुरू हो जाएगी।
भक्‍त- बाबा मैं तो लड्डू के साथ-साथ बर्फी भी खाता हूँ !
बाबा- यही तो गड़बड़ करते हो। जाओ लड्डू खाना बंद करके सिर्फ बरफी खाओ। बहुत जल्‍दी शादी हो जाएगी।
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भक्‍त- बाबा मैं बहुत पढ़ता हूँ बहुत पढ़ता हूँ लेकिन पास ही नहीं होता।
बाबा- अच्‍छा, क्‍या कर रहे हो ?
भक्‍त- बाबा बी.एस सी. कर रहा हूँ।
बाबा- कौन से सब्‍जेक्‍ट से बी.एस सी. कर रहे हो।
भक्‍त- फि‍जिक्‍स, केमेस्‍ट्री, मैथ्‍स बाबा।
बाबा- इसीलिए तो कृपा नहीं आ रही है, कल से राजनीति और दर्शनशास्‍ञ की पढ़ाई करके बी.एस.सी. की परीक्षा दो पास हो जाओगे।
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यह सब सीन देख-सुनकर मुझे पूरा भरोसा हो गया है कि इस देश में ठगी का धंधा अब बड़ी इज्‍ज़त का धंधा हो गया है और अब इसमें जूते पड़ने की संभावनाऍं नगण्‍य हो गईं है। चूँकि व्‍यंग्‍यकारों के पास ऐसी धांसू सलाहों की कोई कमी नहीं होती इसलिए सभी व्‍यंग्‍यकारों को भी मेरी विनम्र सलाह है कि जबरन कलम घिसना छोड़कर बाबागिरी का धंधा शुरू कर मूर्खता पूर्ण सलाहें देने लग पड़ें, कहीं कोई खतरा नहीं है, फायदा ही फायदा रहेगा। मैं तो बहुत जल्‍द यह धंधा शुरु करने वाला हूँ। प्रथम सौ लोगों को फीस में मोटी छूट दी जाएगी। पहले आऍं पहले पाऍं।