रविवार, 11 मई 2014

महाराज केजरादित्य और लोकतंत्र का पिशाच



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
महाराज केजरादित्य ने जब दोबारा लोकतंत्र के पिशाच को कंधे पर उठाकर लोकसभा की तरफ दौड़ लगाई तो पिशाच बहुत फड़फड़ाया, चीखा-चिल्लाया, नानुकुर की, एक तरह से उसने केजरादित्य महाराज के साथ न जाने की ज़िद पकड़ ली। महाराज उसे जमीन पर घसीटते-पछीटते हुए खीच कर कंधे पर डालने का प्रयास करते रहे और लोकतंत्र का पिशाच उनका भरसक प्रतिरोध करता रहा। अंततः जीत महाराज केजरादित्य की हुई, लोकतंत्र के पिशाच को मरे हुए सुअर की तरह कंधे पर डालकर वे लोकसभा की दिशा में चल पड़े।
बोरियत दूर करने के लिए लोकतंत्र के पिशाच ने ही बातचीत प्रारम्भ की और केजरादित्य महाराज पर तीखा आक्रमण करते हुए पूछा-‘‘क्यों उठाया बे मुझे, आखिर क्यों! सड़ने देता मुझे वहीं। पिछली बार भी कंधे पर उठाकर विधानसभा की ओर ले चला था और बीच रास्ते में पटक कर चलता बना! जब सम्हाल नहीं सकता तो क्यों दोबारा उठाया मुझे! फालतू की नोटंकी मत किया कर, तुझसे कुछ होने-हवाने का नहीं है। चुपचाप मुझे वही छोड़ आ जहाँ से उठाया था।’’
केजरादित्य महाराज को अपनी पिछली हरकत से थोड़ी झेंप सी तो अवश्य महसूस हुई मगर उन्हें भी राजनीति में कुछ वक्त तो हो ही गया था। बेशर्मी की चमड़ी धीरे-धीरे मोटी हो चली थी। दंभ के साथ बोले-‘‘मैंने कोई गलती नहीं की है। गलती अगर किसी ने की है तो वो खुद तुम हो। क्यों एक टाँग पर लटके हुए थे मेरे कंधे पर, ठीक से नहीं बैठ सकते थे। अच्छे से अपने पैर गरदन के दोनों ओर जमाकर बैठते तो उन कम्बख्त पाखंडी भ्रष्टाचारियों को तुम्हारी टाँग पकड़ कर खीचने का मौका ही नहीं मिलता। कभी नहीं गिरते मेरे कंधे से। मैं तुम्हें विधानसभा पहुँचाकर ही दम लेता।’’
लोकतंत्र का पिशाच इस पर आँखें मटकाता और हाथ नचाता हुआ बोला-‘‘राजन के बच्चे, जबरदस्ती मुझे कंधे से उतार फेंका बीच सड़क में और कह रहा है एक टाँग से क्यों लटके थे? अंधा है क्या तू! देखता नहीं मेरी एक ही टाँग है! लम्बी छिपकली की पूँछ की तरह। सढ़सठ सालों में काफी लम्‍बी हो गई हैं मेरी यह टाँग। देश की सीमाएँ फांदकर बाहर भी निकलने लगी हैं। नौसीखिये! पहले तुझे मुझ जैसे एक टाँग वाले विराट पिशाच को सुभीते से कंधे पर बिठाने की प्रेक्टिस करके आना चाहिए था, बड़ा आया विधानसभा पहुँचाने वाला।’’
केजरादित्य ने आश्चर्य से दीदें फाड़ते हुए कहा-‘‘एक टाँग व़ाला पिशाच! लोकतंत्र? छिपकली की पूछ जैसा! मैंने तो सुना था कि तुम्हारी तो चार टाँगें हैं! इसीलिए तो मैंने तुम्हें अपने कंधे पर बिठाया था। मुझे भरोसा था कि मैं चारों टाँगों को मैं अच्छे से साध लूँगा। अगर मुझे पता होता कि तुम्हारी एक ही टाँग है, और उसकी वजह से तुम ठीक से कंधे पर नहीं सवार हो सकते हो, तो सच कहता हूँ उस छिपकली की पूँछ के तो मैं टुकड़े-टुकड़े करके जमुना में बहा देता और जनता के चंदे से चारों टाँगों का एक नया सेट बनवा देता।
लोकतंत्र का पिशाच केजरादित्य महाराज की बातें सुनकर ठठाकर हँस पड़ा। बोला-‘‘ राजन बच्चा है तू अभी। हैं तो मेरी चार ही टाँगें, मगर जब तुझ जैसे किसी सिरफिरे से साबका पड़ता है तो मेरी चारों टाँगें मिलकर एक हो जाती हैं और छिपकली की पूँछ की शक्ल ले लेती हैं। जानता है राजन छिपकली की पूँछ की खासियत क्या होती है?’’
केजरादित्य महाराज भोलेपन से बोले-‘‘नहीं जी, मुझे तो किसी ने आजतक नहीं बताई छिपकली की पूँछ की खासियत, तुम्हीं बता दो!’’
लोकतंत्र का पिशाच बोला-‘‘ राजन जाओ अपने बड़े-बूढ़ों से पूछो, वे बताएंगे, कि छिपकली की पूँछ जितनी बार भी काटी जाए उतनी बार उग आती है।’’ इतना कहकर लोकतंत्र के पिशाच ने जोरदार दानवी ठहाका लगाया और महाराज केजरादित्य के कंधे से नीचे कूद पड़ा। दुनिया देख रही थी कि अब की बार वह बदबू और कीचड़दार नाली में गिरा था। महाराज केजरादित्य पूरे जतन से उसे खीचकर फिर से अपने कंधे पर बिठाने की कोशिश करने लगे मगर लोकतंञ का पिशाच कसके धरती पर अपनी पकड़ बनाए चिपका रहा। अचानक आसपास पेड़ों के झुरमुट के पीछे से कई सारे महाराज, महारानियाँ निकल आए और लोकतंञ के पिशाच के साथ घसीटा-पछीटी करने लगे। सभी लोकतंञ के पिशाच को अपने कंधे पर बिठाकर लोकसभा ले जाना चाहते हैं। कौन उसे उठाकर कंधे पर बिठा पाएगा या नहीं बिठा पाएगा, यह रहस्‍य और रोमांच और कौतूहल का विषय है।
पाठकों से सवाल-‘‘कौन सा महाराज लोकतंत्र के पिशाच को कंधे पर लादकर लोकसभा तक ले जाने में कामयाब हो पाएगा? सही जवाब के लिए लिखिए लोकतंञ का पिशाच 1 अथवा लोकतंञ का पिशाच 2 अथवा 3,4,5,6  और भेज दीजिए अपना एस.एम.एस 272,272,272 पर।    
(अप्रकाशित)  
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बुधवार, 30 अप्रैल 2014

हमारी अपनी नोटा पार्टी



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
देश में सभी धर्म-सम्प्रदायों, जातियों, वर्गों यहाँ तक कि चोर-उचक्कों, ठग-लुटेरों, कातिलों, बलात्कारियों तक का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनैतिक पार्टियाँ मौजूद हैं, मगर हाल ही में उदित हुए ‘नोटा-सम्प्रदाय’ का प्रतिनिधित्व करने वाली कोई पार्टी अस्तित्व में नहीं है। नोटा प्रमियों को लग रहा है जैसे कोई बाप ही नहीं है। इस स्थिति में ‘नोटा-सम्प्रदाय’ के सदस्य किसी भी पार्टी के बहकावे में आकर अपना वोट खराब कर सकते हैं। इसलिए हमने इन्‍हें संगठित कर देश की सबसे बड़ी पार्टी ‘नोटा-पार्टी’ बनाने का बीड़ा उठाया है। इस पार्टी का मिशन होगा, सूरज की पहली किरण के साथ ज्यादा से ज्यादा तादात में पोलिंग बूथ पर भीड़ लगाकर ‘नोटा’ बटन का कचूमर निकालना।
हमने यह बीड़ा उठा तो लिया है मगर हम स्पष्ट कर देना चाहते है कि हम चुनावों में आखिरी ईवीएम का आखिरी बटन दब जाने तक ही इस बीड़े को सिर पर ढोएंगे, उसके बाद कहीं भी नाली में फेंककर चलते बनेंगे। वैसे भी, ईवीएम का बटन दब जाने के तुरंत बाद सारी पार्टियों के ‘बीड़ों’ का यही तो हश्र होता है!
इस पार्टी में कोई नेता नहीं होगा, कोई अनुयायी नहीं होगा। न कोई चन्दा माँगेगा ना देगा। कोई धरना प्रदर्शन हाय-हाय नहीं होगी, कोई पोस्टर, पम्पलेट, बैनर नहीं होगा। पार्टी न किसी का सपोर्ट लेगी न देगी, चाहे टाटा-बिरला-अंबानी ही क्यों न आ जाएँ। पार्टी की कोई चुनावी सभा नहीं होगी न हवाई यात्राएँ की जाएंगी। हमारा दावा है कि हमारी यह ‘नोटा’ पार्टी देश की एकमात्र सच्ची लोकतांत्रिक पार्टी होगी जिसमें हम किसी भी तुर्रम खाँ को रिजेक्ट करने के इस महान लोकतांत्रिक अधिकार को इस हद तक अपने जीवन में उतारेंगे कि एक दिन खुद की सत्ता को भी सिरे से रिजेक्ट कर देंगे। यह एक तरह से नेतृत्व की भीड़ से मुक्त होकर परम आत्मा में लीन हो जाने की तरह का कांड होगा।
आइये, ज्यादा से ज्यादा तादात में हमारी अपनी ‘नोटा’ पार्टी में शामिल होकर महान लोकतांत्रिक पर्व ‘चुनाव’ को सफल बनाएँ। 
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शुक्रवार, 28 मार्च 2014

जबरदस्ती का चुनावी टिकट



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
वे नाहरमुँह भागे चले आए और बेहद शर्मिंदगी से बोले-‘‘कम्बख्तों ने कहीं का नहीं छोड़ा, जबरदस्ती ‘टिकट’ पकड़ा दिया। ऊपर से धमकाया भी है कि-‘‘अगर ज़मानत ज़ब्त हुई तो बेटा तेरी खैर नहीं!’’ उनके साथ घटी इस त्रासद घटना से मुझ पर भी ‘सकते’ का दौरा सा पड़ गया है।
वे सुबकते हुए अपनी पीड़ा बयान कर रहे थे-‘‘ भगवान का दिया हुआ सब कुछ है अपने पास, मगर उस निर्दयी ने बिना माँगे चुनाव का टिकट दिलवाकर इस गरीब पर इतना बड़ा अन्याय किया है कि मत पूछो। पता नहीं किस जन्म का पाप है जो आज यह दिन देखने को मिल रहा है। कभी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं आई, मगर अब वोटों के लिए हाथ फैलाकर भीख कैसे माँगू समझ में नहीं आ रहा है। जी करता है कि गले में फाँसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर लूँ।’’
मैंने उन्हें सात्वना देते हुए कहा-‘‘देखों, निराशा भरी बातें मत करों, जो होना है वह तो हो गया। नाम वापसी के समय तक कुछ हो सकता हो तो देख लो, किसी राष्ट्रीय स्तर के नेता से जुगाड़ हो तो सिफारिश लगवाकर टिकट कैंसल करवाने की कोशिश कर लो, पैसे का मुँह मत देखना, जितना खर्च करना पड़े कर लो, तब भी अगर कुछ न हुआ तो फिर लड़ो भैया, ईश्वर की मर्ज़ी के आगे हम भी क्या कर सकते हैं। अब जब ओखली में सर डल ही गया है तो भलाई इसी में है कि परिस्थितियों का सामना करो।’’
वे बोले-‘‘क्या खाकर सामना करूँ? विरोधियों की प्रचंड लहर चल रही है और इन निकम्मों, बदमाशों के पिछले सढ़सठ सालों के कुकर्म मेरे माथे पर आ गए हैं। मैं तो कम्बख्त परचा दाखिल करने से पहले ही हारा हुआ केंडीडेट हूँ। मोहल्ले वालों तक के वोट नहीं पड़ने वाले। घर वाली भी शर्तिया ‘नोटा’ का बटन दबा कर आएगी।’’
मैंने कहा-‘‘देखों भैया, तुम्हारे सर पटकने से न वोटर पिघलने वाला है और न चुनाव आयोग तुम्हें निर्विरोध विजेता घोषित करने वाला है। हिम्मत हारने से काम नहीं चलने वाला मित्र, चुनावी व्यूहरचना बनाना प्रारंभ करो।’’
वे बोले-‘‘काहे की व्यूहरचना! पार्टी वालों ने साफ कह दिया है कि एक पैसा नहीं देंगे, अपनी गाँठ से लगाओ। तुम्हीं बताओं हारने के लिए कोई अपनी गाँठ की पूँजी खर्च करता है। राजनीति में आदमी कमाने के लिए जाता है या गँवाने के लिए! मति मारी गई थी मेरी जो पार्टी की सदस्यता ले ली, किसे पता था कि कम्बख्त चुनाव गले पड़ जाएंगे। पार्टी का तमाम कार्यकर्ता भी विरोधी उम्मीद्वार से बारगेनिंग में लगा है, एक कमबख्त तो मेरे ही वोट का सौदा कर आया।’’
उपसंहार-कुछ समय बात सुना गया कि वे विरोधी पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने की विरोधी पार्टी की शिकायत पर चुनाव आयोग में तलब किये गए, जहाँ उन्होंने अपनी पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चुनाव आयोग को उसकी मान्यता समाप्त करने की गुजारिश की है। 
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शुक्रवार, 21 मार्च 2014

बस एक अदद वादा दे दो



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
चुनाव की बेला निकट है। शर्तिया चुनाव जीतने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के अलावा अगर कुछ ज़रूरी है तो वह है एक अदद धाँसू वादा। कितनी भी न्याय-नीति, सुशासन की बातें कर लीजिए, जनता की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, वह तब तक टस से मस नहीं होगी जब तक उससे एक लार टपकाने वाला वादा नहीं कर लिया जाएगा। जनता-जनार्दन को वोटर में तब्दील कर उसका वोट झड़ाने के लिए भाषणों की स्टेंडअप कॉमेडी के साथ-साथ चंद आकर्षक और लुभावने वादों की झड़ी लगाना अत्यंत आवश्यक है। मेरी ओर से कुछ बेहतरीन वादों के पेटी पैक नमूने प्रस्तुत हैं जिन्हें सचमुच जीतने का इच्छुक उम्मीद्वार बिना किसी रिस्क के आज़मा सकता है।
इन दिनों महँगाई आसमान छू रहीं है। सरकार तो अपने कर्मचारियों-अधिकारियों को महँगाई भत्ता बाँटकर उनका गुस्से पर ठंडा पानी डाल देती है। चुनाव जीतने की ख्वाहिश रखने वाले उम्मीदवारों वोटरों को भी महँगाई भत्ता बाँटने का वादा कर सीट सुरक्षित कर सकते हैं। चुनाव के बाद में महँगाई भत्ता सीधे वोटरों के खाते में जमा करने का वादा कर दें। वोटरों का बैंक तो ज़रूर होता है मगर उनका कोई खाता तो होता नहीं, लिहाज़ा कोई भत्ता जमा करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। बात आई गई हो जाएगी।
गरीबों के लिए सस्ती दरों पर जो गेहूँ-चावल बाँटा जा रहा है, मध्यमवर्गीय वोटरों को जिन्हें मुफ्त का माल नहीं मिल रहा उनके पेट में काफी दर्द है और इस वजह से उनका वोट दिशाहीन हो सकता है। इसलिए उनसे पाँच-पाँच किलो शरबती गेहूँ और आधा किलो भर बासमती राइस प्रति व्यक्ति बाँटने का वादा कर वोटों को मनचाही दिशा दी जा सकती है। घी-तेल के ढाई-ढाई सौ ग्राम के पाउच और कम से कम हफ्ते भर का किराना घर-घर पहुँचाने का वादा कर दिया जाए तो समझ लो वोटर अपने खर्चे पर देश भर में फैले अपने रिश्तेदारों को बटोर कर समारोहपूर्वक आपके नाम का बटन दबाने बूथ पर पहुँच जाएगा। पेट्रोल-डीज़ल, मिट्टी का तेल और रसोई गैस के भाव हमेशा चढ़े रहते हैं। ये ज्वलनशील पदार्थ सुविधाजनक पेकिंग में पैक करवा कर घर-घर बँटवाए जा सकते हैं, इससे फुटकर मतदाता को रिझाया जा सकता है। पेट्रोल-डीज़ल, घासलेट और रसोई गैस की ऐजेंसियाँ बँटवाने का वादा करके वोटरों के प्रभावशाली दलालों को अपने पक्ष में सक्रिय कर सके तो गजब हो जाए। ये लोग तो खुद सारी व्यवस्था जमा कर वोटरों को घेर-घेर कर बूथ तक ले आने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभा देंगे।
भारतवर्ष की चुनाव परम्परा में देसी-विदेशी ठर्रे का काफी महत्व रहा है। दरअसल ठर्रा लोकतंत्र के अभिन्न अंग के रूप में लम्बे समय से अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। पहले के ज़माने के चुनावों में एक अदद पव्वे की आपूर्ति के एक नशीले वादे से काम चल जाता था, परन्तु अब ज़माना बदल गया है, लोगों को रिजल्ट आने तक का कोटा चाहिए। चुनावी सख्तियों के मद्देनज़र यह एक बड़ा मुश्किल काम है, उम्मीद्वारी खतरे में पड़ सकती है। सबसे बढ़िया तरीका यह है कि आप समाज के कुछ दंदफंदी ब्लेक मार्कटियर्स को मुफ्त में देसी-विदेशी शराब के ठेके दिलवाने का पुख्ता वादा कर लें, बाकी का काम वे खुद कर लेंगे।
उम्मीद्वारों के सामने इन दिनों भीड़ पर नियंत्रण रखने वाले छुटभैये नेताओं को साधना एक बड़ा चुनौती भरा काम है। वे थाली के मैंढक की तरह उछल-उछल कर दूसरी पार्टियों के पाले में कूदते रहते हैं। उनसे वादा किया जाए कि उन्हें सोने अथवा हीरे की खदान दिलवाई जाएगी। फिर भी यदि वे न माने तो उनसे कोयले अथवा मुरम-कोपरे, पत्थर की खदान दिलवाने का लालच दे दीजिए, वे नोटों के अंबार का  सुखद स्वप्न आँखों में लिए आपके लिए वोटों का अंबार लगवा देंगे। आजकल सोने-हीरे की खदान से इतना सोना-हीरा नहीं निकल रहा है जितना मुरम-कोपरे और पत्थर की खदानों के ज़रिये पैदा किया जा सकता है।
कहा जा रहा है कि आसन्न चुनावों में इस बार सबसे ज़्यादा अनिर्णय की स्थिति में पड़ा हुआ युवा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है। कम्प्यूटर, टेबलेट, मोबाइल फोन, से लेकर पीज़ा-बर्गर पेप्सी-कोक तक कुछ भी मुफ्त बाँटने का वादा कर इस युवा ऊँट अपनी मनपसन्द करवट बिठाया जा सकता है। जींस, टी शर्ट, आदिदास के जूते भले ही फटे हों मगर हों ब्रांडेड तो देश के ये होनहार अपनी शक्ति ई.वी.एम. में आपके नाम के बटन पर उतार देंगे।
जहाँ तक मुझ जैसे बुद्धिजीवी का प्रश्न है मुझसे तो बस एक अदद रेमण्ड के सूट का वादा कर देना, मैं तुरंत तुम्हारे जाल में फँस जाउँगा और अपना कीमती वोट उम्मीद्वार के घर जाकर दे आउँगा। मेरी बीवी का वोट चाहिए तो एक चंदेरी की साड़ी मेरे हवाले कर देना उसे बूथ तक ले जाने की जिम्मेदारी मेरी, बाकी वो बदन किसका दबाएगी यह मैं नहीं कह सकता।
यदि कोई उम्मीद्वार चुनाव आयोग के डर से अथवा अपने किन्हीं अदृश्य सैंद्धातिक आग्रहों के कारण उपरोक्त में से कुछ भी बाँटने का वादा करने में अपने आप को असमर्थ पाता है तो कोई समस्या नहीं है, बस जनता-जनार्दन को थोड़ा सा डर, भय, आतंक, दंगा-फसाद, मार-काट कत्लेआम का वादा दे देना, भगवान ने चाहा तो वोट आपके पक्ष में पड़ जाएगा। कुछ भी नहीं चाहिए हमारे देश के सम्मानित वोटर को, खूब चुनाव लड़ो, जीतो, सांसद बनो, मंत्री बनो। उसे कुछ दो न दो, एक बस एक अदद वादा दे दो, इस चुनाव में तो आपका काम पक्का बन जाएगा।
            उम्‍मीद्वार खुद अपनी रिस्‍क पर ये वादे करे। चुनाव आयोग का डंडा पड़ने पर मेरी कोई जिम्‍मेदारी नहीं होगी।

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

न समझोगे तो मिट जाओगे, अरे ओ ‘आप’ वालों

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
समझते क्या हो अपने-‘आप’ को? हरीशचन्द्राई का ठेका ले रखा है क्या ‘आप’ ने, जो हम सबको चोर-उच्चकों का सर्टिफिकेट बाँटकर खुद दूध का धुला बने फिर रहे हो। कान खोलकर सुन लो, झूठे वादे करके ‘आप’ दुनिया को बेवकूफ बना सकते हो, हमें नहीं। यह हक पारम्परिक रूप से सिर्फ हमारे पास है। हमी हैं जो वादाखिलाफी के बावजूद दो-दो तीन-तीन पारियों में खेल जाते हैं। ‘आप’ को तो वादे पूरे कर देने के बाद भी हम एक पारी तक पूरा टिक जाने दें, तो हमारा नाम बदल देना। अपनी औकात में रहो ‘आप’ वालों, समझे कि नहीं समझे।
गुरबक समझते हो हमें? बरसों-बरस से बनी लीक तोड़गे! जनता को पानी दोगे! और वह भी मुफ्त! उल्लू के पट्ठों, जनता क्या मुफ्त पानी देने के लिए होती है? मूर्खों, इतना भी नहीं पता कि जनता को उंगली पकड़ाओ तो वो पोछा पकड़ लेती है। ‘आप’ उसे पानी दोगे तो वह ‘साफ’ पानी माँगने के लिए आ खड़ी होगी। तो क्या सबको आर.ओ. सिस्टम बाँटते फिरोगे? जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ करना चाहते हो नराधमों! कीड़े पडे़ंगे कीड़े ‘आप’ के शरीर में। कितनी घृणास्पद और निंदनीय बात है, सार्वजनिक नलों पर झौंटा-झॉटी, गाली-गलौच, सिर-फुटव्वल और खून-खच्चर की सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति को जड़ से खत्म करना चाहते हो बदमाशों, तुम्हें नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी।
बिजली का बिल आधा करोगे, जैसे बिजली ‘आप’ के बाप की है । अरे है बाप की तो पूरा बिल ही माफ कर दो न, कौन रोक रहा है ‘आप’ को? ‘आप’ तो बिल के साथ-साथ उसे जमा करने के लिए पैसे भी बाँट दो जनता में, हमारे बाप का क्या जा रहा है! मगर, ताजा-ताजा गल्ले पर बैठे हो बेटों इसलिए भाई समझ कर समझा रहे हैं, जनता को बिजली-विजली नहीं दी जाती, सिर्फ बिल दिया जाता है। दुगना है, तिगुना है, या चार-पाँच-छः गुना यह नहीं देखा जाता। दादागिरी से उससे पैसे भरवाए जाते हैं, या फिर लाइन काट दी जाती है। कोई ज़्यादा चू-चपड़ करें तो उसे जेल भिजवा दिया जाता है। यह होता है सुशासन का तरीका, मगर नए-नए आए हो न, ‘आप’ नहीं समझोगे।
बतोलेबाज़ी की हद होती है, कह रहे हो कि दिल्ली में पाँच सौ सरकारी स्कूल खोल दोगे। अबे, उनमें पढ़ने के लिए बच्चे कहाँ से लाओगे! और प्रायवेट स्कूलों के मालिकों को क्या धूनी रमाने के लिए हिमालय भेज दोगे? या कि उन स्कूलों के बाहर डंडा धारी पुलिस बिठाओगे? हद है! कल को तो ‘आप’ कहने लगोगे कि जनता को पढ़ाई के लिए स्कूलों में धक्के खाने की ज़रूरत नहीं है, हम घर-घर में स्कूल खोल देंगे। जनता के बच्चों को इस तरह घर-घर जाकर ज्ञानी बना देने की परम्परा अच्छी नहीं है, समझ लो अच्छे से। कल को यही जनता और उसके बच्‍चे जूते-चप्पल हाथ में लेकर ‘आप’ को ही ज्ञान बाँटने के लिए आ खड़े होंगे। भागते फिरोगे गली-गली।
परसों तुम्हारा नया शिमूफा होगा कि जनता को मरने के लिए प्रायवेट अस्पतालों में जाने की जरूरत नहीं है, ‘आप’ गली-गली में सरकारी अस्पताल खोल दोगे और मुफ्त इलाज और दवाइयाँ भी बँटवाओगे। इतना कमीनापन अच्छा नहीं। करोड़ों रुपये खर्च कर स्थापित हुए कुशाग्र बुद्धि डॉक्टर और लायसेंस के लिए लाखों रुपया खर्चा कर धंधे पर बैठे ड्रगिस्ट-केमिस्ट क्या फुटपाथ पर बैठकर जड़ी-बूटी कूटेंगे ? ‘नानसेंस’, किसी दिन कहोगे प्रदूषण बहुत है, सारी जनता को आक्सीजन सिलेंडर बाँटे जाएंगे, मुफ्त! यह सब क्या सरकारी जिम्मेदारियाँ हैं? बिगाड़ रहे हो जनता को! कल को हम वापस आएंगे तो इतना सब कुछ कैसे कर पाएंगे? बंद करो यह लोकतंत्र-लोकतंत्र का नाटक, दिमाग खराब कर के रख दिया ‘आप’ ने।
गप्प हॉक रहे हो कि मुंसीपाल्टी, कलेक्ट्री, आर.टी.ओ. में किसी को दलाली देने की जरूरत नहीं है, सारे काम मुफ्त हो जाएंगे। पंजीरी बँट रही है क्या सालों? लोकतंत्र में ऐसा कहीं होता है। लोकतंत्र का मतलब क्या यह होता है कि सब कुछ मुफ्त बँटने लगे, सब को सब कुछ मिल जाए, चारों ओर अमन चैन हो, सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगे। मूर्खों हमारी नहीं तो कम से कम अपनी तो चिंता कर लो, पहली बार में ही जनता को सब कुछ दे दोगे, तो अगले चुनावों में वोटों के लिए जनता क्या बांगलादेश से लाओगे?
बावलों अगर सपने में भी यह सोचते हो कि ‘आप’ जैसे पढ़े-लिखों की गुडागर्दी से देश की सारी जनता ‘आप’ के झाँसे में आ जाएगी तो सुन लो, अभी बच्चे हो, जनता को झाँसे में लाने का जो अनुभव हमें है, तुम्हें बिल्कुल नहीं है। सावधान हो जाओ ईमानदारी के पिल्लों, हमारी फौज ‘आप’ को भौंक-भौंक कर खदेड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार है। हम ‘आप’ को भंभोड़कर रख देंगे और काटेंगे-घसीटेंगे अलग। ‘आप’ को इस देश से खदेड़कर ही दम लेंगे।
वह समय गया जनतंत्र की औलादों, जब जन का, जन के लिए, जन के द्वारा चलाए जाने वाले परोपकारी राज्य को ‘जनतंत्र’ कहने की कुप्रथा प्रचलन में थी। हमने एडी-चोटी का जोर लगा कर ऐसी कुप्रथाएँ खत्म की और धन का, धन के लिए, धन के द्वारा स्वलोभकारी राज्य की स्थापना की जो आज ‘धनतंत्र’ के नाम से जोर-शोर से चल रहा है। ‘आप’ लोग जन-जन को फालतू की पट्टी पढ़ाकर हमारी भविष्य की सारी योजनाओं पर पानी फेरना चाहते हो! याद रखो, भूलकर भी अगर ऐसी नापाक हरकत की, तो दौड़ा-दौड़ाकर इसी जनता से पिटवाएंगे ‘आप’ को, जो कि लहरा-लहरा कर ‘आप’ की घिनौनी झाड़ू दिखाने की जुर्रत कर रही है हमें।
कम्बख्तों, जीयो और जीने दो के सिद्धांत पर चलना चाहिए, मगर नहीं! ना जाने किस मिट्टी के बने हो, जरा भी लोच नहीं है। अगला चुनाव फिर सर पर आ गया है, खर्चे पानी के लिए कुछ तो माल अन्दर कर लेने देते! दया-धर्म कुछ है कि नहीं दुनिया में? हमें पता है लालची बंदरों, तुम हमें बिल्कुल हॉथ मारने नहीं दोगे। खुद, पाँचों उंगलियाँ घी में और सर कढ़ाई में डाल कर बैठना चाहते हो चांडालों, ताकि सारे मुल्क पर कब्ज़ा कर सारा माल अकेले ही चॉप सको! मगर ‘आप’ की तो ऐसी की तैसी, हमने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली है, जो जुम्मा-जुम्मा चार दिन में हम जैसे घाघों को किनारे कर सको! तुम रायता बनाना शुरू तो करो, हम भी उसे फैलाने के लिए कमर कस के तैयार बैठे हैं। ना हमने तुम्हारे रायते को मिट्टी में मिला दिया, तो संसदीय प्रजातंत्र के पटल से हमारा नामो-निशान जे.सी.बी. लगवाकर खुरचवा देना, हम कुछ नहीं कहेंगे। अब सम्हल जाओ, ज्यादा होशियारी मत झाड़ो। न समझोगे तो मिट जाओगे, अरे ओ ‘आप’ वालों तुम्हारी दास्तॉ भी न होगी दास्तानों में।